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Showing posts from August, 2023

31 अगस्त को सुबह 9 से शाम 5 बजे तक मनाएं राखी का त्योहार

31 अगस्त को सुबह 9 से शाम 5 बजे तक मनाएं राखी का त्योहार हर साल श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को मनाया जाता है रक्षाबंधन कई पंचांगों में रक्षाबंधन 30 अगस्त बुधवार रात 9 बजकर 5 मिनट के बाद लिखा है, जो सैद्धांतिक दृष्टि से ठीक हो सकता है किन्तु व्यावहारिक दृष्टि से ठीक नहीं। 31 अगस्त गुरुवार को सुबह 9 बजे श्रवण पूजन के उपरांत सायंकाल 5 बजे तक रक्षाबंधन का पर्व मनाना कल्याणकारी होगा श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को प्रतिवर्ष रक्षाबंधन का पवित्र पर्व मनाया जाता है। इसमें अपराह्न व्यापिनी पूर्णिमा तिथि जरूरी है और इसमे भद्रा वर्जित है। भद्रा में रक्षाबंधन से राजा का अनिष्ट और फाल्गुनी (होलिका दहन) से प्रजा अग्नि इत्यादि उत्पातों से प्रजा एक ही वर्ष में हीन हो जाती है। व्रती को चाहिए कि इस दिन सुबह विधिपूर्वक स्नान करके देवता पितर और ऋषियों का स्मरण करें पूर्वा में ही गाय के गोबर से लिपे शुद्ध स्नान पर रक्षासूत्र रखकर उसका यथाविधि पूजन करें। उसके बाद रक्षासूत्र को दाहिने हाथ में बंधवाना चाहिए। रक्षासूत्र बांधते समय ब्राह्मणों को यह मन्त्रोच्चारण करना जरूरी है। येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्र महाबला ।।  ते...

बरसाना परिक्रमा

बरसाना परिक्रमा ब्रज के धर्म स्थलों पर परिक्रमा का महत्व होता है। गोवर्धन की गिरिराज परिक्रमा तो बहुत प्रसिद्ध है। मथुरा, वृंदावन आदि स्थानों पर भी परिक्रमा होती है। बरसाना की जो परिक्रमा है वह गहवरवन परिक्रमा है। कहते हैं कि बरसाना की एक परिक्रमा गोवर्धन की सात परिक्रमा के समान फलदाई है। करीब एक कोस की है यह परिक्रमा बरसाना की परिक्रमा से यहां के अधिकांश मंदिरों के दर्शन होते हैं। परिक्रमा जहां से शुरू होती है वहीं पर समाप्त होती है। ज्यादातर भक्त यह परिक्रमा मुख्य बाजार से शुरू करते हैं। बाजार से थाना मार्ग पर यह परिक्रमा आगे बढ़ती है। थाना पहुंचने के बाद रास्ता सांकरी खोर की तरफ जाता है। यहां शीतला माता का मन्दिर स्थित है। यह मन्दिर परिक्रमा के बाय ओर है। यहां भक्तजन दर्शन करते हैं। राधा की नगरी में करें राम के दर्शन यहां एक घाटी है जिसके बायीं तरफ विलासगढ़ की पहाड़ी है। दायीं तरफ कुशल बिहारी मंदिर है। यहां दायीं ओर बड़े बड़े रेतीले टीले हैं। दरअसल यह समूचा बरसाना नगर रेतीले टीलों पर ही बसा हुआ है। यहां के गलियों में हो उतार चढ़ाव दिखता है उसकी वजह उनके नीचे दबे रेत के टीले ही हैं। ...

काशी वाले से मिलना बड़ा जरुरी

काशी वाले से मिलना बड़ा जरुरी, डमरू वाले से मिलना बड़ा जरुरी, मिलना बड़ा जरुरी, मुझे मिलना बड़ा जरुरी, मिलना बड़ा जरुरी, मुझे मिलना बड़ा जरुरी काशी वाले से मिलना बड़ा जरुरी, डमरू वाले से मिलना बड़ा जरुरी, श्यामा प्यारी से मिलना बड़ा जरुरी, राधा रानी से मिलना बड़ा जरुरी, जो मैं होती पवन बसंती, झोँका बन कर आती, जो मैं होती पवन बसंती, झोँका बन कर आती, जो मैं होती बेला चमेली, जो मैं होती पवन बसंती, झोँका बन कर आती, जो मैं होती पवन बसंती, झोँका बन कर आती, जो मैं होती बेला चमेली, चरणों में बिछ जाती, जो मैं होती बेला चमेली, चरणों में बिछ जाती, जो मैं होती बेला चमेली, चरणों में बिछ जाती, जो मैं होती बेला चमेली, चरणों में बिछ जाती, बन ना सकी हवा का झोँका, ये मेरी मजबूरी, बन ना सकी हवा का झोँका, ये मेरी मजबूरी, काशी वाले से मिलना बड़ा जरुरी, डमरू वाले से मिलना बड़ा जरुरी, मिलना बड़ा जरुरी, मुझे मिलना बड़ा जरुरी, मिलना बड़ा जरुरी, मुझे मिलना बड़ा जरुरी काशी वाले से मिलना बड़ा जरुरी, डमरू वाले से मिलना बड़ा जरुरी, जो मैं होती काली बदरिया, झमा झम नीर बहाती, जो मैं होती काली बदरिया, झमा झम नीर बहाती, जो मैं होती काली...

कलश यात्रा

कलश यात्रा  सैकड़ों महिलाओं को सिर पर कलश लेकर चलते देख लोग आश्चर्यचकित हो जाते हैं। उन्हें यह सब बे फालतू का काम लगता है। कलश का अपना एक आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्त्व है । जिसे समझना जरूरी हैं। सत्य सनातन परंपरा अर्थात हिन्दू धर्म की विशेषता है कि वह वैज्ञानिक ज्ञान को प्रतीकों में बाँधकर उसे धार्मिक आस्था में ओतप्रोत कर देता है।  विद्वानों का कहना है कि सिर पर कलश रखने वाले श्रद्धालु की आत्मा पवित्र व निर्मल हो जाती है। उसके तमाम रोग दोष विकारों का भगवान हरण कर देते है। वहीं कलश को धारण करने वाले जिस मार्ग से भी ग्राम का भ्रमण करता है वहां की धरा स्वयं सिद्व हो जाती है। जो अपने सिर पर कलश धारण करने वाली आत्मा को ईश्वर पवित्र और निर्मल करते हुए अपनी शरण में ले लेते हैं।  कलश की उत्पत्ति समुद्र मंथन की कथा बहुत प्रसिद्ध है। समुद्र जीवन और तमाम दिव्य रत्नों और उपलब्धियों का स्रोत है। देवी अर्थात्‌ रचनात्मक और दानवी अर्थात्‌ ध्वंसात्मक शक्तियाँ इस समुद्र का मंथन मंदराचल शिखर पर्वत की मथानी और वासुकी नाग की रस्सी बनाकर करती हैं। पहली दृष्टि में यह एक कपोल कल्पना अथवा गल्पक...

भगवान गणेश, श्री गजानन ने, भगवान ब्रह्मा जी के मुख से उत्पन्न असुरराज, सिंदूर, का वध

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भगवान गणेश, श्री गजानन ने, भगवान ब्रह्मा जी के मुख से उत्पन्न असुरराज, सिंदूर, का वध किस प्रकार किया एवं महर्षि पराशर को उन्होंने किस प्रकार पुत्र सुख प्रदान किया एक बार द्वापर युग की बात है । एक दिन पार्वती वल्लभ भगवान् शिव, ब्रह्म-सदन पहुँचे । उस समय ब्रह्मा जी शयन कर रहे थे । नया कल्प प्रारम्भ होने को था | कमलासन ब्रह्मा जी ने निद्रा से उठते ही जँभाई ली । उसी समय उनके मुख से एक महाघोर पुरूष प्रकट हुआ । जन्म लेते ही उसने त्रैलोक्य में भय उत्पन्न करने वाली घनघोर गर्जना की । उसके उस गर्जन से सम्पूर्ण वसुधा काँप गयी, दिक्पाल भी चकित हो गये । उस महाघोर पुरूष की अंग-कान्ति जमा-पुष्प के सदृश लाल थी और उसके शरीर से तीव्र सुगन्ध निकल रही थी । उसके रूप-सौन्दर्य को देखकर पद्म्योनी ब्रह्मा भी चकित हो गये । उन्होंने उससे पूछा-‘तुम कौन हो? तुम्हारा जन्म कहाँ हुआ है और तुम्हें क्य अभीष्ट है?’ उस पुरूष ने उत्तर दिया-‘देवाधिदेव ! आप तो अनेक ब्रह्माण्डों का निर्माण करते हैं, सर्वज्ञ हैं, फिर अनजान की तरह कैसे पूछ रहे हैं? जँभाई लेते समय मैं आपके मुख से ही प्रकट हुआ हूँ, अतः आपका पुत्र हूँ | अतएव आप म...

विभीषण की पुत्री त्रिजटा

विभीषण की पुत्री त्रिजटा रामायण की एक पात्रा त्रिजटा लंका की मुख्य साध्वी, राक्षसी प्रमुख थी। जिसका जन्म तो राक्षस कुल में हुआ था लेकिन उसका हृदय देवियों के समान पवित्र था।  श्री रामचरित मानस में त्रिजटा एक लधु स्त्रीपात्र है । यह पात्र आकार में जितना ही छोटा है, उसकी महिमा उतना ही गौराव मण्डित है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि श्री रामचरित मानस के हर छोटे-से-छोटे पात्र भी विशेषता संपन्न है।  त्रिजटा की बात करें तो मन्दोदरी ने त्रिजटा को सीताजी की देख-रेख के लिए उसे विशेष रूप से सुपुर्द किया था। वह राक्षसी होते हुए भी सीता की हितचिंतक थी।  सम्पूर्ण ‘श्री रामचरित मानस’ में केवल दो काण्ड सुन्दरकाण्ड और लंका काण्ड में सीता-त्रिजटा का वर्णन मिलता है उनके वार्तालाप के रूपमें त्रिजटा का वर्णन है। परंतु इन लघु वार्तालापों में ही त्रिजटा के चरित्र की भारी विशेषताएँ दिखाई दी हैं। पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदासजी ने मानस के सुन्दरकाण्ड की एक चौपाईं में त्रिजटा का स्वरूप इस प्रकार बतलाया गया है : त्रिजटा जाम राच्छसी एका ।* राम चरन रति निपुन बिबेका ।।* (रा.च.मा ५। ११ । १) जहां तुलसीदास है ...

नंदनार की कथा

नंदनार की कथा क्या आपने पूरी सुनी ? क्या कहा सोच में पड़ गए,  तो हम आपको बता दें कि आज की कथा में यह कथा अधूरी रह गई। चलो हम इसे आपको पूरा सुनाते हैं? नंदनार तमिलनाडु के एक छोटे से गांव में रहता था। वह भोले का भक्त था। वह खेतिहर मजदूर और गायक थे। यह जरूरी नहीं कि भगवान शिव का भक्त धनवान हो महान व्यक्ति हो परंतु यदि शिव भक्त के पास में भक्ति है भजन है जल चढ़ाने के लिए एक लोटा है और घर में जल है तो वही सबसे महान शिव भक्त है। नंदनार के माता पिता बहुत गरीब थे उन्होंने उसे एक साहूकार के हाथों कुछ पैसों में बेच दिया इस प्रकार नंदनार खेतिहर बंधुआ मजदूर बनकर रह गया। उससे बहुत काम कराया जाता उससे खेती कराई जाती, उससे मजदूरी कराई जाती ,उससे सभी काम कराए जाते। वह शिव का भक्त खेतिहर मजदूरी करता हुआ भी शिव के भजन गाया करता था।  नंदनार सेठ जी के यहां जो काम किया करता था। उस गांव से 25 किलोमीटर दूर तिरुपंकुर नाम का एक शिव मंदिर था। हालाँकि, उनके मन में तिरुपंकुर के शिवलोकनाथर मंदिर में शिव की प्रतिमा के प्रति सम्मान व्यक्त करने की प्रबल इच्छा थी । वह हमेशा से इस मंदिर में जाना चाहता था क्यों...

मल्लनमूलई का मल्ला चोर

मल्लनमूलई का मल्ला चोर  सदगुरु यहाँ मल्ला नाम के एक चोर की एक दिलचस्प कहानी सुना रहे हैं, जो शिव का एक परम भक्त था। सद्‌गुरु : आज मैं आप को एक योगी के बारे में बता रहा हूँ जो मेरे जन्मस्थान के बहुत निकट रहा करते थे। मैंने इस व्यक्ति के बारे में सुना था और उन विलक्षण घटनाओं के बारे में भी जो वहां हुइं थीं, पर अपनी युवावस्था में मैंने उनकी ओर कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया। वे बातें सुन कर मुझे थोड़ा रोमांच होता था, पर उस समय उन सब को मैंने कोई महत्व नहीं दिया। एक लुटेरे की शिवभक्ति मैसूर से लगभग 16 किमी दूर, नंजनगुड के नाम से प्रसिद्ध जगह की बाहरी सीमा पर एक शिव-भक्त रहता था। उसका नाम मल्ला था। वह किसी धार्मिक परंपरा से नहीं जुड़ा था और पूजा, ध्यान के नियम नहीं जानता था। लेकिन बचपन से ही आँखें बंद करने पर उसे सिर्फ शिव दिखते थे। शायद उनके लिये भक्त एक ठीक शब्द नहीं है। उनके जैसे लाखों लोग हैं जो एक तरह से शिव के बंदी हैं, उनके पास कोई और चारा ही नहीं है। शायद मैं भी उनके जाल में फंस गया। हम उनकी खोज नहीं कर रहे थे - हम ऐसे घमंडी थे कि कोई खोज कर ही नहीं सकते थे -- लेकिन उनके फंदे में फंस गए ...

Day 2 || श्री कावड़ शिवमहापुराण कथा || पूज्य पंडित प्रदीप जी मिश्रा (सीहोर वाले) || रायपुर, छत्तीसगढ़ 2/8/2023

Day 2 || श्री कावड़ शिवमहापुराण कथा || पूज्य पंडित प्रदीप जी मिश्रा (सीहोर वाले) || रायपुर, छत्तीसगढ़ 2/8/2023 ध्यान रखो कि कभी-कभी पुण्य भी समाप्त हो जाते हैं। भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य की जिन्होंने हमेशा पुण्य किया था । जब मात्र सभा में द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था तो उन्हें न रोकने के कारण उनका पुणे समाप्त हो गया और भगवान कृष्ण उनकी मृत्यु का कारण बने। सुनो रुकमणी में कर्ण की मृत्यु का भी कारण बना क्योंकि जो अभिमन्यु कोरवो न मारा तो तो मरते मरते अभिमन्यु ने कर्ण से पानी मांगा परंतु उसने नहीं दिया मालूम है कि वही पानी का गड्ढे में पानी भरा हुआ था और वह मुंह फेर कर चला गया। अभिमन्यु घिसटते हुए पीने जा रहा था । तभी जयद्रथ ने सिर पर गदे से वार किया और उसकी मृत्यु हो गई। फिर उसने मेरे हुए अभिमन्यु के सिर पर पैर भी मारा। जो जयद्रथ की मृत्यु का कारण बना। जानते हो जिस गड्ढे में कर्ण के रथ का पहिया फसा था वह वही गड्ढा था जिसमें पानी भरा हुआ था और कर्ण से पानी की याचना कर रहा था। अतः मर्यादा मैं सबको रहना चाहिए जो मर्यादा में रहते हैं होली ही अपने जीवन को सार्थक बनाते हैं बाकी सब का जीवन व्यर...