पुस्तक २ (रिवाडी से खरीदी) पशुपति व्रत

पशुपति व्रत

॥ श्री गणेशाय नमः ॥ मनोवांछित फल प्रदान करने वाली

श्री पशुपतिनाथ व्रत कथा (सरल एवं शुद्ध हिन्दी भाषा में)

शिव स्तुति एवं शिवजी की आरती सहित

मूल्य : 60 रुपये

पशुपतिनाथ व्रत की पूजा की सामिग्री

पूजा की थाली, कुमकुम, अबीर, गुलाल, अष्टगंध, लाल चंदन, पीला चंदन, अक्षत, बेलपत्र धतूरा, फूल, फल, एक लोटा जल, दक्षिणा आदि।


पशुपतिनाथ व्रत की विधि

सबसे पहले सोमवार के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त हो भगवान शिव का शुद्ध अन्तःकारण से ध्यान करें। फिर पूजा की थाली लेकर शिवजी के मंदिर में जावे। शिवलिंग के आस-पास की सफाई कर आसन बिछाकर बैठें। फिर शिवलिंग का जल से अभिषेक करें। जल चढ़ाते समय 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करते रहें। तप्तश्चात् पूजा की अन्य सामग्रियाँ शिवजी पर चढ़ाकर पूजा की थाली लेकर घर आ जावें। शिवजी तो भोलेनाथ हैं यदि किसी कारणवश पूजा की सामग्री की व्यवस्था न होने पावे तो सिर्फ जल को ही चढ़ावें। भगवान शिव तो इससे भी प्रसन्न होते हैं। सुबह की पूजन के पश्चात् पाशुपत व्रत की शाम को पूजा करें। सुबह की पूजा की थाली पुनः मंदिर में ले जावें। प्रसाद घर में बनाकर ले जावें जिसके तीन भाग कर लें और 6 दीये भी साथ रख लें। प्रसाद के दो भाग मंदिर में चढ़ावें और 5 दीये शिवजी के सम्मुख जलाकर प्रार्थना कर आरती करें। पत्पश्चात् घर आकर एक दीये का मुख्य द्वार पर सीधे हाथ की तरफ प्रज्वलित करें। भगवान पशुपतिनाथ का ध्यार कर अपनी अपनी मनोकामना कहें फिर घर में प्रवेश करें। प्रसाद के एक शेष भाग को स्वयं खावें। प्रसाद लेकर स्वयं फलाहार आदि से अपना व्रत खोलें। इस प्रकार पाँच सोमवार व्रत कर उद्यापन करें। ऐसा करने से 卐 भगवान पशुपतिनाथ सभी मनोकामनायें पूर्ण करते है।

पशुपतिनाथ व्रत के नियम

भगवान शिव को पंचानन भी कहा जाता है। इसलिए पाँच दीये भगवान शिव के मंदिर में प्रज्ज्वलित करते हुए अपने मन की मनोकामना पूर्ति के लिए पाशुपतिनाथ भगवान शंकर से इस प्रकार प्रार्थना करें कि आप मेरी पूजा स्वीकार करें।

शास्त्रों में कहा गया है कि जिस मंदिर में पाशुपत व्रत आरम्भ किया जाता है और पाशुपतिनाथ की पूजा आरम्भ की जाती है उसी मंदिर में पाँचों व्रत किये जाते हैं, किसी भी सूरत में मंदिर नहीं बदला जाता है। अगर व्रत के बीच में आपको कहीं जाना पड़ जाता है तो वापस आकर उसी घर और उसी मंदिर में व्रत को आगे बढ़ाओ। इस व्रत को आप फलाहार या अन्न दोनों से ही रख सकते हैं तथा यदि अधिक आवश्यकता हो तो खाने में नमक ले सकते हैं। पाशुपति व्रत पाँच सोमवार तक किया जाता है फिर भी अपनी  श्रद्धानुसार कितने भी सोमवार को किया जा सकता है, बस जितने सोमवार का करना है उसका संकल्प पहले ही मान लिया जाता है और एक ही स्थान पर पूरा किया जाता है। जब तक व्रत का उद्यापन संपन्न नहीं हो जाता है।

पशुपतिनाथ व्रत की कथा

ऋषि बोले- हे भगवन् ! हम पाशुपत व्रत के सुनने की इच्छा करते हैं, जिसे करके ब्रह्मादिक भी पाशुपत हो गये। वायु बोले- समस्त पापों को दूर करने वाला रहस्य मैं आपसे वर्णन करता हूँ, यह पाशुपत व्रत अथर्वशिरस् उपनिषद् में प्रसिद्ध हैं। इसका काल चैत्र पूर्णमासी, शिव स्वीकृत देश, क्षेत्र, आराम (बगीचा) श्रेष्ठ लक्षण युक्त इसमें कहा है। 1. उसमें पहले त्रयोदशी के दिन स्नानादि करके उनसे आजा लें। विशेष पूजा करके स्वयं शुक्ल वस्त्र करके, शुक्ल यज्ञोपवीत, श्वेत चन्दन धारण करके कुशासन पर बैठकर मुट्ठी में कुशों को लेकर उत्तर या पूर्व को मुख करके तीन प्राणायाम करके देवी और देव को विज्ञापन किये मार्ग से धारण करके। 'मैं दीक्षित होकर यह व्रत करता हूँ यह संकल्प करें, जब तक शरीरपात हो अथवा बारह वर्ष, छः वर्ष, तीन वर्ष अथवा बारह मास तक, छः, तीन अथवा एक ही महीने। बारह दिन अथवा छः दिन, तीन दिन व एक ही दिन में व्रत का संकल्प करके। विरजामोह के निमित विधिपूर्वक अग्रि को लेकर घी, समिध और चरु से यथायोग्य हवन करें ॥1-10 ॥ पूर्ण आहुति के उपरान्त फिर तत्वों की शुद्धि के उद्देश्य से उन समिधा आदि का मूल मन्त्र (पंचाक्षर) से हवन करें और यह तत्वा मेरे देह को शुद्ध करें, ऐसा स्मरण करता जाय। पंचभूत तन्मात्रा पंच कर्मेन्द्रिय ज्ञान और कर्म के भेद से इनके पाँच-पाँच विभाग है, त्याचादि सात धातु, प्राणादि वायु। मन, बुद्धि, अंहकार, गुण, प्रकृति, 卐 पुरुष, राम, विद्या, कला, नियति, काल। माया शुद्ध विद्या, महेश्वर, सदाशिव, शक्ति और शिवतत्व यह क्रम से तत्व कहे हैं। इन विरजा (मल रहित) मन्त्रों से हवन करने वाला पाप रहित हो जाता है, शिवजी के अनुग्रह को प्राप्त होकर ज्ञानवान् हो जाता है। फिर गोबर लाकर उसका पिण्ड करके मन्त्र पड़कर, सूंघकर उसे अग्रि में रखकर उस दिन व्रती हविष्य अन्न खायें। फिर प्रातःकाल चतुर्दशी के दिन सब 卐 पहले दिन का कृत्य करके होम के पीछे रुद्राग्रि को शान्त करके यत्रपूर्वक भस्म ग्रहण करें। फिर जटा युक्त या मुण्डित या केवल शिखामात्र धारण किये हुए- इडा पिंगला के बीच में सुषुन्मा है, यह मल रहित ब्रह्मस्वरुपिणी नाड़ी है, इसके बाईं ओर इडा, दाहिनी ओर पिंगला नाड़ी है ।।11-20 ॥ गेरुआ वस्त्र या चर्म धीर वस्त्र धारण करें, एक वस्त्र धारण करें, वल्कल वे मेखला दण्ड धारण किये रहें। फिर चरण धोकर दो बार आचमन करके अपने शरीर को उस हवन की भस्म से भूषित करें। 'अग्रिरितिभस्म' यह छः अथर्ववेद के मन्त्र हैं, इनसे सिर से लेकर चरण तक स्पर्श करें। फिर इसी क्रम से सर्वांग में भस्म लगायें, ओंकार युक्त शिवजी का उच्चारण करें। फिर 'त्र्यायुषं जमयुषंः' इस मन्त्र से त्रिपुण्ड लगावें, इस प्रकार शिवभाव को प्राप्त होकर शिवयोग का आचरण करें। तीनों सन्ध्याओं में इस पाशुपत व्रत को करें, यह भुक्ति-मुक्ति का देने वाला पशुत्व दूर करता है। इस पाशुपत व्रत से पशुपन त्याग करें, लिंगमूर्ति सनातन महादेव जी का पूजा करें। आठ दलों का सुवर्ण का कमल, नौ रत्नों से अलंकृत करके कर्णिका और केशर के सहित पद्मासन की कल्पना करें। एक ऐश्वर्य होने पर करें तथा इसके अभाव में लाल, श्वेत कमल स्थित करें, यदि यह भी न हो सके तो केवल भावना का कमल स्थित करें। उस कमल की कर्णिका में एक छोटी लिंगमूर्ति स्फटि की स्थापित कर क्रम से पूजन करें ।।21-30 ॥ उस लिंग को विधि पूर्वक स्थापन कर और शुद्ध कर पंचमुख के प्रकार से आसन मूर्ति को कल्पना करके पंचगव्यादि पवित्र 卐 विस्तार पूर्वक यथायोग्य सहस्त्र कलशों से स्नान करावें। गन्ध, द्रव्य, कपूर, चन्दनादि, कुंकुम यह सब वस्त वेदी सहित लिंग को चढ़ाकर भूषण से भूषित करें। बिल्वपत्र, श्वेतपद्म, नीलकमल तथा दूसरे सुगन्धित पुष्प, पवित्र श्रेष्ठ बिल्वपत्र, चित्रदूर्वा, अक्षत, महापूजा के विधान से यथा लाभ पूजित करके 卐 धूप, दीप, अर्घ्य, नैवेध प्रदान करें, इस प्रकार शिवजी को निवेदन करके कल्याण की प्रवृत्ति करें और जो न्याय पूर्वक उपार्जन, की हुई अपने को इष्ट वस्तु हों, वह सब द्रव्य इस व्रत में विशेष कर देने चाहिए। श्रीपत्र, उत्पल और कमल सहस्त्र चढ़ाने चाहिये अथवा कमती संख्या 108 चढ़ाने चाहिये। उसमें भी विशेष कर बेलपत्र को न त्यागें, एक ही सुवर्ण का कमल सहस्त्र कमलों से विशेष है और नीलोत्पलादि कमले बेलपत्र के समान है और दूसरे फलों का नियम नहें है, यथालाभ निवेदन करें ।॥ 31-40 ।। अष्टांग अर्घ्य श्रेष्ठ है, विशेष कर धूप देनी, चन्दन लगाना, कृष्ण, अगरु, अघोर नामक मुख में, सद्योजात में मलशिला, वामदेव मुख में, चन्दन, पौरुष में हरिताल, ईशान, में भस्म इस प्रकार कोई आचार्य आलेपन कहते हैं। कोई धूपान्तर के विधान से धूप नहीं मानते हैं कि अघोर के मुख में श्वेत अगरु, पुरुष के मुख में काला अगरु, सद्योजात के मुख में गुग्गुल, सौम्य के मुख में सुगन्धि द्रव्य, ईशान के उशीरादि की धूप विशेष करके देनी चाहिये। शर्करा, मधु, कपूर, कपिला गौ के घृत में मिलाकर देनी चाहिये, चन्दन, अगरु काष्ठादि वह सामान्य कहा है। कर्पूर वर्ति घी के दीपक देने चाहिये। इसके उपरान्त प्रत्येक मुख 卐 की ओर अर्घ्य और आचमन देना चाहिये। प्रथम आवरण से क्रम से गणेश और कार्तिकेय का पूजन करना चाहिये, फिर ब्रह्मा प्रभृति अंगादि का पूजन करें। इस प्रकार प्रथम आवरण की पूजा करने पर दूसरे आवरण में चक्रवर्ती विध्नेश की पूजा करनी चाहिये, तीसरे आवरण में भव आदि अष्टमूर्तियों का पूजन卐 करना चाहिये। चौथे आवरण में महादेवादियों की तथा ग्यारह रुद्रों की, सब गणेश्वरों की पूजा करनी 卐 चाहिये। पद्म के बाहर पाँच आवरण के क्रम से अस्त्र और अनुचरों के साथ दश दिक्पालों की पूजा करें। ब्रह्माजी के मानसिक पुत्र और सब ग्रह, समस्त देव-देवी और सर्व आकाशचारी ॥ 41-50 ।। सब पातालवासी और सब मुनीश्वर, सब मुख्य योगीश्वर पाँचवे आवरण में मातृकाओं के साथ पूजें। गणों के साहित क्षेत्रपाल और यह सब चराचन जगत् शिवजी की प्रीति से शिवजी की विभूति जानकर पूजें। आवरण पूजा के अन्त में परमेश्वर को पूजन करके घृत व्यंजन युक्त हवि शाकादि मनोहर वस्तु निदेवन करें। मुख सुगन्धि के निमित ताम्बूल रोचक द्रव्य के सहित दें, फिर अनेक प्रकार के पुष्प और भूषणों से अलंकृत करके। नीराजन के अन्त में पूजा का विस्तार समाप्त करें, फिर सामग्री सहित पानपात्र दें और शयन निवेदन करें। चन्द्रमा के समान हार उज्ज्वल श्यन स्थान में रखें और भी सब योग्य पदाथ, राजाओं के समान स्थित करें। यह कार्य स्वयं करें या ऋत्विजों से कराकर हवन और पूजन के पीछे प्रार्थना, स्तोत्र, जप करके पंचाक्षर विद्या को जपें। प्रदक्षिणा करें और परमात्मा की पूजा करें, फिर शिवजी के सम्मुख ही गुरु और ब्रह्मा का पूजन करें। फिर अर्घ्य और आठ फूल देकर देव को लिंग से विसर्जन करके अग्निमन्त्र से अग्नि की रक्षा करके उसे भी विदा करें। इस प्रकार यह सब कृत्य प्रतिदिन करें, फिर सब सामग्री सहित कमल युक्त लिंग ॥ 51-60 ॥ अपने गुरु को दे दें अथवा शिवालय में स्थापन करें, फिर वह व्रती अपने दूसरे गुरुजनों का पूजन करके समर्थ हो तो भक्त, ब्राह्मण औद दीनों को सन्तुष्ट करें, आप या तो भोजन न करें अथवा फल और मूल भोजन करें। दूध पीयें भिक्षा खायें, केवल एक बार भोजन करें, 卐 रात्रि में सदा नियत भोजन करें और पवित्र होकर पृथ्वी पर शयन करें। भस्म या तृण पर शयन करें अथवा चीर व अजिन मृगचर्म पर शयन करें, ब्रह्मचर्य पूर्वक इस व्रत को समाप्त करें। रविार आर्द्रा नक्षत्र के दिन अमावस, पूर्णमासी, अष्टमी और चतुर्दशी को सामर्थ्य हो तो उपवास करें। पाखण्ड, पतित, उदक्या, रजस्वला, सूतिका आदि को मन से भी स्मरण न करें, न वाणी से उच्चारण करें। क्षमा, दया, सत्य, अहिंसा और शील युक्त सदा रहें, सन्तुष्ठ शान्त रहें और तप तथा ध्यान में सदा मन लगावें। तीनों काल स्नान करें अथवा भस्म स्नान करें। मन, वचन, क्रम से विशेष पूजा करें। बहुत कहने से क्या ? व्रती कुछ भी अमंगल बात न करें, प्रमाद हो जाने से आचार में गुरु लघु का विचार करके। पूजा, होम, यज्ञादि से उसका उचित प्रायश्चित करें जब तक व्रत समाप्त न हो, कुछ भी प्रमाद न करें ॥ 61-70 ॥ गोदान, वृषोत्सर्ग पूजा धन के अनुसार सब कामना से रहित होमर भक्त शिवजी की प्रीति के निमित सब करें। यह व्रत की विधि संक्षप से सामान्य कही है, प्रति मास में जो विशेष है, सो क्रम से कहता हूँ। वैसाख में हीरे का लिंग, आषाढ़ में मोती का, श्रावण में नीलम का, भाद्रपद में पद्मराग मणि का, आश्विन में गोमेद का, कार्तिक में मूंगे का, अगहन में वैडूर्य का, पौष में पुष्परा का, माघ में घुमणि (सूर्यकान्त) का फाल्गुन में चन्द्रकान्त मणि का और चैत्र में इसी मणि का अथवा रत्न न मिले तो सब महीनों में सुवर्ण लिंक की पूजा करें। उसके अभाव में चांदी, तांबा अथवा शिला के लिंग का पूजन करें, यह भी न हो तो मिट्टी का अथवा किसी वस्तु का लिंग पूजें। सब ही मूर्ति गन्धमय बनावें अथवा जैसी रुचि होवे सो बनावें, व्रत के अन्त में अपना नित्यकर्म समाप्त करके सदाचरण युक्त व्रती पुरुष शिव और आचार्य का पूजन करें। आचार्य की आज्ञा से पूर्व उत्तर मुख होकर बैठें, कुश का आसन कुशा ही हाथ में लिये प्राण अपान वायु को रोककर ॥ 71-80 ॥ शक्ति के अनुसार मूलमन्त्र को जपकर उमा सहित त्र्यम्बक देव का यान करके आज्ञा लेकर हाथ जोड़कर कहें- हे भगवन् ! आपकी आज्ञा से इस व्रत का त्याग करता हूँ, यह कहकर लिंगमूल के कुशों को उत्तर भाग में विसर्जन करें। फिर दण्ड, जटा, चीर, मेखला को भी त्याग करें, विधि पूर्वक आचमन करके पंचाक्षर मन्त्र का उच्चारण करें। जो देहान्त तक इस दीक्षा को सावधानी से करता है और इस व्रत को करता है, वह नैष्ठिक व्रती कहलाता है। वही आश्रमों श्रेष्ठ महापाशुपत व्रती कहलाता है, वही तपस्वियों में श्रेष्ठ और महाव्रती है। उसके समान मुमुक्षुओं में कोई कृतकृत्य नहीं है, जो यति नैष्ठिक हो, वह उत्तम नैष्ठिक है जो बारह दिन तक भोजन न करके इस व्रत को करे वह भी तीव्र व्रत के कारण नैष्ठिक के तुल्य हो जाता है। जो शरीर में घृत लगाकर इस व्रत को करता है, दो-तीन दिन भी करता है, वह भी नैष्ठिक है जो कोई निष्काम होकर इस व्रत को करता है और जिसने निरन्त अपनी आत्मा शिवजी को अर्पण की है, उसके समान कोई दूसरा नहीं है। विद्वान ब्राह्मण भस्म लगाकर महापाप से उत्पन्न हुए पापों से छूट जाता है, इसमें संदेह नहीं ॥ 81-90 ॥ रुद्र अग्नि का जो परम वीर्य है, वही भस्म कहलाता है, इस कारण सब काल में भस्म युक्त वीर्यवान होता है जो पुरुष भस्मनिष्ठ है, अग्नि के संगम से उनके सब दोष दूर हो जाते हैं, भस्म स्नान से पवित्र हुआ पुरुष भस्मनिष्ठ कहा जाता है। जिसके शरीर में भस्म लगा है और जिसका त्रिपुण्ड्र भस्म से दीप्तिमान है, भस्म स्नान करने से पुरुष भस्मनिष्ठ कहा जाता है। भूत, प्रेत, पिशाच और बड़े-बड़े भयंकर रोग भष्मनिष्ठ के समीप से दूर भाग जाते हैं, इसमें संदेह नहीं। कल्पष (पाप) दूर करने से और भासमान होने से यह भस्म कहलाता है, वह विभूति पुरुषों को ऐश्वर्य देने वाली तथा परम रक्षा करने वाली है। अधिक भस्म का माहात्म्य क्या कहे ? व्रती भस्म स्नान करके स्वयं महेश्वर हो जाता है। यही भस्म परमेश्वरी और शैवों का परम अस्त्र है, इसने उपमन्यु की तप में आपदा निवारण की है। इस कारण सब प्रकार के यन्त्र से पाशुपत व्रत करना चाहिये, धन के समान भस्म संग्रह करना चाहिये और भस्म स्नान में प्रीति करनी चाहिये ॥ 91-98 ।। ऋशि बोले - धौम्य के बड़े भ्राता उपमन्यु ने बाल्यावस्था में दूध के निमित्त पत किया था, उसे शिवजी ने प्रसन्न होकर क्षीरसागर दिया। परन्तु उस बालक को शिवशास्त्र की प्रवक्ता किस प्रकार प्राप्त हुई और वह किस प्रकार शिवजी का सद्भाव जानकर तप में निरत हुआ ? तप करने के समय उनको किस प्रकार ज्ञान प्राप्त हुआ और उन्होंने रुद्राग्रि के परम वीर्य भस्म से कैसे रक्षा प्राप्त की? सो कहिये। वायु बोले- यह उपमन्यु कोई साधारण बालक नहीं थे जो ऐसा तप किया था, वह महात्मा व्याघ्रपाद मुनि के पुत्र थे। जन्मान्तर में भी सिद्ध थे, परन्तु किसी कारण से अपने प्रारब्ध से भ्रष्ट होकर कुमारता को प्राप्त हुए। इसी करण महादेव जी के प्रसाद से और होने वाले भाग्य के बल से दुग्ध की इच्छा से' व्याज से तप करके महादेव जी की कृपा के द्वारता को प्राप्त हुए। इसी करण शिवजी ने उनके निमित्त गणेशत्व, कुमारत्व के सहित दुग्ध 卐 का सागर प्रदान किया। इसी शिवजी के अनुग्रह के कारण उनको ज्ञान शास्त्र प्राप्त हुआ और कुमार आवस्था में ही उसे धारण करने की शक्ति प्राप्त हुई। इसी से उनको कुमार अवस्था में शिवशास्त्र की वक्तृता हुई, जैसे ज्ञानसागर कुमार के मुख से नन्दी ने ज्ञान पाया था। इसी प्रकार शिवज्ञान की प्राप्ति में' इसका कारण देखा है, दुग्ध के कारण साक्षात् अपनी माता के शोक भरे वचन सुने । 1-10 ॥ किसी समय उसने अपने मामा के आश्रम में बहुत थोड़ा दूध पीया, मातुल के पुत्र से उसने ईर्ष्या की जो कि क्षीरपान से तृप्त था। दूध पीकर मामा के पुत्र को आनन्द से बैठा हुआ देखकर व्याघ्रपाद का पुत्र उपमन्यु प्रेम से माता से बोला। उपमन्यु बोला- हे मातः ! हे महाभागे ! हे तपस्विनी ! मुझे भी गौ का स्वादिष्ठ दूध दो, मैं थोड़ा सा नहीं पिऊंगा, गरम-गरम ला वायु बोले पुत्र के वचन सुनकर उसकी तपस्विनी माता व्याघ्रपाद की स्त्री बड़ी दुःखी हुई आदर से पुत्र को आलिंगन करके लाड़लड़ाय अपने को निर्धन मानकर दुःख से विलाप करने लगी। इधर महाकान्तिमान् बालक उपमन्यु बारंबार दूध की याद करके बारंबार रोते हुए उससे दूध मांगने लगा। तपस्विनी द्विजस्त्री ने उसके हठ को जानकर उसकी शान्ति के लिए एक उपाय सोचा। जो बीच उञ्छवृत्ति से प्राप्त किये थे उनको देखकर और पीसकर, उस मनस्विनी ने उसमें जल मिलाया। 'बेटा आओ, ऐसा साम पूर्वक कहकर उसे आलिंगन करके दुःख बनावटी दूध दिया। वह बालक माता के दिये बनावटी दूध को पीकर व्याकुल होकर माता से बोला 'यह दूध नहीं है । 11-20।। तब वह देखकर पुत्र का सिर सूंघकर दुःखी होकर अपने हाथ से कमल समान नेत्रों के आंसू पोंछकर बोली। माता बोली - सब रत्नों से पूर्ण नदियाँ स्वर्ण-पाताल में सबको प्राप्त हैं, पर जो भाग्यहीन और शिवभक्ति रहित हैं, वे उन्हें नहीं देख पाते। राज्य, स्वर्ग, मोक्ष, दूध के भोजन वे प्राणी नहीं प्राप्त कर सकते, जिन पर शिवजी प्रसन्न नहीं हैं। ये सब शंकर जी की कृपा से मिलते हैं, अन्य देवताओं से नहीं, अन्य देवताओं के मन में लगाने वाले दुःख से व्याकुल होकर भटकते हैं। हम वनवासियों को दूग्ध कहाँ प्राप्त हो सकता है ? हे पुत्र ! कहाँ तो दूध के साधन और कहाँ हम वनवासी। सब प्रकार के अभाव होने से, दरिद्रता से मैं भाग्यहीन हूँ, जो कि मैंने जल में पिट्ठी डालकर तुझे असत्य दूध बनाकर दिया था। तूने मामा के घर में औटा हुआ थोड़ा दुग्ध पान किया था, इससे तुझे स्वाद विदित था, उसको स्मरण करके। 'मुझे दूध नहीं दिया' ऐसा कहकर रोता हुआ मुझे दुःखी करता है, बिना शिवजी की कृपा से तुझको दूध प्राप्ति न होगी। उन्हीं शिवजी के चरण कमल की पार्वती और गणों के सहित आराधना करो, जो उनको भक्ति से कुछ भी समर्पण किया जाय, वह सब सम्पत्तियों का कारण है। हमने धन देने वाले शिवजी को नहीं पूजा, वह कामना वालों को यथायोग्य फल देते हैं ।॥21-30 ॥ धन के उद्देश्य से हमने पहले शंकर जी को नहीं पूजा, इससे हम दरिद्री हुए और तुम्हें दूध नहीं मिल सका। हे पुत्र ! पूर्व जन्म शिवजी के उद्देश्य से या प्रभु विष्णु जी के उद्देश्य से जो दिया जाता है वही मिलता है। इस प्रकार माता का शोकादि का सूचक सत्य वचन सुनकर बालक होकर भी पश्चाताप करते हुए प्रगल्भता से बोला। उपमन्यु बोले- हे मातः ! शोक मत करो, यदि साम्बशिव हैं तो हे महाभागे शोक त्यागो, सब भला होगा। हे मातः ! मेरे वचन सुनो, यदि महादेव जी हैं, तो शीघ व देर में मैं उन्हें प्रसन्नः करके दूध का सागर ले आऊंगा, जो कि कभी घटेगा नहीं। वायु बोले- इस प्रकार उस महामति बालक के वचन सुनकर प्रसन्न होकर उसकी बुद्धिमती माता बोली- हे तात् ! मेरी प्रीति बढ़ाने वाली शुभ वार्ता तुमने विचारी, तू देर मत कर, साम्ब का भजन कर। 
परम करण शिवजी सबसे अधिक हैं, सारा जगत् उन्हीं का किया हुआ है, ब्रह्माजी आदि उनके दास हैं। उन्हीं की प्रसन्नता से ये सब ऐश्वर्य है, हम उन प्रभु के दोस्त हैं, उन लोक के कल्याण करने वाले शंकर जी के सिवाय अन्य को मैं नहीं जानती। अन्य देवताओं को छोड़कर मन, वचन, कर्म से उन्हीं शिवजी को झ पार्वती सहित, गणेश सहित परम प्रीति से भजन करना चाहिये ॥31-40 ॥ उन देवाधिदेव वरदायी, मंगलदायी शिव जी का 'ॐ नमः शिवाय' यही मन्त्र वाचक है। ॐकार सहित जो सात करोड़ मन्त्र हैं, वह इसी में लय होकर फिर इसी में से निकलते हैं। अपने अधिकारी अपेक्षा से सुप्रसाद सहित वे मन्त्र हैं, अर्थात् अधिकरियों के अनुसार पृथक-पृथक हैं, परन्तु यह मन्त्र ईश्वर की आज्ञा से सबके अधिकार का है। जिस प्रकार शिवजी सम्पूर्ण उत्कृष्ट और निकृष्ट आत्माओं की रक्षा करने में समर्थ होते हैं, उसी प्रकार यह मन्त्र हैं। यह मन्त्र सब दूसरे मन्त्रों से प्रबल है, यह सबकी रक्षा करने में समर्थ है, उससे परे फिर और इच्छा नहीं करनी चाहिये। इस कारण, हे पुत्र ! अन्य मन्त्रों को छोड़कर पंचाक्षर मन्त्र जपने में तत्पर हो। यह मन्त्र जिह्वा के अन्तर्गत होने से फिर कुछ दुर्लभ नहीं रहता। यह शैवों की रक्षा का हेतु परम दुर्लभ अघोरास्त्र है, वह इसी से उत्पन्न हुआ है, ऐसा जानकर उसमें तत्पर हो। तुम्हारे पिता के समीप में मैंने यह भस्म प्राप्त की है, जो विरजा अग्रि से उत्पन्न होने के कारण सिद्ध और महाआपत्ति को दूर करने वाली है, इसे लगाओ यह जो तुझे मैंने मन्त्र दिया है इसको मेरी आज्ञा से ग्रहण कर, इसी के जप करने से तुम्हारी 卐रक्षा होगी। इस प्रकार माता ने आज्ञा देकर 'शिवस्तु' (वेरा कल्याण) ऐसा उच्चारण करके विदा किया 卐 और मुनि उसकी आज्ञा सिर पर धारण करके ॥ 41-50 ॥ और प्रणाम करके तप करने के निमित्त चला 卐

गया, तब माता ने उसके, प्रति वचन कहे कि, 'देवता तेरा मंगल करें'। इस प्रकार माता की आज्ञा से उसने दुश्वर तप करना आरम्भ किया, हिमालय पर्वत पर प्राप्त होकर वायु भक्षण करता हुआ। आठ इष्टकाओं (ईटों) का स्थान बनाकर, मृत्तिका का लिंग निर्माण करके, वहाँ गण और पार्वती के सहित महादेवजी का अवाहन करके भक्ति पूर्वक पंचाक्षर मंत्र से ही वन के उत्पन्न हुए पत्र और पुष्पों से बहुत काल तक पूजा करता हुआ परम तप और आरम्भ किया। इस प्रकार शिवजी में मन लगाये कृश शरीर उपमन्यु ब्राह्मण श्रेष्ठ को अकेले तप करते हुए देखकर मरीचि ऋषि के शाप से पिशाचं पन को प्राप्त हुए कुछ मुनि राक्षस भाव से पीड़ित करके उसके तप में, विघ्न करने लगे। वह उनसे पीड़ित होकर भी किसी प्रकार से तप करते हुए और सदा' नमः शिवाय' इस प्रकार आर्तनाद के समान शब्द करने लगा। उस शब्द को श्रवण करके वह ब्राह्मण कुमार उपमन्यु के तप से चराचर, मुनि तथा जगत् प्रदीप्त हो गया ।॥51-59 ॥ वायु बोले- तब सब देवता प्रदीप्त अंग होकर बैकुण्ठ में नारायण के पास झट गये और प्रणाम करके सब हाल कहने लगे। उनके यह वचन सुनकर भगवान् पुरूषोत्तम यह क्या है? इस वार्ता को विचार कर और उसका कारण जान कर शिवजी को देखने की इच्छा से मन्दर पर्वत पर गये और देव को देखकर प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले। विष्णुजी बोले-हे भगवन् ! कोई उपमन्यु नामक ब्राह्मण दुग्ध पाने के निमित्त जगत् को दुग्ध करता है, तप करते हुए उसे आप निवारण करें। विष्णुजी के यह वचन सुनकर देव महेश्वरजी बोले-आप अपने स्थान को जाइये, मैं बालक का निवारण करूंगा। शिवजी के वचन सुनकर देववल्लभ विष्णुजी उन सब देवताओं का समाधान करके अपने लोक को गये। इसी अवसर पर देव देव 卐

शिवजी इन्द्र के रूप से उस स्थान में जाने की इच्छा करने लगे। तब शिवजी श्वेत हाथी पर चढ़कर उस ब्राह्मण के आश्रम में गये, इन्द्र वेष का धारण किया, सुर, असुर, सिद्ध, महोरग उनके साथ हुए। तब उस विभु के निमित्त बाल व्यंजन से वीजित किया गया और वाम हाथी में शची सहित सुरेन्द्र के ऊपर श्वेत छत्र धारण किया गया। उमा सहित इन्द्र रूपधारी शिवजी महाशोभित हुए और छत्र चन्द्रमण्डल से शोभित मन्दर मके समान शोभितः हुए ॥1-10 ॥ इस प्रकार ईशान इन्द्र रूपधारी शिवजी को देखकर महामुनियों में श्रेष्ठ उपमन्यु प्रणाम करके स्वयं बोले उपमन्यु बोले- हे देवेश्वर ! आपने स्वयं आकर मेरा आश्रम पवित्र किया, जो, आप जगत्पति देवताओं में श्रेष्ठ इन्द्र प्राप्त हुए हो। इस प्रकार कहकर उपस्थिति हुए ब्राह्मण को इन्द्र रूपधारी शिवजी मेघ गंभीर वाणी से बोल। हे सुव्रत! मैं तेरे इस तप से बहुत प्रसन्न हुआ हूँ, तू वर मांग, हे महामुने ! हे धौम्य के अग्रज ! मैं तेरे सब मनोरथ पूर्ण करूंगा। जब इस प्रकार शिव रूपी इन्द्र ने कहा, तब वह मुनिश्रेष्ठः 'शिवजी में भक्ति हो' यही हाथ जोड़कर बोला। यह सुनकर इन्द्र बोले-तुम नही जानते कि, मैं देवताओं का राजा हूँ, तीनो लोकों का अधिपति इन्द्र हूँ, सब देवता मुझको नमस्कार 'करते हैं। हे विप्रऋषि ! तू मेरा भक्त हो, सदा मेरी अर्चना कर, तेरा कल्याण हो, मैं ही तुझको सब कुछ दूंगा, निर्गुण रूद्र को त्याग दे। निर्गुण रूद्र से तेरा क्या कार्य बनेगा ? जो देवताओं की पंक्ति से बाहर होकर पिशाचपने को प्राप्त हुए हैं। वायु बोले-यह सुनकर पंचाक्षर मंत्र जपते हुए वह मुनि धर्म में विघ्न मानकर इन्द्र से बोले ॥11-20 ॥ उपमन्यु बोले- शिवनिन्दा में तत्पर आपने प्रसंग से महात्मा रूद्र का निर्गुणपन कथन किया। पर सब देवताओं के अधिपति रूद्र को तुम नहीं जानते हो, ब्रह्मा, विष्णु, महेश के भी उत्पादक वे, प्रकृति से परे हैं। जिनको ब्रह्मवादी सत्-असत्, व्यक्त रूप से कथन करते हैं तथा नित्य एक अनन्त कहते हैं, उन्हीं से वर माँगूंगा। हेतुवाद से रहित, सांख्य योग के अर्थ देने वाले परम रूप हैं, ऐसा जानकर जिनकी उपासना की जाती है, उन्ही से वर माँगूंगा। सब के कारण शिवजी से परे कोई तत्त्व नहीं है, ब्रह्मा, विष्णु, आदि देवताओं के निर्माताः गुण से वही विभु हैं। बहुत कहने से क्या है, यह बात मैंने भीली प्रकार से जान ली है कि, यदि शिवजी की निन्दा सुनी जाय तो जान लो कि, जन्मान्तर में पाप किये हैं। शिवजी की निन्दा, सुनते ही उसको तत्काल मारकर उसी समय अपना देह त्याग दे, तो वह शिवलोक को जाता है। हे सुराधम ! मेरी दूध की इच्छा यों ही रहे, मैं तुमको शिवास्त्र से मारकर अपने देह को त्यागकर इन्द्र को मारने को उद्यत हुए। घोर भस्म लेकर उसको अघोर अस्त्र से अभिमन्त्रित करके इन्द्र के उद्देश्य से मुनि बड़ा शब्द करके त्यागा। ॥ 21-30 ॥ और शिवजी के चरण कमलों को स्मरण करके अपना देह त्याग करने को उद्यत हुए तो भगदेवता के नेत्रहारी शिवजी ने सौम्यता से उस योगी की धारणा को निवारण किया और उस छोड़े हुए अघोरास्त्र को शिवजी की आज्ञा से शिवजी के प्रिय नन्दी ने ग्रहण किया। उसी समय परमेश्वर ने अपने स्वरूप में स्थित होकर उस उपमन्यु को अपना चन्द्रभाल रूप दिखाया। सहस्त्रों दूध के सागर, अमृत के सागर, दही, घी के सागर। फल भक्ष्य भोज्यों के सागर तथा पूओं के पर्वत प्रभु ने उस बालक को दिखाये। जब उसने शंकरजी को देवी के साथ वृष पर स्थित देखा कि जिनके चारों ओर गणेश्वर स्थित हैं और त्रिशूलादि से युक्त हैं। तब देवताओं की दुंदुभी बजी, फूलों की वर्षा हुई; विष्णु ब्रह्मा, इन्द्रादि देवताओं से सब दिशाएँ आच्छादित हो गई। इधर उपमन्यु भी आनन्द के सागर में मग्न होकर, भक्ति से नम्र होकर दण्ड के समान पृथ्वी पर गिर पड़ा। इसी अवसर में भगवान् शंकरजी ने 'यहाँ आओ, यहाँ आओं' कहकर हँसते हुए उसे बुलाकर, सिर सूंघकर अनेक वर दिये ॥31-40 ॥ शिवजी बोले- हे पुत्र ! तुम यथायोग्य भक्ष्य भोज्य अपने बांधवों सहित सदा भोगो, सदा सुखी रहों, दुःखों से रहित होकर मेरी भक्ति में तत्पर हो। हे महाभाग उपमन्यु ! यह पार्वती तुम्हारी माता हैं, मैंने तुमको पुत्र बनाकर क्षीरसागर दिया हैं मधु, दही, अन्न, घृत, भात, फल इनके सागर मैंने तुमको दिय। मालपुओं के पर्वत, भक्ष्य भोज्य सागर मैंने तुमको दिये, हे महामुने ! तुम इनको ग्रहण करो। तुम्हारे पित महादेव और माता जगदम्बा है, मैंने तुमको अमरत्व और निरन्तर का गाणपत्य दिया। अब तुम प्रसन्न प्र होकर जो-जो मन में हो सो-सो, वर मांगों, मैं प्रसन्न होकर दूंगा, इसमें विचार की आवश्यकता नहीं। वायु बोले-महादेवजी ने ऐसा कहकर अपने हाथों से उपमन्यु का आलिंगन करके उसका सिर सूंघकर 'यह तुम्हारा पुत्र है' यों कहकर देवी को निवेदन किया। देवी ने भी अपने कमल जैसे हाथों से प्रेम से कुमार के समान उसका सिर सूंघकर उसको अविनाशी कुमारत्व दिया। क्षीराब्धि भी सरकार रूप से स्वादुक्षीर हाथ में धारण किए, वह अविनाशी दूध पिण्डकार उसके हाथ में समर्पण किया (यह पिण्डकार दूध के सागर का सूक्ष्म सार था) योग, ऐश्वर्य, सदातुष्टि अविनाशिनी ब्रह्मविद्या, परम समृद्धि, सन्तुष्ट मन से उसको प्रदान की ॥41-50 ॥ फिर भी प्रसन्न हो शिवजी उसका तप तेज देखकर उपमन्यु मुनि को दिव्य वर देने लगे। व्रत पाशुपत ज्ञान व्रतयोग तत्त्व से देकर निरन्तर वक्तृत्व मुनिराज को दी। वह भी दिव्य वर देने लगे। व्रत पाशुपत ज्ञान व्रतयोग तत्त्व से देकर निरन्तर वक्तृत्व मुनिराज को दी। वह भी दिव्य वर और निरन्तर रहने वाला कुमारत्व प्राप्त करके उन और 'चतुरता भी शिवा-शिव से वर पाकर बड़े प्रसन्न 卐 हुए। तब प्रसन्न चित्त होकर, हाथ जोड़कर, प्रणाम करके महेश्वर देव देव से वर माँगने लगे। उपमन्यु 卐 बोले- हे देवदेवेश ! हे परमेश्वर ! प्रसन्न होकर अपनी अव्यभिचारिणी भक्ति मुझको दीजिए। हे 卐 महादेवजी। अपने सम्बन्धियों में मुझे श्रृद्धा दीजिये, अपने दासों में परम स्नेह और सदा उनकी समीपता卐 दीजिये। यह कहने के उपरान्त प्रसन्न मन होकर वह ब्राह्मण श्रेष्ठ उपमन्यु सहर्ष गद्द वाणी से महादेवजी को प्रसन्न करने लगे। उपमन्यु बोले हे देव देव महादेव ! हे शरणागत वत्सल ! हे करूणासागर ! 'हे साम्ब शंकर ! प्रसन्न हो। वायु बोले-सबको वर देने वाले महादेवजी ऐसा कहकर प्रसन्न मन होकर मुनिश्रेष्ठ उपमन्यु से बोले। शिवजी बोले-हे पुत्र ! मैं तुझसे प्रसन्न हूँ, मैंने तुझे सब दिया, तू मेरा दृढ़ भक्त है, यह मैंने जान लिया ॥51-60 ॥ तुम दुःख से रहित होकर अजर-अमर हो, महायशस्वी, तेज से युक्त, ज्ञान से युक्त हो। तुम्हारे बांधव और कुल तथा गोत्र सदा अक्षय रहेंगे हे द्विजश्रेष्ठ ! तुम्हारी मुझ में निरन्तर भक्ति होगी। हे द्विजोत्तम ! मैं तुम्हारे आश्रम में नित्य समीपता करूंगा, तुम मेरे समीर सदा आनन्द से विहार करोगे। कोटि सूर्य के समान कान्तिवाले भगवान् शिवजी यह कहरकर और उसको वर देकर अन्तर्धान हो गया। उपमन्यु भी प्रसन्न होकर उनसे वरदान पाकर महासुखी होकर अपनी माता के समीप गये ॥ 61-65 ।।

पशुपतिनाथ व्रत का उद्यापन

भगवन शंकर के लिए समर्पित पशुपत व्रत के चार सोमवार पूरे होने के बाद पांचवे सोमवार के व्रत में 卐श्रद्धानुसार 108 वस्तुएँ जैसे- मूँग, चावल, मखाने या विल्बपत्र आदि कोई सी भी सामग्री 108 की मात्रा में लेकर शाम को पाशुपत की पूजा के समय उनके चरणों में समर्पित कर दें और नारियल तथा 11 रुपये दक्षिणा चढ़ाऐं, हाथ जोड़कर भगवान शंकर से अपनी मनोकामना पूर्ण होरे की प्रार्थना करें। ऐसा कहा जाता है कि इस व्रत को करने से पाशुपति भगवान शंकर अत्यंत प्रसन्न होते हैं और पाँच व्रत पूरे होने से पहले ही भक्तों की मनोकामना पूरी कर देते हैं, अगर आप सच्चे मन से सही तरीके से इस व्रत को करते हैं तो जल्दी ही इस व्रत का परिणाम देखने को मिलता है।

आरती त्रिगुण शिवजी की

जय शिव आंकारा, हर हर शिव ओंकारा।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अद्धांगी धारा ॥ 
एकानन चतुरानन, पंचानन राजै । 
हंसासन गरुड़ासन, वृषवाहन साजै ॥ 
दो भुज चार चतुर्भुज, दसभुज अति सोहै। 
तीनों रुप निरखता, त्रिभुवन जन मोहै ॥ 
अक्षमाला वनमाला, मुण्डमाला धारी। 
चंदन मृग मद चंदा, भाले शुभकारी ॥ 
श्वेताम्बर पीताम्बर, बाघम्बर अंगे । 
सनकादिक ब्रह्मादिक, भूतादिक संगे ॥
करके मध्य कमण्डलु, चक्र त्रिशुलधर्ता । 
जग कर्ता जग हर्ता, जग पालन कर्ता ॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, जग पालन कर्ता।
प्रणवाक्षर में शोभित, ये तीनों एका ॥
त्रिगुण स्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे। 
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे ॥

आरती पशुपतिनाथ जी की

जय पशुपति नाथ हरे, जय पशुपति हरे। 
भक्त जनों के संकट क्षण में दूर करे ॥ 
अष्ट मुखी शिव नाम तिहारों शरण में आए तेरे। 
इच्छा फल प्रभु देहु कष्ट हटाओ मेरे ॥ 
शिवं न तट पर विराजे पूजां नर नारी। 
निशिदिन तुमको ध्यावे भक्तन हितकारी ॥ 
तुम हो जग के स्वामी, अन-धन के भरता । 
अष्टमुखी त्रिपुरारी, तुम जब तम के हर्ता ॥ 
तन मन धन अर्पण आरती भोले जी की। 
तुम हो दया के सागर द्वार तुम्हारे खड़े ॥ 
जय पशुपति नाथ हरे, जय पशुपति नाथ हरे। 
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे ॥ 
जय पशुपति नाथ-हरे, जय पशुपति नाथ हरे।


श्रीपशुपत्याष्टकम्

ध्यानम्

ध्यायेत्रित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रवतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वजाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्। समन्तात्स्तुतममरगणैव्यधिकृतिं वसानं विश्वाद्यं विश्वीजं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेतम् ।।

स्तोत्रम्
पद्मासीनं पाशुपतिं द्युपतिं धरणपतिं भुजगलोपतिं च सतीपतिम्। प्रणतः भक्त-जनातिंहरं परं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥१ ॥ 
न जनको जननी न च सोदरो न तनयो न च भूरिबलं कुलम्। अवति कोऽपि न कालवशं गतं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥२ ॥ 
मुरजडिण्डिमवाद्यविलक्षणं मधुरपंचमनादविशारदम् । प्रमथभूतगणैरपि सेवितं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥३॥ 
शरणदें सुखदं शरणान्वितं शिव शिवेति शिवेति नतं नृणाम्। अभयदं करुणावरुणालयं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥४ ॥ 
नरशिरोरचितं कुण्डलं भुजंगहारमुदं वृषभध्वजम्। चितिरजोधवलीकृतविग्रहं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥५ ॥ 
मखविनाशकरं शशिशेर सततमध्वरभाजि फलप्रदम् । प्रलयदग्ध-सुरासुर-मानवं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥६ ॥ मदमपास्य चिरं हदि संस्थितं मरणजन्मजराभयपीड़ितम्। 
जगदुदीक्ष्य समीपभयाकुलं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥७॥ हरिविरञ्विसुराधिपपूजितं यम, जनेश धनेश नमस्कृतम्। त्रिनयनं भुवनत्रितयाधिपं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥८॥ 
पशुपतेरिदमष्टकमभुत विरचिंत पृथिवीपतिसूरणा। पठति संशृणुते मनुजः सदा शिवपुरीं वसते लभते मुदम् ॥९॥

॥ इति श्री पृथि्वी पति सूरिविर चिंत श्री पशुपत्यष्टकं सम्पूर्ण ॥


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