Day - 01 ll श्री शिव महापुराण कथा ll पूज्य पण्डित प्रदीप जी मिश्रा (सीहोर वाले) ll धमतरी, छत्तीसगढ़
Day - 01 ll श्री शिव महापुराण कथा ll पूज्य पण्डित प्रदीप जी मिश्रा (सीहोर वाले) ll धमतरी, छत्तीसगढ़
तेरी कृपा बिना ना हिले एक भी अणु लेते स्वास तेरी कृपा से तनु बखान क्या करूं मैं राखो के ढेर का चपटी भभूत में खजाना कुबेर का
हे गंगधार मुक्ति द्वार ओमकार तू भोले ओमकार तू
आयो शरण तिहारी शंभु तार तार तू
शिव कथा कोई साधारण सी कथा नहीं है इसमें बाबा आपकी पूरी पूरी परीक्षा लेता है और परीक्षा के साथ में यह कथा सफल हो पाती है। हमने पहले भी कथा में कहा परीक्षा लेगा भोलेनाथ और प्रतीक्षा करना तुम परीक्षा अगर वह ले रहा है तो प्रतीक्षा तुम्हें करना है तुम्हें इंतजार करना है कि मेरा बाबा संभाल लेगा। मेरा बाबा कर लेगा। उस प्रतीक्षा को थोड़ा सा इंतजार को बढ़ा लो।
मैंने तेरे ही भरोसे बाबा तेरे ही भरोसे हवा विच उड़ती जावांगी बाबा डोर हतो छड़ ना में कटी जावांगी भोले मैं तेरी पदम शंभु मैं तेरी अपने विश्वास को ड़ी बनाना है हमको अपने भरोसे को दृढ़ मनाना है और जब हमारा विश्वास हमारा भरोसा दृढ़ होगा तो शिव को मिलने में देरी नहीं होग अभी चल रहा है
श्राद्ध पक्ष श्राद्ध का मतलब है श्रद्धा अपने गुरु अपने माता-पिता अपने पूर्वजों के प्रति अपने गुरु के प्रति अपने घर के बड़ों के प्रति अपने बड़े आदरणीय के प्रति आपकी कितनी श्रद्धा है । दुनिया के लोग कहते हैं कि अगर हम पित्रों का स्मरण ना करें तो हमारे पित्र रुष्ट हो जाते हैं। हम अपने पित्रों का भजन ना करें तो हमारे पित्र रुष्ट हो जाते हैं । पर शिव महापुराण की कथा कहती है कोई ने कहा कि नख काटना पर रुष्ट हो जाएंगे। कोई ने कहा महिलाएं ज्यादा श्रृंगार मत करना पित रुष्ट हो जाएंगे। कोई ने कह दिया नया साड़ी मत लेना, नया वस्त्र मत लेना, पित रुष्ट हो जाएंगे।
पहले आप और हम समझे कि पितृ पक्ष का मतलब क्या है ।भाव से दिल से कथा का तत्व ग्रहण कर पितृ पक्ष को हम समझे। किसी ने कहा नाखून मत काटना किसी ने का नया कपड़ा मत लेना पितृ पक्ष में 16 दिन नए कपड़े नहीं लेना चाहिए कोई कहे ये नहीं करना चाहिए कोई कहे मकान का महूरत कोई कहे यह महूरत कोई क वो महूरत कोई के अच्छा काम करने के लिए मत जाओ अच्छा मंगल कार्य के लिए आगे मत बढ़ो ।
शिव महापुराण की कथा कहती है कि पितृ बुरे नहीं होते हैं पित्र बुरे नहीं होते हैं।
आज लोगों के मन में बड़ा भय हो जाता है । फेसबुक खोलो तो ब्राह्मणों के लिए लोग कमेंट करना प्रारंभ कर देते हैं कि श्राद्ध पक्ष चालू हो गया ब्राह्मण जीवने के लिए जाएंगे। कोई ब्राह्मण की तुलना कौए से कर देता है, कोई कुछ कह देता है कोई कुछ कह देता है।
गायत्री करने वाला ब्राह्मण, वेद पाठ करने वाला ब्राह्मण, संध्या करने वाला ब्राह्मण की तुलना किसी साधारण से नहीं होती उसकी तुलना तो स्वयं नारायण और ब्रह्मा से होती है।
किसी ने कहा कि तुम अभी नया वस्त्र मत लो पितृ पक्ष चल रहा है, नया काम मत चालू करो पितृ पक्ष चल रहा है। श्राद्ध का मतलब क्या है श्राद्ध का मतलब है आपकी पूर्ण श्रद्धा। आपका पूर्ण विश्वास आपका पूर्ण भरोसा पूर्ण श्रद्धा पूर्ण विश्वास पूर्ण भरोसा।
भगवान राम जिस भूमि के पास में से निकल कर गए हो व भूमि साधारण नहीं हो सकती उसकी शिव तपोस्थली हो सकती शिव तप जिस भूमि पर स्वयं शंकर बैठे हो महानदी के तट पर मां आद्य शक्ति दुर्गा भवानी बैठी हो तो भूमि साधारण नहीं एक विश्वास के साथ कथा सुनो जिस नदी को छत्तीसगढ़ की गंगा कहा जाता है उस पवित्र नदी के तट पर आप और हम कथा सुन रहे हैं।
एक मन में विश्वास रखकर श्रद्धा श्राद्ध का मतलब पित्र आपका बुरा करेंगे यह श्राद्ध का मतलब नहीं है पित्र आपका बुरा करेंगे यह श्राद्ध का मतलब नहीं है पित्र आपको श्राप देंगे यह श्राद्ध का मतलब नहीं है यह पितृ पक्ष का मतलब नहीं नया कपड़ा मत लो यह मत करो वह मत करो मोहर मत करो नए मकान की बात मत करो संबंध की बात मत करो शादी की बात मत करो पितृ पक्ष चल रहा है श्राद्ध चल रहा है लोगों ने भय पैदा कर दिया पितृ पक्ष का श्राद्ध पक्ष का पर यदि कुर्म पुराण को पढ़ा जाए यदि देवी भागवत को पढ़ा जाए यदि लिंग पुराण को पढ़ा जाए यदि शिव महापुराण को पढ़ा जाए तो हमारा शास्त्र कहता है कि पितृ पक्ष से सुंदर कोई पक्ष नहीं हो सकता जिसमें पित्रों का भी आशीर्वाद देवता के साथ मिलता है जिसमें देवता का तो आशीर्वाद मिलता ही है और देवताओं के साथ में पित्रों का भी आशीर्वाद हमको प्राप्त होता है पित्रों का भी आ पित्रों का भी बर हमें प्राप्त होता है पितरों का भी आशीर्वाद हमें प्राप्त होता है तो कौन कह दे कि यह पितृ पक्ष बेकार होता है यह श्राद्ध पक्ष बेकार होता है श्राद्ध पक्ष में यह मत करो श्राद्ध पक्ष में वो मत करो पितृ पक्ष में यह ना ना ना
शिव महापुराण की कथा कहती है पितृ पक्ष वो पक्ष है कि बाकी के समय में बाकी के पक्षों में तो केवल देवता का आशीर्वाद मिलता है पर श्राद्ध पक्ष में देवताओं के साथ में पित्रों का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है हमारे पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त श्राद्ध का मतलब है श्रद्धा आपकी श्रद्धा कितनी है।
एक कथा आती है बड़ी सुंदर सी एक वकील साहब
एक कथा आती है बड़ी सुंदर सी । एक वकील साहब एक बड़े शहर में रहते थे। वकील साहब अदालत जाते और अपना केस लड़ते ।
एक दिन गांव का एक व्यक्ति शहर में आया । वह बहुत गांव का व्यक्ति था। वह शहर ए तो गया लेकिन उसे अपने लड़के के घर नहीं मालूम था इसलिए वह हर किसी से अपने लड़के का पता पूछ रहा था।
वकील साहब जो केस लड़ थे वे उस केस को हार गए । वकील साहब केस हार कर अदालत के बाहर खड़े हुए थे। और इतने में वह गांव का व्यक्ति आया और उस गांव के व्यक्ति ने वकील साहब से पूछा। ए काले कोट वाले भैया ! ए काले कोट वाले भैया ! मेरा बेटा इस शहर में रहता है। उसका यह पता है। आप मुझे बता देंगे कहां रहता है।
गांव के उसे व्यक्ति ने वकील साहब से बार-बार आग्रह किया जरा पता बता दो भईया, यह पता बता दो। वकील साहब ने उस गांव के व्यक्ति से बात नहीं करी और उसको कहा, " क्यों दिमाग का रहा है। जा निकल यहां से, चल भाग यहां से । "
वकील साहब ने जैसे ही हाथ का इशारा करा। बेचारे गांव के व्यक्ति विचार करता है कि काले कोट वाले भैया ने कहा है कि तुम्हारा बेटा इधर रहता होगा। चल जा यहां से हाथ का इशारा करा।
वह वहीं को चल दिया। चलते-चलते, चलते-चलते आगे चलकर कहीं पर शिव महापुराण की कथा हो रही थी। वह गांव का व्यक्ति अपने बेटे को ढूंढते ढूंढते उसी शिवपुराण की कथा में जाकर बैठ गया। कथा पूरी हुई। हाथ में प्रसाद का दोना लिया और चल दिया । खाते खाते जा रहा था सामने से स्कूटर से बेटा आ रहा था।
बेटे ने अपने बाप को देखा, पिताजी ! तुम यहां कैसे आ गए शहर में ?
बेटा ! मैं तेरा एड्रेस लेकर आया था । वहां काले कोट वाले भैया से पूछा था । उसने मुझे यहां भेजा।
पिताजी पर मेरा घर तो इधर नहीं दूसरी जगह। यहां तो मैं अचानक यहां आ गया।
बेटा ! कथा सुनी और यहां तू मुझे मिल गया। अब मुझे कुछ नहीं चाहिए। बेटे ने अपने बाप को स्कूटर पर बिठाया। वह उन्हें स्कूटर पर बिठाकर अपने घर लेकर गया । घर लेकर गया चार महीने बीते और वकील साहब का एक्सीडेंट हो गया और एक्सीडेंट होते सेही वकील साहब का तो राम नाम सत्य हो गया ।
वकील साब मरे । ऊपर गए। धर्मराज ने कहा कौन आया है? यह आया है? कालाकोट पहने वकील साहब धर्मराज के सामने खड़े थे।
धर्मराज ने चित्रगुप्त महाराज से कहा , "इनके पाप पुण्य गिनो।"
उसके पाप पुण्य गिनना प्रारंभ करा और जब पाप पुण्य गिनना प्रारंभ करा तो मालूम पड़ा कि इन्होंने तो झूठ बहुत बोला छल बहुत करा है, यह करा। वो करा।
महाराज ! इसने पुण्य नहीं करा। कोई पुण्य नहीं करा । नरक भेज दिया जाए इसको । अदालत में भी जाते थे तो क्लेश करते थे। एक वो वकील होता है जो अदालत में भी जाता है तो भगवान को प्रणाम कर कर जाता है और बड़े प्रेम से सबसे बात करता है पर ये वहां पर भी क्लेश करता है। इसे नरक भेज दो। तुरंत।
धर्मराज निर्णय दे ही रहे थे और इतने में वहां से नंदी निकल कर जा रहे थे नंदी ने कहा इस वकील ने कुछ करा हो, चाहे ना करा हो। पर एक बार इसने एक गांव के व्यक्ति को शिव पुराण का रास्ता बता दिया था।
इतने में धर्मराज ने कहा , "रास्ता नहीं बताया था । उस व्यक्ति ने एड्रेस पूछा था और इसने उसे भगाया था।"
नंदी ने कहा' "भले भगाया। पर हाथ का इशारा तो शिव पुराण के कथा पंडाल की ओर ही था ।हाथ का इशारा तो शिव पुराण की ओर था।"
" तो बताओ नंदी ! क्या करना है ?" धर्मराज से पूछा ।
"तुम बताओ कि मंदिर का रास्ता । शिवालय का रास्ता । शिव पुराण का रास्ता बताने वाले का क्या फल होता है ? "
तो इतने में धर्मराज ने कहा उसको भी बैकुंठ का रास्ता बता दिया जाता इसलिए इसको भी बैकुंठ का रास्ता बता दो । इसको भी बैकुंठ का रास्ता बता दो।
वकील की आंख से आंसू बहने लगा कि मैंने जिंदगी में कोई अच्छा कर्म नहीं करा पर एक कर्म और वो भी मैंने अनायास करा। वह मुझे बैकुंठ लेकर जा रहा है।
हमारा आपसे कहना है कि जब अनायास क्या हुआ कार्य धूर्त वकील साहब को बैकुंठ भेज सकता है। तो हमें ऐसे कार्य जान बूझकर क्यों नहीं करने चाहिए।
डॉक्टरों के हिसाब से संतान का सुख नहीं तो
गुरुदेव कहते हैं कि सारी अष्टमियों में सोमवार की अष्टमी श्रेष्ठ होती है यदि सोमवार की अष्टमी के दिन सफेद आंकड़े की जड़ का प्रयोग किया जाए और पशुपतिनाथ का व्रत प्रारंभ कर दिया जाए तो जो बाबा से मांगा जाता है। वो बाबा देता है।
जब सोमवार की अष्टमी पड़े तब पति-पत्नी बड़े प्रेम से शंकर की मंदिर में जाकर बाबा से विनती और विनय करके सफेद आंकड़े की जड़ को कुंडकेश्वर महादेव का नाम लेकर और अशोक सुंदरी केपास खड़े होकर अपनी कमर में बांध लें और बड़े प्रेम से शंकर भगवान की पूजन और आराधना करने और विनती करें तो बाबा संतान का सुख आवश्यक प्रदान करता है।
श्राद्ध का समय गलत समय नहीं है
पितृ पक्ष, श्राद्ध का समय गलत समय नहीं है कोई काम आपको शुरू करना है तो पितृ पक्ष में शुरू कर सकते हो, उसमें देवता और पितर दोनों आशीर्वाद रहता है। दोनों का कितना देते हैं ।
शिव महापुराण में कथा आती है पित्रों की तीन बेटियां मैना, धन्या और कला थीं। मेना के सुंदर आनंद में पार्वती जी, धन्या सुनैना बनी जिनकी गोद में माता सीता जी खेली, कला कीर्ति बनी जिनकी गोद में राधा जी खेली।
पित्रों की तीन बेटियों के तीन देवियां है। पहले नंबर पर कौन है पार्वती जी दूसरे नंबर पर कौन है सीता जी और तीसरे नंबर पर राधा जी हैं। इन तीन देवियों का नाम उच्चारण करने से जीव पार हो जाता है। हम गौरी शंकर – ग़ौरी शंकर, सीताराम – सीताराम और राधे श्याम – राधे श्याम उच्चारण करा जाता है। अतः राधा का नाम स्मरण किया सीता का नाम स्मरण किया पार्वती जी के नाम का स्मरण किया पार्वती जी के नाम का स्मरण किया कैसे पार उतर सकता है।
पितृ पक्ष में कुछ करो या ना करो एक काम चालू करो। पितृ पक्ष में बन सके तो गौ माता को रोटी दो। पितृ पक्ष में बन सके गौ माता को जल दो। पितृ पक्ष में बन सके तो भूखे को भोजन कराओ। प्यासे को पानी पिलाओ।
किसी ने कह दिया कोई विद्वान ने तुम्हें बता दिया कि तुम्हारे पितृ दोष है। तुम्हारे घर में काल सर्प दोष है। तुम्हारे घर में ऐसा दोष है। तो एक काम चालू करो 16 दिन श्राद्ध के एक चावल का दाना देवदिदेव महादेव के शिवलिंग पर समर्पित करो। दूसरा चावल का दाना अशोक सुंदरी की जगह पर समर्पित करो और एक लोटा जल में से पहले थोड़ा सा जल अपना गोत्र बोलकर और अपने पित्रों का स्मरण करके अशोक सुंदरी वाली जगह पर चढ़ाओ उसके बाद शंकर भगवान को उस जल को अर्पित करो । आपका पितृ दोष अपने आप शांत हो जाएगा। दोष मिट जाएगा।
जिसको गोत्र नहीं मालूम उसको एक चीज मालूम होना चाहिए शंकर का नाम, श्री शिवाय नमस्तुभयम या ओम नमः शिवाय।
भरोसे के करिए एक चावल का दाना अशोक सुंदरी की जगह, अशोक सुंदरी का स्थान मालूम है ना सबको । बोलो बोलो जम के बोलो जरा। सबको मालूम है ना । चावल का एक दाना अशोक सुंदरी की जगह और चावल का एक दाना मेरे देवाधिदेव महादेव कोई कितना भी कह दे। आपका पितृ दोष अपने आप शांत हो जाएगा। दोष मिट जाएगा।
गोवर्धन नाथ जी का पूजन
भागवत कथा को देखिए आप लोग सुना होगा कि भगवान कृष्ण ने गिरि गोवर्धन नाथ जी का पूजन करा और करवाया था। गोवर्धन नाथ जी का पूजन करते समय सारे ब्रजवासी कृष्ण भगवान से कहने लगे कि हमारा इंद्र देवता तो खाने आता था। यह तो पर्वत है। ये तो पत्थर है। यह तो पाषाण है। इस पूजन में से तो भगवान खाने आ ही नहीं रहे। हमने इतना सारा भोजन बनाया। कोई आ ही नहीं रहा । कृष्ण ! सुना कि नहीं सुना । भागवत जी में कोई आ ही नहीं रहा। इतने में भगवान कृष्ण ने कहा क्या आप चाहते हो कि भगवान आए और खाके जाए ।
"हां !" सभी ने एक और में उत्तर दिया।
तो भगवान कृष्ण तुरंत गोवर्धन पर्वत के अंदर प्रकट हो गए। गिरिराज बाबा प्रकट हुए। उन्होंने हजारों हाथ करे और सारा खाना खाना चालू कर दिया। बृजवासी जितना लाए थे सब खा गए। और अन्न मांगने लगे। कहते हैं जिस स्थान पर उन्होंने भोजन किया वह स्थान वर्तमान में आन्योर के नाम से जाना जाता है।
अब जितने लोग बैठे थे। सब सिर पर पल्लू लेकर बात करने लगे हमारा इंद्र देवता तो थोड़ा हमारे लिए छोड़ के भी जाता था। ये तो पूरे ही खा गया । ये तो पूरा ही खा गया । भगवान नहीं खाए तो दिक्कत और भगवान खा जाए तो दिक्कत ।
अब सब बात कर रहे हैं अरे इंद्र देवता तो थोड़ा छोड़ देते थे। ये तो पूरा के पूरा ही खा गया। ये तो पूरा के पूरा खा गया।
तब भगवान कृष्ण ने हाथ जोड़कर कहा गोवर्धन बाबा थोड़ा सा इन ब्रजवासी के लिए प्रसाद छोड़ दो। तब भगवान गोवर्धन नाथ जी ने प्रसाद छोड़ा और कृष्ण से कह दिया, " सुनो कृष्ण ! इन ब्रजवासियों ने मुझे खाने से रोका, इसलिए आज के बाद मैं किसी के सामने खाने नहीं आऊंगा। केवल भाव से खाकर जाऊंगा। केवल भाव से ।
अब किसी ने पूछा गुरु जी कि भगवान भाव से खाते हैं यह कैसे मालूम पड़ेगा? तो एक प्रैक्टिकल करो घर में सत्यनारायण भगवान की कथा करो। सत्यनारायण भगवान की कथा में आटा सेक के शक्कर मिला कर पंजीरी बनाओ और दही दूध सब मिलाकर पंचामृत बनाओ।
अब इसमें से आधा पंचामृत और आधी पंजीरी अलग रख दो फ्रिज के ऊपर और आधी पंजीरी और आधा पंचामृत सत्यनारायण भगवान के सामने रख दो। पूरी कथा सुनना, आरती करना, पूजन करना और फिर पूजा की पंजीरी और पंचामृत खाकर देखना फिर फ्रिज के ऊपर जो रखा था उसको खाकर देखना दोनों में स्वाद अंतर आएगा । अतः जो भगवान के सामने रखा जायेगा भगवान द्वारा भाव रूप में ग्रहण करने के कारण उसका स्वाद बढ़ जाएगा।
एक और उदाहरण ले लेते हैं नवरात्रि में देवी जी का भंडारा होता है तुम अपने घर में कद्दू या काशी फल की सब्जी व पूरी या पूड़ी बनाओ या आलू की सब्जी बनाओ। घर में हलवा बनाओ। घर में खीर बनाओ और एक बार भंडारे में जाकर कद्दू की सब्जी, मोटी मोटी पूरी, हलवा, खीर खाकर आओ। जो घर में स्वाद नहीं आएगा वो भंडारे में आएगा।
भगवान तो भाव का भूखे है। प्रेम वश आते हैं और सब पाकर चले जाते हैं। यह प्रेम ही तो है । आपका स्नेह ही है।
गुरुजी तालाब नदी का पानी शंकर को चढ़ाना चाहिए कि नहीं
गुरुजी तालाब नदी का पानी शंकर को चढ़ाना चाहिए कि नहीं चढ़ाना चाहिए क्योंकि उसमें सब नहाते हैं। सब तरह के लोग होते हैं।
स्मरण में लेकर आओ अग्नि, वायु , जल, पृथ्वी और आकाश ये पांच कभी अशुद्ध नहीं होते। ये शुद्ध के शुद्ध रहते हैं। पृथ्वी जिस पर तुमने गंदगी करी है पृथ्वी कभी अशुद्ध नहीं होती और कभी अशुद्ध नहीं होगी। अब यह जंगल है यह इतना बड़ा ग्राउंड है अब जरा विचार करो इस पृथ्वी पर लोग मल मूत्र कर कर गए होंगे पहले ना जाने कितने लोग इस पर गंदगी कर कर गए होंगे उसके बाद शिव पुराण हो रही कि नहीं हो रही बोलो जम के बोलो इस भूमि पर लोग बैठे कि नहीं बैठे कथा सुन रहे हैं कि नहीं सुन रहे पृथ्वी भूमि कभी अशुद्ध नहीं होती ।
अग्नि कभी अशुद्ध नहीं होती अग्नि कभी अशुद्ध नहीं है आकाश कभी अशुद्ध नहीं है जल कभी अशुद्ध नहीं होता।
अग्नि अशुद्ध नहीं है पृथ्वी अशुद्ध नहीं है आकाश अशुद्ध नहीं है जल अशुद्ध नहीं है जल जल होता है उसमें वह खुद गुण होता है कि जल अपने आप में पवित्र होता है अशुद्ध उसकी शुद्धता अपने आप है अपने यह वायु अशुद्ध कहां है शुद्धता का नदी का तालाब का बावड़ी का कुए का हापसी का हेड पंप का बोर का जल शिव को चढ़ा सकते हो
कडप डाकू की कथा
एक कथा शिव पुराण में जरूर पढ़ना । शिव महापुराण में कथा आती है। कडप डाकू की
कडप जंगल में रहने वाला ऐसा भील जो कभी किसी देवता को नहीं जानता था । भगवान को नहीं देखा था उसने । वह भगवान को नहीं जानता था।
एक बार एक ब्राह्मण को शंकर का पूजन करते हुए देख लिया था। तो कड़क ने भी ऐसा करने का प्राण बना लिया।
कड़क के पास में पानी का लोटा नहीं था तो तालाब में जाकर मुंह में पानी भर लिया । कड़क के पास चढ़ाने की के लिए बेलपत्र नहीं था तो उसने दूसरी पत्तियां तोड़कर ले आया। कड़क के पास भोग लगाने के लिए कुछ नहीं था तो एक जीव को मारकर उसका मांस लेकर आ गया । उसको नहीं मालूम था की पूजा कैसे होती है और क्याहोती है?
शंकर जी के पास में जाकर उसने मुंह में से पानी की पिचकारी चला दी। शिव जी के ऊपर पत्तियां तोड़कर चढ़ा दी। और आखिर में उन पर रक्त मिश्रित मांस चढ़ा दिया।
ब्राह्मण परेशानहो गया। कोई मांस का भोग लगा जाता है। गलत भोग लगा जाता है। इससे परेशान होकर ब्रह्मण ने शंकर के शिवलिंग को पिंजरे में बंद कर दिया।
एक दिन कड़क द्वारा पूजा करते समय पिंजरे की एक लोहे की तान टूट गई और शंकर के शिवलिंग को चुप गई । चुभते से ही शिवलिंग में से रक्त निकलने लगा। कड़प घबराया । उसने देखा आज मेरे भोलेनाथ की आंख में यह बाण लग गया। यह तार लग गया । कडप ने अपना हाथ लगाया पर रक्त रुका नहीं। खून रुका नहीं ।
तब कड़प को याद आने पड़ा कि मेरे पिताजी कहा करते थे कि जो चीज बेकार हो जाती है। उस पर वही चीज लगाना पड़ती है।
कडप ने आव देखा ना ताव बिना देर किए त्रिशूल से अपनी आंख निकाली और शिवलिंग पर लगा दी इतने में शंकर भगवान प्रकट हो गए शिव प्रकट हो गए। शिव महापुराण की कथा कहती है आपका भाव शुद्ध होना चाहिए आपका मन शुद्ध होना चाहिए।
कहां से लाऊं गंगा। कहां से लाऊं यमुना । कहां से लाऊ सरयू अपार पड़ी रे । और भोले तेरी सेवा हमसे ना बनी रहे। भोले बाबा तेरी सेवा हमसे न बनी रहे।
कहां से लाऊं लड्डू कहां से लाऊं पेड़े कहां से लाऊं बर्फी वो शक्कर चढ़ी रे कहां से लाऊं बर्फी वो शक्कर चड़ी रे और भोले तेरी सेवा हमसे ना बनी रे
जो अपने पित्रों के फोटो लेकर आए हैं पूर्वजों के फोटो लेकर आए उसको साथ में लेकर बड़े आनंद के साथ भाव के साथ जो अपने पूर्वजों के फोटो लाए हैं इस श्राद्ध पक्ष की कथा में दोनों हाथों से ऊपर करते हुए भाव के साथ जय हो इस श्राद्ध पक्ष की कथा में हमने पहले कहा है पाच दिन की कथा छत्तीसगढ़ में हो रही है अपने पूर्वजों का फोटो साथ लेकर चलो अपने जिसको भाव के साथ आप कथा सुनवा और महाराष्ट्र में भी कथा हो नासिक जिले में नंदगांव में 26 तारीख से तो साथ में फोटो लेकर चलो बाबा का भक्ति करने के लिए दोनों हाथों से जय हो और जितने लोग आस्था चैनल पर कथा सुन रहे हैं टीवी हों पर कथा सुन रहे हैं आप अपने टीवी के सामने अपने साथ में फोटो रखकर बैठिए अगर फोटो नहीं है तो चावल का एक दाना लेकर बैठिए और जब कथा पूरी हो पहले दिन की उस चावल के दाने को अपने परिंडे के पास मटके के पास हंडे के पास रखिए सात दिन पाच दिन रोज कथा सुनो रोज एक चावल का दाना अपने पित्रों के नाम से रखो बाबा देवदिदेव महादेव आपके पूर्वजों को पार लगाएगा ही।
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