Posts

Showing posts from November, 2023

काशी

Image
काशी में अनेक शिवभक्त काशी नगरी की पंचक्रोशी यात्रा करने की इच्छा व्यक्त कर रहे हैं,परंतु उन्हें इस पुनीत यात्रा का ज्ञान नहीं  #चले श्री ढुंढीराज कृपा से कई पौराणिक पुस्तकों में वर्णित काशी की पंचकोशी यात्रा के पौराणिक विधि नियम कई खण्डों में इसे आप तक पहुँचने का प्रयास करूँगा #ॐ_विश्वेश्वराय_नमः  यात्रा नियम पिछला लिंक नीचे है यह नं.3है  ज्ञानवापी से कन्दवाँ पहला वास स्थान ( ३ कोस), मणिकर्णिका से कन्दवाँ तक के देवताओं के नाम, मणिकर्णिका जाकर वहां गंगा में स्नान अथवा मार्जन ( आचमन करें), मौन विसर्जन कर, तत्पश्चात् मन्दिरों में दर्शन पूजन करते हुए यात्रा आरम्भ करें। मणिकर्णितटे छन्नं, गंगाकेशवमप्युत। ललितां च ततः पूज्य, जरासंध्येश्वरं विभुम् ।। मणिकर्णिका महादेव का दर्शन पूजन कर ललिताघाट के ऊपर ललिता देवी की पूजा करे फिर मीरघाट आवें । यहां पर जरासन्धेश्वर की पूजा करें  1- मणिकर्णिकायै नमः गंगा की पूजा करें। 2- मणिकर्णिकेश्वराय नमः। गोमठ सन्यासाश्रम, म० नं० सी.के. 8/12 में  3- सिद्धिविनायकाय नमः उसी मार्ग में अमेठी के मन्दिर के बाहर म०नं० सी.के. 6/1 म...

प्रदोष व्रत

ज्येष्ठ माह का पहला प्रदोष व्रत आज ****************************** प्रदोष व्रत हर महीने में दो बार आता है। कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि में शाम के समय को प्रदोष कहा गया है। आज शुक्र प्रदोष व्रत है। जो प्रदोष शुक्रवार के दिन आता है उसे शुक्र प्रदोष कहते हैं। प्रदोष व्रत को त्रयोदशी व्रत के नाम से भी जाना जाता है। प्रदोष व्रत हर महीने में दो बार आता है एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में। सूरज ढलने के बाद के समय और रात होने से पहले के समय को प्रदोष काल कहा जाता है। इस व्रत के दौरान भगवान शिव की पूजा की जाती है। माना जाता है इस दिन सच्चे मन से और पूरे विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करने से मनचाही वस्तु की प्राप्ति होती है। हिंदू धर्म में वैसे तो हर दिन का महत्व होता है लेकिन प्रदोष व्रत के दिन को काफी खास माना जाता है। ज्येष्ठ मास का पहला प्रदोष व्रत 27 मई 2022 को शुक्रवार के दिन रखा जाएगा।  प्रदोष व्रत का शुभ मुहूर्त ================ प्रदोष व्रत 27 मई, 2022, शुक्रवार को, प्रारम्भ - 27 मई, सुबह 11 बजकर 47 मिनट पर समाप्त - 28 मई, शाम 1 बजकर 9 मिनट पर  प्रदोष व्रत का महत...

16 सोमवार

हर सोमवार करें भगवान शिव की आराधना। ★★★★★★★★★★★★★★ सोमवार का दिन माता पार्वती और भगवान शिव का होता है। ऐसी मान्यता है कि 16 सोमवार तक श्र्धापूर्वक करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। बेलपत्र संस्थान के वरिष्ठ विद्वानों का मत है कि आप अपनी क्षमता के अनुसार प्रत्येक सोमवार को पूजन करें तो जीवन की सभी परेशानियां खत्म हो जाएंगी। हम आपके लिए सोमवार व्रत की विधि लेकर आए हैं। ॐ। सोमवार व्रत विधि- व्रत करने वाले स्त्री-पुरुष को सुबह उठकर पानी में काला तिल डालकर स्नान करें इसके बाद पूजाघर में जाकर पूजा की विधि के साथ अर्चना करें। पूजा मेंकुछ चीजों का इस्तेमाल अनिवार्य होता है। – सफेद फूल, – चन्दन – चावल – पंचामृत – अक्षत – पान – सुपारी – फल – गंगा जल – बेलपत्र – धतूरा फल और धतूरा फूल।  इन सभी सामग्री के उपयोग से शिव-पार्वती, गणेश, कार्तिकेय और नंदी जी की पूजा करनी चाहिए। सोमवार का व्रत करने से आपको सिर्फ अच्छा जीवनसाथी ही नहीं मिलता और भी कई लाभ मिलते हैं, सोमवार के व्रत की महिमा बहुत है। ये दिन भगवान शिव का माना जाता है और भगवान शिव को वरदान और न्याय का देवता माना जाता है। जो भी व्यक्ति भ...

गिलोय_एक_अद्भुत_औषधि

#_गिलोय_एक_अद्भुत_औषधि :-- 🙏 गिलोय एक ही ऐसी बेल है, जिसे आप सौ मर्ज की एक दवा कह सकते हैं। इसलिए इसे संस्कृत में अमृता नाम दिया गया है। कहते हैं कि देवताओं और दानवों के बीच समुद्र मंथन के दौरान जब अमृत निकला और इस अमृत की बूंदें जहां-जहां छलकीं, वहां-वहां गिलोय की उत्पत्ति हुई। इसका वानस्पिक नाम (Botanical name) टीनोस्पोरा कॉर्डीफोलिया (tinospora cordifolia) है।* इसके पत्ते पान के पत्ते जैसे दिखाई देते हैं और जिस पौधे पर यह चढ़ जाती है, उसे मरने नहीं देती। इसके बहुत सारे लाभ आयुर्वेद में बताए गए हैं, जो न केवल आपको सेहतमंद रखते हैं, बल्कि आपकी सुंदरता को भी निखारते हैं।  आइए जानते हैं गिलोय के फायदे… गिलोय बढ़ाती है रोग प्रतिरोधक क्षमता गिलोय एक ऐसी बेल है, जो व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा कर उसे बीमारियों से दूर रखती है। इसमें भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो शरीर में से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने का काम करते हैं। यह खून को साफ करती है, बैक्टीरिया से लड़ती है। लिवर और किडनी की अच्छी देखभाल भी गिलोय के बहुत सारे कामों में से एक है। ये दोनों ही अंग खून ...

पीपल

🏵पीपल पूजन ओर उसका महत्व...✍ 🔺हमारे शास्त्रों के अनुसार पिलल एक कल्पवृक्ष है.. उस के नीचे खड़े होकर जिस वस्तु की भी कामना की जाती है वह अवश्य पूरी हो जाती है.. कलियुग में लोगों के लिए कल्पवृक्ष तो सुलभ नहीं है परंतु सर्वदेवमय वृक्ष पीपल जिसे अश्वत्थ भी कहा जाता है.. पिलाल पर सच्चे भाव से संकल्प लेकर नियमित रूप से जल चढ़ाने से पूजा एवं अर्चना करने से मनुष्य वह सब कुछ सरलता से पा सकता है जिसे पाने की उसकी इच्छा हो.. इसीलिए पीपल को कलियुग का कल्पवृक्ष माना जाता है.. पीपल एकमात्र पवित्र देववृक्ष है जिसमें सभी देवताओं के साथ ही पितरों का भी वास रहता है.. श्रीमद्भगवदगीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि...  👉‘अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणाम.. मूलतो ब्रहमरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे.. अग्रत: शिवरूपाय अश्वत्थाय नमो नम:.. 🔺अर्थात मैं वृक्षों में पीपल हूं... पीपल के मूल में ब्रह्मा जी.. मध्य में विष्णु जी तथा अग्र भाग में भगवान शिव जी साक्षात रूप से विराजित हैं.. स्कंदपुराण के अनुसार पीपल के मूल में विष्णु.. तने में केशव.. शाखाओं में नारायण.. पत्तों में भगवान श्री हरि और फलों में सभी देवताओं का वास...

वृक्ष

"अश्वत्थमेकम् पिचुमन्दमेकम् न्यग्रोधमेकम् दश चिञ्चिणीकान्। कपित्थबिल्वाऽऽमलकत्रयञ्च पञ्चाऽऽम्रमुप्त्वा नरकन्न पश्येत्।।" भारतीय संस्कृति आद्यकाल से ही पर्यावरण की उपासक और संरक्षक रही हैं। वर्षभर के अनेक पर्व परम्पराओं एवं उत्सवों में हमारे यहाँ वृक्षरोपण तथा उन्हें पूजने की परम्परा रही है। हरीतिमा धरा की सौन्दर्याभिव्यक्ति है। वृक्ष-नदियाँ, झील-सरोवर एवं अन्यान्य प्राकृतिक घटकों द्वारा धरा के सौन्दर्य को सहेज कर रखें। वसुन्धरा को स्वच्छ सन्तुलित और प्रदूषण मुक्त रखना अब हमारी प्राथमिकता बने। 

बेलपत्र के प्रयोग

Image
बेलपत्र की कहानी :- स्कंद पुराण के अनुसार, एक बार माता पार्वती मंदराचल पर्वत पर भ्रमण कर रहीं थीं । तभी उनके शरीर से उनके पसीने की एक बूंद मंदराचल पर्वत पर गिर गई और पसीने की उसी एक बूंद से बेलपत्र के वृक्ष का जन्म हुआ। इस प्रकार पुराग्रंथों में ऐसा वर्णन मिलता है कि माता पार्वती के पसीने से बेल के वृक्ष का उद्भव हुआ। अत: इसमें माता पार्वती के सभी रूप समाए हुए हैं।  एक अन्य कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव पार्वती के साथ हिमालय पर्वत पर विराजमान थे तभी वहां घूमते-फिरते नारद जी पहुंच गए और उन्होंने भगवान भोलेनाथ से एक प्रश्न कर दिया। नारद जी ने एक बार भोलेनाथ की स्तुति कर पूछा – " प्रभु ! आपको प्रसन्न करने के लिए सबसे उत्तम और सुलभ साधन क्या है ? हे त्रिलोकीनाथ ! आप तो निर्विकार और निष्काम हैं। आप सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं। फिर भी मेरी जानने की इच्छा है कि आपको क्या प्रिय है ?" शिवजी बोले, " हे नारदजी ! वैसे तो मुझे भक्त के भाव सबसे प्रिय हैं, फिर भी जब आपने पूछा है तो बताता हूं कि मुझे जल के साथ-साथ बिल्वपत्र अर्थात बेलपत्र बहुत प्रिय है। जो अखंड बेलपत्र मुझे ...