कलश यात्रा

कलश यात्रा 

सैकड़ों महिलाओं को सिर पर कलश लेकर चलते देख लोग आश्चर्यचकित हो जाते हैं। उन्हें यह सब बे फालतू का काम लगता है। कलश का अपना एक आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्त्व है । जिसे समझना जरूरी हैं। सत्य सनातन परंपरा अर्थात हिन्दू धर्म की विशेषता है कि वह वैज्ञानिक ज्ञान को प्रतीकों में बाँधकर उसे धार्मिक आस्था में ओतप्रोत कर देता है। 

विद्वानों का कहना है कि सिर पर कलश रखने वाले श्रद्धालु की आत्मा पवित्र व निर्मल हो जाती है। उसके तमाम रोग दोष विकारों का भगवान हरण कर देते है। वहीं कलश को धारण करने वाले जिस मार्ग से भी ग्राम का भ्रमण करता है वहां की धरा स्वयं सिद्व हो जाती है। जो अपने सिर पर कलश धारण करने वाली आत्मा को ईश्वर पवित्र और निर्मल करते हुए अपनी शरण में ले लेते हैं। 

कलश की उत्पत्ति

समुद्र मंथन की कथा बहुत प्रसिद्ध है। समुद्र जीवन और तमाम दिव्य रत्नों और उपलब्धियों का स्रोत है। देवी अर्थात्‌ रचनात्मक और दानवी अर्थात्‌ ध्वंसात्मक शक्तियाँ इस समुद्र का मंथन मंदराचल शिखर पर्वत की मथानी और वासुकी नाग की रस्सी बनाकर करती हैं। पहली दृष्टि में यह एक कपोल कल्पना अथवा गल्पकथा लगती है, क्योंकि पुराणों में अधिकांश ऐसी ही कथाएँ हैं, किन्तु उनका मर्म बहुत गहरा है। जीवन का अमृत तभी प्राप्त होता है, जब हम विषपान की शक्ति और सूझबूझ रखते हैं। अर्थात जो कठिनाईयाँ झेल सके वही सफ़लता का स्वाद चख सकता है। यही श्रेष्ठ विचार इस कथा में पिरोया हुआ है, जिसे हम मंगल कलश द्वारा बार-बार पढ़ते हैं।

वेद में सागर मंथन का प्रसंग आता है। पहिले पहल समुद्र मंथन से रत्नों प्राप्त हुए उन्हें रखने की आवश्यकता प्रतीत नहीं हुई। उन्हें देवताओं और दैत्यों ने आपस में आसानी से बांट लिया जब हलाहल विष निकला तो सभी देव और देते समुद्र मंथन को छोड़कर भाग गए। 

तब भगवान भोलेनाथ ने उसे अपने गले में धारण किया और भी नीलकंठ कहलाए। हलाहल विष के उपरांत अमृत निकलना था यदि अमृत भी हरा हल्बी उसकी तरह खुले ही निकलता तो धरती पर उपस्थित सभी लोग अमर हो गए होते तब देते और दानव आपस में लड़ते रहते और कभी नहीं मरते इसलिए अमृत को एक पात्र में रखने की आवश्यकता हुई।

जब सभी देवो को इस समस्या का ज्ञान हुआ तो वहां उपस्थित देव शिल्पी विश्वकर्मा ने उनसे कहा कि आप अपनी एक ही कला मुझे दीजिए। मैं उसे किसी पात्र में ढा़लने का प्रयास करता हूं।

तब वहां एकत्रित देवताओं ने अपने शरीर में से कुछ अंश कला के निकाल कर चलो देव शिल्पी विश्वकर्मा जी को दे दिए। देव शिल्पी विश्वकर्मा जी ने बर्तन बनाने की कला से उन कलाओं को एक पात्र में परिवर्तित कर दिया । कलाओं के द्वारा उत्पन्न पात्र को कलश नाम दिया। इस प्रकार कलश की उत्पत्ति देवताओं के कलम से हुई है। देव शिल्पी विश्वकर्मा जी को ही कलाओं का जन्मदाता और शिल्प कलाकारों का पूर्वज माना जाता है ।

कलश पात्र में तीनों देव ब्रम्हा, विष्णु व महेश के साथ-साथ 33 कोटि देवी देवता स्वयं विराजमान होते हैं। जो जो भक्त इसे सिर पर धारण करता है। ऐसे भक्तों पर भगवान की विशेष कृपा होती है। 

ब्रह्मांड प्रतीक है और जल जीवन का जबकि आम्र पल्लव, नागवल्ली जीवन के फलने फूलने का। जटाओं से युक्त ऊँचा नारियल मंदराचल पर्वत का तथा यजमान द्वारा कलश की ग्रीवा (कंठ) में बाँधा कच्चा सूत्र ही वासुकी रूपी रस्सी का प्रतीक है। यजमान और ऋत्विज (पुरोहित) दोनों ही मंथनकर्ता हैं। 

पूजा के समय प्रायः उच्चारण किया जाने वाला मंत्र स्वयं स्पष्ट है-
‘कलशस्य मुखे विष्णु कंठे रुद्र समाश्रिताः मूलेतस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मात्र गणा स्मृताः। कुक्षौतु सागरा सर्वे सप्तद्विपा वसुंधरा, ऋग्वेदो यजुर्वेदो सामगानां अथर्वणाः अङेश्च सहितासर्वे कलशन्तु समाश्रिताः।’

अर्थात्‌ सृष्टि के नियामक विष्णु, रुद्र और ब्रह्मा त्रिगुणात्मक शक्ति लिए इस ब्रह्माण्ड रूपी कलश में व्याप्त हैं। समस्त समुद्र, द्वीप, यह वसुंधरा, ब्रह्माण्ड के संविधान चारों वेद इस कलश में स्थान लिए हैं। 

 कलश का वैज्ञानिक पक्ष

कलश को ब्रह्मांड माना जाता है। अर्थात कलश या घट में ब्रह्माण्ड का दर्शन होता है, हमारे आसपास स्थिति यही कलश हमारे शरीर रूपी घट से तादात्म्य बनता है, यदि यह कलश ताँबे के पात्र है। तो यह पात्र, पात्र में स्थित जल को विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा से ऊर्जावान बनता है। कलश के ऊपर रखा ऊँचा नारियल या श्रीफल ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का ग्राहक बन, उस पूजा को ग्रहण करने लग जाता है। 
ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए सेल होती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सही प्रकार से स्थापित किया गया या बनाया गया कलश रूपी मंगल पात्र ब्रह्माण्डीय ऊर्जा को एक ही स्थान पर संकेंद्रित कर उसे बहुगुणित कर आसपास के क्षेत्र में विकिरित करने वाला एक सेल है। कलश यात्रा को हम एकीकृत सेल या बैटरी कह सकते है, क्योंकि यहां कलश रूपी अनेक सेल एकत्रित रहते हैं, जो अपने आसपास ऊर्जा को विकृत कर उस क्षेत्र के वातावरण को दिव्य बनाती है।

क्लेश की ग्रीवा में बांधा गया कलावा या मौली रूपी कच्चे सूत्रों का दक्षिणावर्ती वलय ऊर्जावलय को धीरे-धीरे चारों ओर वर्तुलाकार संचारित या विकरित करता रहता है। संभवतः सूत्र के विद्युत कुचालक होने के कारण ब्रह्माण्डीय बलधाराओं का अपव्यय रोकता है। 

फिर भी अनुसंधान का खुला क्षेत्र है कि शोधकर्ता आधुनिक उपकरणों का प्रयोग भक्ति एवं सम्मानपूर्वक करें, ताकि कुछ और नए आयाम मिल सकें।

कलश सिर्फ महिलाये ही धारण करती है।

यह भी सत्य है कि भारतीय संस्कृति में कलश सिर्फ महिलाये ही धारण करती है। भारतीय सत्य सनातन संस्कृति में कलश बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। कलश विश्व ब्रम्हांण्ड का प्रतीक है जिसमे सभी देव शक्तियों का वास माना जाता है। 
नारी का हृदय दया, करुणा, ममता एवं सेवा भाव से परिपूर्ण होता है। नारी शक्ति मे क्षमाशीलता, गंभीरता,एवं सहनशीलत सबसे अधिक होती है। 
इस लिए कलश के जल जैसी शीतलता एवं कलश जैसी पात्रता अनादि काल से मातृ शक्ति के ह‌दय मे मानी जाती रही है। इसलिए देव शक्तियों को अपने मस्तक पर धारण कर समस्त मानव जाति के सुख सौभाग्य समृद्धि की कामना  केवल मातृ शक्ति ही कर सकती है। यही कारण है कि धर्मिक आयोजन में कलश सिर्फ महिलाये ही धारण करती है।


हिन्दू रीति के अनुसार जब भी कोई पूजा होती है, तब मंगल कलश की स्थापना अनिवार्य होती है। बड़े अनुष्ठान यज्ञ यागादि में पुत्रवती सधवा महिलाएँ बड़ी संख्या में मंगल कलश लेकर शोभायात्रा में निकलती हैं। उस समय सृजन और मातृत्व दोनों की पूजा एक साथ होती है। पृथ्वी के बाद सृजन का उत्तरदायित्व मातृ शक्तियां निभाती हैं, कलश वह धारण करती है और यज्ञादि आयोजन में पुरुष के दाहिनी तरफ बैठकर धर्म के उत्तदायित्व को आगे बढ़कर सम्हालती है👈🏻।*

कलश रिद्धि- सिद्धि का प्रतीक है। इसका हिंदू धर्म में अपना महात्म्य है। उन्होंने कहा कि कलश हमारे जीवन के हर क्षण में काम आता है। जन्म के समय भी कलश स्थापना की जाती है और मरने के समय भी शरीर के साथ कलश विसर्जित किया जाता है। उन्होंने बताया कि कलश के उपर नारियल रखा जाता है। यह नारियल मनुष्य को इस बात की शिक्षा देता है कि परिवार के मुखिया को उपर से सख्त और अंदर से मुलायम होना चाहिए। इससे जीवन की गाड़ी बेहतर चलती है। कलश के उपर जो माला रखी जाती है उसका अलग महत्व है। जिस प्रकार माला में लगा हुआ फूल महकता है उसी प्रकार मनुष्य का जीवन भी दूसरों को सुगंध देने वाला होना चाहिए।

जल से भरे कलश को मानव शरीर का प्रतीक माना जाता है। 

कलश में जल मानव शरीर में आत्मा के समान है। इसीलिए खाली कलश अशुभ माना जाता है। कलश को शांति का संदेश वाहक भी माना जाता है। इसके बाद शाम को भजन संध्या का आयोजन हुआ। जिसमें भजन गायक ओमकार देवा ने श्री श्याम बाबा और साईं बाबा के भजन प्रस्तुत किए।

कलश यात्रा के आध्यात्मिक महत्व के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि कलश यात्रा में शामिल होने वाले भक्तों पर भगवान की विशेष कृपा होती है। कलश यात्रा में तीनों देव ब्रम्हा, विष्णु व महेश के साथ-साथ 33 कोटि देवी देवता स्वयं कलश में विराजमान होते हैं। वहीं कलश यात्रा में शामिल होने वाले जहां से भी ग्राम का भ्रमण करता है। वहीं की धरा स्वयं सिद्ध होती जाती है। जो अपने सिर पर कलश धारण करता है, उसकी आत्मा को ईश्वर पवित्र और निर्मल करते हुए अपनी शरण में ले लेते हैं। जिनके तमाम रोग दोष विकारों का भगवान हरण कर देते है।


वरुण और अग्नि को साक्षात देवता माना जाता है। वरुण का प्रतीक कुंभ है। कुंभ को देखते ही समुद्र मंथन की कथा का स्मरण होता है। घट के साथ ही जुड़ी है श्रीकृष्ण की बाल लीला और समुद्र मंथन का प्रसंग।
 
मोहिनी अवतार के हाथों देव-असुरों के बीच अमृत बांटने की कथा स्मरण हो आती है। शास्त्रों में कलश दर्शन को देव दर्शन के समकक्ष माना गया है। कलश स्थापना के समय जिन श्लोकों का उच्चारण और जो भावना व्यक्त की जाती है, उसी से स्पष्ट हो जाता है कि कलश क्यों मंगलसूचक है।
 
कलश की स्थापना और उसके पूजन के समय पुजारी शास्त्रसम्मत कुछ मंत्रों का उच्चारण करते हैं।
 
कलश पूजा का महत्व 
 
कलशस्य मुखे विष्णु : कंठे रुद्र: समाश्रित। मूल तस्य, स्थिति ब्रह्मा मध्ये मातगण: समाश्रित:।। 
 
भ्रात: कान्चलेपगोपितबहिस्ताम्राकृते सर्वतो।
मा भैषी: कलश: स्थिरो भव चिरं देवालयस्योपरि।।

ताम्रत्वं गतमेव कांचनमयी कीर्ति: स्थिरा ते धुना।
नान्स्तत्त्वविचारणप्रणयिनो लोका बहिबरुद्धय:।।
 
कांचन से कीर्ति महान है और सुवर्ण से सुनहरा जीवन श्रेष्ठ है। मंदिर के शिखर पर स्थित कलश वह कीर्ति और वैसा जीवन प्राप्त कर चुका है। अब उसे अपने बारे में हीनभाव रखने का कोई कारण नहीं है। छोटा मानव भी महान कार्य में निमित्त बना हो तो वह जीवन में महानता के शिखरों को प्राप्त कर सकता है। उसके बाद उसे छोटेपन का अनुभव नहीं करना चाहिए।
 
कलश भारतीय संस्कृति का अग्रगण्य प्रतीक है इसलिए तो महत्वपूर्ण सभी शुभ प्रसंगों में पुण्याहवाचन कलश की साक्षी में तथा सान्निध्य में होता है।
 
प्रत्येक शुभ प्रसंग या कार्य के आरंभ में जिस तरह विघ्नहर्ता गणपति जी की पूजा की जाती है उसी तरह कलश की भी पूजा होती है। देवपूजा के स्थान पर इस कलश को अग्रस्थान प्राप्त होता है। पहले इसका पूजन, फिर इसे नमस्कार और बाद में विघ्नहर्ता गणपति को नमस्कार! ऐसा प्राधान्यप्राप्त कलश और उसके पूजन के पीछे अति सुंदर भाव छिपा हुआ है।

 
स्वस्तिक चिह्न अंकित करते ही जिस तरह सूर्य आकर उस पर आसनस्थ होते हैं उसी तरह कलश को सजाते ही वरुणदेव उसमें विराजमान होते हैं। जो संबंध कमल-सूर्य का है वही संबंध कलश वरुण का है। वास्तव में कलश यानी लोटे में भरा हुआ या घड़े में भरा हुआ साधारण जल। परंतु कलश की स्थापना के बाद उसके पूजन के बाद वह जल सामान्य जल न रहकर दिव्य ओजस्वी बन जाता है।
 
तत्वायामि ब्रह्मणा वंदमानस्तदाशास्ते यजमानो हविर्भि:।
अहेळमानो वरुणोहबोध्यु रुशंसा मा न आयु: प्रमोषी:।।
 
हे वरुणदेव! तुम्हें नमस्कार करके मैं तुम्हारे पास आता हूं। यज्ञ में आहुति देने वाले की याचना करता हूं कि तुम हम पर नाराज मत होना। हमारी उम्र कम नहीं करना आदि वैदिक दिव्य मंत्रों से भगवान वरुण का आवाहन करके उनकी प्रस्थापना की जाती है और उस दिव्य जल का अंग पर अभिषेक करके रक्षा के लिए प्रार्थना की जाती है। कलश पूजन की प्रार्थना के श्लोक भी भावपूर्ण हैं। उसकी प्रार्थना के बाद वह कलश केवल कलश नहीं रहता, किंतु उसमें पिंड ब्रह्मांड की व्यापकता समाहित हो जाती है।
 
कलशस्य मुखे विष्णु: कंठे रुद्र: समाश्रित:।
मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्मृता:।।

कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्तद्वीपा वसुंधरा।
ऋग्वेदोअथ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथवर्ण:।।
अंगैच्श सहिता: सर्वे कलशं तु समाश्रिता:।
अत्र गायत्री सावित्री शांतिपृष्टिकरी तथा।
आयांतु मम शांत्यर्थ्य दुरितक्षयकारका:।।
सर्वे समुद्रा: सरितस्तीर्थानि जलदा नदा:।
आयांतु मम शांत्यर्थ्य दुरितक्षयकारका:।।
 
हमारे ऋषियों ने छोटे से पानी के लोटे में सभी देवता, वेद, समुद्र, नदियां, गायत्री, सावित्री आदि की स्थापना कर पापक्षय और शांति की भावना से सभी को एक ही प्रतीक में लाकर जीवन में समन्वय साधा है। बिंदु में सिंधु के दर्शन कराए हैं।

 
नए घर में प्रवेश करने से पहले कुंभ रखने की प्रथा प्रचलित है। जलपूर्ण कुंभ की तरह घर भावपूर्ण और नवपल्लवित रहे, ऐसी मंगलकामना इसके पीछे रही है। कलश या कुंभ पर श्रीफल रखने से उसकी शोभा दोगुनी होती है। श्रेष्ठागमन के समय माथे पर श्रीफलयुक्त कलश लेकर खड़ी रहने वाली कुमारिकाओं को हम कई बार देखते हैं।
 
भावभीने आतिथ्य सत्कार का यह अनोखा प्रकार है। गुजरात में नवरात्रि के प्रसंग पर खेला जाने वाला गरबा कलश या कुंभ का ही स्वरूप है। गरबा सजल होने के बजाय सतेज होता है। स्थापत्य शास्त्र में भी कलश का सबसे खास महत्व है।


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