बाँसुरी
बाँसुरी
एक बार गोपियों ने बाँसुरी से पुछा "री बांसुरी, तू श्री कृष्ण के होठों से कैसे चिपक गयी"?
बाँसुरी ने कहा "क्या बताऊँ बहना, मैं तो बाँसों के झुण्ड चुपचाप 'कृष्ण-कृष्ण' रटा करती थी, एक दिन उनकी दृष्टि मुझे पर पड़ गयी बस फिर क्या था, पहले तो उस 'छलिये ने मुझे मेरे कुटुंब से अलग कर दिया, फिर मुझे काटा और छाटा, पीड़ा तो बहुत हो रही थी, परन्तु मैं 'कृष्ण-कृष्ण' करती रही फिर भी उनका मन न भरा तो, मेरे अन्दर जो भी था वह सब निकाल बाहर फेंका और तब भी मैं प्रेम दीवानी 'कृष्ण-कृष्ण' करती रही। तब उस 'चितचोर' ने मेरे अंग में छह छेद (सुराख) कर दिए और मैं पागल तब भी 'कृष्ण-कृष्ण' करती रही। अंत में कृष्ण ने कहा "तू जीती मैं हारा, अब तू सदा मेरे होठों पर विराजमान रहेगी"।
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