Day 2 || श्री कावड़ शिवमहापुराण कथा || पूज्य पंडित प्रदीप जी मिश्रा (सीहोर वाले) || रायपुर, छत्तीसगढ़ 2/8/2023

Day 2 || श्री कावड़ शिवमहापुराण कथा || पूज्य पंडित प्रदीप जी मिश्रा (सीहोर वाले) || रायपुर, छत्तीसगढ़ 2/8/2023

ध्यान रखो कि कभी-कभी पुण्य भी समाप्त हो जाते हैं।
भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य की जिन्होंने हमेशा पुण्य किया था । जब मात्र सभा में द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था तो उन्हें न रोकने के कारण उनका पुणे समाप्त हो गया और भगवान कृष्ण उनकी मृत्यु का कारण बने।
सुनो रुकमणी में कर्ण की मृत्यु का भी कारण बना क्योंकि जो अभिमन्यु कोरवो न मारा तो तो मरते मरते अभिमन्यु ने कर्ण से पानी मांगा परंतु उसने नहीं दिया मालूम है कि वही पानी का गड्ढे में पानी भरा हुआ था और वह मुंह फेर कर चला गया। अभिमन्यु घिसटते हुए पीने जा रहा था । तभी जयद्रथ ने सिर पर गदे से वार किया और उसकी मृत्यु हो गई। फिर उसने मेरे हुए अभिमन्यु के सिर पर पैर भी मारा। जो जयद्रथ की मृत्यु का कारण बना। जानते हो जिस गड्ढे में कर्ण के रथ का पहिया फसा था वह वही गड्ढा था जिसमें पानी भरा हुआ था और कर्ण से पानी की याचना कर रहा था।
अतः मर्यादा मैं सबको रहना चाहिए जो मर्यादा में रहते हैं होली ही अपने जीवन को सार्थक बनाते हैं बाकी सब का जीवन व्यर्थ हो जाता है।

उद्यापन में कभी भी अपने घर के सदस्य को न गिने।
बच्चे आसपास गांव क्षेत्र के लोगों को उद्यापन में शामिल करें। परिवार के लोगों को खिलाया गया या दिया गया दान नहीं कहलाता दान कहलाता है परिवार से अलग दूसरों को खिलाया या दिया गया। परिवार में से गिनना तो बहन बेटी को गिनो भांजी व भतीजी को गिनो। कुछ लोगों का कहना है कि बेटी को दिया दान में लड़ता है परंतु ऐसा नहीं है वह दान में ही है उसका हक है जो आपको उसे लौटाना चाहिए।

पेट बात करवा देता हड़ताल पाप पाप हमेशा पापी पेट के लिए ही होते हैं पेट बात तो करवा देता है परंतु प्रायश्चित नहीं करता प्रायश्चित आपको करना पड़ता है। और प्रायश्चित करती है हमारी पीठ और हमें पार लगाती है।

स्थान और संगत आपको पहचान देते हैं
यदि आप अबे वनों के साथ रहते हैं तो आप भी बेवड़ो में गिने जाएंगे यदि आप संतो के साथ बैठते हैं तो पांचवी विद्वान देने जाएगे इसी प्रकार यदि आप मंदिर जाते हैं तो आप भक्त माने जाएंगे यदि मधुशाला जाते हैं तो आप शराबी माने जाएंगे।

त्रिजटा चरित्र



पत्र नंबर 1
राज यादव राजनगर कन्हान नागपुर महाराष्ट्र
मेरा पूरा परिवार शिव की आराधना करता है। मुझे कोल इंडिया में माईन सरदार बनना था। बहुत मेहनत की है परंतु उसका कोई फल नहीं मिला परंतु अंतिम बार बेलपत्र पर शहद लाकर एक लोटा जल चढ़ाया तब मेरा ३३वां नंबर प्राप्त हुआ। और मुझे माईन सरदार की नौकरी मिल गई।


विभीषण की पुत्री त्रिजटा

रामायण की एक पात्रा त्रिजटा लंका की मुख्य साध्वी, राक्षसी प्रमुख थी। जिसका जन्म तो राक्षस कुल में हुआ था लेकिन उसका हृदय देवियों के समान पवित्र था। मन्दोदरी ने सीताजी की देख-रेख के लिए उसे विशेष रूप से सुपुर्द किया था। वह राक्षसी होते हुए भी सीता की हितचिंतक थी। रावण के बाहर होने पर लंका की सत्ता मन्दोदरी के हाथ में थी तथा मन्दोदरी ने सीता के साथ रावण को महल में प्रवेश की अनुमति नहीं दी।

विभीषण की पुत्री त्रिजटा की सम्पूर्ण कथा?*
त्रिजटा नाम राच्छसी एका।*
राम चरन रति निपुन बिबेका॥*

श्री रामचरित मानस के छोटे-से-छोटे पात्र भी विशेषता संपन्न है। इसके स्त्री पात्रों में त्रिजटा एक लधु स्त्रीपात्र है । यह पात्र आकार में जितना ही छोटा है, महिमा में उतना की गौरावमण्डित है।

सम्पूर्ण ‘मानस’ में केवल सुन्दरकाण्ड और लंका काण्ड में सीता-त्रिजटा संवाद के रूपमें त्रिजटा का वर्णन आया है परंतु इन लघु संवादो में ही त्रिजटा के चरित्र की भारी विशेषताएँ निखर उठी हैं।

छोटेसे वार्ताप्रसङ्गमें भी सम्पूर्ण चरित्र को समासरूप से उद्भासित करने की क्षमता पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदासजी की विशेषता है । मानस के सुन्दरकाण्ड की एक चौपाईं में त्रिजटा का स्वरूप इस प्रकार बतलाया गया है :

त्रिजटा जाम राच्छसी एका ।*
राम चरन रति निपुन बिबेका ।।*
(रा.च.मा ५। ११ । १)

प्रस्तुत पंक्ति त्रिजटाके चार गुणोंको स्पष्ट करती है- १- वह राक्षसी है । २-श्री रामचरण में उसकी रति है । ३ -वह व्यवहार-निपुण और ४ -विवेकशीला है । राक्षसी होते हुए भी श्री रामचरणानुराग, व्यवहार कुशलता एवं विवेकशीलता जैसे दिव्य देवोपम गुणों की अवतारणा चरित्र में अलौकिकता को समाविष्ट करती है।

सम्भवत: इन्ही तीन गुणों के समाहार के कारण उसका नाम त्रिजटा रखा गया हो । संत कहते है इनके सिर पर ज्ञान,भक्ति और वैराग्य रुपी तीन जटाएं है अतः इनका नाम त्रिजटा है।

त्रिजटा रामभक्त विभीषणजी की पुत्री है। इनकी माता का नाम शरमा है। वह रावण की भ्रातृजा है। राक्षसी उसका वंशगुण है और रामभक्ति उसका पैतृक गुण । लंका की अशोक वाटिका में सीताजी के पहरेपर अथवा सहचरी के रूपमें रावणद्वारा जिस स्त्री-दल की नियुक्ति होती है, त्रिजटा उसमें से एक है।

अपने सम्पूर्ण चरित्र में सीताके लिये इसने परामर्शदात्री एवं प्राणरक्षिका का काम किया है । यही कारण है कि विरहाकुला और त्रासिता सीताने त्रिज़टा के सम्बोधन में माता शब्द का प्रयोग किया है।

त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी ।*
मातु बिपति संगिनि तें मोरी।।*
(रा.च.मा. ५। १२ । १)

ऐसी शुभेच्छुका के लिये मा शब्द कितना समीचीन है ।

त्रिज़टा की रति राम-चरण में है । रामभक्त पिता की पुत्री होने के कारण इसका यह अनुराग पैतृक सम्पत्ति है और स्वाभाविक है । त्रिजटा के घर में निरंतर रामकथा होती है । अभी माता सीता से मिलने के थोडी देर पहले वह घरसे आयी है, जहाँ हनुमान जी जैसे परम संत श्री विभीषणजी से रामकथा कह रहे थे ।

तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम ।*
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम ।।*
(रा.च.मा ५।६)
राक्षसी होते हुए भी त्रिजटा को मानव-मनोविज्ञान का सूक्ष्म ज्ञान है । वह सीताजी के स्वभाव और मनोभाव को अच्छी तरह समझती है । वह यह भलीभांति जानती है कि सीताजी को सांत्वना के लिये और उनके दुखों को दूर करने के लिये रामकथा से बढकर दूसरा कोई उपाय नहीं है।

रावण के द्वारा माता त्रिजटा को ही सीता की सुरक्षा सौंपी गयी व सभी राक्षसियों का प्रमुख बनाया गया। रामायण में त्रिजटा की भूमिका भी यही से शुरू हुई थी जिसमे उन्होंने स्वयं के चरित्र को ऐसा दिखाया जिससे वह आमजनों के दिल में हमेशा के लिए बस गयी।

अशोक वाटिका में अन्य राक्षसियां उन्हें तंग कर रही थी। यह देखकर त्रिजटा ने अपनी बुद्धिमता से बाकि राक्षसियों को चुप करा दिया था व माता सीता को ढांढस बंधाया था। त्रिजटा के कारण ही माता सीता को उस राक्षस नगरी में रहने की शक्ति मिली व उनका विलाप कम हुआ था।

सीता जी का विरह जब असह्य हो चला तब मरणातुर सीताजी आत्मत्याग के लिये जब त्रिजटा से अग्नि की याचना करती हैं , सीताजी त्रिजटा से कहती है के चिता बनाकर सजा दे और उसमे आग लगा दे, तो इस अनुरोंध को वह बुद्धिमान राम भक्ता यह कहकर टाल देती है कि रात्रि के समय अग्नि नहीं मिलेगी और सीताजी के प्रबोधके लिये वह राम यश गुणगान का सहारा लेती है ।

ज्ञान गुणसागर हनुमान जी ने भी जब अशोकवाटिका में सीटा जी की विपत्ति देखी तो उनके प्रबोधके लिये उन्हें कोई उपाय सूझा ही नहीं । वे सीताजी के रूप और स्वभाव दोनों ही से अपरिचित थे ।

उन्होंने त्रिजटा प्रयुक्त विधिका ही अनुसरण किया । रावण त्रासिता सीताजी को राम सुयश सुनने से ही सांत्वना मिली थी, यह हनुमान् जी ऊपर पल्लवोंमें छिपे बैठे देख रहे थे।

त्रिजटाके चले जानेके बाद सीताजी और भी व्याकुल हो उठी । तब उनकी परिशान्ति के लिये हनुमान जी ने भी श्रीराम गुणगान सुनाये ।
दानवी होने के कारण त्रिजटा में दानव मनोविज्ञान का ज्ञान तो था ही । दानवोंका अधिक विश्वास दैहिक शक्ति मे है और इसीलिये उन्हें कार्यविरत करनेमें भय अधिक कारगर होता है।

सीताजी को वशीभूत करने के लिये रावणने भय और त्रासका सहारा लिया था और तदनुसार राक्षसियों को ऐसा ही अनुदेश करके यह चला गया था । सीताजीका दुख दूना हो गया, क्योंकि राक्षसियाँ नाना भाँति बह्यंकर रूप बना बनाकर उन्हें डराने धमकाने लगी ।

व्यवहार-विशारद त्रिजटा के लिये यह असह्य हो गया । वर्जन के लिये उस पण्डिता ने विवेकपूर्ण एक युक्ति निकाली । उसने राक्षस मनोविज्ञान का सहारा लिया और एक भयानक स्वप्न कथा की सृष्टि की ।उसने सब राक्षसियों को बुलवाकर कहा सब सीता जी की सेवा करके अपना कल्याण कर लो।

त्रिजटा ने उन राक्षसियों से कहा की मैंने एक स्वप्न देखा है। स्वप्नमे मैंने देखा कि एक बंदर ने लंका जला दी । राक्षसों की सारी सेना मार डाली गयी । रावण नंगा है और गधे पर सवार है । उसके सिर मुँड़े हुए हैं बीसो भुजाएँ कटी हुई है ।

इस प्रकार से वह दक्षिण (यमपुरी की) दिशा को जा रहा है और मानो लंका विभीषण ने पायी है। लंका में श्री रामचंद्र जी की दुहाई फिर गयी । तब प्रभुने सीताजी को बुलावा भेजा।

पुकारकर (निश्चय के साथ ) कहती हूँ कि यह स्वप्न चार ( कुछ ही) दिनों में सत्य होकर रहेगा । उसके वचन सुनकर वे सब राक्षसियाँ डर गयी और जानकी जी के चरणों पर गिर पड़ी।
इस स्वप्न वार्तासे एक ओर जहाँ त्रिज़टा का भविष्य दर्शिनी होना सिद्ध होता है, वहीं दूसरी ओर उसका व्यवहार-निपुणा और विवेकिनी होना भी उद्धाटित होता है।

भय दिखाकर दूसरे को वशीभूत करनेवाली मण्डलि को उसने भावी भयकी सूचना देकर मनोनुकूल बना लिया । प्रत्यक्ष वर्जन मे तो राजकोप का डर था, अनिष्ट की सम्भावना थी । उसने उन राक्षसियों को साक्षात भक्तिरूपा सीता जी के चरणों में डाल दिया । यही तो भक्तो संतो का स्वभाव है।

लंका काण्डके युद्ध- प्रसंग में त्रिज़टा की चातुरीका एक और विलक्षण उदाहरण मिलता है । राम रावण युद्ध चरम सीमापर है । रावण छोर युद्ध कर रहा है । उसके सिर कट-कट करके भी पुन: जुट जाते हैं । भुजाओ को खोकर भी वह नवीन भुजावाला बन जाता है और श्रीराम के मारे भी नहीं मरता । अशोक वाटिका में त्रिज़टा के मुँहसे यह प्रसङ्ग सुनकर सीताजी व्याकुल हो जाती हैं । श्री रामचंद्र के बाणों से भी नहीं मरने वाले रावण के बन्धन से वह अब मुक्त होने की आशा त्याग देने को हो जाती हैं।

त्रिजटा को परिस्थितिवश अनुभव होता है । वह सीताजी की मनोदशा को देखकर फिर प्रभु श्रीरामके बलका वर्णन करती है और सीता को श्रीराम की विजय का विश्वास दिलाती है।
त्रिजटाने कहा- *राजकुमारी ! सुनो, देवताओ का। शत्रु रावण हृदयमें बाण लगते ही मर जायगा ।परन्तु प्रभु उसके हृदय मे बाण इसलिये नहीं मारते कि इसके हृदयमे जानकी जी (आप) बसती हैं ।*

श्री राम जी यही सोचकर रह जाते हैं कि इसके हृदय में जानकी का निवास है, जानकी के हदयमे मेरा निवास है और मेरे उदरमें अनेकों भूवन हैं । अत: रावणके हृदयमें बाण लगते ही सब भुवनोंका नाश हो जायगा । यह वचन सुनकर, सीताजी के मनमें अत्यन्त हर्ष और विषाद हुआ यह देखकर त्रिजटाने फिर कहा-

सुन्दरी !*
महान सन्देह का त्याग कर दो अब सुनो, शत्रु इस प्रकार मरेगा । सिरोंके बार बर कटि जानेसे जब वह व्याकुल हो जायगा और उसके हृदय से तुम्हारा ध्यान छूट जायेगा और उसकी मृत्यु होगी।*
(रावण हर क्षण जानकी जी को प्राप्त करने के बारे में ,उन्हें अपना बनाने के बारे में ही सोचता रहता अतः ह्रदय से जानकी जी का ही विचार करता रहता । संतो ने सीता माँ को साक्षात् भक्ति ही बताया है। रावण भक्ति को जबरन अपने बल से प्राप्त करना चाहता है, परंतु क्या भक्ति इस तरह प्राप्त होती है?

भक्ति तो संतो के संग से, प्रभु लीला चिंतन एवं जानकी जी की कृपा दृष्टी से ही प्राप्त हो सकती है । जानकी माता ने तो कभी रावण की ओर दृष्टी तक नहीं डालीं । रावण को पता था की प्रभु से वैर करने पर उन्हें हाथो मृत्यु होगी तो मोक्ष प्राप्त हो जायेगा परंतु प्रभु चरणों की भक्ति नहीं प्राप्त होगी। )

वैसे तो माता त्रिजटा रावण की सेविका थी लेकिन वह भगवान श्रीराम की विजय में विश्वास रखती थी। उसनें अपने व माता सीता के बीच के संबंधों को जगजाहिर नही होने दिया किंतु हर पल वह माता सीता को हर महत्वपूर्ण जानकारी देती थी जैसे कि लंका का दहन होना, समुंद्र पर सेतु बनना, राम लक्ष्मण का सुरक्षित होना इत्यादि। त्रिजटा के द्वारा समय-समय पर माता सीता को जानकारी देते रहने से उनकी हिम्मत बंधी रहती थी।

जानकी माता ने पुत्र कहकर हनुमान जी से और माता कहकर त्रिजटा से अपना सम्बन्ध जोड़ लिया। किशोरी जी की कृपा हो गयी तब राम भक्ति सुलभ है। हनुमान जी को और त्रिजटा को सीता माँ ने अखंड भक्ति का दान दिया है ।सीता जी के प्राणों की रक्षा करने में और उनकी पीड़ा कम करने में हनुमान जी और त्रिजटा का मुख्य सहयोग रहा है।

संतो ने कहा है लगभग २ वर्ष तक सीताजी लंका में रही(कोई ४३५ दिन मानते है) और त्रिजटा अत्यंत भाग्यशाली रही की राक्षसी होने पर भी उन्हें साक्षात् भक्ति श्री सीता जी का प्रत्येक क्षण संग मिला,सेवा मिली और प्रेम मिला।
संत कहते है भगवान् के पास देने के लिए सबसे छोटी वस्तु कोई है तो वो है मोक्ष और भगवान् के पास देने के लिए सबसे बड़ी वस्तु कोई है तो वह है भक्ति।

अंत में भगवान श्रीराम व दशानन रावण के बीच भयंकर युद्ध हुआ व उसमें रावण मारा गया। इसके पश्चात विभीषण को लंका का अधिपति बनाया गया व उन्होंने तुरंत माता सीता को मुक्त करने का आदेश जारी कर दिया। त्रिजटा माता सीता के जाने से तो दुखी थी लेकिन प्रसन्न भी थी कि अब सब विपत्ति टल गयी।


अग्नि परीक्षा के बाद जब माता सीता भगवान श्रीराम के पास आई तब उन्होंने माता त्रिजटा के वात्सल्य व प्रेम के बारे में उन्हें बताया। यह सुनकर सभी बहुत खुश हुए व भगवान राम व माता सीता ने त्रिजटा को इतने पुरस्कार दिए कि अब जीवनभर उन्हें कुछ करने की आवश्यकता नही थी। साथ ही त्रिजटा को लंका में भी विभीषण के द्वारा अहम उत्तरदायित्व व उचित सम्मान दिया गया।

कुछ मान्यताओं के अनुसार माता त्रिजटा भगवान राम व माता सीता के साथ पुष्पक विमान में बैठकर अयोध्या भी आई थी व कुछ दिनों तक उनके साथ रही थी। कुछ रामायण में लंका विजय के बाद यह बताया गया है कि विभीषण ने भगवान हनुमान से अनुरोध किया था कि वे उनकी बेटी त्रिजटा से विवाह कर ले। इसके बाद हनुमान ने त्रिजटा से विवाह किया जिन्हें उन्हें एक पुत्र तेगनग्गा प्राप्त हुआ। कुछ समय तक वहां रहने के पश्चात हनुमान वहां से चले गए।

भगवान् संसार की बड़ी से बड़ी वास्तु और भोग प्रदान कर अपना पीछा छुडा लेते है ,परंतु अपने चरणों की अविचल भक्ति नहीं देते ।नारी भक्ताओ का चरित्र हमेशा ही सर्वश्रेष्ठ रहा है, लंका में सर्वश्रेष्ठ भक्ता त्रिजटा है ऐसा संतो का मत है।

इस प्रकार त्रिजटा चरित्र भक्ति, विवेक और व्यवहार कुशलता का एक मणिकाञ्चन योग है।

शुभ प्रभात। आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलमय हो।


त्रिजटा कौन थी?

ऐसी मान्यता है की त्रिजटा भगवान राम के भक्त श्री विभीषणजी की पुत्री हैं। त्रिजटा की माता का नाम शरमा है। त्रिजटा रावण की भतीजी थी तथा राक्षसी त्रिजटा का वंशगुण था, जबकि रामभक्ति उसका पैतृकगुण था। जो त्रिजटा को उसके पिता विभीषण जी से प्राप्त हुआ था।

विभीषण के कितने पुत्र थे (trijata kaun hain)
भगवान राम के अनन्य भक्त विभीषण जी के केवल एक ही संतान थी। और वह भी विभीषण जी की तरह ही एक राम भक्त थी। विभीषण जी की कन्या का नाम त्रिजटा था।

विभीषण की पत्नी कौन थी? (trijata kaun hain)
विभीषण की पहली पत्नी का नाम शर्मा था, जोकि त्रिजटा की मां थी। लेकिन रावण के वध के बाद मंदोदरी ने रावण के छोटे भाई और लंका के नए राजा विभीषण से विवाह कर लिया था ऐसी कहानी लोग बताते हैं।

बनारस में त्रिजटा का मंदिर है
उत्तर प्रदेश के बनारस में लंका की त्रिजटा का एक मंदिर है जोकि काशी विश्वनाथ मंदिर के करीब है। मान्यता है कि जब सीता माता पुष्पक विमान में बैठकर अयोध्या आ रही थी तब त्रिजिटा भी उनके साथ आई, माता सीता के कहने पर वह बनारस में रहकर भगवान शंकर की आराधना में लीन हो गई। बनारस में त्रिजटा मंदिर में त्रिजटा को देवी के रूप में पूजा जाता है। महिलाएं इस मंदिर में अपनी मनोकामना को पूर्ण करने के लिए हाजिरी देती हैं। प्रसाद के रूप में त्रिजटा माता को मूली और बैगन चढ़ाया जाता है। इसी तरह त्रिजटा का मंदिर उज्जैन जिले में भी है जोकि बाल रूप हनुमान मंदिर के परिसर में ही मौजूद है। सीता पुराण में त्रिजटा को विभीषण और गंधर्व शर्मा की बेटी बताया गया है।

त्रिजटा अशोक वाटिका में माता सीता की अंगरक्षक थी
जब लंकापति रावण साधु का वेश धर के छल से माता सीता को पुष्पक विमान में उठाकर लंका लाया था तब माता सीता के रहने के लिए उसने अशोक वाटिका को चुना। माता सीता को किसी भी प्रकार से कोई नुकसान ना हो इसलिए रावण ने त्रिजटा राक्षसी को माता सीता का पहरेदार बनाया। त्रिजटा अशोक वाटिका में पहरा देने वाली सभी रक्षासिनो की मुखिया थी। उसके आदेश पर ही सभी अपने कर्तव्य का निर्वाहन किया करते थे। जब रावण माता सीता को अपहरण करके लंका लाया तब माता सीता अत्यंत दुखी थी और लगातार विलाप कर रही थी। अशोक वाटिका में मौजूद दूसरी राक्षसियां माता सीता को लगातार तंग किया करती थी। तब त्रिजटा ने अपनी बुद्धिमानी से सभी राक्षसियों को डरा कर चुप करा दिया था और माता सीता को ढांढस बांधा कर उनका साहस और हिम्मत बढ़ाया करते थे। माता सीता भी त्रिजटा को माता कहकर पुकारा करती थी। त्रिजटा की वजह से ही माता सीता राक्षसों की उस लंका नगरी में रह पा रही थी क्योंकि त्रिजटा लगातार उनकी हिम्मत को बढ़ाया करती थी और आशा की किरण को बुझने नहीं देती थी।

विभीषण की मृत्यु कैसे हुई?
मान्यता है कि विभीषण आज भी जीवित है क्योंकि भगवान राम जब पृथ्वी लोक से जा रहे थे तो उन्होंने भी विभीषण जी को चिरंजीवी होने का वरदान दिया था। और उन्हें कलयुग के अंत तक जिंदा रहने का आशीर्वाद दिया था। मान्यता है की ब्रह्म मुहूर्त में वह अयोध्या आते हैं और भगवान राम की पूजा करके रामेश्वरम जाते हैं और रामेश्वरम से वापस लंका चले जाते हैं आवागमन के लिए वह वायु की चाल से हवा में हनुमान जी की तरह विचरण करते हैं।

रावण की पत्नी मंदोदरी कौन थी?
मंदोदरी का जन्म हेमा नाम के एक अप्सरा के गर्भ से हुआ था। उस अप्सरा का विवाह मायासुर के साथ हुआ था। मान्यता है की मंदोदरी मध्य प्रदेश के मंदसौर के राजा की पुत्री थी।

विभीषण नाम क्यों नहीं रखा जाता है?
रामायण में विभीषण ने अपने परिवार का भेद भगवान राम को बताया था, जिसकी वजह से उसके भाई तथा उसके सभी सगे संबंधियों का विनाश हो गया था। इसीलिए कोई भी अपने बच्चे का नाम भी विभीषण नहीं रखता है।

विभीषण की माता का नाम क्या था?
विभीषण ब्राह्मण एवं राक्षस परिवार में हुआ था क्योंकि उसके पिता ऋषि विश्रवा एक ब्राह्मण थे जबकि विभीषण की मां का नाम कैक्सी था जो की एक राक्षसी थी।

कुंभकरण की पत्नी का नाम क्या था?
कुंभकरण की पत्नी बाली देश की कन्या वज्रजवाला थी। इसके अलावा कुंभकरण की एक दूसरी पत्नी भी थी, उसका नाम करकटी था। कुंभकरण के 1 पुत्र था इसका नाम मूलकासुर था। मान्यता है कि इस मूलकासूर का वध माता सीता ने किया था।

रावण की मृत्यु के बाद सुपनखा का क्या हुआ?
रावण की बहन सुपनखा जिसकी वजह से रावण की मति भ्रष्ट हो गई और उसमें माता सीता का अपहरण कर अपने पूरे परिवार को मृत्यु के मुख्य मे ले गया। वह रावण की मृत्यु के बाद सूर्पनखा जंगल में जाकर तपस्या करके अपने जीवन से मुक्ति प्राप्त करनी थी।

रावण की मृत्यु के पश्चात लंका का राजा कौन बना?
मान्यताओं के अनुसार रावण की मृत्यु के बाद लंका की राजगद्दी में रावण के सबसे छोटे भाई विभीषण बैठे थे और उन्होंने लंका का सारा कार्य भार अपने हाथों में ले लिया था। भगवान राम ने उनका राजतिलक किया था और भारत के बाद अगर कहीं रामराज्य चल रहा था तो वह विभीषण के शासन में लंका में चल रहा था।

रावण का धर्म क्या था?
रावण ब्रांहण का पुत्र था, इसलिए कह सकते हैं की वह हिन्दू धर्म मे जन्म लिया था, लेकिन क्योंकि उसकी चालचलन सनातन/हिन्दू धर्म के अनुयाईयो की तरह नहीं था, तथा उसने राक्षस गुण को स्वीकार्य कर लिया था। पूर्व काल मे जन्म से जाती का निर्धारण नहीं होता था, इस लिए ज्ञान एवं वेदो के ज्ञाता को ब्रांहण कहते थे, इसलिए कई लोग ज्ञान के आधार पर रावण को ब्राहण कहते हैं, लेकिन गुण के आधार पर रावण को राक्षस गुण का कहा जा सकता हैं।

रावण की उम्र कितनी थी?
रावण पुलत्स मुनि का पौत्र था तथा वह भगवान ब्रम्हा के वंश का था। रावण की मृत्यु जब राम भगवान के हाथो हुई थी तब रावण की मृत्यु 39001 वर्ष 4 माह और 9 दिन की थी।

कुबेर से रावण ने बलपूर्वक क्या छीन लिया था?
कुबेर और रावण दोनों एक दूसरे के सौतेले भाई है। कुबेर देवता की श्रेणी मे आते हैं तथा, उन्हे धन का देवता माना जाता हैं। मान्यता हैं की लंका का राजा कुबेर ही थे, लेकिन रावण को लंका बहुत पसंद आई तो उसने कुबेर से लंका बलपूर्वक छीन लिया।

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