बेलपत्र के प्रयोग

बेलपत्र की कहानी :-

स्कंद पुराण के अनुसार, एक बार माता पार्वती मंदराचल पर्वत पर भ्रमण कर रहीं थीं । तभी उनके शरीर से उनके पसीने की एक बूंद मंदराचल पर्वत पर गिर गई और पसीने की उसी एक बूंद से बेलपत्र के वृक्ष का जन्म हुआ। इस प्रकार पुराग्रंथों में ऐसा वर्णन मिलता है कि माता पार्वती के पसीने से बेल के वृक्ष का उद्भव हुआ। अत: इसमें माता पार्वती के सभी रूप समाए हुए हैं। 

एक अन्य कथा के अनुसार

एक बार भगवान शिव पार्वती के साथ हिमालय पर्वत पर विराजमान थे तभी वहां घूमते-फिरते नारद जी पहुंच गए और उन्होंने भगवान भोलेनाथ से एक प्रश्न कर दिया।

नारद जी ने एक बार भोलेनाथ की स्तुति कर पूछा – " प्रभु ! आपको प्रसन्न करने के लिए सबसे उत्तम और सुलभ साधन क्या है ? हे त्रिलोकीनाथ ! आप तो निर्विकार और निष्काम हैं। आप सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं। फिर भी मेरी जानने की इच्छा है कि आपको क्या प्रिय है ?"

शिवजी बोले, " हे नारदजी ! वैसे तो मुझे भक्त के भाव सबसे प्रिय हैं, फिर भी जब आपने पूछा है तो बताता हूं कि मुझे जल के साथ-साथ बिल्वपत्र अर्थात बेलपत्र बहुत प्रिय है। जो अखंड बेलपत्र मुझे श्रद्धा से अर्पित करते हैं। मैं उन्हें अपने लोक में स्थान देता हूं।"

नारद जी भगवान शंकर औऱ माता पार्वती की वंदना कर अपने लोक को चले गए। उनके जाने के पश्चात पार्वती जी ने शिव जी से पूछा, " हे प्रभु ! मेरी यह जानने की बड़ी उत्कट इच्छा हो रही है कि आपको बेलपत्र इतने प्रिय क्यों है? कृपा करके मेरी जिज्ञासा शांत करें।"

इस पर शिव जी बोले, " हे शिवे ! बिल्व के पत्ते मेरी जटा के समान हैं । उसका त्रिपत्र यानी तीन पत्ते, ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद हैं। शाखाएं समस्त शास्त्रों का स्वरूप हैं। विल्ववृक्ष को आप पृथ्वी का कल्पवृक्ष समझें; जो ब्रह्मा-विष्णु-शिव स्वरूप है। स्वयं महालक्ष्मी ने शैल पर्वत पर विल्ववृक्ष रूप में जन्म लिया था।"

यह सुनकर पार्वती जी कौतूहल में पड़ गईं. उन्होंने पूछा- देवी लक्ष्मी ने आखिर विल्ववृक्ष का रूप क्यों लिया ? आप यह कथा विस्तार से कहें। भोलेनाथ ने देवी पार्वती को कथा कहनी शुरू की।

हे देवी, सत्ययुग में ज्योतिरूप में मेरे अंश का रामेश्वर लिंग था। ब्रह्मा आदि देवों ने उसका विधिवत पूजन-अर्चन किया था। फलतः मेरे अनुग्रह से वाग्देवी सबकी प्रिया हो गईं। वह भगवान विष्णु को सतत प्रिय हो गईं।

मेरे प्रभाव से भगवान केशव के मन में वाग्देवी के लिए जितनी प्रीति हुई वह स्वयं लक्ष्मी को नहीं भाई, अतः लक्ष्मी देवी चिंतित और रूष्ट होकर परम उत्तम श्री शैल पर्वत पर चली गईं।

वहां उन्होंने मेरे लिंग विग्रह की उग्र तपस्या प्रारम्भ कर दी। हे परमेश्वरी कुछ समय बाद महालक्ष्मी जी ने मेरे लिंग विग्रह से थोड़ा उर्ध्व में एक वृक्ष का रूप धारण कर लिया और अपने पत्र पुष्प द्वारा निरंतर मेरा पूजन करने लगी।

इस तरह उन्होंने कोटि वर्ष (एक करोड़ वर्ष) तक आराधना की। अंततः उन्हें मेरा अनुग्रह प्राप्त हुआ। महालक्ष्मी ने मांगा कि श्री हरि के हृदय में मेरे प्रभाव से वाग्देवी के लिए जो स्नेह हुआ है। वह समाप्त हो जाए।

शिवजी बोले- मैंने महालक्ष्मी को बहुत समझाया कि श्री हरि के हृदय में आपके अतिरिक्त किसी और के लिए कोई प्रेम नहीं है। वाग्देवी के प्रति तो केवल उनकी श्रद्धा है। यह सुनकर लक्ष्मी जी प्रसन्न हो गईं और पुनः श्री विष्णु के ह्रदय में स्थित होकर निरंतर उनके साथ विहार करने लगी।

हे पार्वती ! महालक्ष्मी के हृदय का एक बड़ा विकार इस प्रकार दूर हुआ था। इस कारण हरिप्रिया उसी वृक्षरूप में सर्वदा अतिशय भक्ति से भरकर यत्न पूर्वक मेरी पूजा करने लगी। बिल्व इस कारण मुझे बहुत प्रिय है और मैं विल्ववृक्ष का आश्रय लेकर रहता हूं।

विल्ववृक्ष को सदा सर्व तीर्थमय एवं सर्व देवमय मानना चाहिए। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। विल्वपत्र, विल्वफूल, विल्ववृक्ष अथवा विल्व काष्ठ के चन्दन से जो मेरा पूजन करता है। वह मेरा प्रिय भक्त है। विल्ववृक्ष को मेरे ही समान समझो। वह मेरा शरीर है।

जो विल्वपत्र पर चंदन से मेरा नाम अंकित करके मुझे अर्पण करता है। मैं उसे सभी पापों से मुक्त करके अपने लोक में स्थान देता हूं। उस व्यक्ति को स्वयं लक्ष्मी जी भी नमस्कार करती हैं। जो विल्वमूल में प्राण छोड़ता है। उसको रूद्र देह प्राप्त होती है।

शिव पुराण और बिल्वपत्र 
अब तुम लोग आदरपूर्वक बिल्बका माहात्म्य सुनो। यह बिल्व वृक्ष महादेव का ही रूप है। देवताओं ने भी इसकी स्तुति की है। फिर जिस किसी तरह से इसकी महिमा कैसे जानी जा सकती है। तीनों लोकों में जितने पुण्य-तीर्थ प्रसिद्ध हैं, वे सम्पूर्ण तीर्थ बिल्व के मूलभाग में निवास करते हैं। जो पुण्यात्मा मनुष्य बिल्व के मूल में लिंगस्वरुप अविनाशी महादेवजी का पूजन करता है, वह निश्चय ही शिवपद को प्राप्त होता है। 
जो बिल्व की जड़ के पास जल से अपने मस्तक को सींचता है, वह सम्पूर्ण तीर्थों का स्नान का फल पा लेता है और वही इस भूतल पर पावन माना जाता है। इस बिल्व की जड़ के परम उत्तम थाले को जल से भरा हुआ देखकर महादेवजी पूर्णतया संतुष्ट होते हैं। जो मनुष्य गंध, पुष्प आदि से बिल्व के मूलभाग का पूजन करता है, वह शिवलोक को पाता है और इस लोक में भी उसकी सुख-सन्तति बढ़ती है। जो बिल्व की जड़ के समीप आदरपूर्वक दीपावली जलाकर रखता है, वह तत्त्वज्ञान से सम्पन्न हो भगवान् महेश्वर में मिल जाता है। 
जो बिल्वकी शाखा थामकर हाथ से उसके नये-नये पल्लव उतारता और उनसे उस बिल्व की पूजा करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। जो बिल्व की जड़ के समीप भगवान् शिव में अनुराग रखने वाले एक भक्त को भी भक्तिपूर्वक भोजन कराता है, उसे कोतिगुना पुण्य प्राप्त होता है। जो बिल्व की जड़ के पास शिवभक्त को खीर और घृत से युक्त अन्न देता है, वह कभी दरिद्र नहीं होता। 

बेलपत्र की कहानी :-

स्कंद पुराण के अनुसार, एक बार माता पार्वती मंदराचल पर्वत पर भ्रमण कर रहीं थीं । तभी उनके शरीर से उनके पसीने की एक बूंद मंदराचल पर्वत पर गिर गई और पसीने की उसी एक बूंद से बेलपत्र के वृक्ष का जन्म हुआ। इस प्रकार पुराग्रंथों में ऐसा वर्णन मिलता है कि माता पार्वती के पसीने से बेल के वृक्ष का उद्भव हुआ। अत: इसमें माता पार्वती के सभी रूप समाए हुए हैं। 

बेलवृक्ष में इन देवियों का है वास!

मां गिरिजा इस वृक्ष की जड़ों में, मां महेश्वरी तने में , मां दक्षिणायनी शाखाओं में , मां पार्वती पत्तियों में , मां गौरी फूलों में और मां कात्यायनी फलों में वास करती हैं। कहा जाता है कि बेल वृक्ष के कांटों में भी कई शक्तियां समाहित हैं। 
मान्‍यता यह भी है क‍ि इसमें देवी महालक्ष्मी का भी वास है। जो श्रद्धालु शिव-पार्वती की पूजा में बेलपत्र अर्पित करते हैं। उन्हें भोलेनाथ और माता पार्वती दोनों का आशीर्वाद मिलता है।

अतः बेलपत्र के वृक्ष की जड़ को मां गिरिजा का, तनों को मां माहेश्वरी का, शाखाओं को मां दक्षिणायनी का व पत्तियों को मां पार्वती का, फलों को मां कात्यायनी का व फूलों को मां गौरी स्वरूप माना जाता है। इसके अलावा, मां लक्ष्मी भी इस समस्त वृक्ष में निवास करता है। 

बेलपत्र में माता पार्वती का वास होने के कारण इसे भगवान शिव पर चढ़ाया जाता है। भगवान शिव पर बेल पत्र चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं और भक्त की मनोकामना पूर्ण करते हैं। 



बेलपत्र के प्रयोग 

                        बेलपत्र का स्वरूप

बेलपत्र का स्वरूप
जैसा कि ऊपर के चित्र में आपको दिखाई दे रहा है की सबसे बड़ी पट्टी में भगवान शिव का वास होता है और दाएं और बाएं पत्तियों में ब्रह्मा जी और विष्णु जी का, दोनों पत्तियों और बड़ी पत्ती के बीच में वाली डंडी में 33 कोटी देवी देवताओं का वास होता है। डूंठ और मध्य की दोनों पत्तियां के बीच वाली डंडी में 64 योगिनियों और माता पार्वती का स्थान होता है। बेलपत्र के डूंठ वाले स्थान में शिवगणौं का स्थान होता है। 

बेलपत्र
बेलपत्र को संस्कृत में 'बिल्वपत्र' कहा जाता है। सामान्य बेलपत्र में एक साथ तीन पत्तियां जुड़ी रहती हैं। इन तीनों पत्तियों को त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना जाता है। बेलपत्र 3 से लेकर 11 दलों अर्थात पत्रों तक के होते हैं। बेलपत्र में जितने अधिक पत्ते होते, हैं , बह बेलपत्र उतना ही उत्तम माना जाता है।

ऐसे करें : भोलेनाथ को बेलपत्र अर्पित
भोलेनाथ को बेलपत्र अर्पित करते समय रुद्राष्टाध्यायी के इस पौराणिक मंत्र का उच्‍चारण करें। 
‘त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतम्। 
त्रिजन्मपापसंहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्॥’ 
अर्थात : तीन गुण, तीन नेत्र, त्रिशूल धारण करने वाले और तीन जन्मों के पाप को संहार करने वाले हे शिवजी आपको त्रिदल बिल्व पत्र अर्पित करता हूं। रुद्राष्टाध्यायी के इस मंत्र को बोलकर बेलपत्र चढ़ाने का विशेष महत्त्व एवं फल है।


वैसे तो बेलपत्र की महिमा का वर्णन कई पुराणों में मिलता है। लेकिन शिवपुराण में इसकी महिमा विस्‍तार से बताई गयी है।

बेलपत्र चढ़ाने के नियम

भगवान शिव को हमेशा उल्टा बेलपत्र चढ़ाने की परम्परा है। अर्थात बेलपत्र की चिकनी सतह की तरफ वाला भाग शिवलिंग को या भगवान को स्पर्श कराते हुए चढ़ाया जाता है।बेलपत्र को हमेशा अनामिका, अंगूठे और मध्यमा अंगुली की मदद से इस प्रकार पकड़ कर चढ़ाएं कि इसकी तीनों पत्तियों और उनके मध्य की डंडी हमारी उंगलियों से स्पर्श करती रहे। भगवान शिव को बिल्वपत्र अर्पण करने के उपरांत जल जरूर चढ़ाएं।

ध्यान रहे कि 
★ भगवान शिव को ऐसा बेलपत्र अर्पण करें जिसकी पत्तियां बिल्कुल भी कटी-फटी न हों। 
★ शिवलिंग पर दूसरे के द्वारा चढ़ाए गए बेलपत्र का अनादर नहीं करना चाहिए।

लीवर या किडनी गड़बड़ या डायलिसिस की स्थिति में
बेलपत्र के डूंठ वाले स्थान में शिवगणौं का स्थान होता है। इनका काम होता है कि किसी व्यक्ति के शरीर में दुख तकलीफ हो तो उसे दूर करें। बेलपत्र की डूंठ को तोड़कर अशोक सुंदरी वाले स्थान पर चढ़ने के उपरांत उसे औषधि बनाने की प्रार्थना करें। इसके उपरांत अशोक सुंदरी से वह डूंठ मांग ले और वहीं खड़े होकर चबा-चबा कर खाएं। यह उपाय हफ्ते में दो बार करें। लीवर और किडनी दोनों काम करने लगेंगे।

सुगर लेवल के लिए 
बेलपत्र के डूंठ वाले स्थान में शिवगणौं का स्थान होता है। इनका काम होता है कि किसी व्यक्ति के शरीर में दुख तकलीफ हो तो उसे दूर करें। 
यदि किसी को शुगर है तो पहले शुगर की जांच करा लें, उसके उपरांत मंदिर जाकर, बेलपत्र की डूंठ को तोड़कर अशोक सुंदरी वाले स्थान पर चढ़ने के उपरांत उसे औषधि बनाने की प्रार्थना करें। इसके उपरांत अशोक सुंदरी से वह डूंठ मांग ले और वहीं खड़े होकर चबा-चबा कर खाएं। यह उपाय हफ्ते में दो बार करें। सुगर लेवल में आ जाएगी मंदिर से जाकर जांच करा लें।

बेलपत्र की पत्तियां खाने से मुंह कट जाता है।
बेलपत्र की पत्तियां खाने से मुंह कट जाता है। मुंह क्षार क्षार हो जाता है। रोज-रोज बेलपत्र खाने से मुंह में छाले पड़ जाते हैं। 'अति सर्वत्र वर्ज्यते' इससे बचने के लिए बेलपत्र को सुखाकर उसका चूर्ण बना ले और चुटकी भर चूर्ण पानी के साथ ले ले।

वनस्पति की प्रजातियां
पौधों की 20 लाख प्रजातियां, अतः बिना किसी उपयोग या जरूरत के नहीं काटना या बेकार करना चाहिए। यदि आप ऐसा करते हैं तो वनस्पति के देव आपको वनस्पति बनने का श्राप दे देते हैं।

बेलपत्र, तुलसी, आंवाला या पीपल के पत्ते आप जब चाहे तोड़ अर्थात उतार सकते हैं । परंतु ध्यान रखें कि उसकी टहनी या डाली नहीं टूटनी चाहिए।
यदि टहनी या डाली टूट जाती है तो आपने कितना भी दान या पुण्य किया हो। वह सब उसी पल नष्ट हो जाता है।

अतः जब आवश्यकता हो, आप उनके पत्तों को तोड़ सकते हैं और उपयोग में ला सकते हैं। बिना मतलब इन्हें नहीं तोड़ना चाहिए।

बेलपत्र चन्दन के तीन उपाय ...
1. शरीर में गाँठ पड़ गई हो 
 2. शरीर की रीढ़ की हड्डी में गैप हो 
3. बच्चा बिस्तर में गन्दा करता हो

जब बेलपत्र पूरी तरह से सूख जाए
जब बेलपत्र का वृक्ष पूरी तरह सुख जाए तो उसे बजा कर देख ले और पूर्णता अस्वस्त हो जाए कि वह पूरी तरह सूख चुका है। अब पुनः हरा नहीं होगा तो आप उसे जड़ से काट ले और उसके जड़ के छोटे-छोटे टुकड़े या मुठिया बना लें । ये टुकड़े चंदन की तरह काम करेंगे। उन्हें घिसकर आप चंदन बना ले इस चंदन का उपयोग आप भगवान भोलेनाथ अर्चना और बहुत सारे उपाय में कर सकते हैं।
ध्यान रहे की यह वृक्ष हरा नहीं होना चाहिए । इस पर फल या पत्ते आदि भी नहीं होने चाहिए। वह पूरी तरह से सूख चुका होना चाहिए तभी उसे काटे। फिर इसके मुठिया को घिसकर या सिलबट्टे पर घिसकर उसका चंदन बना ले।

हर महीने का प्रदोष, शिवरात्रि और सोमवार की अष्टमी को भगवान भोलेनाथ का इस चंदन से अभिषेक करें। 
प्रदोष हर महीने आता है शिवरात्रि हर महीने आती है और ये  मुहुर्त माह में दो दो बार आता है परंतु सोमवार की अष्टमी दो-तीन महीने के अंतराल के बाद ही आती है। कभी-कभी महीने बाद भी पड़ सकती है।

अभिषेक करने के उपरांत उस चंदन को प्लेट में निकल ले और सुखा कर रख ले। यह इसकी गोलियां बना ले।
यह ध्यान रहे की हर दिन प्रदोष, शिवरात्रि और सोमवार की अष्टमी का चंदन अलग अलग डिब्बे में रखें और उन पर लेबल लगा ले। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि प्रदोष का चंदन अलकड़ी में शिवरात्रि के दिन का चंदन अलग डिब्बी में और सोमवार की अष्टमी का चंदन अलग विधि में सुखाकर या गोलियां बनाकर रख ले।

शरीर में गाठ का उपाय
प्रदोष के दिन के चंदन का उपाय 
यदि शरीर में कहीं भी गांठ है और डॉक्टर ने बोल दिया कि इसका ऑपरेशन जरूरी है तो प्रदोष के दिन आपने जो चंदन का लेपन किया था उसकी गोली एक-एक गोली कुंदकेश्वर महादेव का नाम लेकर, जल के साथ सेवन करें और 15 दिन बाद जांच कराएं भगवान की कृपा से वह गांठ गला प्रारंभ हो गई होगी।

शिवरात्रि के दिन के चंदन का उपाय 
बच्चों का बिस्तर गंदा करने से छुटकारा पाने का उपाय
जब बच्चा बड़ा हो गया है। अगर डरता है या डर के बावजूद बिस्तर को गंदा करता है अर्थात पेशाब करता है तो उसे एक छोटी सी गोली जल के साथ हफ्ते में एक बार देने पर आनंद की अनुभूति होगी और धीरे-धीरे वह बच्चा बिस्तर गिला करना छोड़ देगा।

सोमवार की अष्टमी के दिन के चंदन का उपाय 
रीड की हड्डी में गैप या हड्डियों की कमजोरी या घुटनों में दर्द से छुटकारा पाने का उपाय
रीड की हड्डी में गैप या हड्डियों की कमजोरी या घुटनों में कमजोरी के कारण दर्द से हो तो उसे एक गोली हफ्ते में दो बार देने पर आनंद की अनुभूति होगी और धीरे-धीरे रीड की हड्डी का गैप भरने लगेगा या हड्डियों की कमजोरी दूर होने लगेगी।








शिव को बेलपत्र इतने प्रिय क्यों है ???
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नारद जी ने एकबार भोलेनाथ की स्तुति कर पूछा – प्रभु आपको प्रसन्न करने के लिए सबसे उत्तम और सुलभ साधन क्या है. हे त्रिलोकीनाथ आप तो निर्विकार और निष्काम हैं, आप सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं. फिर भी मेरी जानने की इच्छा है कि आपको क्या प्रिय है ?
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 शिवजी बोले- नारदजी वैसे तो मुझे भक्त के भाव सबसे प्रिय हैं, फिर भी आपने पूछा है तो बताता हूं. मुझे जल के साथ-साथ बिल्वपत्र बहुत प्रिय है. जो अखंड बिल्वपत्र मुझे श्रद्धा से अर्पित करते हैं मैं उन्हें अपने लोक में स्थान देता हूं.
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नारद जी भगवान शंकर औऱ माता पार्वती की वंदना कर अपने लोक को चले गए. उनके जाने के पश्चात पार्वती जी ने शिव जी से पूछा- हे प्रभु मेरी यह जानने की बड़ी उत्कट इच्छा हो रही है कि आपको बेलपत्र इतने प्रिय क्यों है. कृपा करके मेरी जिज्ञासा शांत करें.
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शिव जी बोले- हे शिवे ! बिल्व के पत्ते मेरी जटा के समान हैं. उसका त्रिपत्र यानी तीन पत्ते, ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद हैं. शाखाएं समस्त शास्त्र का स्वरूप हैं. विल्ववृक्ष को आप पृथ्वी का कल्पवृक्ष समझें जो ब्रह्मा-विष्णु-शिव स्वरूप है. स्वयं महालक्ष्मी ने शैल पर्वत पर विल्ववृक्ष रूप में जन्म लिया था.
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यह सुनकर पार्वती जी कौतूहल में पड़ गईं. उन्होंने पूछा- देवी लक्ष्मी ने आखिर विल्ववृक्ष का रूप क्यों लिया ? आप यह कथा विस्तार से कहें. भोलेनाथ ने देवी पार्वती को कथा सुनानी शुरू की.
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हे देवी, सत्ययुग में ज्योतिरूप में मेरे अंश का रामेश्वर लिंग था. ब्रह्मा आदि देवों ने उसका विधिवत पूजन-अर्चन किया था. फलतः मेरे अनुग्रह से वाग्देवी सबकी प्रिया हो गईं. वह भगवान विष्णु को सतत प्रिय हो गईं.
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मेरे प्रभाव से भगवान केशव के मन में वाग्देवी के लिए जितनी प्रीति हुई वह स्वयं लक्ष्मी को नहीं भाई. अतः लक्ष्मी देवी चिंतित और रूष्ट होकर परम उत्तम श्री शैल पर्वत पर चली गईं.
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वहां उन्होंने मेरे लिंग विग्रह की उग्र तपस्या प्रारम्भ कर दी. हे परमेश्वरी कुछ समय बाद महालक्ष्मी जी ने मेरे लिंग विग्रह से थोड़ा उर्ध्व में एक वृक्ष का रूप धारण कर लिया और अपने पत्र पुष्प द्वारा निरंतर मेरा पूजन करने लगी.
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इस तरह उन्होंने कोटि वर्ष ( एक करोड़ वर्ष) तक आराधना की. अंततः उन्हें मेरा अनुग्रह प्राप्त हुआ. महालक्ष्मी ने मांगा कि श्री हरि के हृदय में मेरे प्रभाव से वाग्देवी के लिए जो स्नेह हुआ है वह समाप्त हो जाए.
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शिवजी बोले- मैंने महालक्ष्मी को समझाया कि श्री हरि के हृदय में आपके अतिरिक्त किसी और के लिए कोई प्रेम नहीं है. वाग्देवी के प्रति तो उनकी श्रद्धा है. यह सुनकर लक्ष्मी जी प्रसन्न हो गईं और पुनः श्री विष्णु के ह्रदय में स्थित होकर निरंतर उनके साथ विहार करने लगी.
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हे पार्वती ! महालक्ष्मी के हृदय का एक बड़ा विकार इस प्रकार दूर हुआ था. इस कारन हरिप्रिया उसी वृक्षरूपं में सर्वदा अतिशय भक्ति से भरकर यत्न पूर्वक मेरी पूजा करने लगी. बिल्व इस कारण मुझे बहुत प्रिय है और मैं विल्ववृक्ष का आश्रय लेकर रहता हूं.
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विल्ववृक्ष को सदा सर्व तीर्थमय एवं सर्व देवमय मानना चाहिए. इसमें तनिक भी संदेह नहीं है. विल्वपत्र, विल्वफूल, विल्ववृक्ष अथवा विल्व काष्ठ के चन्दन से जो मेरा पूजन करता है वह भक्त मेरा प्रिय है. विल्ववृक्ष को शिव के समान ही समझो. वह मेरा शरीर है.
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जो विल्व पर चंदन से मेरा नाम अंकित करके मुझे अर्पण करता है मैं उसे सभी पापों से मुक्त करके अपने लोक में स्थान देता हूं. उस व्यक्ति को स्वयं लक्ष्मी जी भी नमस्कार करती हैं. जो विल्वमूल में प्राण छोड़ता है उसको रूद्र देह प्राप्त होता है.
(योगिनीतंत्रम् ग्रंथ से)


भूतभावन भोलेनाथ को क्यों प्रिय है भाँग धतूरा औऱ विल्वपत्र?????

भगवान शिव के बारे में एक बात प्रसिद्ध है कि वे भांग और धतूरे जैसी नशीली चीजों का सेवन करते हैं। शराब को छोड़कर उन्हें शेष सारी ऐसी वस्तुएं प्रिय हैं। क्या वाकई शिव हमेशा भांग या अन्य किसी नशे में रहते हैं? क्यों उन्हें इस तरह की वस्तुएं प्रिय हैं? क्यों सन्यासियों में गांजा-चिलम आदि का इतना प्रचलन है?

दरअसल भगवान शिव सन्यासी हैं और उनकी जीवन शैली बहुत अलग है। वे पहाड़ों पर रह कर समाधि लगाते हैं और वहीं पर ही निवास करते हैं। जैसे अभी भी कई सन्यासी पहाड़ों पर ही रहते हैं। पहाड़ों में होने वाली बर्फबारी से वहां का वातावरण अधिकांश समय बहुत ठंडा होता है। गांजा, धतूरा, भांग जैसी चीजें नशे के साथ ही शरीर को गरमी भी प्रदान करती हैं। जो वहां सन्यासियों को जीवन गुजारने में मददगार होती है। 

अगर थोड़ी मात्रा में ली जाए तो यह औषधि का काम भी करती है, इससे अनिद्रा, भूख आदि कम लगना जैसी समस्याएं भी मिटाई जा सकती हैं लेकिन अधिक मात्रा में लेने या नियमित सेवन करने पर यह शरीर को, खासतौर पर आंतों को काफी प्रभावित करती हैं।

इसकी गर्म तासीर और औषधिय गुणों के कारण ही इसे शिव से जोड़ा गया है। भांग-धतूरे और गांजा जैसी चीजों को शिव से जोडऩे का एक और दार्शनिक कारण भी है। ये चीजें त्याज्य श्रेणी में आती हैं, शिव का यह संदेश है कि मैं उनके साथ भी हूं जो सभ्य समाजों द्वारा त्याग दिए जाते हैं। जो मुझे समर्पित हो जाता है, मैं उसका हो जाता हूं।

आखिर भगवान शिव को क्यों चढ़ाया जाता है बेल पत्र?

ज्योतिष के जानकारों की मानें तो भगवान शिव के पूजन में बेलपत्र का विशेष महत्व है। शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करने से प्रसन्न होते हैं महादेव। मान्यता है कि शिव की उपासना बिना बेलपत्र के पूरी नहीं होती। अगर आप भी देवों के देव महादेव की विशेष कृपा पाना चाहते हैं तो बेलपत्र के महत्व को समझना बेहद ज़रूरी है। आइए जानते हैं कि बेलपत्र क्यों है 

शिव को इतना प्रिय और क्या है बेलपत्र का महत्व…

बेल के पेड़ की पत्तियों को बेलपत्र कहते हैं। बेलपत्र में तीन पत्तियां एक साथ जुड़ी होती हैं लेकिन इन्हें एक ही पत्ती मानते हैं। भगवान शिव की पूजा में बेलपत्र प्रयोग होते हैं और इनके बिना शिव की उपासना सम्पूर्ण नहीं होती। पूजा के साथ ही बेलपत्र के औषधीय प्रयोग भी होते हैं। इसका प्रयोग करके तमाम बीमारियां दूर की जा सकती हैं।

सही तरीके से करें अर्पित तभी मिलेगा उचित लाभ : ज्योतिष के जानकारों की मानें तो जब भी आप महादेव को बेलपत्र अर्पित करें तो कुछ बातों का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है। क्योंकि गलत तरीके से अर्पित किए हुए बेलपत्र शिव को अप्रसन्न भी कर सकते हैं। जानिए बेलपत्र से जुड़ी इन सावधानियों के बारे में…

एक बेलपत्र में तीन पत्तियां होनी चाहिए।पत्तियां कटी या टूटी हुई न हों और उनमें कोई छेद भी नहीं होना चाहिए। भगवान शिव को बेलपत्र चिकनी ओर से ही अर्पित करें।  एक ही बेलपत्र को जल से धोकर बार-बार भी चढ़ा सकते हैं। शिव जी को बेलपत्र अर्पित करते समय साथ ही में जल की धारा जरूर चढ़ाएं। बिना जल के बेलपत्र अर्पित नहीं करना चाहिए।

बिल्व पत्र का महत्व- बिल्व तथा श्रीफल नाम से प्रसिद्ध यह फल बहुत ही काम का है। यह जिस पेड़  पर लगता है वह शिवद्रुम भी कहलाता है। बिल्व का पेड़ संपन्नता का प्रतीक, बहुत पवित्र तथा समृद्धि देने वाला है। बेल के पत्ते शंकर जी का आहार माने गए हैं, इसलिए भक्त लोग बड़ी श्रद्धा से इन्हें महादेव के ऊपर चढ़ाते हैं। शिव की पूजा के लिए बिल्व-पत्र बहुत ज़रूरी माना जाता है। शिव-भक्तों का विश्वास है कि पत्तों के त्रिनेत्रस्वरूप् तीनों पर्णक शिव के तीनों नेत्रों को विशेष प्रिय हैं।

भगवान शंकर का प्रिय- भगवान शंकर को बिल्व पत्र बेहद प्रिय हैं। भांग धतूरा और बिल्व पत्र से प्रसन्न होने वाले केवल शिव ही हैं। शिवरात्रि के अवसर पर बिल्वपत्रों से विशेष रूप से शिव की पूजा की जाती है। तीन पत्तियों वाले बिल्व पत्र आसानी से उपलब्ध  हो जाते हैं, किंतु कुछ ऐसे बिल्व पत्र भी होते हैं जो दुर्लभ पर चमत्कारिक और अद्भुत होते हैं।

 बिल्वाष्टक और शिव पुराण- बिल्व पत्र का भगवान शंकर के पूजन में विशेष महत्व है, जिसका प्रमाण शास्त्रों में मिलता है। बिल्वाष्टक और शिव पुराण में इसका स्पेशल उल्लेख है। अन्य कई ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है। भगवान शंकर एवं पार्वती को बिल्व पत्र चढ़ाने का विशेष महत्व है।

मां भगवती को बिल्व पत्र- श्रीमद् देवी भागवत में स्पष्ट वर्णन है कि जो व्यक्ति मां भगवती को बिल्व पत्र अर्पित करता है वह कभी भी किसी भी परिस्थिति में दुखी नहीं होता। उसे हर तरह की सिद्धि प्राप्त होती है और कई जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है और वह भगवान भोले नाथ का प्रिय भक्त हो जाता है। उसकी सभी इच्छाएं  पूरी होती हैं और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।

 बिल्व पत्र के प्रकार- बिल्व पत्र चार प्रकार के होते हैं – अखंड बिल्व पत्र, तीन पत्तियों के बिल्व पत्र, छः से 21 पत्तियों तक के बिल्व पत्र और श्वेत बिल्व पत्र। इन सभी बिल्व पत्रों का अपना-अपना आध्यात्मिक महत्व  है। आप हैरान हो जाएंगे ये जानकर की कैसे ये बेलपत्र आपको भाग्यवान बना सकते हैं और लक्ष्मी कृपा दिला सकते हैं।

 अखंड बिल्व पत्र- इसका विवरण बिल्वाष्टक में इस प्रकार है – ‘‘अखंड बिल्व पत्रं नंदकेश्वरे सिद्धर्थ लक्ष्मी’’। यह अपने आप में लक्ष्मी सिद्ध है। एकमुखी रुद्राक्ष के समान ही इसका अपना विशेष महत्व है। यह वास्तुदोष का निवारण भी करता है। इसे गल्ले में रखकर नित्य पूजन करने से व्यापार में चैमुखी विकास होता है।

 तीन पत्तियों वाला बिल्व पत्र- इस बिल्व पत्र के महत्व का वर्णन भी बिल्वाष्टक में आया है जो इस प्रकार है- ‘‘त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतम् त्रिजन्म पाप सहारं एक बिल्वपत्रं शिवार्पणम’’ यह तीन गणों से युक्त होने के कारण भगवान शिव को प्रिय है। इसके साथ यदि एक फूल धतूरे का चढ़ा दिया जाए, तो फलों  में बहुत वृद्धि होती है।

 तीन पत्तियों वाला बिल्व पत्र- इस तरह बिल्व पत्र अर्पित करने से भक्त को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। रीतिकालीन कवि ने इसका वर्णन इस प्रकार किया है- ‘‘देखि त्रिपुरारी की उदारता अपार कहां पायो तो फल चार एक फूल दीनो धतूरा को’’ भगवान आशुतोष त्रिपुरारी भंडारी सबका भंडार भर देते हैं।

 तीन पत्तियों वाला बिल्व पत्र- आप भी फूल चढ़ाकर इसका चमत्कार स्वयं देख सकते हैं और सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं। तीन पत्तियों वाले बिल्व पत्र में अखंड बिल्व पत्र भी प्राप्त हो जाते हैं। कभी-कभी एक ही वृक्ष पर चार, पांच, छह पत्तियों वाले बिल्व पत्र भी पाए जाते हैं। परंतु ये बहुत दुर्लभ हैं।

 छह से लेकर 21 पत्तियों वाले बिल्व पत्र- ये मुख्यतः नेपाल में पाए जाते हैं। पर भारत में भी कहीं-कहीं मिलते हैं। जिस तरह रुद्राक्ष कई मुखों वाले होते हैं उसी तरह बिल्व पत्र भी कई पत्तियों वाले होते हैं।

 श्वेत बिल्व पत्र- जिस तरह सफेद सांप, सफेद टांक, सफेद आंख, सफेद दूर्वा आदि होते हैं उसी तरह सफेद बिल्वपत्र भी होता है। यह प्रकृति  की अनमोल देन है। इस बिल्व पत्र के पूरे पेड़ पर श्वेत पत्ते पाए जाते हैं। इसमें हरी पत्तियां नहीं होतीं। इन्हें भगवान शंकर को अर्पित करने का विशेष महत्व है।

 कैसे आया बेल वृक्ष- बेल वृक्ष की उत्पत्ति के संबंध में ‘स्कंदपुराण’ में कहा गया है कि एक बार देवी पार्वती ने अपनी ललाट से पसीना पोछकर फेंका, जिसकी कुछ बूंदें मंदार पर्वत पर गिरीं, जिससे बेल वृक्ष उत्पन्न हुआ। इस वृक्ष की जड़ों में गिरिजा, तना में महेश्वरी, शाखाओं में दक्षयायनी, पत्तियों में पार्वती, फूलों में गौरी और फलों में कात्यायनी वास करती हैं।

यह एक रामबाण दवा भी है- धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण इसे मंदिरों  के पास लगाया जाता है। बिल्व वृक्ष की तासीर बहुत शीतल होती है। गर्मी की तपिश से बचने के लिए इसके फल का शर्बत बड़ा ही लाभकारी (होता है। यह शर्बत कुपचन, आंखों की रोशनी  में कमी, पेट में कीड़े और लू लगने जैसी समस्याओं से निजात पाने के लिए उत्तम है। औषधीय गुणों से परिपूर्ण बिल्व की पत्तियों मे टैनिन, लोह, कैल्शियम, पोटेशियम और मैग्नेशियम जैसे रसायन  पाए जाते हैं।



जो व्यक्ति किसी तीर्थस्थान पर नहीं जा सकता है अगर वह श्रावण मास में बिल्व के पेड़ के मूल भाग की पूजा करके उसमें जल अर्पित करे तो उसे सभी तीर्थों के दर्शन का पुण्य मिलता है।

बेल वृक्ष का महत्व- 

1. बेल वृक्ष के आसपास सांप नहीं आते।

2. अगर किसी की शवयात्रा बेल वृक्ष की छाया से होकर गुजरे तो उसका मोक्ष हो जाता है।

3. वायुमंडल में व्याप्त अशुद्धियों को सोखने की क्षमता सबसे ज्यादा बेल वृक्ष में होती है।

4. 4, 5, 6 या 7 पत्तों वाले बेल पत्रक पाने वाला परम भाग्यशाली और शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल मिलता है।

5. बेल वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है और बेल वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है।

6. सुबह-शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापों का नाश होता है।

7. बेल वृक्ष को सींचने से पितर तृप्त होते हैं।

8. बेल वृक्ष और सफेद आक को जोड़े से लगाने पर अटूट लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

9. बेलपत्र और ताम्र धातु के एक विशेष प्रयोग से ऋषि मुनि स्वर्ण धातु का उत्पादन करते थे।

10. जीवन में सिर्फ 1 बार और वह भी यदि भूल से भी शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ा दिया हो तो भी उसके सारे पाप मुक्त हो जाते हैं।

11. बेल वृक्ष का रोपण, पोषण और संवर्द्धन करने से महादेव से साक्षात्कार करने का अवश्य लाभ मिलता है।

कृपया बेल पत्र का पेड़ जरूर लगाएं। बेल पत्र के लिए पेड़ को क्षति न पहुचाएं....

🚩ॐ नमः शिवाय 🚩

यूं तो भोलेशंकर की पूजा में अनेक सामग्र‍ियों का प्रयोग क‍िया जाता है। लेक‍िन क्या आप जानते हैं कि अगर आपके पास पूजन की कोई सामग्री न हो, तो भी आप श‍िवजी को केवल तीन पत्तियों वाला बेलपत्र चढ़ा कर खुश कर सकते हैं।

वहीं सावन के माह में भगवान को जलाभिषेक के समय बेलपत्र चढ़ाने का विशेष महत्व है। बेलपत्र को संस्कृत में 'बिल्वपत्र' कहा जाता है। यह भगवान शिव को बहुत ही प्रिय है। शास्त्रों के अनुसार बेलपत्र और जल से भगवान शंकर का मस्तिष्क शीतल रहता है।

इस संबंध में पंडित शर्मा का कहना है कि एक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान भगवान शिव ने जब विष पान किया था तो उनके गले में जलन हो रही थी। बिल्वपत्र के में विष निवारक गुण होते हैं इसलिए उन्हें बेलपत्र चढ़ाया गया, ताक‍ि जहर का असर कम हो। मान्‍यता है क‍ि तभी से भोलेनाथ को बेलपत्र चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई।

वहीं एक अन्‍य कथा के अनुसार बेलपत्र की तीन पत्तियां भगवान शिव के तीन नेत्रों का प्रतीक हैं। यानी शिव का ही रूप है इसलिए बेलपत्र को अत्‍यंत पवित्र माना जाता है।

भोलेनाथ की पूजा में इन तीन पत्तियों यानि बेलपत्र का विशेष महत्व है। मान्यता के अनुसार यहां तक की महादेव एक बेलपत्र अर्पण करने से भी प्रसन्न हो जाते है, इसलिए उन्हें ‘आशुतोष’ भी कहा जाता है।


शिवपुराण में कहा गया है कि बेलपत्र भगवान शिव का प्रतीक है। भगवान स्वयं इसकी महिमा स्वीकारते हैं। मान्यता है कि जो भी बेल वृक्ष की जड़ के पास शिवलिंग रखकर भोले की पूजा करते हैं। वे हमेशा सुखी रहते हैं। उनके पर‍िवार पर कभी कोई कष्‍ट नहीं आता।




बेलपत्र से जुड़े कुछ नियम...
जानकारों के अनुसार बेलपत्र को तोड़ते समय भगवान शिव का ध्यान करना चाहिए। इसके अलावा इस बात का भी ख्‍याल रखें क‍ि कभी भी चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या तिथि पर बेलपत्र न तोड़ें। साथ ही तिथियों के संक्रांति काल और सोमवार को भी बेल पत्र नहीं तोड़ना चाहिए।

: बेलपत्र को कभी भी टहनी के साथ नहीं तोड़ना चाहिए। इसे चढ़ाते समय तीन पत्तियों की डंठल को तोड़कर ही भोलेनाथ को अर्पित करना चाहिए।

: स्कंद पुराण के अनुसार अगर नया बेल पत्र नहीं मिल सके तो किसी दूसरे के चढ़ाए हुए बेलपत्र को भी धोकर आप चढ़ा सकते हैं। इससे किसी भी तरह का पाप नहीं लगेगा।

शिवलिंग पर गंगाजल के साथ-साथ बेलपत्र चढ़ाने से देवों के देव महादेव बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं। 

श्रावण मास में भगवान शिव को बेलपत्र चढ़ाने से अधूरी कामनाएं पूरी हो जाती है। मान्यता है कि बेलपत्र और जल से भगवान शंकर का मस्तिष्क शीतल रहता है। पूजा में इनका प्रयोग करने से वे बहुत जल्द प्रसन्न होते हैं

 

इन तिथियों पर न तोड़ें बेलपत्र

बेलपत्र को तोड़ते समय भगवान शिव का ध्यान करते हुए मन ही मन प्रणाम करना चाहिए। चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या तिथि पर बेलपत्र न तोड़ें। साथ ही तिथियों के संक्रांति काल और सोमवार को भी बेल पत्र नहीं तोड़ना चाहिए। बेलपत्र को कभी भी टहनी समेत नहीं तोड़ना चाहिए। साथ ही इसे चढ़ाते समय तीन पत्तियों की डंठल को तोड़कर ही शिव को अर्पण करना चाहिए।

 

बेलपत्र नहीं होता है बासी

बेल पत्र एक ऐसा पत्ता है जो कभी भी बासी नहीं होता है। भगवान शिव की पूजा में विशेष रूप से प्रयोग में लाए जाने वाले इस पावन पत्र के बारे में शास्त्रों में कहा गया है कि यदि नया बेलपत्र न उपलब्ध हो तो किसी दूसरे के चढ़ाए हुए बेलपत्र को भी धोकर कई बार पूजा में प्रयोग किया जा सकता है।

 


बेलपत्र का महत्व

शिव पुराण अनुसार श्रावण मास में सोमवार को शिवलिंग पर चढ़ाने से एक करोड़ कन्यादान के बराबर फल मिलता है। शिवलिंग का बिल्व पत्र से पूजन करने पर दरिद्रता दूर होती है और सौभाग्य का उदय होता है। बिल्ब पत्र से भगवान शिव ही नहीं उनके अंशावतार बजरंग बली प्रसन्न होते हैं। शिवपुराण के अनुसार घर में बिल्व वृक्ष लगाने से पूरा कुटुम्ब विभिन्न प्रकार के पापों के प्रभाव से मुक्त हो जाता है। जिस स्थान पर बिल्ववृक्ष होता है उसे काशी तीर्थ के समान पूजनीय और पवित्र माना गया है। ऐसे स्थान पर साधना अराधना करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

बेलपत्र को तोड़ते समय भगवान शिव का ध्यान करते हुए मन ही मन प्रणाम करना चाहिए. चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या तिथि पर बेलपत्र न तोड़ें. साथ ही तिथियों के संक्रांति काल और सोमवार को भी बेलपत्र नहीं तोड़ना चाहिए. बेलपत्र को कभी भी टहनी समेत नहीं तोड़ना चाहिए. इसके अलावा इसे चढ़ाते समय तीन पत्तियों की डंठल को तोड़कर ही भगवान शिव को अर्पण करना चाहिए.

बेलपत्र नहीं होता है बासी

बेलपत्र एक ऐसा पत्ता है, जो कभी भी बासी नहीं होता है. भगवान शिव की पूजा में विशेष रूप से प्रयोग में लाए जाने वाले इस पावन पत्र के बारे में शास्त्रों में कहा गया है कि यदि नया बेलपत्र न उपलब्ध हो, तो किसी दूसरे के चढ़ाए हुए बेलपत्र को भी धोकर कई बार पूजा में प्रयोग किया जा सकता है.



बेलपत्र का महत्व

शिव पुराण अनुसार, श्रावण मास में सोमवार को शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से एक करोड़ कन्यादान के बराबर फल मिलता है. शिवलिंग का बिल्वपत्र से पूजन करने पर दरिद्रता दूर होती है और सौभाग्य का उदय होता है. बेलपत्र से भगवान शिव ही नहीं, उनके अंशावतार बजरंगबली भी प्रसन्न होते हैं.

शिवपुराण के अनुसार, घर में बिल्व वृक्ष लगाने से पूरा कुटुम्ब विभिन्न प्रकार के पापों के प्रभाव से मुक्त हो जाता है. जिस स्थान पर बिल्ववृक्ष होता है, उसे काशी तीर्थ के समान पूजनीय और पवित्र माना गया है. ऐसे स्थान पर साधना, अराधना करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है.




 
#बिल्व_वृक्ष_विशेष_पंचपत्रबिल्व_दर्शनम्

🌿1. बिल्व वृक्ष के आसपास सांप नहीं आते ।
🌿2. अगर किसी की शव यात्रा बिल्व वृक्ष की छाया से होकर गुजरे तो उसका मोक्ष हो जाता है ।
🌿3. वायुमंडल में व्याप्त अशुध्दियों को सोखने की क्षमता सबसे ज्यादा बिल्व वृक्ष में होती है ।
🌿4. चार पांच छः या सात पत्तो वाले बिल्व पत्रक पाने वाला परम भाग्यशाली और शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल मिलता है ।
🌿5. बेल वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है। और बेल वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है।
🌿6. सुबह शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापो का नाश होता है।
🌿7. बेल वृक्ष को सींचने से पितर तृप्त होते है।
🌿8. बेल वृक्ष और सफ़ेद आक् को जोड़े से लगाने पर अटूट लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
🌿9. बेल पत्र और ताम्र धातु के एक विशेष प्रयोग से ऋषि मुनि स्वर्ण धातु का उत्पादन करते थे ।
🌿10. जीवन में सिर्फ एक बार और वो भी यदि भूल से भी शिवलिंग पर बेल पत्र चढ़ा दिया हो तो भी उसके सारे पाप मुक्त हो जाते है ।
🌿11. बेल वृक्ष का रोपण, पोषण और संवर्धन करने से महादेव से साक्षात्कार करने का अवश्य लाभ मिलता है।
🌿कृपया बिल्व पत्र का पेड़ जरूर लगाये । बिल्व पत्र के लिए पेड़ को क्षति न पहुचाएं।

#शिवजी की पूजा में ध्यान रखने योग्य बात:-

#शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को कौन सी चीज़ चढाने से क्या फल मिलता है । किसी भी देवी-देवता का पूजन करते वक़्त उनको अनेक चीज़ें अर्पित की जाती है। प्रायः भगवन को अर्पित की जाने वाली हर चीज़ का फल अलग होता है। शिव पुराण में इस बात का वर्णन
मिलता है कि भगवन शिव को अर्पित करने वाली अलग-अलग चीज़ों का क्या फल होता है।
#शिवपुराण के अनुसार जानिए कौन सा अनाज भगवान शिव को चढ़ाने से क्या फल मिलता है:
👉1. भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।
👉2. तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाताहै।
👉3. जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।
👉4. गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।यह सभी अन्न भगवान को अर्पण करने के बाद गरीबों में वितरीत कर देना चाहिए।
#शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन सा रस(द्रव्य) चढ़ाने से उसका क्या फल मिलता है।
🚩1. ज्वर (बुखार) होने पर भगवान शिव को जलधारा चढ़ाने से शीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी जलधारा द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है।
🚩2. नपुंसक व्यक्ति अगर शुद्ध घी से भगवान शिव का अभिषेक करे, ब्राह्मणों को भोजन कराए तथा सोमवार का व्रत करे तो उसकी समस्या का निदान संभव है।
🚩3. तेज दिमाग के लिए शक्कर मिश्रित दूध भगवान शिव को चढ़ाएं।
🚩4. सुगंधित तेल से भगवान शिव का अभिषेक करने पर समृद्धि में वृद्धि होती है।
🚩5. शिवलिंग पर ईख (गन्ना) का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों की प्राप्ति होती है।
🚩6. शिव को गंगाजल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।
🚩7. मधु (शहद) से भगवान शिव का अभिषेक करने से राजयक्ष्मा (टीबी) रोग में आराम मिलता है।

#शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन का फूल चढ़ाया जाए तो उसका क्या फल मिलता है-
☑️1. लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने पर भोग व मोक्ष की प्राप्ति होती है।
☑️2. चमेली के फूल से पूजन करने पर वाहन सुख मिलता है।
☑️3. अलसी के फूलों से शिव का पूजन करने से मनुष्य भगवान विष्णु को प्रिय होता है।
☑️4. शमी पत्रों (पत्तों) से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है।
☑️5. बेला के फूल से पूजन करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती
है।
☑️6. जूही के फूल से शिव का पूजन करें तो घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती।
☑️7. कनेर के फूलों से शिव पूजन करने से नए वस्त्र मिलते हैं।
☑️8. हरसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है।
☑️9. धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशनकरता है।
☑️10. लाल डंठलवाला धतूरा पूजन में शुभ माना गया है।
☑️11. दूर्वा से पूजन करने पर आयु बढ़ती है।
     
             🌿ॐहर हर महादेव शम्भू 🌿
🙏🙏🏻🔱जय भवानी हर हर महादेव 🙏🙏🏻🔱

*बिल्वपत्र चढाने के 108 मन्त्र* 

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम् ।
त्रिजन्म पापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१॥

त्रिशाखैः बिल्वपत्रैश्च अच्छिद्रैः कोमलैः शुभैः ।
तव पूजां करिष्यामि एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२॥

सर्वत्रैलोक्यकर्तारं सर्वत्रैलोक्यपालनम् ।
सर्वत्रैलोक्यहर्तारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३॥

नागाधिराजवलयं नागहारेण भूषितम् ।
नागकुण्डलसंयुक्तं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४॥

अक्षमालाधरं रुद्रं पार्वतीप्रियवल्लभम् ।
चन्द्रशेखरमीशानं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५॥

त्रिलोचनं दशभुजं दुर्गादेहार्धधारिणम् ।
विभूत्यभ्यर्चितं देवं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६॥

त्रिशूलधारिणं देवं नागाभरणसुन्दरम् ।
चन्द्रशेखरमीशानं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७॥

गङ्गाधराम्बिकानाथं फणिकुण्डलमण्डितम् ।
कालकालं गिरीशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८॥

शुद्धस्फटिक सङ्काशं शितिकण्ठं कृपानिधिम् ।
सर्वेश्वरं सदाशान्तं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९॥

सच्चिदानन्दरूपं च परानन्दमयं शिवम् ।
वागीश्वरं चिदाकाशं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०॥

शिपिविष्टं सहस्राक्षं कैलासाचलवासिनम् ।
हिरण्यबाहुं सेनान्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥११॥

अरुणं वामनं तारं वास्तव्यं चैव वास्तवम् ।
ज्येष्टं कनिष्ठं गौरीशं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१२॥

हरिकेशं सनन्दीशं उच्चैर्घोषं सनातनम् ।
अघोररूपकं कुम्भं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१३॥

पूर्वजावरजं याम्यं सूक्ष्मं तस्करनायकम् ।
नीलकण्ठं जघन्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१४॥

सुराश्रयं विषहरं वर्मिणं च वरूधिनम् I
महासेनं महावीरं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१५॥

कुमारं कुशलं कूप्यं वदान्यञ्च महारथम् ।
तौर्यातौर्यं च देव्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१६॥

दशकर्णं ललाटाक्षं पञ्चवक्त्रं सदाशिवम् ।
अशेषपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१७॥

नीलकण्ठं जगद्वन्द्यं दीननाथं महेश्वरम् ।
महापापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१८॥

चूडामणीकृतविभुं वलयीकृतवासुकिम् ।
कैलासवासिनं भीमं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१९॥

कर्पूरकुन्दधवलं नरकार्णवतारकम् ।
करुणामृतसिन्धुं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२०॥

महादेवं महात्मानं भुजङ्गाधिपकङ्कणम् ।
महापापहरं देवं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२१॥

भूतेशं खण्डपरशुं वामदेवं पिनाकिनम् ।
वामे शक्तिधरं श्रेष्ठं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२२॥

फालेक्षणं विरूपाक्षं श्रीकण्ठं भक्तवत्सलम् ।
नीललोहितखट्वाङ्गं एकबिल्वं शिवार्पणम् 
॥२३॥

कैलासवासिनं भीमं कठोरं त्रिपुरान्तकम् ।
वृषाङ्कं वृषभारूढं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२४॥

सामप्रियं सर्वमयं भस्मोद्धूलितविग्रहम् ।
मृत्युञ्जयं लोकनाथं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२५॥

दारिद्र्यदुःखहरणं रविचन्द्रानलेक्षणम् ।
मृगपाणिं चन्द्रमौळिं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२६॥

सर्वलोकभयाकारं सर्वलोकैकसाक्षिणम् ।
निर्मलं निर्गुणाकारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२७॥

सर्वतत्त्वात्मकं साम्बं सर्वतत्त्वविदूरकम् ।
सर्वतत्त्वस्वरूपं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२८॥

सर्वलोकगुरुं स्थाणुं सर्वलोकवरप्रदम् ।
सर्वलोकैकनेत्रं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II२९॥

मन्मथोद्धरणं शैवं भवभर्गं परात्मकम् ।
कमलाप्रियपूज्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३०॥

तेजोमयं महाभीमं उमेशं भस्मलेपनम् ।
भवरोगविनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II३१॥

स्वर्गापवर्गफलदं रघुनाथवरप्रदम् ।
नगराजसुताकान्तं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३२॥

मञ्जीरपादयुगलं शुभलक्षणलक्षितम् ।
फणिराजविराजं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३३॥

निरामयं निराधारं निस्सङ्गं निष्प्रपञ्चकम् ।
तेजोरूपं महारौद्रं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II३४॥

सर्वलोकैकपितरं सर्वलोकैकमातरम् ।
सर्वलोकैकनाथं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३५॥

चित्राम्बरं निराभासं वृषभेश्वरवाहनम् ।
नीलग्रीवं चतुर्वक्त्रं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३६॥

रत्नकञ्चुकरत्नेशं रत्नकुण्डलमण्डितम् ।
नवरत्नकिरीटं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II३७॥

दिव्यरत्नाङ्गुलीस्वर्णं कण्ठाभरणभूषितम् ।
नानारत्नमणिमयं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II३८॥

रत्नाङ्गुलीयविलसत्करशाखानखप्रभम् ।
भक्तमानसगेहं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II३९॥

वामाङ्गभागविलसदम्बिकावीक्षणप्रियम् ।
पुण्डरीकनिभाक्षं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४०॥

सम्पूर्णकामदं सौख्यं भक्तेष्टफलकारणम् ।
सौभाग्यदं हितकरं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४१॥

नानाशास्त्रगुणोपेतं स्फुरन्मङ्गल विग्रहम् ।
विद्याविभेदरहितं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II४२॥

अप्रमेयगुणाधारं वेदकृद्रूपविग्रहम् ।
धर्माधर्मप्रवृत्तं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II४३॥

गौरीविलाससदनं जीवजीवपितामहम् ।
कल्पान्तभैरवं शुभ्रं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४४॥

सुखदं सुखनाशं च दुःखदं दुःखनाशनम् ।
दुःखावतारं भद्रं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४५॥

सुखरूपं रूपनाशं सर्वधर्मफलप्रदम् ।
अतीन्द्रियं महामायं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४६॥

सर्वपक्षिमृगाकारं सर्वपक्षिमृगाधिपम् ।
सर्वपक्षिमृगाधारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II४७॥

जीवाध्यक्षं जीववन्द्यं जीवजीवनरक्षकम् ।
जीवकृज्जीवहरणं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४८॥

विश्वात्मानं विश्ववन्द्यं वज्रात्मावज्रहस्तकम् ।
वज्रेशं वज्रभूषं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II४९॥

गणाधिपं गणाध्यक्षं प्रलयानलनाशकम् ।
जितेन्द्रियं वीरभद्रं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५०॥

त्र्यम्बकं मृडं शूरं अरिषड्वर्गनाशनम् ।
दिगम्बरं क्षोभनाशं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५१॥

कुन्देन्दुशङ्खधवलं भगनेत्रभिदुज्ज्वलम् ।
कालाग्निरुद्रं सर्वज्ञं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५२॥

कम्बुग्रीवं कम्बुकण्ठं धैर्यदं धैर्यवर्धकम् ।
शार्दूलचर्मवसनं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II५३॥

जगदुत्पत्तिहेतुं च जगत्प्रलयकारणम् ।
पूर्णानन्दस्वरूपं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५४॥

सर्गकेशं महत्तेजं पुण्यश्रवणकीर्तनम् ।
ब्रह्माण्डनायकं तारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५५॥

मन्दारमूलनिलयं मन्दारकुसुमप्रियम् ।
बृन्दारकप्रियतरं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II५६॥

महेन्द्रियं महाबाहुं विश्वासपरिपूरकम् ।
सुलभासुलभं लभ्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ ५७॥

बीजाधारं बीजरूपं निर्बीजं बीजवृद्धिदम् ।
परेशं बीजनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II५८॥

युगाकारं युगाधीशं युगकृद्युगनाशनम् ।
परेशं बीजनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II५९॥

धूर्जटिं पिङ्गलजटं जटामण्डलमण्डितम् ।
कर्पूरगौरं गौरीशं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II६०॥

सुरावासं जनावासं योगीशं योगिपुङ्गवम् ।
योगदं योगिनां सिंहं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६१॥

उत्तमानुत्तमं तत्त्वं अन्धकासुरसूदनम् ।
भक्तकल्पद्रुमस्तोमं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६२॥

विचित्रमाल्यवसनं दिव्यचन्दनचर्चितम् ।
विष्णुब्रह्मादि वन्द्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् 
॥६३॥

कुमारं पितरं देवं श्रितचन्द्रकलानिधिम् ।
ब्रह्मशत्रुं जगन्मित्रं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६४॥

लावण्यमधुराकारं करुणारसवारधिम् ।
भ्रुवोर्मध्ये सहस्रार्चिं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६५॥

जटाधरं पावकाक्षं वृक्षेशं भूमिनायकम् ।
कामदं सर्वदागम्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II६६॥

शिवं शान्तं उमानाथं महाध्यानपरायणम् ।
ज्ञानप्रदं कृत्तिवासं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६७॥

वासुक्युरगहारं च लोकानुग्रहकारणम् ।
ज्ञानप्रदं कृत्तिवासं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६८॥

शशाङ्कधारिणं भर्गं सर्वलोकैकशङ्करम् I
शुद्धं च शाश्वतं नित्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६९॥

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणम् ।
गम्भीरं च वषट्कारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७०॥

भोक्तारं भोजनं भोज्यं जेतारं जितमानसम् I
करणं कारणं जिष्णुं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७१॥

क्षेत्रज्ञं क्षेत्रपालञ्च परार्धैकप्रयोजनम् ।
व्योमकेशं भीमवेषं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७२॥

भवज्ञं तरुणोपेतं चोरिष्टं यमनाशनम् ।
हिरण्यगर्भं हेमाङ्गं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७३॥

दक्षं चामुण्डजनकं मोक्षदं मोक्षनायकम् ।
हिरण्यदं हेमरूपं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II७४॥

महाश्मशाननिलयं प्रच्छन्नस्फटिकप्रभम् ।
वेदास्यं वेदरूपं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II७५॥

स्थिरं धर्मं उमानाथं ब्रह्मण्यं चाश्रयं विभुम् I
जगन्निवासं प्रथममेकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II७६॥

रुद्राक्षमालाभरणं रुद्राक्षप्रियवत्सलम् ।
रुद्राक्षभक्तसंस्तोममेकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७७॥

फणीन्द्रविलसत्कण्ठं भुजङ्गाभरणप्रियम् I
दक्षाध्वरविनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७८॥

नागेन्द्रविलसत्कर्णं महीन्द्रवलयावृतम् ।
मुनिवन्द्यं मुनिश्रेष्ठमेकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II७९॥

मृगेन्द्रचर्मवसनं मुनीनामेकजीवनम् ।
सर्वदेवादिपूज्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II८०॥

निधनेशं धनाधीशं अपमृत्युविनाशनम् ।
लिङ्गमूर्तिमलिङ्गात्मं एकबिल्वं शिवार्पणम् 
॥८१॥

भक्तकल्याणदं व्यस्तं वेदवेदान्तसंस्तुतम् ।
कल्पकृत्कल्पनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् 
॥८२॥

घोरपातकदावाग्निं जन्मकर्मविवर्जितम् ।
कपालमालाभरणं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८३॥

मातङ्गचर्मवसनं विराड्रूपविदारकम् ।
विष्णुक्रान्तमनन्तं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८४॥

यज्ञकर्मफलाध्यक्षं यज्ञविघ्नविनाशकम् ।
यज्ञेशं यज्ञभोक्तारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II८५॥

कालाधीशं त्रिकालज्ञं दुष्टनिग्रहकारकम् ।
योगिमानसपूज्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८६॥

महोन्नतमहाकायं महोदरमहाभुजम् ।
महावक्त्रं महावृद्धं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८७॥

सुनेत्रं सुललाटं च सर्वभीमपराक्रमम् ।
महेश्वरं शिवतरं एकबिल्वं शिवार्पणम् II८८॥

समस्तजगदाधारं समस्तगुणसागरम् ।
सत्यं सत्यगुणोपेतं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ ८९॥

माघकृष्णचतुर्दश्यां पूजार्थं च जगद्गुरोः ।
दुर्लभं सर्वदेवानां एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९०॥

तत्रापि दुर्लभं मन्येत् नभोमासेन्दुवासरे ।
प्रदोषकाले पूजायां एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९१॥

तटाकं धननिक्षेपं ब्रह्मस्थाप्यं शिवालयम्
कोटिकन्यामहादानं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९२॥

दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम् ।
अघोरपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् II९३॥

तुलसीबिल्वनिर्गुण्डी जम्बीरामलकं तथा ।
पञ्चबिल्वमिति ख्यातं एकबिल्वं शिवार्पणम् 
॥९४॥

अखण्डबिल्वपत्रैश्च पूजयेन्नन्दिकेश्वरम् ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यः एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९५॥

सालङ्कृता शतावृत्ता कन्याकोटिसहस्रकम् ।
साम्राज्यपृथ्वीदानं च एकबिल्वं शिवार्पणम् 
॥९६॥

दन्त्यश्वकोटिदानानि अश्वमेधसहस्रकम् ।
सवत्सधेनुदानानि एकबिल्वं शिवार्पणम् II९७॥

चतुर्वेदसहस्राणि भारतादिपुराणकम् ।
साम्राज्यपृथ्वीदानं च एकबिल्वं शिवार्पणम् 
॥९८॥

सर्वरत्नमयं मेरुं काञ्चनं दिव्यवस्त्रकम् ।
तुलाभागं शतावर्तं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९९॥

अष्टोत्तरश्शतं बिल्वं योऽर्चयेल्लिङ्गमस्तके ।
अधर्वोक्तं अधेभ्यस्तु एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१००॥

काशीक्षेत्रनिवासं च कालभैरवदर्शनम् ।
अघोरपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् II१०१॥

अष्टोत्तरशतश्लोकैः स्तोत्राद्यैः पूजयेद्यथा ।
त्रिसन्ध्यं मोक्षमाप्नोति एकबिल्वं शिवार्पणम् 
॥१०२॥

दन्तिकोटिसहस्राणां भूः हिरण्यसहस्रकम् 
सर्वक्रतुमयं पुण्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् II१०३॥

पुत्रपौत्रादिकं भोगं भुक्त्वा चात्र यथेप्सितम् ।
अन्ते च शिवसायुज्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् 
॥१०४॥

विप्रकोटिसहस्राणां वित्तदानाच्च यत्फलम् ।
तत्फलं प्राप्नुयात्सत्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०५॥

त्वन्नामकीर्तनं तत्त्वं तवपादाम्बु यः पिबेत् 
जीवन्मुक्तोभवेन्नित्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०६॥

अनेकदानफलदं अनन्तसुकृतादिकम् ।
तीर्थयात्राखिलं पुण्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०७॥

त्वं मां पालय सर्वत्र पदध्यानकृतं तव ।
भवनं शाङ्करं नित्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०८॥

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भगवान शिव की आराधना करते समय उनपर बेलपत्र चढ़ाने का विशेष महत्व है। स्कंद पुराण के अनुसार, एक बार माता पार्वती के पसीने की बूंद मंदराचल पर्वत पर गिर गई और उससे बेल के पेड़ का उद्भव हुआ, इसलिए इस पेड़ में माता पार्वती के सभी रूप बसते हैं। माता पार्वती बेल के पेड़ की जड़ में गिरिजा के स्वरूप में, इसके तनों में माहेश्वरी के स्वरूप में, शाखाओं में दक्षिणायनी स्वरूप में, पत्तियों में पार्वती के रूप में रहती हैं, फूलों में गौरी स्वरूप में, फलों में कात्यायनी रूप में निवास करती हैं एवं मां लक्ष्मी का रूप समस्त वृक्ष में निवास करता है।
बेलपत्र में माता पार्वती का प्रतिबिंब होने के कारण इसे भगवान शिव पर चढ़ाया जाता है। मान्यतानुसार जो व्यक्ति किसी तीर्थस्थान पर नहीं जा सकता है अगर वह श्रावण मास में बिल्व के पेड़ के मूल भाग की पूजा करके उसमें जल अर्पित करें तो उसे सभी तीर्थों के दर्शन का पुण्य मिलता है और भगवान शिव की कृपा दृष्टि प्राप्त होती है!!

ॐ श्री गौरीशंकराय नमः!!

भगवान शिव को बिल्व पत्ते (बेल पत्र) क्यों अर्पित किए जाते हैं?

स्कंद पुराण के अनुसार, एक बार माता पार्वती के स्वेद की बूंद मंदराचल पर्वत पर गिर गई और उससे बिल्व वृक्ष निकल आया।
चुंकि माता पार्वती के स्वेद बिन्दु से बिल्व के वृक्ष का उद्भव हुआ।
अत: इसमें माता पार्वती के सभी रूप बसते हैं।
वे वृक्ष की जड़ में गिरिजा के स्वरूप में,
इसके तनों में माहेश्वरी के स्वरूप में और
शाखाओं में दक्षिणायनी व
पत्तियों में पार्वती के रूप में रहती हैं।
फलों में कात्यायनी स्वरूप
औऱ पुष्पों में गौरी स्वरूप निवास करता है।
इस सभी रूपों के अलावा, मां लक्ष्मी का रूप समस्त वृक्ष में निवास करता है।
बेलपत्र में माता पार्वती का प्रतिबिंब होने के कारण इसे भगवान शिव पर चढ़ाया जाता है।
भगवान शिव पर बेल पत्र चढाने से वे प्रसन्न होते हैं और भक्त की मनोकामना पूर्ण करते हैं।
जो व्यक्ति किसी तीर्थस्थान पर नहीं जा सकता है अगर वह श्रावण मास में बिल्व के पेड़ के मूल भाग की पूजा करके उसमें जल अर्पित करे तो उसे सभी तीर्थों के दर्शन का पुण्य मिलता है एवं बिल्व वृक्ष को सींचने से पितृगण तृप्त होते है।
बिल्व वृक्ष के आसपास सांप नहीं आते ।
किसी की शव यात्रा बिल्व वृक्ष की छाया से होकर निकले तो उसको मोक्ष प्राप्त हो जाता है।
वायुमंडल में व्याप्त अशुध्दियों को सोखने की क्षमता सबसे ज्यादा बिल्व वृक्ष में होती है।
चार, पांच, छः या सात पत्ते वाले बिल्व पत्र पाने वाला परम भाग्यशाली और उसे शिवजी को अर्पण करने से अनंत गुना फल मिलता है
बिल्व वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है और बिल्व वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है।
प्रातःकाल संध्या समय बिल्व वृक्ष के दर्शन मात्र से पापों का नाश होता है।
बिल्व वृक्ष और सफ़ेद आक् को जोड़े से लगाने पर अटूट लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
जीवन में यदि भूल से भी शिव लिंग पर बिल्व पत्र चढ़ा दिया हो तो भी उस प्राणी के सारे पाप नष्ट हो जाते है
बिल्व वृक्ष का रोपण, पोषण और संवर्धन करने से महादेव से साक्षात्कार करने का अवश्य लाभ मिलता है।
ॐ नमः शिवाय

बेलपत्र (बिल्व पत्र) के पेड़ के नीचे दीपक जलाने के बहुत सारे आधारभूत मान्यताएं और मानसिक अर्थ हो सकते हैं। यह एक धार्मिक अभ्यास है जो हिन्दू धर्म में प्रचलित है। इसका मतलब और प्रभाव निम्नलिखित हो सकते हैं:

1. पूजा और आराधना: बेलपत्र के पेड़ के नीचे दीपक जलाना अपनी पूजा और आराधना का एक हिस्सा हो सकता है। यह दीपक प्रकाश द्वारा ईश्वरीय अस्तित्व के प्रतीक के रूप में सेवा करने का एक तरीका है। यह प्रक्रिया भक्ति और आंतरिक शांति की अनुभूति में सहायता कर सकती है।

2. प्राणिक ऊर्जा के अभिसंधान: धार्मिक दृष्टिकोण से, बेलपत्र पवित्र माना जाता है और उसमें ऊर्जा की अभिव्यक्ति मानी जाती है। दीपक जलाने से प्राणिक ऊर्जा का उद्घाटन हो सकता है और यह आपके चेतना और आंतरिकता को जागृत कर सकता है।

3. सौंदर्य और शांति की अनुभूति: बेलपत्र के पेड़ के नीचे जलता दीपक आपके आस-पास की मानसिकता को शांत, प्रशान्त और सुंदरता

4. बिल्वपत्र के वृक्ष में लक्ष्मी का वास और भगवान महादेव का स्वरुप माना जाता है। इसकी पूजा करने से दरिद्रता दूर होती है और बेलपत्र के वृक्ष और सफेद आक को जोड़े से लगाने पर निरंतर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। इसके नीचे रोज दीपक जलाने से पितर दोष से मुक्ति मिलती हैं और जीवन में खुशहाली आती हैं I

इस अच्छे सवाल के लिए शुक्रिया। उत्तर में हम बेल के पेंड़ के नीचे दीपक जलाने की प्रथा और इसे पवित्र पेंड़ की संज्ञा देने के पीछे के रहस्यों पर चर्चा करेंगे।

बेल का पेंड़ का हमारे नित्य जीवन मे विशेष महत्व रखता हैं। इसका प्रत्येक भाग बड़े काम का होता है, जैसे पत्तियां और फल स्वास्थ्य वर्द्धक होते हैं; लकड़ी बेहद मजबूत होती है; पेंड़ वायु को शुद्ध करते हैं तथा जड़ें पत्थर को तोड़कर जमीन के नीचे चली जाती है।

बेल की कई अन्य विशेषतायें भी होती हैं, जैसे (1) कँकरीली-पथरीली अनुपजाऊ भूमि में यह आसानी से चलता है; (2) शुष्क वातावरण में भी बिना सिचाई के फलता-फूलता है; (3) जानवर इसे नुकसान नहीं पहुंचाते और ना ही कोई कीट या बीमारी की समस्या होती है; (4) फल इतनी मजबूती से लगे होते हैं, कि तेज हवाएं या बंदर इनका कुछ नहीं बिगाड़ पाते; (5) पेंड़ फलों व पत्तों से सालभर लदे रहते हैं।

इन्ही खूबियों के चलते बेल के पेंड़ को धार्मिक महत्व देकर पूर्वजों ने इसे मंदिरों में लगाने, पेंड़ के नीचे दीपक जलाने तथा पत्तियां को शिवलिंग पर चढ़ाने जैसे रिवाज डाले। बेल के पेंड़ के नीचे दीपक जलाने या पेंड़ को पवित्र मानने की प्रथा के पीछे का उद्देश्य इसे महत्व देने के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

कटीला होने के कारण पहले बेल को निवास के पास लगाने की मनाही थी। आज इसकी कांटा रहित बड़े फलों वाली वैरायटी बन चुकी हैं। मेरे घर में भी बेल का पेंड़ है, और इसे मैं लगाने के लिए मैं लोंगों को प्रोत्साहित भी करता रहता हूँ।


जी नमस्कार। बेल पत्र शिव का प्रिय होता है।ऐसा शास्त्र प्रमाणित है।बेलपत्र के फल को निश्चित काल व तिथि पर तोड़कर घर के मंदिर में रख का विधिवत पूजा करने से लक्ष्मी प्रसन्न होती है वह आप के घर मे सुख-समृद्धि का स्थाई वास होता है।

बेलपत्र की महिमा का वर्णन आप को शिवपुराण मे भली-भाँति मिल जाएगा ।बेलपत्र प्रायः अलग देवताओ को अलग संख्या में अर्पित किए जा सकते है।

विष्णु भगवान पर एकादशी व्रत में बेलपत्र चढाने से विष्णु भगवान प्रसन्न होते है ।वह सहस्र पापो से मुक्ति मिलती है।

माँ दुर्गा पर चढाने से सुख-सौभाग्य प्राप्त होता है।

गणेश जी पर अर्पित करने से आपके जीवन के विघ्न-बाधा की समाप्त होती है।

लक्ष्मी जी को अर्पित करने से धन-वैभव की प्राप्त होता है।

श्री राम की पूजा में भी बेलपत्र का प्रयोग किया जाता है क्योंकि श्री राम शिव को प्रिय है ।अतः मनोकामना पूर्ति के लिए हम श्री राम को भी शिव का प्रिय बेलपत्र अर्पित कर सकते है।

बेलपत्र का पेड़ महादेव जी का स्वरूप है।इस के मूल मे संसार के सारे पवित्र और प्रसिद्ध तीर्थ व्याप्त है,क्योंकि विल्वमूल में लिंग रूपी महादेव का वास होता है ।

जो भी पुण्यात्मा इसकी पूजा करता है वह निश्चित ही शिव को प्राप्त होता है।

विल्व मूल मे जो जल चढ़ाता है मानो वह सब तीर्थो में स्नान कर चुका और वह पृथ्वी में पवित्र है।

जो मनुष्य विल्वमूल को गंध-पुष्पादि से पूजता है वह शिवलोक को प्राप्त होता है,संतान सुख की वृद्धि होती है।

जो दीपक जलाताहै ,नवीन पत्र हाथ मे लेकर उस के समस्त पाप दूर हो जाते है।

जो विल्वमूल मे दूध-घी सहित अन्न किसी शिवभक्त को देता है वह कभी गरीब नही होता।

जो मनुष्य विल्वमूल में किसी शिव भक्त को भक्तिपूर्वक भोजन करवाता है उसे भोजना का करोड़ गुणा फल मिलता है।

बेलपत्र की महिमा का विस्तार पूर्वक वर्णन करना कठिन है ।परन्तु अपने सामर्थ्य के अनुसार उत्तर देने का प्रयास किया है।

धन्यवाद

इस विषय में कई कथाएं प्रचलित हैं| इनमें सबसे महत्वपूर्ण एक पौराणिक प्रसंग है| प्राचीन काल में एक बार देवताओं और दानवों दोनों ने मिलकर सागर मंथन किया था| सागर मंथन के दौरान समुद्र से कई चीजें निकली| इनमे से कुछ अच्छी थीं और कुछ बुरी| इसी मंथन के फलस्वरूप समुद्र से हलाहल नामक विष भी निकल आया जो इतना भयानक विष था कि इसके प्रभाव से पूरे संसार का विनाश हो सकता था| इस विष से संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने इस विष को पी लिया और यह विष उनके कंठ में रह गया, इसलिए उनका एक नाम नीलकंठ भी हो गया| इस विष के प्रभाव से भगवान शिव का मस्तिष्क गर्म हो गया और वो बेचैन हो उठे| देवताओं ने उनके सर पर जल उड़ेला तो उनके सर की जलन तो दूर हो गयी लेकिन कंठ की जलन बनी रही| इसके बाद देवताओं ने उन्हें बेलपत्र खिलाना शुरू किया क्योंकि बेलपत्र में विष के प्रभाव को ख़त्म कर देने का गुण होता है| इसीलिए शिव की पूजा में बेलपत्र का विशेष महत्त्व है|

शिव जी को बिल्व पत्ते (बेल पत्र) का अर्पण उनकी पूजा और उपासना में महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके पीछे कई पुराणिक कथाएं और महत्वपूर्ण आध्यात्मिक तत्व हैं। निम्नलिखित कारणों से बिल्व पत्तों का अर्पण किया जाता है:

1. शिव जी की प्रियतमता: बिल्व पत्ते शिव जी के अत्यंत प्रिय होते हैं। इन्हें अर्पित करके भक्तों का इनके प्रति प्रेम और आदर्श स्थान दिखाया जाता है।

2. महिमा और पुण्य: पुराणों के अनुसार, जो कोई भी बिल्व पत्ते को शिव जी को अर्पित करता है, उसे बहुत बड़ा पुण्य प्राप्त होता है। यह पत्ता शुद्धता, पवित्रता और स्वर्गीय आनंद का प्रतीक है।

3. त्रिदेवों के संयोग: बिल्व पत्ते में तीन पत्ते होते हैं, जो त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) के संयोग को प्रतिष्ठित करते हैं। इसलिए, इस पत्ते का अर्पण करके त्रिमूर्ति की आराधना की जाती है।

4. पापों का नाश: बिल्व पत्ते का अर्पण करने से पापों का नाश होता है और धर्म, आदर्श और साधारण जीवन का पालन होता है।

5. आरोग्य और धन: इस पत्ते को अर्पण करने से आरोग्य, धन और सुख की प्राप्ति होती है। यह पत्ता स्वास्थ्य और समृद्धि के प्रतीक के रूप में माना जाता है।

6. शिवलिंग के पूजन के लिए: शिवलिंग पूजा में बिल्व पत्तों का उपयोग विशेष रूप से किया जाता है। इन्हें शिवलिंग पर स्थापित करके उनकी पूजा की जाती है और इससे शिव जी का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

इस प्रकार, बिल्व पत्ते का अर्पण शिव जी की पूजा, उपासना और आराधना में महत्वपूर्ण रूप से किया जाता है। यह भक्तों का प्रेम और समर्पण प्रकट करता है और उन्हें शिव जी के आशीर्वाद और कृपा को प्राप्त करने में मदद करता है।

आपने शिवलिग देखी होगाी उसमे 3 पट्टे होते है 1 ब्रह्या, 2 विष्णु, 3 शंकर का और बीच में बिन्दु अर्थात निराकार शिव परमात्मा जो इन तीनो को सुक्ष्म रूप से रचता है। फिर भक्ति मार्ग में स्थुल रूप से सुचक रूप से बेल पत्र चढ़ाते है क्योकि इसमें विशेष देखा होगा तीन पत्ते जो एक साथ रहता हैै। वास्तव में ऐसा भी हो सकता है इसको पर्यावरण से जोड़ा गया है हम पेड़ो का संरक्षण करे।

सबसे महत्तवपूर्ण सोचने वाला विषय है किसी सुचना या घटना या भक्ति मार्ग जो चीजे है हम उसको उसी प्रकार से स्वीकार कर लेते है परन्तु हमे उसका दुसरा रूप सोचना चाहिए जैसे सिक्के में दो पहलु होते है एक नहीं,देखिये अगर हमे दुसरा पहलु सोचेगे तो हमारी निर्णय लेने और बुद्धि का विकास होगा, तो ऐसा हो सकता है।

पहले हम शिव परमपिता परमात्मा को समझ ले । परमात्मा बिन्दु स्वरूप होते हेै , परमात्मा का शरीर नही होता है, परन्तु परमात्मा नयी सृष्टि की स्थापना के लिए ब्रह्या शरीर लोन पर लेते है है शिव लिंग में देखा बीच में बिंदी अर्थात परिमात्मा शिव 3 पट्टे ब्रह्या,विष्णु,शंकर अर्थात् परमात्मा ब्रह्या के तन में आकर नई सृष्टि अर्थात सतयुग की स्थापना करते है आपने देखा होगा कि ब्रह्या के हाथ शास्त्र दिखाये गये है और दूसर पट्टी विष्णु अर्थात लक्ष्मी नारायण अर्थात् सतयुग पालना की पालना करने वाले और तीसरी पट्टी शंकर जटाधारी जो विनाश का सूचक है ,तांडव नृत्य करते बताया गया है अर्थात परमात्मा शिव जी शंकर द्वारा कलियुग का विनाश कराते है ड्रामा अनुसार ।
परमात्मा ही ब्रह्या,विष्णु,शंकर को लाईट शरीर रचते है और फिर प्रकृति से मैच बेल पत्र होते है तो जिससे शास्त्र,ग्रंथ लिख तो उसने उसका प्रतिक बता दिया और साथ में पर्यावरण का महत्तव बता दिया कि मानव वृक्षो का सम्मान करे।

बेल (बिल्व) के पत्ते, जो कि त्रिक रूप के होते हैं, शिव मंदिरों में श्रावण माह के दौरान शिव मंदिरों में पुजारियों द्वारा शिव लिंग पर रखे जाते हैं। बेल ट्री एक पवित्र पेड़ है जिसमें बलि का महत्व है। इसका त्रिफला का पत्ता त्रिकाल या देवों के हिंदू त्रिमूर्ति अर्थात् ब्रह्मा विष्णु और शिव का प्रतीक है।

बेल के पत्ते महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उनका आकार शिव की तीन आंखों के साथ-साथ त्रिशूल के तीन प्रवक्ता का संकेत देता है। जब उनका शीतलन प्रभाव होता है, तो उन्हें इस गर्म स्वभाव वाले देवता को शांत करने के लिए शिवलिंग की पेशकश की जाती है। जो लोग शिव और पार्वती की पूजा भक्तिपूर्वक करते हैं, वे पत्तियों का उपयोग करते हुए आध्यात्मिक शक्तियों से संपन्न हो सकते हैं।

बेल पत्ती के तीन खंड प्रतीकात्मक रूप से तीन गुणों अर्थात् तमस (भौतिक शरीर), राजस (भावनाओं) और सात्विक (बुद्धि) का प्रतिनिधित्व करते हैं। सात्विक घटक का अनुपात अधिक होता है, इसलिए बेल पत्ती में सात्विक आवृत्तियों को अवशोषित करने और उत्सर्जित करने की अधिक क्षमता होती है। यदि कोई इन तीनों अर्थात् शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक का संतुलित तरीके से उपयोग करता है, तो आत्मा को मुक्ति यानि मोक्ष की प्राप्ति होती है।

एक पत्ते को दूसरे पत्ते से अधिक पवित्र क्यों माना जाता है? क्या यह एक तरह का पक्षपात है? आखिरकार, हर चीज मिट्टी से ही उत्पन्‍न होती है। नीम का फल और आम का फल एक ही मिट्टी में पैदा होते हैं लेकिन उनका स्वाद कितना अलग होता है?

एक जीवन उसी मिट्टी को एक तरह से ढालता है और दूसरा जीवन उसी मिट्टी को दूसरे तरीके से ढालता है। एक कृमि और एक कीड़े में क्या अंतर है? आप दूसरे मनुष्यों से कैसे अलग हैं? यह सब एक ही चीजें हैं लेकिन फिर भी इनमें अंतर है।

यह सब लोग जानते हैं कि इस पेड़ को सदियों से पवित्र माना जाता रहा है और शिव को चढ़ाया जाने वाला कोई भी चढ़ावा बेल-पत्र के बिना अधूरा होता है।

बेल-पत्र में तीन पत्तियां एक साथ जुड़ी होती हैं जिसको लेकर कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं : तीन पत्तों या त्रिपत्र को कहीं त्रिदेवों (सृजन, पालन और विनाश के देव), कहीं तीन गुणों (सत्व, रज और तम नामक) तो कहीं तीन आदि ध्वनियों (जिनकी सम्मिलित गूंज ऊँ बनती है) का प्रतीक माना जाता है। तीन पत्तों को महादेव की तीन आंखों या उनके शस्त्र त्रिशूल का भी प्रतीक माना जाता है।

यह सब किंवदंतियां हैं। लेकिन बेल-पत्र को इतना पवित्र क्यों माना जाता है?

पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन के समय जब कालकूट नाम का विष निकला तो इसके प्रभाव से सभी देवता व जीव-जंतु व्याकुल होने लगे ,सारी सृष्टि में हाहाकार मच गया। संपूर्ण सृष्टि की रक्षा के लिए देवताओं और असुरों ने भगवान शिव से प्रार्थना की। तब भोलेनाथ ने इस विष को अपनी हथेली पर रखकर पी लिया।

विष के प्रभाव से स्वयं को बचाने के लिए उन्होंने इसे अपने कंठ में ही रख लिया। जिस कारण शिवजी का कंठ नीला पड़ गया इसलिए महादेवजी को 'नीलकंठ' कहा जाने लगा। लेकिन विष की तीव्र ज्वाला से भोलेनाथ का मस्तिष्क गरम हो गया।

ऐसे समय में देवताओं ने शिवजी के मस्तिष्क की गरमी कम करने के लिए उन पर जल उड़ेलना शुरू कर दिया और ठंडी तासीर होने की वजह से बेलपत्र भी चढ़ाए। बस तभी से शिवजी पर जल और बेलपत्र चढ़ाने की प्रथा चल पड़ी।

भगवान शिव को बेलपत्र क्यों चढ़ाया जाता है?
ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव के शिवलिंग को बिल्व वृक्ष के नीचे स्थापित करके हर दिन सुबह-सुबह जल चढाने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट होते हैं और उसे सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। इतना ही नहीं यह भी मान्यता है कि बिल्व वृक्ष के दर्शन या स्पर्श मात्र से भी मनुष्य का उद्धार हो सकता है।

बेलपत्र के विषय में लोगों का यह विश्वास है कि जो मनुष्य पवित्र मन से भगवान शिव को दो या तीन बेलपत्र अर्पित करता है, वो भवसागर से मुक्त हो जाता है। ऐसा भी मानते हैं कि भगवान शिव को अखंडित बेलपत्र चढ़ाने वाला भक्त मृत्यु के पश्चात भगवान शिव के धाम चला जाता है।

बेलपत्र में 2 से 11 दल होते हैं जितने ज्यादा दल हों वो बेलपत्र पूजा के लिए उतना ही ज्यादा श्रेष्ठ माना जाता है।

इस विषय में कई कथाएं प्रचलित हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण एक पौराणिक प्रसंग है। प्राचीन काल में एक बार देवताओं और दानवों दोनों ने मिलकर सागर मंथन किया था। सागर मंथन के दौरान समुद्र से कई चीजें निकली। इनमे से कुछ अच्छी थीं और कुछ बुरी। इसी मंथन के फलस्वरूप समुद्र से हलाहल नामक विष भी निकल आया जो इतना भयानक विष था कि इसके प्रभाव से पूरे संसार का विनाश हो सकता था। इस विष से संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने इस विष को पी लिया और यह विष उनके कंठ में रह गया, इसलिए उनका एक नाम नीलकंठ भी हो गया। इस विष के प्रभाव से भगवान शिव का मस्तिष्क गर्म हो गया और वो बेचैन हो उठे। देवताओं ने उनके सर पर जल उड़ेला तो उनके सर की जलन तो दूर हो गयी लेकिन कंठ की जलन बनी रही। इसके बाद देवताओं ने उन्हें बेलपत्र खिलाना शुरू किया क्योंकि बेलपत्र में विष के प्रभाव को ख़त्म कर देने का गुण होता है। इसीलिए शिव की पूजा में बेलपत्र का विशेष महत्त्व है।

भगवान शिव को बेलपत्र उसके उपासकों द्वारा भक्ति व आराधना के लिए चढ़ाए जाते हैं। बेलपत्र एक प्राचीन परंपरा है जो हिंदू धर्म में अपनी गहरी संस्कृति के साथ जुड़ी हुई है। यह हिंदू धर्म के वेदों व पुराणों में वर्णित है।

बेलपत्र के चढ़ाने के पीछे कई कारण होते हैं। भगवान शिव जी को प्रसन्न करने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। भगवान शिव के लिए बेलपत्र एक सात्विक पदार्थ होता है जो उसकी पूजा अर्चना में इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा, बेलपत्र में आयुर्वेदिक गुण होते हैं जो शरीर के लिए फायदेमंद होते हैं। बेलपत्र में विटामिन सी, अंशिक तृणमय तत्व, तान्दुलिया एसिड, कैल्शियम, फाइबर आदि होते हैं जो शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं।

इसके अलावा, बेलपत्र को भगवान शिव की शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इसे चढ़ाने से उसकी कृपा मिलती है।

भगवान शिव पर बेलपत्र ही क्यों चढ़ाये जाते हैं ?
जब बात भगवान शिव (Lord Shiva) की सबसे प्रिय चीजों की आती है तो उसमें सबसे पहले बेलपत्र (Bel Patra) का नाम आता है. यह बात तो हम सभी जानते हैं कि बेलपत्र भगवान शिव को बेहद प्रिय है और शिवलिंग (Shivlinga) पर बेलपत्र चढ़ाए बिना पूजा को पूर्ण नहीं माना जाता. ऐसी मान्यता है कि शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करने से महादेव प्रसन्न होते हैं और श्रद्धालु को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है.

बेलपत्र का महत्व

बेलपत्र में तीन पत्तियां एक साथ जुड़ी होती हैं जिसको लेकर कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं. तीन पत्तों को कहीं त्रिदेव (सृजन, पालन और विनाश के देव ब्रह्मा, विष्णु और शिव) तो कहीं तीन गुणों (सत्व, रज और तम) तो कहीं तीन आदि ध्वनियों (जिनकी सम्मिलित गूंज से ऊं बनता है) का प्रतीक माना जाता है. बेलपत्र की इन तीन पत्तियों को महादेव की तीन आंखें या उनके शस्त्र त्रिशूल का भी प्रतीक माना जाता है.

शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से जुड़ी पौराणिक कथा

जब समुद्र मंथन के बाद विष निकला तो भगवान शिव ने पूरी सृष्टि को बचाने के लिए ही इस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया. विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला हो गया और उनका पूरा शरीर अत्यधिक गरम हो गया जिसकी वजह से आसपास का वातावरण भी जलने लगा. चूंकि बेलपत्र विष के प्रभाव को कम करता है इसलिए सभी देवी देवताओं ने बेलपत्र शिवजी को खिलाना शुरू कर दिया. बेलपत्र के साथ साथ शिव को शीतल रखने के लिए उन पर जल भी अर्पित किया गया. बेलपत्र और जल के प्रभाव से भोलेनाथ के शरीर में उत्पन्न गर्मी शांत होने लगी और तभी से शिवजी पर जल और बेलपत्र चढ़ाने की प्रथा चल पड़ी.

शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाते वक्त इन बातों का रखें ध्यान

शिवलिंग पर हमेशा तीन पत्तियों वाला ही बेलपत्र चढ़ाएं.
- बेलपत्र को भगवान शिव को अर्पित करने से पहले अच्छे से धोकर ही इस्तेमाल करें.
- जब भी भोलेशंकर को बेलपत्र चढ़ाएं तो इस बात का ध्यान रखें कि बेलपत्र चढ़ाने के बाद जल जरूर अर्पण करें.
- बेलपत्र चढ़ाते समय 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप भी करें.।

भगवान शिव को बेलपत्र क्यों प्रिय है ?
नारद जी ने एक बार भोलेनाथ की स्तुति कर पूछा – प्रभु आपको प्रसन्न करने के लिए सबसे उत्तम और सुलभ साधन क्या है. हे त्रिलोकीनाथ आप तो निर्विकार और निष्काम हैं, आप सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं. फिर भी मेरी जानने की इच्छा है कि आपको क्या प्रिय है ?

शिवजी बोले- नारदजी वैसे तो मुझे भक्त के भाव सबसे प्रिय हैं, फिर भी आपने पूछा है तो बताता हूं. मुझे जल के साथ-साथ बिल्वपत्र बहुत प्रिय है. जो अखंड बिल्वपत्र मुझे श्रद्धा से अर्पित करते हैं मैं उन्हें अपने लोक में स्थान देता हूं.

नारद जी भगवान शंकर औऱ माता पार्वती की वंदना कर अपने लोक को चले गए. उनके जाने के पश्चात पार्वती जी ने शिव जी से पूछा- हे प्रभु मेरी यह जानने की बड़ी उत्कट इच्छा हो रही है कि आपको बेलपत्र इतने प्रिय क्यों है. कृपा करके मेरी जिज्ञासा शांत करें.

शिव जी बोले- हे शिवे ! बिल्व के पत्ते मेरी जटा के समान हैं. उसका त्रिपत्र यानी तीन पत्ते, ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद हैं. शाखाएं समस्त शास्त्र का स्वरूप हैं. विल्ववृक्ष को आप पृथ्वी का कल्पवृक्ष समझें जो ब्रह्मा-विष्णु-शिव स्वरूप है. स्वयं महालक्ष्मी ने शैल पर्वत पर विल्ववृक्ष रूप में जन्म लिया था.

यह सुनकर पार्वती जी कौतूहल में पड़ गईं. उन्होंने पूछा- देवी लक्ष्मी ने आखिर विल्ववृक्ष का रूप क्यों लिया ? आप यह कथा विस्तार से कहें. भोलेनाथ ने देवी पार्वती को कथा सुनानी शुरू की.

हे देवी, सत्ययुग में ज्योतिरूप में मेरे अंश का रामेश्वर लिंग था. ब्रह्मा आदि देवों ने उसका विधिवत पूजन-अर्चन किया था. फलतः मेरे अनुग्रह से वाग्देवी सबकी प्रिया हो गईं. वह भगवान विष्णु को सतत प्रिय हो गईं.

मेरे प्रभाव से भगवान केशव के मन में वाग्देवी के लिए जितनी प्रीति हुई वह स्वयं लक्ष्मी को नहीं भाई. अतः लक्ष्मी देवी चिंतित और रूष्ट होकर परम उत्तम श्री शैल पर्वत पर चली गईं.

वहां उन्होंने मेरे लिंग विग्रह की उग्र तपस्या प्रारम्भ कर दी. हे परमेश्वरी कुछ समय बाद महालक्ष्मी जी ने मेरे लिंग विग्रह से थोड़ा उर्ध्व में एक वृक्ष का रूप धारण कर लिया और अपने पत्र पुष्प द्वारा निरंतर मेरा पूजन करने लगी.

इस तरह उन्होंने कोटि वर्ष ( एक करोड़ वर्ष) तक आराधना की. अंततः उन्हें मेरा अनुग्रह प्राप्त हुआ. महालक्ष्मी ने मांगा कि श्री हरि के हृदय में मेरे प्रभाव से वाग्देवी के लिए जो स्नेह हुआ है वह समाप्त हो जाए.

शिवजी बोले- मैंने महालक्ष्मी को समझाया कि श्री हरि के हृदय में आपके अतिरिक्त किसी और के लिए कोई प्रेम नहीं है. वाग्देवी के प्रति तो उनकी श्रद्धा है. यह सुनकर लक्ष्मी जी प्रसन्न हो गईं और पुनः श्री विष्णु के ह्रदय में स्थित होकर निरंतर उनके साथ विहार करने लगी.

हे पार्वती ! महालक्ष्मी के हृदय का एक बड़ा विकार इस प्रकार दूर हुआ था. इस कारन हरिप्रिया उसी वृक्षरूपं में सर्वदा अतिशय भक्ति से भरकर यत्न पूर्वक मेरी पूजा करने लगी. बिल्व इस कारण मुझे बहुत प्रिय है और मैं विल्ववृक्ष का आश्रय लेकर रहता हूं.

विल्ववृक्ष को सदा सर्व तीर्थमय एवं सर्व देवमय मानना चाहिए. 

बिल्व, बेल या बेलपत्थर, भारत में होने वाला एक फल का पेड़ है। इसे रोगों को नष्ट करने की क्षमता के कारण बेल को बिल्व कहा गया है।[1] इसके अन्य नाम हैं-शाण्डिल्रू (पीड़ा निवारक), श्री फल, सदाफल इत्यादि। इसका गूदा या मज्जा बल्वकर्कटी कहलाता है तथा सूखा गूदा बेलगिरी। बेल के वृक्ष सारे भारत में, विशेषतः हिमालय की तराई में, सूखे पहाड़ी क्षेत्रों में ४००० फीट की ऊँचाई तक पाये जाते हैं।[2] मध्य व दक्षिण भारत में बेल जंगल के रूप में फैला पाया जाता है। इसके पेड़ प्राकृतिक रूप से भारत के अलावा दक्षिणी नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार, पाकिस्तान, बांग्लादेश, वियतनाम, लाओस, कंबोडिया एवं थाईलैंड में उगते हैं। इसके अलाव इसकी खेती पूरे भारत के साथ श्रीलंका, उत्तरी मलय प्रायद्वीप, जावा एवं फिलीपींस तथा फीजी द्वीपसमूह में की जाती है।[3]

धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण इसे मंदिरों के पास लगाया जाता है। हिन्दू धर्म में इसे भगवान शिव का रूप ही माना जाता है व मान्यता है कि इसके मूल यानि जड़ में महादेव का वास है तथा इनके तीन पत्तों को जो एक साथ होते हैं उन्हे त्रिदेव का स्वरूप मानते हैं परंतु पाँच पत्तों के समूह वाले को अधिक शुभ माना जाता है, अतः पूज्य होता है। धर्मग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है।[4][5] इसके वृक्ष १५-३० फीट ऊँचे कँटीले एवं मौसम में फलों से लदे रहते हैं। इसके पत्ते संयुक्त विपत्रक व गंध युक्त होते हैं तथा स्वाद में तीखे होते हैं। गर्मियों में पत्ते गिर जाते हैं तथा मई में नए पुष्प आ जाते हैं। फल मार्च से मई के बीच आ जाते हैं। बेल के फूल हरी आभा लिए सफेद रंग के होते हैं व इनकी सुगंध भीनी व मनभावनी होती है।[2][5]

बेल फल बीज
बेल का फल ५-१७ सेंटीमीटर व्यास के होते हैं। इनका हल्के हरे रंग का खोल कड़ा व चिकना होता है। पकने पर हरे से सुनहरे पीले रंग का हो जाता है जिसे तोड़ने पर मीठा रेशेदार सुगंधित गूदा निकलता है। इस गूदे में छोटे, बड़े कई बीज होते हैं। बाजार में दो प्रकार के बेल मिलते हैं- छोटे जंगली और बड़े उगाए हुए। दोनों के गुण समान हैं। जंगलों में फल छोटा व काँटे अधिक तथा उगाए गए फलों में फल बड़ा व काँटे कम होते हैं। बेल का फल अलग से पहचान में आ जाता है। इसकी अनुप्रस्थ काट करने पर यह १०-१५ खण्डों में विभक्त सा लगता है, जिनमें प्रत्येक में ६-१० बीज होते हैं। ये सभी बीज सफेद लुआव से परस्पर जुड़े होते हैं।[5] प्रायः सर्वसुलभ होने से इसमें मिलावट कम होती है। कभी-कभी इसमें गार्मीनिया मेंगोस्टना तथा कैथ के फल मिला दिए जाते हैं, परन्तु इसे काट कर इसकी परीक्षा की जा सकती है। इनकी वीर्य कालावधि लगभग एक वर्ष है।

बेल का पका फल
आचार्य चरक और सुश्रुत दोनों ने ही बेल को उत्तम संग्राही बताया है। फल-वात शामक मानते हुए इसे ग्राही गुण के कारण पाचन संस्थान के लिए समर्थ औषधि माना गया है। आयुर्वेद के अनेक औषधीय गुणों एवं योगों में बेल का महत्त्व बताया गया है, परन्तु एकाकी बिल्व, चूर्ण, मूलत्वक्, पत्र स्वरस भी अत्यधिक लाभदायक है।[3] चक्रदत्त बेल को पुरानी पेचिश, दस्तों और बवासीर में बहुत अधिक लाभकारी मानते हैं। बंगसेन एवं भाव प्रकाश ने भी इसे आँतों के रोगों में लाभकारी पाया है। यह आँतों की कार्य क्षमता बढ़ती है, भूख सुधरती है एवं इन्द्रियों को बल मिलता है।

बेल फल का गूदा डिटर्जेंट का काम करता है जो कपड़े धोने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। यह चूने के प्लास्टर के साथ मिलाया जाता है जो कि जलअवरोधक का काम करता है और मकान की दीवारो सीमेंट में जोड़ा जाता है। चित्रकार अपने जलरंग मे बेल को मिलाते है जो कि चित्रों पर एक सुरक्षात्मक परत लगाता है।[3]


रासायनिक संगठन
बेल के फल की मज्जा में मूलतः ग्राही पदार्थ पाए जाते हैं। ये हैं-म्युसिलेज पेक्टिन, शर्करा, टैनिन्स। इसमें मूत्र रेचक संघटक हैं-मार्मेलोसिन नामक एक रसायन जो स्वल्प मात्रा में ही विरेचक है।[2] इसके अतिरिक्त बीजों में पाया जाने वाला एक हल्के पीले रंग की तीखा तेल (लगभग १२ प्रतिशत) भी रेचक होता है। शक्कर ४.३ प्रतिशत, उड़नशील तेल तथा तिक्त सत्व के अतिरिक्त २ प्रतिशत भस्म भी होती है। भस्म में कई प्रकार के आवश्यक लवण होते हैं। बिल्व पत्र में एक हरा-पीला तेल, इगेलिन, इगेलिनिन नामक एल्केलाइड भी पाए गए हैं। कई विशिष्ट एल्केलाइड यौगिक व खनिज लवण त्वक् में होते हैं।[5]

बेल की कथा

बेल वृक्ष की उत्पत्ति के संबंध में स्कंद पुराण में कहा गया है कि एक बार देवी पार्वती ने अपनी ललाट से पसीना पोछकर फेंका, जिसकी कुछ बूंदें मंदार पर्वत पर गिरीं, जिससे बेल वृक्ष उत्पन्ना हुआ। इस वृक्ष की जड़ो में गिरिजा, तना में महेश्वरी, शाखाओं में दक्षयायनी, पत्तियों में पार्वती, फूलों में गौरी और फलों में कात्यायनी वास करती हैं।

कहा जाता है कि बेल वृक्ष के कांटों में भी कई शक्तियां समाहित हैं। यह माना जाता है कि देवी महालक्ष्मी का भी बेलवृक्ष में वास है। जो व्यक्ति शिव-पार्वती की पूजा बेलपत्र अर्पित कर करते हैं, उन्हें महादेव और देवी पार्वती दोनों का आशीर्वाद मिलता है।

बेलपत्र से महादेव की पूजा का रहस्य

भगवान शिव को औढ़र दानी कहते हैं। शिव का यह नाम इसलिए है क्योंकि वे जब देने पर आते हैं तो भक्त जो भी मांग ले बिना हिचक दे देते हैं। शिव जी थोड़ी सी भक्ति और बेलपत्र एवं जल से भी खुश हो जाते हैं। यही कारण है कि भक्त जल और बेलपत्र से शिवलिंग की पूजा करते हैं।

शिव जी को ये दोनों चीजें क्यों पसंद हैं इसका उत्तर पुराणों में दिया गया है। समुद्र मंथन के समय जब हालाहल नाम का विष निकलने लगा तब विष के प्रभाव से सभी देवता एवं जीव-जंतु व्याकुल होने लगे। ऐसे समय में भगवान शिव ने विष को अपनी अंजुली में लेकर पी लिया।

विष के प्रभाव से स्वयं को बचाने के लिए शिव जी ने इसे अपनी कंठ में रख लिया इससे शिव जी का कंठ नीला पड़ गया और शिव जी नीलकंठ कहलाने लगे। लेकिन विष के प्रभाव से शिव जी का मस्तिष्क गर्म हो गया।

ऐसे समय में देवताओं ने शिव जी के मस्तिष्क पर जल उंडेलेना शुरू किया जिससे मस्तिष्क की गर्मी कम हुई। बेल के पत्तों की तासीर भी ठंडी होती है इसलिए शिव जी को बेलपत्र भी चढ़ाया गया। इसी समय से शिव जी की पूजा जल और बेलपत्र से शुरू हो गयी। बेलपत्र और जल से शिव जी का मस्तिष्क शीतल रहता और उन्हें शांति मिलती है। इसलिए बेलपत्र और जल से पूजा करने वाले पर शिव जी प्रसन्ना होते हैं।

शिवपूजा के लिए बेलपत्र चयन करते समय रखें इन बातों का ध्यान

1. बेलपत्र में छेद न हों।
2. तीन पत्ते वाले, कोमल और अखण्ड बिल्वपत्रों से भगवान शिव की पूजा करें।
3. बिल्वपत्र में चक्र व वज्र नहीं होने चाहिए। बिल्वपत्रों में जो सफेद लगा रहता है उसे चक्र कहते हैं और डण्ठल में जो गांठ होती है उसे वज्र कहते है।
4. बिल्वपत्र सदैव उम्टा चढ़ाना चाहिए। इसका चिकना भाग नीचे की तरफ रहना चाहिए।
बिल्वपत्र तोड़ने के नियम

चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या तिथि को, संक्रान्ति व सोमवार को बेलपत्र नहीं तोड़ने चाहिए। किन्तु बेलपत्र शंकरजी को बहुत प्रिय हैं अत: इन तिथियों में पहले दिन का रखा हुआ बेलपत्र चढ़ाया जा सकता है। यदि नए बेलपत्र न मिलें तो चढ़ाएं हुए बेलपत्र को भी धोकर बार- बार चढ़ाया जा सकता है।

दुर्लभ व चमत्कारी बेलपत्र

जिस तरह रुद्राक्ष कई मुख वाले होते हैं उसी तरह बिल्वपत्र भी कई पत्तियों वाले होते हैं। बिल्वपत्र में जितनी अधिक पत्तियां होती हैं, वह उतना ही अधिक उत्तम माना जाता है। तीन पत्तियों से अधिक पत्ते वाले बेलपत्र अत्यन्त पवित्र माने गए हैं।

चार पत्ती वाला बिल्वपत्र ब्रह्मा का रूप माना जाता है। पांच पत्ती वाला बेलपत्र शिवस्वरूप होता है व शिवकृपा से ही कभी-कभी प्राप्त होता है। छह से लेकर इक्कीस पत्तियों वाले बिल्वपत्र मुख्यत: नेपाल में पाए जाते हैं। इनका प्राप्त होना तो अत्यन्त ही दुर्लभ है।

सोमवार के दिन न तोड़ें बेलपत्र
शिवपुराण के अनुसार, बेलपत्र चढ़ाते समय कुछ नियमों का जरूर पालन करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, बेलपत्र सोमवार के दिन बिल्कुल नहीं तोड़ना चाहिए। माना जाता है कि इस दिन बेलपत्र तोड़ने से वह रुष्ट हो सकते हैं। इसलिए एक दिन पहले यानी रविवार के दिन आप बेलपत्र तोड़कर रख सकते है।
सोमवार के अलावा इस दिन भी न तोड़े बेलपत्र
शिवपुराण के अनुसार, सोमवार के अलावा हर मास की चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या तिथि के अलावा संक्रांति तिथियों के दिन भी बेलपत्र नहीं तोड़ना चाहिए। इन दिनों बेलपत्र तोड़ने से भगवान शिव नाराज हो जाते हैं और घर में परेशानियां आने लगती हैं।

इस दिन बेलपत्र के पौधे की पूजा करना शुभ
स्कंद पुराण के अनुसार, रविवार और द्वादशी के दिन बेलपत्र के पेड़ का पूजन करना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिनों में पूजा करने से घर की दरिद्रता समाप्त हो जाती है। इसके साथ ही ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं और मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।

6 माह तक बासी नहीं होती बेलपत्र
शिवपुराण के अनुसार, बेलपत्र तोड़ने के करीब 6 माह तक बासी नहीं होती है। इसे आप अपनी श्रद्धा के साथ भोलेनाथ को चढ़ा सकते हैं।

बेलपत्र नहीं है, तो करें ये काम
अगर आप शिव मंदिर गए हैं और आपके पास बेलपत्र नहीं है, तो आप मंदिर से ही दूसरों के चढ़ाए हुए बेलपत्र को उठाकर धो लें और फिर इसे भगवान शिव पर चढ़ा दें। यह भी फलदायी मानी जाती है।

बिल्व पत्र वृक्ष की महिमा

1. बिल्व वृक्ष के आसपास सांप नहीं आते ।

2. अगर किसी की शव यात्रा बिल्व वृक्ष की छाया से होकर गुजरे तो उसका मोक्ष हो जाता है।

3. वायुमंडल में व्याप्त अशुध्दियों को सोखने की क्षमता सबसे ज्यादा बिल्व वृक्ष में होती है। 4. चार पांच छः या सात पत्तो वाले बिल्व पत्रक पाने वाला परम

भाग्यशाली और शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल मिलता है।

5. बेल वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है। और बेल वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है। 6. सुबह शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापो का नाश होता है।

7. बेल वृक्ष को सींचने से पितर तृप्त होते है।

8. बेल वृक्ष और सफ़ेद आक् को जोड़े से लगाने पर अटूट लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

9. बेल पत्र और ताम्र धातु के एक विशेष प्रयोग से ऋषि मुनि स्वर्ण धातु का उत्पादन करते थे।

10. जीवन में सिर्फ एक बार और वो भी यदि भूल से भी शिवलिंग पर बेल पत्र चढ़ा दिया हो तो भी उसके सारे पाप मुक्त हो जाते है। 11. बेल वृक्ष का रोपण, पोषण और संवर्धन करने से महादेव से साक्षात्कार करने का अवश्य लाभ मिलता है।

कृपया बिल्व पत्र का पेड़ जरूर लगाये। बिल्व पत्र के लिए पेड़ को क्षति न पहुंचाएं।

बिल्व वृक्ष पन्द्रह से तीस फुट ऊँचा और पत्तियाँ तीन और कभी-कभी पाँच पत्र युक्त होती हैं। तीखी स्वाद वाली इन पत्तियों को मसलने पर विशिष्ट गंध निकलती है। गर्मियों में पत्ते गिरने पर मई में पुष्प लगते हैं, जिनमें अगले वर्ष मार्च-मई तक फल तैयार हो जाते हैं। इसका कड़ा और चिकना फल कवच कच्ची अवस्था में हरे रंग और पकने पर सुनहरे पीले रंग का हो जाता है। कवच तोड़ने पर पीले रंग का सुगन्धित मीठा गूदा निकलता है, जो खाने और शर्बत बनाने के काम

आता है। 'जंगली बेल' 'के वृक्ष में काँटे अधिक और फल छोटा होता है।

प्राप्ति स्थान

बेल के वृक्ष पूरे भारत में पाये जाते हैं। विशेष रूप से हिमालय की तराई, सूखे पहाड़ी क्षेत्रों में चार हज़ार फीट की ऊँचाई तक ये पाये जाते हैं। मध्य व दक्षिण भारत में बेल वृक्ष जंगल के रूप में फैले हुए हैं और बड़ी संख्या में उगते हैं। इसके पेड़ प्राकृतिक रूप से भारत के अलावा दक्षिणी नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार, पाकिस्तान, बांग्लादेश, वियतनाम, लाओस, कंबोडिया एवं थाईलैंड में उगते हैं। इसके अतिरिक्त इसकी खेती पूरे भारत के साथ श्रीलंका, उत्तरी मलय

प्रायद्वीप, जावा एवं फिलीपींस तथा फीजी द्वीपसमूह में भी की जाती है ।

धार्मिक महत्त्व

हिन्दू धर्म में बिल्व वृक्ष को भगवान शिव का रूप माना जाता है। मान्यता है कि इसके मूल में महादेव का वास है। इसीलिए इस वृक्ष की

पूजा का बहुत महत्त्व है। धर्मग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है। भगवान शिव को बिल्व और बिल्व के पत्ते अत्यधिक प्रिय हैं। नियमित बेलपत्र अर्पित करके भगवान शिव की पूजा करने वाला भगवान शिव का प्रिय होता है। ऐसा व्यक्ति अपनी जन्मपत्री में चाहे कितने भी अशुभ योग लेकर आया हो, तब भी उससे प्रभावित नहीं होता। 'शिवपुराण' में बेल के पेड़ को साक्षात शिव का स्वरूप कहा गया है। महर्षि व्यास के पुत्र सूतजी ने ऋषि-मुनियों को समझाते हुए कहा है कि- "जितने भी तीर्थ हैं, उन सबमें स्नान करने का जो फल है, वह बेल के वृक्ष के नीचे स्नान करने मात्र से प्राप्त हो जाता है।" गंध, पुष्प, धूप, दीप एवं नैवेद्य सहित जो व्यक्ति बिल्व के पेड़ की पूजा करता है, उसे इस लोक में संतान एवं भौतिक सुख मिलता है। ऐसा व्यक्ति मृत्यु के पश्चात शिवलोक में स्थान प्राप्त करने योग्य बन जाता है। बेल ल के पेड़ की पूजा करने के बाद जो व्यक्ति एक भी शिव भक्त को आदर पूर्वक बेल की छांव में भोजन करवाता है, वह कोटि गुणा पुण्य प्राप्त कर लेता है। शिव भक्त को खीर एवं घी से बना भोजन करवाने वाले व्यक्ति पर महादेव की विशिष्ट कृपा होती है। ऐसा व्यक्ति कभी गरीब नहीं होता है। शाम के समय बेल की जड़ के चारों ओर दीपक जलाकर भगवान शिव का ध्यान और पूजन करने वाला व्यक्ति कई जन्मों के पाप कर्मों के प्रभाव से मुक्त हो जाता है।

महिमा

बिल्वपत्र भगवान शिव की पूजा में बिल्व पत्र यानी बेलपत्र का विशेष महत्व है। महिमा

बिल्वपत्र भगवान शिव की पूजा में बिल्व पत्र यानी बेलपत्र का विशेष महत्व है। महादेव एक बेलपत्र अर्पण करने से भी प्रसन्न हो जाते है, इसलिए तो उन्हें 'आशुतोष' भी कहा जाता है। सामान्य तौर पर बेलपत्र में एक साथ तीन पत्तियाँ जुड़ी रहती हैं, जिसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना जाता है। वैसे तो बेलपत्र की महिमा का वर्णन कई पुराणों में मिलता है, लेकिन 'शिवपुराण' में इसकी महिमा विस्तृत रूप में बतायी गयी है। शिवपुराण में कहा गया है कि बेलपत्र भगवान शिव का प्रतीक है। भगवान स्वयं इसकी महिमा स्वीकारते हैं। मान्यता है कि बेल वृक्ष की जड़ के पास शिवलिंग रखकर जो भक्त भगवान शिव की आराधना करते हैं, वे हमेशा सुखी रहते हैं। बेल वृक्ष की जड़ के निकट शिवलिंग पर जल अर्पित करने से उस व्यक्ति के परिवार पर कोई संकट नहीं आता और वह सपरिवार खुश और संतुष्ट रहता है। कहते हैं कि बेल वृक्ष के नीचे भगवान भोलेनाथ को खीर का भोग लगाने से परिवार में धन की कमी नहीं होती है और वह व्यक्ति कभी निर्धन नहीं होता है। बेल वृक्ष की उत्पत्ति के संबंध में 'स्कंदपुराण' में कहा गया है कि एक बार देवी पार्वती ने अपनी ललाट से पसीना पोछकर फेंका, जिसकी कुछ बूंदें मंदार पर्वत पर गिरीं, जिससे बेल वृक्ष उत्पन्न हुआ। इस वृक्ष की जड़ों में गिरिजा, तना में महेश्वरी, शाखाओं में दक्षयायनी, पत्तियों में पार्वती, फूलों में गौरी और फलों में कात्यायनी वास करती हैं। कहा जाता है कि बेल वृक्ष के कांटों में भी कई शक्तियाँ समाहित हैं। यह माना जाता है कि देवी महालक्ष्मी का भी बेल वृक्ष में वास है। जो व्यक्ति शिव-पार्वती की पूजा बेलपत्र अर्पित कर करते हैं, उन्हें महादेव और देवी पार्वती दोनों का आशीर्वाद मिलता है।

पौराणिक कथा

भगवान शिव को प्रसन्न करने का सबसे सरल तरीका उन्हें 'बेलपत्र'

अर्पित करना है। बेलपत्र के पीछे भी एक पौराणिक कथा का महत्त्व है। इस कथा के अनुसार- "भील नाम का एक डाकू था। यह डाकू अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए लोगों को लूटता था। एक बार सावन माह में यह डाकू राहगीरों को लूटने के उद्देश्य से जंगल में गया और एक वृक्ष पर चढ़कर बैठ गया। एक दिन-रात पूरा बीत जाने पर भी उसे कोई शिकार नहीं मिला। जिस पेड़ पर वह डाकू छिपा था, वह बेल का पेड़ था। रात-दिन पूरा बीतने पर वह परेशान होकर बेल के पत्ते तोड़कर नीचे फेंकने लगा। उसी पेड़ के नीचे एक शिवलिंग स्थापित था। जो पत्ते वह डाकू तोडकर नीचे फेख रहा था, वह अनजाने में शिवलिंग पर ही गिर रहे थे। लगातार बेल के पत्ते शिवलिंग पर गिरने से भगवान शिव प्रसन्न हुए और अचानक डाकू के सामने प्रकट हो गए और डाकू को वरदान माँगने को कहा। उस दिन से बिल्व-पत्र का महत्त्व और बढ़ गया। शिव का वास शिवलिंग पर अर्पित बिल्वपत्र

'शिवपुराण' में बेलपत्र के वृक्ष की जड़ में शिव का वास माना गया है। इसलिए इसकी जड़ में गंगाजल के अर्पण का बहुत महत्व है। शिव और बेलपत्र का व्यावहारिक और वैज्ञानिक पहलू भी है। यह शिव पूजा द्वारा प्रकृति से प्रेम और उसे सहेजने की सीख देता है। कुदरत के नियमों या उसकी किसी भी रूप में हानि मानव जीवन के लिए घातक है। इसी तरह प्रकृति और सावन में बारिश के मौसम के साथ तालमेल बैठाने के लिए इसे गुणकारी माना गया है। शिव को बेलपत्र चढ़ाने से तीन युगों के पाप नष्ट हो जाते हैं। ग्रंथों में भगवान शिव को प्रकृति रूप मानकर उनकी रचना, पालन और संहार शक्तियों की वंदना की गई है। यही कारण है कि भगवान शिव की उपासना में भी फूल-पत्र और फल के चढ़ावे का विशेष महत्व है। शिव को बेलपत्र या

बिल्वपत्र का चढ़ावा बहुत ही पुण्यदायी माना गया है।। बेलपत्र से महादेव की पूजा का रहस्य

भगवान शिव को औढ़र दानी कहते हैं। शिव का यह नाम इसलिए है, क्योंकि यह जब देने पर आते हैं तो भक्त जो भी मांग ले, बिना हिचक दे देते हैं। इसलिए सकाम भावना से पूजा-पाठ करने वाले लोगों को भगवान शिव अति प्रिय हैं। भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या और भोग सामग्री की भी जरूरत होती है, जबकि शिव जी थोड़ी सी भक्ति और बेलपत्र एवं जल से भी खुश हो जाते हैं। यही कारण है कि भक्तगण जल और बेलपत्र से शिवलिंग की पूजा करते हैं। शिव जी को ये दोनों चीजें क्यों पसंद हैं, इसका उत्तर पुराणों में दिया गया है।

समुद्र मंथन के समय जब हलाहल नाम का विष निकलने लगा, तब विष के प्रभाव से सभी देवता एवं जीव-जंतु व्याकुल होने लगे। ऐसे समय में भगवान शिव ने विष को अपनी अंजुली में लेकर पी लिया। विष के प्रभाव से स्वयं को बचाने के लिए शिव जी ने इसे अपनी कंठ में रख लिया, इससे शिव जी का कंठ नीला पड़ गया और शिव जी 'नीलकंठ' कहलाने लगे। लेकिन विष के प्रभाव से शिव का मस्तिष्क गर्म हो गया। ऐसे समय में देवताओं ने शिव के मस्तिष्क पर जल उड़लेना शुरू किया, जिससे मस्तिष्क की गर्मी कम हुई। बेल के पत्तों की तासीर भी ठंढ़ी होती है। इसलिए शिव को बेलपत्र भी चढ़ाया गया। इसी समय से शिव जी की पूजा जल और बेलपत्र से शुरू हो गयी। बेलपत्र और जल से शिव जी का मस्तिष्क शीतल रहता है और उन्हें शांति मिलती है। इसलिए बेलपत्र और जल से पूजा करने वाले पर शिव जी प्रसन्न होते हैं। महत्त्वपूर्ण तथ्य बिल्व वृक्ष का फल

जो व्यक्ति दो अथवा तीन बेलपत्र भी शुद्धतापूर्वक भगवन शिव पर चढ़ाता है, उसे निःसंदेह भवसागर से मुक्ति प्राप्ति होती है।

यदि कोई व्यक्ति अखंडित (बिना कटा हुआ) बेलपत्र भगवान शिव पर चढ़ाता है, तो वह निर्विवाद रूप से अंत में शिवलोक को प्राप्त होता

है। बिल्व वृक्ष के दर्शन, स्पर्शन व प्रणाम करने से ही रात-दिन के सम्पूर्ण

पाप दूर हो जाया करते हैं। चतुर्थी, अमावस्या, अष्टमी, नवमी, चौदस, संक्रांति, और सोमवार के

दिन बिल्वपत्र तोड़ना निषिद्ध है।

भगवान शिव को बिल्वपत्र सदैव उल्टा अर्पित करना चाहिए, अर्थात

पत्ते का चिकना भाग शिवलिंग के ऊपर रहना चाहिए। बिल्वपत्र में चक्र एवं वज्र नहीं होना चाहिये। कीड़ों द्वारा बनाये हुए सफ़ेद चिन्ह को चक्र कहते हैं और बिल्वपत्र के डंठल के मोटे भाग को वज्र कहते हैं।

बिल्वपत्र तीन से ग्यारह दलों तक के प्राप्त होतें हैं। ये जितने अधिक पत्रों के हों, उतना ही उत्तम होता है। शिव जी को अर्पित किये जाने वाले बिल्वपत्र कटे-फटे एवं कीड़े के खाए नहीं होने चाहिए।

यदि किसी को बिल्वपत्र मिलने की मुश्किल हो तो उसके स्थान पर चांदी का बिल्वपत्र चढ़ाया जा सकता है, जिसे नित्य शुद्ध जल से धोकर शिवलिंग पर पुनः स्थापित किया जा सकता है।

अन्य भाषाओं में नाम गर्मी एवं पेट के रोगों से मुक्ति प्रदान करने वाला बिल्व वृक्ष संस्कृत में 'बिल्व' और हिन्दी में 'बेल' नाम से प्रसिद्ध है। यह महाराष्ट्र और बंगाल में 'बेल', कोंकण में 'लोहगासी', गुजरात में 'बीली', पंजाब में 'वेल' और 'सीफल' संथाल में 'सिंजों', काठियावाड़ में 'थिलकथ' नाम से जाना जाता है। इसके गीले गूदे को 'बिल्वपेशिका' या 'बिल्वकर्कटी' तथा सूखे गूदे 'बेल सोंठ' या 'बेल गिरी' कहा जाता है। इसका शर्बत बड़ा ही स्वादिष्ट होता है, जो स्वास्थ्यवर्धक होने के साथ ही साथ कई बीमारियों को दूर रखने में सहायक है।

औषधीय गुण
आयुर्वेद में बेल वृक्ष को कई प्रकार से लाभकारी बताया गया है। 
औषधीय गुण

आयुर्वेद में बेल वृक्ष को कई प्रकार से लाभकारी बताया गया है। इसके पत्तों, फलों आदि का औषधी के रूप में बहुत प्रयोग किया जाता है। इसके कुछ घरेलू इलाज निम्नलिखित हैं, किन्तु इनका सेवन करने से पहले आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श कर लेना उचित

रहता है-

बिल्व फल गुजरात प्राँत के डाँग ज़िले के आदिवासी बेल और सीताफल पत्रों की समान मात्रा मधुमेह के रोगियों के देते है।

गर्मियों में पसीने और तन की दुर्गंध को दूर भगाने के लिये यदि बेल की पत्तियों का रस नहाने के बाद शरीर पर लगा दिया जाए तो समस्या से छुटकारा मिल सकता है। पातालकोट के आदिवासियों के अनुसार बेल के कच्चे फल और

पत्तियों को गौ-मूत्र में पीस लिया जाए और नारियल तेल में इसे गर्म कर कान में डाला जाए तो बधिरता दूर हो सकती है। जिन्हे हाथ-पैर, तालुओं और शरीर में अक्सर जलन की शिकायत रहती है, उन्हें कच्चे बेल फल के गूदे को नारियल तेल में एक सप्ताह तक डुबोए रखने के बाद, इस तेल से प्रतिदिन स्नान से पूर्व मालिश

करनी चाहिये। बेल की जड़ों की छाल का काढ़ा मलेरिया व अन्य बुखारों में हितकर होता है।

अजीर्ण में बेल की पत्तियों के दस ग्राम रस में, एक-एक ग्राम काली मिर्च और सेंधा नमक मिलाकर पिलाने से आराम मिल सकता है। अतिसार के पतले दस्तों में ठंडे पानी से 5-10 ग्राम बिल्व चूर्ण लेने से आराम पहुँचाता है। कच्चे बेल की कचरियों को धूप में अच्छी तरह

सुखा लें या पंसारी से साफ छाँट कर ले आएँ। इन्हें बारीक पीस कर व कपड़े से छान करके शीशी में भर लें। यही बिल्व चूर्ण है। छोटे बच्चों के दाँत निकलते समय दस्तों में भी यह चुटकी भर देना चाहिए। आँखें दुखने पर बेल के पत्तों का रस, स्वच्छ पतले वस्त्र से छानकर एक-दो बूँद आँखों में टपकाना चाहिए। इससे दुखती आँखों की पीड़ा, चुभन, शूल ठीक होकर, नेत्र ज्योति बढ़ती है।

जल जाने पर बिल्व चूर्ण को गरम किए गये तेल में मिलाकर उसको ठंडा करके पेस्ट बना लें। इसे जले अंग पर लेप करने से आराम आएगा। चूर्ण न होने पर बेल का पका हुआ गूदा साफ करके भी लेपा जा सकता है। 

बेल का फल (Wood Apple) और बेल का वृक्ष (bilva tree) विशेषताओं में अद्भुत है. यह एक भारतीय फल है और प्राचीन ग्रंथों में इसे दिव्य फल कहा गया है. उसका कारण यह है कि यहशरीर विशेषकर पाचन सिस्टम के लिए इतना लाभकारी है, जितना शायद ही दूसरा फल होगा. यह उन विशेष फलों में से एक है, जिसे पूजा भी जाता है. भिन्न स्वाद होने के बावजूद बेल मनमोहक है.

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प्राचीनतम फलों में से एक है बेल बेल भारत के प्राचीनतम फलों में से एक है. इसी कारण प्राचीन धार्मिक व आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसक खूब वर्णन है. बेल के अलावा, उसके वृक्ष, पत्तियों तक की विशेषता बताई गई और इन्हें पूजनीय बताया गया है. बेल के उत्पत्ति की बात करें तो इसमें कोई शंका नहीं है कि यह भारतीय वृक्ष है और हजारों वर्षों से यह हिमालय की तराई इलाकों, सूखे पहाड़ी क्षेत्रों के अलावा मध्य व दक्षिण भारत में तो पाया ही जाता है साथ ही नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार के अलावा वियतनाम, लाओस, कंबोडिया, थाईलैंड आदि देशों में भी इसके वृक्ष बहुतायत में उगते हैं. ईस्वी 633 में चीन से भारत पहुंचे बौद्ध विद्वान जुआनज़ांग जब Install वापस चीन पहुंचे तो वह संस्कृत, बौद्ध दर्शन व भारतीय विचारों पर अनेक पुस्तकें ले गए और उन अनुवाद किया. इसके लिए उन्होंने तत्कालीन शक्तिशाली राजा हर्ष का धन्यवाद भी दिया. उन्होंने भी बेल को एक भारतीय फल के रूप में वर्णित किया है. उन्होंने करीब 657 पुस्तकों का अनुवाद किया है।

बेल के फल का है धार्मिक महत्व पहले बेल फल की धार्मिक व आध्यात्मिक विशेषताओं की बात करें तो शिवपुराण सहित अन्य धर्मग्रंथों में फल, वृक्ष और पत्तियों की विशेषताएं वर्णित की गई हैं. भगवान शिव की पूजा, उनका आशीर्वाद और सांसारिक सुख की प्राप्ति के लिए फल व बेलपत्र को उत्तम बताया गया है. धार्मिक ग्रथा में बेल वृक्ष को साक्षात शिव का स्वरूप कहा गया बेल का वृक्ष संपन्नता का भी प्रतीक है. ऐसी भी मान्यता है कि इसके वृक्ष में देवी लक्ष्मी का वास है. बेल की अन्य विशेषता यह है कि पेड़ में लगे हुए पुराने पीले हुए फल, एक साल के बाद दोबारा से हरे हो जाते हैं. पत्तों की विशेषता यह है कि उन्हें तोड़कर रखेंगे तो छह महीने तक ज्यों के त्यों बने रहते हैं.

सेहत के लिए फायदेमंद है बेल प्राचीन भारतीय आयुर्वेदिक ग्रंथ 'चरकसंहिता' में बेल (बिल्ब) को कफवात जीतने वाला बताया गया है. बेल स्निग्ध, गर्म व तीक्ष्ण होता है और अग्नि (Gastritis) को दीप्त करता है. दक्षिण भारतस्थित कमुसारया के सैनापति व कवि चौवुंदराय (940-989 ईस्वी, आज के कर्नाटक) ने भी बेलफल के कई औषधीय गुण गिनाते हुए उसे विशेष फल बताया है. उन्होंने बेल के शर्बत को अति लाभकारी कहा है. उनका यह भी कहना है कि इसके वृक्ष की छाया ठंडक देती है और शरीर व मन को स्वस्थ बनाती है.

बेल में कई विटामिन भरे हुए हैं. इसके सेवन से पाचन तंत्र ठीक रहता है, जिससे अपच और कब्ज़ जैसी समस्याओं से प्रभावी राहत मिलती है. आहार विशेषज्ञ व होमशेफ सिम्मी बब्बर के अनुसार बेल के फल में विटामिन और पोषक तत्व खूब पाए जाते हैं. बेल में मौजूद टैनिन और पेक्टिन तत्व मुख्य रूप से डायरिया और पेचिश के इलाज में बेहद लाभकारी हैं. इसके अलावा बेल के फल में विटामिन सी, कैल्शियम, फाइबर, प्रोटीन और आयरन भी अधिक मात्रा में मिलते हैं. बेल का मुरब्बा भी शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और शरीर को शीतलता प्रदान करता है. पीलिया होने पर बेल का मुरब्बा खाने की सलाह दी जाती है. सिम्मी के अनुसार बेल का अधिक मात्रा में सेवन नुकसान कर सकता है. ज्यादा खाने से पेट में दर्द, सूजन, पेट फूलना और कब्ज की समस्या पैदा हो जाती है.

अगर आपके घर में कोई सदस्य काफी समय से बीमार चल रहा है तो सावन के महीने में बेलपत्र का उपाय करना आपके लिए शुभफलदायी होगा। तांबे के लोटे में जल लेकर पीला चंदन उसमें डालें और 108 बेलपत्र उसमें डाल दें। इसके बाद शिवलिंग पर जल चढ़ाते रहें और एक बेलपत्र चढ़ाते रहें और मन ही मन ऊ नमः शिवाय मंत्र का जप करते रहें और बीमार व्यक्ति के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते रहें। इस उपाय को करने से रोगी जल्द ही स्वस्थ होगा।

यदि आपके विवाह में देरी हो रही है और बार-बार विवाह के योग बनकर टल जाते हैं तो सावन सोमवार को बेलपत्र का यह उपाय करना आपके लिए लाभदायी होगा। सावन के सोमवार से आरंभ करके 5 सोमवार को शिवलिंग पर 108 बेलपत्र चढ़ाएं और बेलपत्र चढ़ाते समय ऊं नमः शिवाय मंत्र का उच्चारण करते रहें। हर सोमवार को शिवजी के साथ माता पार्वती की भी पूजा करें तो आपके विवाह के शीघ्र योग बनते रहेंगे।

यदि आपके पास पैसा नहीं टिक रहा है तो सावन के महीने में बेलपत्र का यह उपाय आपके लिए बहुत काम का हो सकता है। सावन के 5 सोमवार को आप शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाएं और उन बेलपत्र को पर्स या फिर पैसों के स्थान में रख दें। इस आसान से उपाय को करने से आपको पैसों की कमी नहीं होगी। बेलपत्र का पेड़ घर में लगाएं। बेलपत्र का पेड़ घर में लगाने से महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और आपके घर में बरकत होती है।

बिल्व (बेल)

कहा गया है- 'रोगान बिलत्ति-भिनत्ति इति बिल्व ।' अर्थात् रोगों को नष्ट करने की क्षमता के कारण बेल को बिल्व कहा गया है। इसके अन्य नाम हैं-शाण्डिलू (पीड़ा निवारक), श्री फल, सदाफल इत्यादि । मज्जा 'बल्वकर्कटी' कहलाती है तथा सूखा गूदा बेलगिरी ।

वानस्पतिक परिचय-

सारे भारत में विशेषतः हिमालय की तराई में, सूखे पहाड़ी क्षेत्रों में 4 हजार फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है । मध्य व दक्षिण भारत में बेल जंगल के रूप में फैला पाया जाता है। मध्य व दक्षिण भारत में बेल जंगल के रूप में फैला पाया जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण इसे मंदिरों के पास लगाया जाता है।

15 से 30 फीट ऊँचे कँटीले वृक्ष फलों से लदे अलग ही पहचान में आ जाते हैं। पत्ते संयुक्त विपत्रक व गंध युक्त होते हैं। स्वाद में वे तीखे होते हैं। गर्मियों में पत्ते गिर जाते हैं तथा मई में नए पुष्प आ जाते हैं। फल अलगे वर्ष मार्च से मई के बीच आ जाते हैं। फूल हरी आभा लिए सफेद रंग के होते हैं। सुगंध इनकी मन को भाने वाली होती है। फल 5 से 17 सेण्टीमीटर व्यास के होते हैं। खोल (शेल) कड़ा व चिकना होता है। पकने पर हरे से सुनहरे पीले रंग का हो जाता है। खोल को तोड़ने पर मीठा रेशेदार सुगंधित गूदा निकलता है । बीज छोटे, बड़े व कई होते हैं।

बाजार में दो प्रकार के बेल मिलते हैं- छोटे जंगली और बड़े उगाए हुए। दोनों के गुण समान हैं। जंगलों में फल छोटा व काँटे अधिक तथा उगाए गए फलों में फल बड़ा व काँटे कम होते हैं।

शुद्धाशुद्ध परीक्षा पहचान-

बेल का फल अलग से पहचान में आ जाता है। इसकी अनुप्रस्थ काट करने पर यह 10-15 खण्डों में विभक्त सा मालूम होता है, जिनमें प्रत्येक में 6 से 10 बीज होते हैं। ये सभी बीज सफेद लुआव से परस्पर जुड़े होते हैं। प्रायः सर्वसुलभ होने से इसमें मिलावट कम होती है। कभी-कभी इसमें गार्मीनिया मेंगोस्टना तथा कैथ के फल मिला दिए जाते हैं, परन्तु इसे काट कर इसकी परीक्षा की जा सकती है।

संग्रह-संरक्षण एवं कालावधि-

छोटे कच्चे बेल के फलों का संग्रह कर, उन्हें अच्छी तरह छीलकर गोल-गोल कतरे नुमा टुकड़े काटकर सुखाकर मुख बंद डिब्बों में नमी रहती शीतल स्थान में रखना चाहिए। औषधि प्रयोग हेतु जंगली बेल ही प्रयुक्त होते हैं। खाने, शर्बत आदि के लिए ग्राम्य या लाए हुए फल ही प्रयुक्त होते हैं। इनकी वीर्य कालावधि

लगभग एक वर्ष है।

गुण-कर्म संबंधी विभिन्न मत-

आचार्य चरक और सुश्रुत दोनों ने ही बेल को उत्तम संग्राही बताया है। फल-वात शामक मानते हुए इसे ग्राही गुण के कारण पाचन संस्थान के लिए समर्थ औषधि माना गया है। आर्युवेद के अनेक औषधीय गुणों एवं योगों में बेल का महत्त्व बताया गया है, परन्तु एकाकी बिल्व, चूर्ण, मूलत्वक्, पत्र स्वरस भी बहुत अधिक लाभदायक है।

चक्रदत्त बेल को पुरानी पेचिश, दस्तों और बवासीर में बहुत अधिक लाभकारी मानते हैं। बंगसेन एवं भाव प्रकाश ने भी इसे आँतों के रोगों में लाभकारी पाया है। डॉ. खोटी लिखते हैं कि बेल का फल बवासीर रोकता व कब्ज़ की आदत को तोड़ता है। आँतों की कार्य क्षमता बढ़ती है, भूख सुधरती है एवं इन्द्रियों को बल मिलता है।

डॉ. नादकर्णी ने इसे गेस्ट्रोएण्टेटाइटिस एवं हैजे के ऐपीडेमिक प्रकोपो (महामारी) में अत्यंत उपयोगी अचूक औषधि माना है। विषाणु के प्रभाव को निरस्त करने तक की इसमें क्षमता है। डॉ. डिमक के अनुसार बेल का फल कच्ची व पकी दोनों ही अवस्थाओं में आँतों को लाभ करता है। कच्चा या अधपका फल गुण में कषाय (एस्ट्रोन्जेण्ट) होता है तथा अपने टैनिन एवं श्लेष्म (म्यूसीलेज) के कारण दस्त में लाभ करता है। पुरानी पेचिस, अल्सरेटिव कोलाइटिस जैसे जीर्ण असाध्य रोग में भी यह लाभ करता है। पका फल, हलका रेचक होता है। रोग निवारक ही नहीं यह स्वास्थ्य संवर्धक भी है। 

बिल्व (इगल मार्मेलोज)

पाश्चात्य जगत् में इस औषधि पर काफी काम हुआ है। डॉ. एक्टन एवं नोल्स ने 'डीसेण्ट्रीस इन इण्डिया' पुस्तक में तथा डॉ. हेनरी एवं ब्राउन ने 'ट्रान्जेक्सन्स ऑफ रॉयल सोसायटी फॉर ट्रॉपिकल मेडीसन एण्ड हायजीन' पत्रिका में बेल के गुणों का विस्तृत हवाला दिया है एवं संग्रहणी, हैजे जैसे संक्रामक मारक रोगों के लिए बेल के गूदे को अन्य सभी औषधियों की तुलना में वरीयता दी है। ब्रिटिश फर्मेकोपिया में इसके तीन प्रयोग बताए गए हैं-ताजे कच्चे फल का स्वरस 1/2 से 1 चम्मच एक बार, सुखाकर कच्चे बेल के कतलों का जल निष्कर्ष 1 से 2 चम्मच दो बाद, बिल्व चूर्ण 2 से 4 ग्राम। ये सभी प्रकारांतर से संग्रहणी व रक्तस्राव सहित अतिसार में तुरंत लाभ करते हैं। पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने बेल के छिलके के चूर्ण को कषाय' मानते हुए ग्राहीगुण का पूरक उसे माना है व गूदे तथा छिलके दोनों के चूर्ण को दिए जाने की सिफारिश की है। पुरानी पेचिश में जहाँ रोगी को कभी कब्ज होता है, कभी अतिसार, अन्य औषधियाँ काम नहीं करतीं। ऐसे में बिल्व काउपयोग बहुत लाभ देता है व इस जीर्ण रोग से मुक्ति दिलाता है।

बेल में म्यूसिलेज की मात्रा इतनी अधिक होती है कि डायरिया के तुरंत बाद वह घावों को भरकर आंतों को स्वस्थ बनाने में पूरी तरह समर्थ रहती हैं। मल संचित नहीं हो पाता और ऑतें कमजोर होने से बच जाती है। होम्योपैथी में बेल के फल व पत्र दोनों को समान गुण का मानते हैं। खूनी बवासीर व पुरानी पेचिश में इसका प्रयोग बहुत लाभदायक होता है। अलग-अलग पोटेन्सी में बिल्व टिंक्चर का प्रयोग कर आशातीत लाभ देखे गए हैं।

यूनानी मतानुसार इसका नाम है-सफरजले हिन्द। यह दूसरे दर्जे में सर्द व तीसरे में खुश्क है। हकीम दलजीतसिंह के अनुसार बेल गर्म और खुश्क होने से ग्राही है व पेचिश में लाभकारी है।

रासायनिक संगठन-

बेल के फल की मज्जा में मूलतः ग्राही पदार्थ पाए जाते हैं। ये हैं-म्युसिलेज पेक्टिन, शर्करा, टैनिन्स । इसमें मूत्र रेचक संघटक हैं-मार्मेलोसिन नामक एक रसायन जो स्वल्प मात्रा में ही विरेचक है। इसके अतिरिक्त बीजों में पाया जाने वाला एक हल्के पीले रंग की तीखा तेल (करीब 12 प्रतिशत) भी रेचक होता है। शकर 4.3 प्रतिशत, उड़नशील तेल तथा तिक्त सत्व के अतिरिक्त 2 प्रतिशत भस्म भी होती है। भस्म में कई प्रकार के आवश्यक लवण होते हैं। बिल्व पत्र में एक हरा-पीला तेल, इगेलिन, इगेलिनिन नामक एल्केलाइड भी पाए गए हैं। कई विशिष्ट एल्केलाइड यौगिक व खनिज लवण त्वक् में होते हैं।

आधुनिक मत एवं वैज्ञानिक प्रयोग निष्कर्ष-

पेक्टिन जो बिल्व मज्जा का एक महत्त्वपूर्ण घटक है, एक प्रामाणिक ग्राही पदार्थ है पेक्टिन अपने से बीस गुने अधिक जल में एक कोलाइडल घोल के रूप में मिल जाता है, जो चिपचिपा व अम्ल प्रधान होता है। यह घोल ऑतों पर अधिशोषक (एड्सारवेण्ट) व रक्षक (प्रोटेक्टिव) के समान कार्य करता है। बड़ी आँत में पाए जाने वाले मारक जीवाणुओं को नष्ट करने की क्षमताभी इस पदार्थ में है। डॉ. धर के अनुसार बेल मज्जा के घटक घातक विषाणुओं के विरुद्ध मारक क्षमता भी रखते हैं। इण्डियन जनरल ऑफ एक्सपेरीमेण्टल वायोलॉजी' (6-241-1968) के अनुसार बिल्व फल हुकवर्ग जो भारत में सबसे अधिक व्यक्तियों को प्रभावित करता पाया गया है, को मारकर बाहर निकाल सकने में समर्थ है। पके फल को वैज्ञानिकों ने बलवर्धक तथा हृदय को सशक्त बनाने वाला पाया है तो पत्र स्वरस को सामान्य शोध तथा मधुमेह में एवं श्वांस

रोग में लाभकारी पाया है।

ग्राह्य अंग-

फल का गुदा एवं बेलगिरी। पत्र, मूल एवं त्वक् (छाल) का चूर्ण। चूर्ण के लिए कच्चा, मुरब्बे के लिए अधपका एवं ताजे शर्बत के लिए पका फल लेते हैं। कषाय प्रयोग हेतु मात्र दिन में 2 या 3 बार ।

स्वरस-

10 से 20 मिलीलीटर (2 से 4 चम्मच) ।

शरबत

20 से 40 मिलीलीटर (4 से 8 चम्मच)। पाचन संस्थान में प्रयोग हेतु मूलतः बिल्व पूर्ण ही लेते हैं। कच्चा फल अधिक लाभकारी होता है। इसीलिए चूर्ण को शरबत आदि की तुलना में प्राथमिकता दी जाती है।

निर्धारणानुसार प्रयोग-मूल अनुपान शहद या मिश्री की चाशनी होते हैं।

दाँत निकलते समय जब बच्चों को दस्त लगते हैं, तब बेल का 10 ग्राम चूर्ण आधा पाव पानी में पकाकर, शेष 20 ग्राम सत्व को 5 ग्राम शहद में मिलाकर 2-3 बार दिया जाता है। पुरानी पेचिश व कब्जियत में पके फल का शरबत या 10 ग्राम बेल 100 ग्राम गाय के दूध में उबालकर ठण्डा करके देते हैं। संग्रहणी जब खून के साथ व बहुत वेगपूर्ण हो तो मात्र कच्चे फल का चूर्ण 5 ग्राम 1 चम्मच शहद के साथ 2-4 बार देते हैं। कब्ज व पेचिश में पत्र-स्वरस लगभग 10 ग्राम 2-3 घंटे के अंतर से 4-5 बार दिए जाने पर लाभ करता है। हैजे की स्थिति में बेल का शरबत या बिल्व चूर्ण गर्म पानी के साथ देते हैं।

कोष्ठबद्धता में सायंकाल बेल फल मज्जा, मिश्री के साथ ली जाती है। इसमें मुरब्बा भी लाभ करता है। अग्निमंदता, अतिसार व गूदा गुड़ के साथ पकाकर या शहद मिलाकर देने से रक्तातिसार व खूनी बवासीर में लाभ पहुँचाता है। पके फल का जहाँ तक हो सके, इन स्थितियों में प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसकी ग्राही क्षमता अधिक होने से हानि भी पहुँच सकती है। कब्ज निवारण हेतु पका फल उपयोगी है। पत्र का स्वरस आषाढ़ व श्रावण में निकाला जाता है, दूसरी ऋतुओं में निकाला गया रस उतना लाभकारी नहीं होता। काली मिर्च के साथ दिया गया पत्रस्वरस पीलिया तथा पुराने कब्ज में आराम पहुँचाता है। हैजे के बचाव हेतु भी फल मज्जा प्रयुक्त हो सकती है।

अन्य उपयोग-

आँखों के रोगों में पत्र स्वरस, उन्माद-अनिद्रा में मूल का चूर्ण, हृदय की अनियमितता में फल, शोध रोगों में पत्र स्वरस का प्रयोग होता है।

श्वांस रोगों में एवं मधुमेह निवारण हेतु भी पत्र का स्वरस सफलतापूर्वक प्रयुक्त होता है। विषम ज्वरों के लिए

मूल का चूर्ण व पत्र स्वरस उपयोगी है। सामान्य दुर्बलता के लिए टॉनिक के समान प्रयोग करने के लिए बेल का उपयोग पुराने समय से ही होता आ रहा है। समस्त नाड़ी संस्थान को यह शक्ति देता है तथा कफ-वात के प्रकोपों को शांत करता है।






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