वज्र पुष्प और मंदाती की कहानी
वज्र पुष्प और मंदाती की कहानी |
शिव महापुराण का एक बड़ा सुंदर चरित्र है। एक सेठ जी के घर में संतान का सुख नहीं था। सेठ जी के घर में औलाद नहीं थी । सेठ सेठानी दोनों के घर में औलाद का सुख नहीं था इसकेबावजूद न तो सेठ जी का मन ना ही सेठानी का मन कभी भी भगवान की ओर नहीं गया। संतान का सुख नहीं है पर दोनों का मन कभी शिवजी की ओर नहीं गया।
सेठ कभी किसी गौ माता को एक रोटी ना देता सेठ कभी किसी भूखे को भोजन नहीं कराता। कभी किसी प्यासे को पानी नहीं पिलाता। दान तो कुछ भी नहीं देता। सेठानी का स्वभाव भी ऐसा ही था।
सेठ और सेठानी दोनों ने कभी भूखे को भोजन नहीं कराया कभी नहीं कराया। कभी किसी प्यासे को पानी नहीं पिराया। कभी किसी को अन्न का भाग नहीं दिया कभी कोई सेवा नहीं करी। कभी शिव की आराधना नहीं करी। कभी राम की आराधना कभी कृष्ण की आराधना कभी दत्त की आराधना कभी देवी की आराधना किसी की आराधना नहीं की।
इनका एक बहुत सुन्दर बगीचा था। जिसमें बेल पत्री के वृक्ष के साथ कई तरह के पुष्पों के वृक्ष लगे हुए थे। सेठ सेठानी का मन ऐसा था कि वे फूल तो फूल किसी को पत्ते तक तोड़ने नहीं देते थे। उन्होंने बगीचे कीसुरक्षा की बड़ी तगड़ी व्यवस्था कर रखी थी।
अब एक दिन भूलवश ना पत्नी ने ना पति ने अर्थात न तो सेठ ने और न ही सेठानी ने। किसी ने नहीं सोचा था। परंतु भूलवश सोमवार के दिन अष्टमी तिथि पड़ गई और सोमवार के दिन जैसे ही अष्टमी तिथि पड़ी।
भूलवश सोमवार अष्टमी तिथि के दिन सेठ सेठानी के बगीचे में से कोई ने बेलपत्र और पुष्प ले लिया और सोमवार की अष्टमी के दिन भूलवश, सेठ और सेठानी को पता ही नहीं। कोई दूसरे ने तोड़ा, दूसरे ने लिया और शंकर जी के मंदिर में जाकर वो बेलपत्र और पुष्प उनको समर्पित कर दिया।
शिव की कृपा से, बाबा देवदिदेव महादेव की कृपा से जिनके बगीचे से बेलपत्र और पुष्प तोड़कर लेकर गए थे। जिनके बगीचे से जिनके घर से बेलपत्र और फूल तोड़कर लेकर गए थे। मेरे शंकर भगवान ने उनके घर में भी एक पुष्प देही दिया। एक पुष्प दे ही दिया। एक फूल जैसा बेटे ने सेठ और सेठानी के घर में जन्म ले लिया।
जिसका नाम वज्र-सुमन हुआ। बज्र सुमन धीरे धीरे, धीरे धीरे, धीरे धीरे बड़ा होने लगा। वज्र सुमन भगवान शिव के प्रसाद के द्वारा हुआ था इसलिए वज्र सुमन शिव का भक्त था। पिताजी दुकान पर लगाते वज्र सुमन दुकान पर नहीं जाते। पिताजी काम से भेजते परंतु वज्रसुमन हाथ में जल का पात्र लेकर शिव के पास जाने लगा। वह शिव भक्ति में डूबने लगा। शिव भक्ति में तल्लीन रहने लगा। उसके अंदर बड़ा उत्साह रहता। वज्रसुमन बड़े हुए। उनका विवाह एक सेठ की कन्या मंदमती के साथ हुआ। वज्रसुमन तो शिवजी की आराधना में लगे रहते। वज्रसुमन तो भगवान शंकर की भक्ति में डूबे रहते। बज्र सुमन तो भगवान शंकर की अविरल भक्ति में लगे रहते।
पर मंदमती का मन शिव तत्व में लगता ही नहीं था । एक दिन मंदमती के मामा जी ने अपनी भांजी और अपने भांजा दामाद दोनों के लिए भोजन प्रसाद रखा। दोनों के लिए निमंत्रण आया।
मंदमती ने अपने पति से कहा सुनो मेरे मामा जी के यहां भोजन है। आपका और मेरा दोनों का भोजन है । चलिए ।
पति ने मना करा । देखो । आज मैं नहीं जा सकता। आज मेरा मन नहीं है जाने का । मैं नहीं जाऊंग। आज मैं नहीं जाऊंगा ।पर पत्नी तो पत्नी थी । थोड़ी जिद पड़ गई ।
सास को मालूम पड़ा कि मेरी बहु जिद पर अड़ी हुई है कि मामा जी के यहां भोजन है और बेटा जाने को तैयार नहीं है तो सास ने अपने पुत्र को बुलाकर समझाया । वज्रसुमन अगर बहू कह रही है तो चले जाओ। व्यर्थ का क्लेश मत मचाओ। जाओ, मामा जी के भोजन करने जाओ।
वज्र सुमन ने कहा ठीक है मां । अगर तुम कह रही हो तो मैं भोजन करने जाता हूं । वज्र सुमन और मंदमती दोनों भोजन के लिए जाने लगे।
चलते चलते बीच राह में मंदमती ने बहती हुई उफनती नदी को देखा और देखते से ही पत्नी का मन लगा क्या न इसमें स्नान किया जाए। उसने पति से कहा देखो आज तक आप और हम कभी भ्रमण के लिए नहीं निकले। आप और हम कभी घूमने के लिए नहीं निकले। आज पहली बार हम मामा के यहां जा रहे हैं। बीच में यह नदी पड़ी है क्यों ना अपन स्नान करें।
पति ने मना कर दिया वज्रसुमन ने कहा, मुझे नहीं नहाना, मुझे स्नान नहीं करना । पत्नी जिद पर अड़ गई मुझे तो स्नान करना है और तुम्हें भी मेरे साथ स्नान करना पड़ेगा। वज्र सुमन ने अपनी पत्नी से कहा सुनो मंदमती मुझे तैरना नहीं आता। मंदमती ! हमारा शास्त्र कहता है जिस नदी को हम पहचानते नहीं है। जिस तालाब को हम पहचानते नहीं है। जिस कुए को हम जानते नहीं है। जिस बावड़ी को हम जानते नहीं है। उसमें उतरना नहीं चाहिए।
पति मना कर रहा है। मैं घर से नहा करर आया हूं । मामा जी के यहां भोजन करेंगे। वापस आ जाएंगे। पति अपनी पत्नी मंदमती को समझा रहा है। मान ले मेरा कहना। मान ले । मेरे बस का नहीं। इसमें स्नान मेरे बस का नहीं। पत्नी ने पति का हाथ पकड़ा खींच के नदी में ले गई। जो पति-पत्नी दोनों पानी में गए। पति का हाथ छूट गया। पति को तैरना नहीं आता था। वह पानी में बह गया।
पत्नी पानी से बाहर निकल कर चिल्लाने लगी। मेरा पति पानी में बह गया। मेरा पति पानी में बह गया। वह रोने लगी ।चिल्लाने लगी। वह रोती रोती अपने मामा जी के यहां पहुंच गई । मामा जी को सूचना मिली कि भांजी तो आई पर भांजी दामाद नहीं आया। मामा जी ने पूछा, बेटी ! तू अकेली ।
मामा जी तुम्हारे भांजी दामाद भी आए थे। हम दोनों पानी में नहाने के लिए नदी में उतरे। तुम्हारा दामाद पानी में बह गया। वह रो रही है। वो चले गए । वो चले गए । मामा जी ने अपनी भांजी को खाना तक नहीं खिलाया कि भांजा दामाद नहीं आए तो मैं भोजन भी नहीं कराता।
रोती हुई भांजी मामा के घर से बाहर निकल गई । फिर नदी के तट पर पहुंची। उसने विचार करा अब अपने ससुराल वापस चली जाऊ। पर मन में विचार करा। जब मायके के सगे मामा ने मुझे भोजन नहीं दिया। मामा ने मुझे नहीं रखा। तो मेरे ससुराल वालों को मालूम पड़ेगा कि उनका लड़का नहीं रहा। जो इतने सालों के बाद बेटा हुआ वो बेटा नहीं रहा ।
उनको मालूम पड़ेगा कि मेरी जिद के कारण मेरा पति चले गया। जब उनको मालूम पड़ेगा तो ससुराल वाले क्या रखेंगे। वह खूब बिलक बिलक कर रो रही थी। खूब बिलक के रो रही थी।
एक बुजुर्ग, एक संत, एक साधु, एक सन्यासी, एक तपस्वी, एक बूढ़ा सा व्यक्ति सामने से निकल कर आ रहा था। संत ने पूछ लिया बेटी क्या हो गया ? क्यों रो रही हो ? क्या हुआ है? तुमको तुम्हारे रोने का कारण क्या है ? क्यों रो रही हो। मंदमती ने कहा बाबा मेरा पति पानी में नहा रहा था और ना जाने कहां चला गया। आज मेरे पति को गए हुए पूरा दिन हो गया, रात हो गई, सुबह हो गई, पर मेरा पति नहीं आया । वह पानी में बह गया। उसको तैरना भी नहीं आता।
बूढ़े व्यक्ति ने कहा बेटी मैंने किसी के मुख से सुना है कि अगर घर में दुख आया है, तकलीफ आई है। कष्ट आया है। कोई परेशानी आई है, तो पार्थिव शिवलिंग का निर्माण किया जाए और सात आचमनी जल (सात चुल्लू जल) शिव को चढ़ाया जाए और सात वृक्ष की पत्तियों को तोड़कर शंकर पर चढ़ाया जाए तो दुख कट जाता है।
इतना सुनते ही मंदमती को गुस्सा आ गया उस को क्रोध आया और मंदमती ने कहा बूढ़े, बुड्ढे तुझ में अकल नहीं है। मेरा पति पानी में बह गया और तू मुझसे कह रहा है कि पार्थिव शिवलिंग का निर्माण करो और सात चुल्लू जल (सात आचमन जल) भगवान को चढ़ाऊ और सात वृक्ष की पत्ती लाकर चढ़ाऊ।
बूढ़े व्यक्ति ने कहा बेटी मेरी बात मान ले। इतने में मंदमती का क्रोध और बढ़ गया। उसने पास में पड़ा हुआ पत्थर उठाकर बूढ़े बाबा के सिर पर मार दिया। बूढ़े बाबा के मस्तक से रक्त बहने लगा। बूढ़े बाबा चले गए ।
जैसे ही बूढ़े बाबा गए मंदमती को अपनी ग़लती का अहसास हुआ। वह आंखों में आंसू भरकर अपने ससुराल की ओर जाने लगी । मंदमती जब अपने ससुराल की ओर जा रही और जैसे ही मंती ससुराल की ओर बढ़ रही है ससुराल की ओर जा रही है। मन में भय है। मेरी सास चिल्लाएगी, मेरा बेटा कहां है । मेरा ससुर कहेगा, मेरा बेटा कहां है। चलती जा रही है, वह चलती जा रही है। आंखों में आंसू हैं और चलते-चलते चलते-चलते आज मंदमती जैसे ही ससुराल के नजदीक में पहुंची याद आया यह शंकर जी का वह मंदिर है जहां मेरा पति रोज जल चढ़ाने जाता था। शंकर के मंदिर को देखकर आंख में आंसू भरकर बोली, बाबा ! मेरा पति मुझसे रोज कहता था कि शिवालय चल। शंकर को एक लोटा जल चढ़ाने चल । शिव की आराधना कर। पर मैं आई ना । पर आज मेरा पति चला गया तो मुझे बाबा आपकी याद आ रही है। वह भावावेश में अपने आप को रोक नहीं पायी और भूलवश रोती हुई मंदमती शंकर के मंदिर में आज चली ही गई और जाते से ही मंदिर में जितना सामान पड़ा था। उसको बिलख बिलख कर रोते हुए हटाने लगी। महादेव तूने मेरा पति ले लिया । महादेव तूने मेरा पति ले लिया। महादेव तूने मेरा पति ले लिया। वो इतना जल चढ़ाने वाले को तूने ले लिया । भूलवश मंदमती जैसे ही मुड़कर उठने लगी तो बेल पत्री पत्तियां उसके साड़ी के पल्लू में अड़ गई और अड़ते से उड़ी और उड़कर शंकर पर जाकर गिरी। गिरते से ही मंदमती चक्कर खाकर नीचे गिर गई। मंदिर के लोग ने उसे उठाकर एक पेड़ के नीचे बिठा दिया। वृक्ष के नीचे बैठी हुई मंदमती पर लोगों ने जल का छींटा दिया। जल का छींटा देते ही मंदमती क्या देखती है ? उसके पास में एक पुरुष खड़ा हुआ है? वो उसको पानी पिला रहा है ? पानी पीते समय पानी के पात्र में पुरुष का दर्शन किया ? वो पुरुष कोई दूसरा नहीं था मंदमती का पति था। जो उसके पास में खड़ा हुआ था। मदमती चिल्लाई, स्वामी तुम यहां । तुम तो पानी में बह गए थे।
तुम्हारा तो पानी में बहने के बाद तीन दिन तक पता ठिकाना नहीं था । तुम कहां चले गए थे ? इतने में पति ने कहा मंदमती जैसे ही मैं पानी में बहा। पानी में बहते ही मुझे याद नहीं रहा कि क्या हुआ । इतने में पत्थर से मैं टकरा गया । पत्थर से टकरा कर वहीं पर मैं रुक गया । थोड़ा सा कचरा मेरे पास में एकत्रित हो गया । एक बूढ़े नाविक ने मुझे निकाला और नाविक ने निकाल कर मुझे एक और करा और उस नाविक ने बूढ़े व्यक्ति ने मुझे औषधि दी । औषधि पाकर आज मेरा स्वास्थ्य पूर्ण तरह से मैं ठीक हो गया ।
इतने में मंदमती ने कहा ये मेरा कुछ नहीं है । मुझे लगता है आज तक मैं शंकर के मंदिर नहीं गई थी । आज शिव ने मुझे बुला ही लिया। शिव ने मेरी लाज रख ली। मदमती ने अपने पति वज्रसुमन से कहा मेरा पुण्य प्रबल नहीं है।
बूढ़ा व्यक्ति आया और बूढ़े व्यक्ति ने कहा अरी ओ मंदमती तुझे नहीं मालूम आज सोमवार की अष्टमी है। इस दिन भूल से भी जो शंकर के दरवाजे जो चला जाता है। भूल बस कुछ समर्पित भी कर देता है तो शिव उसकी झोली भर ही देता है । उसका सौभाग्य प्रबल कर ही देता है । मंदमती का पति लौट कर वापस आ गया।
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