11001. शिव शंकर (पुस्तक)

1. शिव के बारे में 

शिव शंकर को जिसने पूजा, उसका ही उद्धार हुआ ।
अंत काल को भवसागर में,  उसका बेडा पार हुआ ॥


भजन किसने नहीं सुना होगा। 

शिव या महादेव भारतीय संस्कृति जो आगे चल कर सनातन शिव धर्म नाम से जानी गई है के सबसे महत्वपूर्ण देवताओं में है। इन्हें अन्य देवों से बढ़कर माना जाने के कारण देवों के देव महादेव कहा जाता है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं।

भगवान शिव ही केवल ऐसे देव हैं जो सर्वपूज्य हैं। चाहे वो देवता हो, चाहे दानव, राक्षस, दैत्य, नाग, किन्नर, गन्धर्व, मनुष्य या कोई भी अन्य जाति, महादेव की कृपादृष्टि समान रूप से सभी पर रहती है। यही कारण है कि वे समस्त जगत में समान रूप से पूज्य हैं। 

शिव जी को संहार का देवता कहा जाता है। शिव जी अपने सौम्यता आकृति एवं रौद्रता दोनों के लिए विख्यात हैं। त्रिदेवों में भगवान शिव संहार के देवता माने गए हैं।

शिव अनादि हैं और सृष्टि प्रक्रिया के आदि स्रोत हैं और यह काल महाकाल ही ज्योतिषशास्त्र के आधार हैं। शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे हमेशा लय एवं प्रलय दोनों को अपने अधीन किए हुए हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो लय अर्थात सृष्टि का प्रारम्भ इन्हीं से होता है और पहले के समय इन्हीं में समाहित हो जाता है। शिवपुराण के अनुसार जब कुछ नहीं था तब भी शिव थे जब कुछ न होगा तब भी शिव ही होंगे। अतः शिव अनादि है सम्पूर्ण ब्रह्मांड शिव के अंदर समाया हुआ है। शिव को महाकाल अर्थात समय कहा जाता है।

वेद में भोले नाथ को रुद्र तथा तंत्र साधना में इन्हे भैरव के नाम से भी जाना जाता है। उनकी पूजा शिवलिंग तथा मूर्ति दोनों रूपों में की जाती है। भगवान शिव को भोलेनाथ, शंकर, महेश, शिव शम्भु, महादेव, रुद्र और नीलकंठ के नाम से भी जाना जाता है।

शैव मत के अनुसार शिव की पूजा शिवलिंग (Shivling) तथा मूर्ति दोनों रूपों में की जाती है। शिव का पूजन समस्त सुख देने वाला माना गया है। इस सम्पूर्ण सृष्टि में भगवान भोले शंकर ही सबसे आसानी से प्रसन्न होने वाले देवता कहे गए है।
भगवान शिव (Bhagwaan Shiv) के गले में नाग देवता लिपटे रहते हैं और उन्होंने अपने हाथों में डमरू और त्रिशूल को धारण किया हुआ हैं। भगवान शिव (Bhagwaan Shiv) कैलाश पर्वत में निवास करते है। भगवान शिव (Bhagwaan Shiv) को संहार का देवता कहा जाता है। भगवान शिव ही ज्योतिषशास्त्र के जनक, इसके आधार हैं।

इन्हें भोलेनाथ, शंकर, महेश, भीलपती, भीलेश्वर, रुद्र, नीलकंठ, गंगाधार आदि नामों से भी जाना जाता है। 

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2. भगवान शिव के मन्त्र

शिव उपासना में पंचाक्षर 
'नम: शिवाय' 

षडाक्षर मंत्र 
'ॐ नम: शिवाय' 

द्वादश अक्षर मंत्र 
'श्री शिवाय नमसभ्यं' 

शिव का महामृत्युंजय मंत्र तो विशेष प्रसिद्ध है।
'ॐ हौं जूं सः ॐ भुर्भवः स्वः ॐ र्य्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । ऊर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ भुवः भूः स्वः ॐ सः जूं हीं ॐ।'

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शिव लिंगम" वाक्यांश दो संस्कृत शब्दों - शिव और लिंगम से बना है। शिव शब्द भगवान शिव को दर्शाता है और लिंगम शब्द "प्रतीक" को दर्शाता है।

अतः शिव लिंगम शब्द का अर्थ है "भगवान शिव का प्रतीक"।

दरअसल संस्कृत शब्द - लिंगम के दो अर्थ हैं - लिंग और प्रतीक। शिव लिंगम में लिंगम का अर्थ प्रतीक होता है।

शिव लिंग का अर्थ है "शिव का प्रकट प्रतीक"

“शिव शक्तोश्च चेह्नस्य मेलनम्

लिंगमुच्यते”

एक इकाई के रूप में एकीकृत शिव और शक्ति का प्रकट प्रतीक शिव लिंग है।

शिव लिंग के भाग:

शिव लिंग के दो भाग हैं:

1. लिंग : लिंग का ऊपरी भाग परब्रह्म का सूचक है।

2 . पीठिका (पानपट्टम)

पीठिका को वेदिका (मंच), पानापट्टम भी कहा जाता है। पीठिका शिव लिंग का निचला भाग पराशक्ति का सूचक है।

अगोचर को शिव लिंग कहा जाता है। सत्त्व, रज, तमो गुण शिवलिंग से उत्पन्न होते हैं और पुनः उसी में विलीन हो जाते हैं। जिसका आदि और अंत नहीं, वह शिव लिंग ही जगत् का कारण है ।

शास्त्र कहते हैं कि इस संसार में शिव लिंग की पूजा से बढ़कर कोई पूजा नहीं है।

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शिव अपने माथे पर राख या विभूति की 3 क्षैतिज रेखाएँ लगाते हैं।

ये तीन रेखाएं दर्शाती हैं

  • 3 गुण अर्थात् रजस, तमस और सत्व।
  • शिव तीन आंखों वाले भगवान (त्रिनेत्र) हैं।
  • शिव त्रिकालदर्शी हैं (जो भूत, वर्तमान और भविष्य को जानते हैं)।
  • तीन कर्म, अर्थात् संचित, प्रारब्ध और अगामी। इससे पता चलता है कि शिव तीन कर्मों से परे हैं। और जो भक्त शिव की सच्ची प्रार्थना करते हैं, उन्हें भी तीन कर्मों से छुटकारा मिल जाएगा, और इस प्रकार मोक्ष / मुक्ति प्राप्त होगी।

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3. शिवलिंग पर विभिन्न देवों के स्थान

भगवान शिव के निराकार स्वरूप रुपी गोल पिंडी को शिवलिंग कहते हैं। यह शिवलिंग जिस आकृति पर रखा होता है उसे अर्धा या फिर जलहरी कहते हैं। यह जलहरी माता पार्वती का हस्तकमल माना जाता है।
जलहरी के गोलाकार से आगे संकरे भाग पर दाईं ओर भगवान गणेश जी का स्थान माना गया है। इसके बाद बाईं ओर भगवान कार्तिकेय का स्थान माना गया है। इसके बाद जलहरी के बीचों बीच जहां से जल आगे जाता है, उसमें एक सर्प की आकृति बनी होती है। यह भगवान शिव की पुत्री अशोक सुंदरी है अतः यह उनकी पुत्री अशोक सुंदरी का स्थान माना जाता है।
अशोक सुंदरी के मुख से लेकर शिवलिंग के बीच में 64 योगिनियों का वास तथा जलहरी में अशोक सुंदरी के दोनों और के स्थान में 33 कोटि देवों का वास होता है।
शिवलिंग के नीचे बनी एक और सर्प की आकृती है जिसे वीरभद्र कहा जाता है। उनके गले में पड़े हए सर्प को वासुकी कहा जाता है।
कभी कभी जलहरी के ऊपर कलश टंगा होता है, तो उस कलश में भगवान शिव की पांच पुत्रियां जया, विषहरा, शामलीवारी, दोतली और देव नमक पांच पुत्रियों का वास माना जाता है।

इस प्रकार मात्र एक शिवलिंग की पूजा अर्चना करने पर समस्त देवों की पूजा अर्चना का फल प्राप्त हो जाता है।

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4. शिवलिंग पर जल चढ़ाने की विधि

शिवलिंग पर कैसे चढ़ाया जाता है जल, जानें सही विधि एवं नियम
भगवान शिव को कल्याण करने वाले और सबसे सरल देव माने जाते है। ऐसी मान्यता है कि इनकी पूजा से साधक के सभी दुख पलक झपकते दूर हो जाते हैं। इसी कारण सोमवार का दिन, शिव पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ और बेहद शुभ माना गया है। परंतु शिवलिंग की पूजा करने से पहले साधक को तन और मन से पवित्र हो जाना चाहिए। 

भगवान की शिव की पूजा बहुत सरल और शीघ्र फलदायी मानी गई है, यदि कोई साधक तन और मन से पवित्र होकर किसी भी दिन किसी भी शिवालय में जाकर भगवान शिव के निराकार स्वरूप यानि शिवलिंग की विधि-विधान से या फिर विधि-विधान जाने बिना भी पूजा करता है तो उस पर देवों के देव महादेव की पूरी कृपा बरसती है। 

भगवान शिव सिर्फ जल और बेलपत्र को चढ़ाने मात्र से प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान शिव को गंगा जल बहुत ज्यादा प्रिय है, जिससे शिवलिंग का अभिषेक करने पर साधक को मनचाहा आशीर्वाद वर देते हैं। यदि आपके पास गंगाजल नहीं हो तो कोई बात नहीं। यदि एक लौटा जल में थोड़ा सा गंगाजल मिला दिया जाए तो वह सारा जल गंगाजल हो जाएगा। 
यदि वह भी नहीं है तो भी शंकर जी इतने भोले हैं कि चढ़ने वाले के भागोंको जानकर ऊपर चढ़े हुए जल को गंगाजल मानकर स्वीकार कर लेते हैं।

ध्यान रहे कि इसे हमेशा तांबे या किसी उत्कृष्ट धातु के लोटे से ही चढ़ाया जाता है। कभी भूलकर कर भी जल को प्लास्टिक के बर्तन से न चढ़ाएं।
शिवलिंग पर जल चढ़ाने का एक कम है। इसी क्रम की जानकारी हम यहां दे रहे हैं। ★ हमेशा दक्षिण दिशा में खड़े होकर उत्तर दिशा की ओर मुंह करके जल चढ़ाएं। लोटे में जल लेकर सबसे पहले ★ जलहरी के दाईं ओर अर्थात भगवान गणेश जी के स्थान जल चढ़ाएं, इसके बाद ★ बाईं ओर अर्थात भगवान कार्तिकेय के स्थान जल चढ़ाएं।
इसके बाद जलहरी के बीचों बीच स्थित ★ अशोक सुंदरी पर जल चढ़ाया जाता है। इसके बाद माता ★ पार्वती के स्थान अर्थात जलहरी के पीछे जल चढ़ाया जाता है। अब ★ अशोक सुंदरी के मुख के स्थान से शुरू करके दक्षिणावर्त अर्थात घड़ी की सुई के घूमने की दिशा में जलहरी के गोलाकार हिस्से में जल चढ़ाएं।
यदि शिवलिंग के ऊपर ★ कलश टंगा है तो उसमें भी थोड़ा जल डालें। सबसे आखिरी में फिर ★ नंदीश्वर जी पर फिर ★ शिवलिंग पर धीमे-धीमे जल चढ़ाएं। भगवान शिव को कभी भी तेज धार से जल नहीं चढ़ाया जाता है। शिवलिंग पर हमेशा जल उतनी ऊँचाई से चढ़ाएँ जितनी ऊँचाई से खुद पर या किसी अन्य पर छींटे ना आयें।
(भगवान शिव पर अर्पित किए हुआ जल जहां जलहरी से गिरता है। वहां कोई छोटा पात्र अर्थात बर्तन लगाकर उसे एकत्रित कर ले। यह जल अभिषेक के उपरांत बहुत ताकतवर हो जाता है। इसे घर ले जाकर अपने संपूर्ण घर में छींट देना है तथा अपने बच्चों को प्रसादरूप में वितरित करना है।)
पूजा के उपरांत घर की ओर प्रस्थान करते समय ★ मंदिर की चौखट पर दो बूंद जल चढ़ाएं और फिर मंदिर से आयें। 

अपनी इच्छा पूर्ति के लिए जल के चढ़ने के भी अलग-अलग तरीके हैं जिन्हें हम उपाय नामक अन्य पुस्तक में वर्णित करेंगे।

हिंदू मान्यता के अनुसार शिवलिंग पर कभी भी खड़े होकर जल नहीं चढ़ाना चाहिए। शिवलिंग पर हमेशा बैठकर और धीमे-धीमे जल चढ़ाना शुभ माना गया है। यदि बैठकर जलाभिषेक करना संभव नहीं हो तो आप खड़े होकर भी जलाभिषेक कर सकते हैं।

पौराणिक मान्यता के अनुसार शिवलिंग की जलहरी पर कभी भी पूजा का सामान नहीं रखना चाहिए। यदि आप फल मिष्ठान आदि चढ़ाते हैं तो उसे भगवान भोलेनाथ को स्पर्श कराकर जलहरी से नीचे एक दोने या बर्तन में रख दें। क्योंकि माता के हस्तकमल बहुत कोमल है इन पर बाहर नहीं रखना चाहिए।

वह स्थान जहां से जलहरी से जल गिरकर एक नाली के द्वारा बाहर निकलता है। उस स्थान को अर्थात उस नाली को कभी लांघा या कूदा नहीं जाता। इसी कारण भगवान भोलेनाथ की आधी ही परिक्रमा की जाती है। इस मान्यता के अनुसार हमें शिवलिंग की हमेशा आधी ही परिक्रमा करनी चाहिए।
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5. एकादश रुद्र कौन हैं?

इन ग्यारह रुद्रों के नाम हैंः कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, अहिर्बुध्न्य, शंभु, चंड और भव। ये एकादश रुद्र सुरभी के पुत्र कहलाते हैं। ये सुख के अवास स्थान हैं तथा देवताओं की कार्य सिद्धि के लिए शिव रूप में उत्पन्न हुए हैं।

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6. शिव परिवार
भगवान शिव के माता पिता : शिवपुराण के अनुसार भगवान सदाशिव और पराशक्ति अम्बिका दुर्गा (जो पार्वती या सती नहीं हैं।) से ही भगवान शंकर से ही त्रिदेवों में मुख्य दो देव (विष्णु और ब्रह्मा) और त्रिदेवियों में मुख्य दो देवियों (महालक्ष्मी और महासरस्वती) की उत्पत्ति काशी क्षेत्र में मानी गई है। 
सदाशिव स्वयं शिव के रूप में तथा पराशक्ति, शक्ति की देवी कालरूप शिव की अर्धांगिनी के रूप मे उत्पन्न हुई है। 

पत्नियां : भगवान शिव की अनेक पत्नियां हुई हैं। शिव की पहली पत्नी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया। भगवान शिव वैसे तो एक पत्नीव्रता हैं और अन्य देवियों से उनका कोई विधिवत विवाह नहीं हुआ लेकिन पुराण कथाओं के के अनुसार उक्त सभी देवियां उन्हें पतिरूप में मानती थीं। इसीलिए उन्होंने इच्छापूर्ति के लिए कुछ समय के लिए उन्हें अपनी अर्धांगिनी स्वीकार किया है।
स्कंद पुराण के अनुसार, देवी गंगा कार्तिकेय (मुरुगन) की सौतेली माता हैं। यह भी कहा जाता हैं कि यह सभी पार्वती के अंश रूप ही हैं।

शिव की पुत्रियां

शिव परिवार के प्रमुख हैं। उनकी पत्नी माता पार्वती हैं। इन दोनों की एक पुत्री और दो पुत्र हैं। मुख्य रूप से उनकी तीन संताने ही है - पुत्री अशोकसुन्दरी पुत्र कार्तिकेय एवं गणेश। 

हालाँकि कई और लोगों को महादेव के पुत्र एवं पुत्री होने का गौरव प्राप्त है। 

श‍िव की पुत्र‍ियों के नाम हैं – अशोक सुंदरी, ज्‍योति या मां ज्‍वालामुखी और देवी वासुकी या मनसा। इसके साथ ही शिव की जया, विषहरा, शामलीवारी, दोतली और देव नमक पांच और पुत्रियों का भी वर्णन मिलता है।

1. अशोक सुंदरी

एक कथा के अनुसार माता पार्वती अपनेको हमेशा अकेला महसूस करती थीं। वह एक पुत्री का साथ चाहती थीं। एक बार देवी पार्वती भगवान शिव के साथ स्वर्ग गई तो शोक दूर करने वाले वृक्ष अशोक नमक वृक्ष से देवी पार्वती ने अपना अकेलापन दूर करने के लिए एक पुत्री को प्राप्त किया था।  मान्यता है कि देवी पार्वती के समान ही अशोक से प्राप्त होने वाली कन्या बहुत ही सुंदर और रूपवान थी। इसलिए उनको अशोक सुंदरी के नाम से पुकारा गया। अशोक सुंदरी को देवकन्या के नाम से भी जाना जाता है। इनका विवाह राजा नहुष से हुआ था। माता पार्वती के वरदान से अशोक सुंदरी ययाति जैसे वीर पुत्र तथा सौ रूपवती कन्याओं की माता बनीं।

2. ज्योति या मां ज्वालामुखी 

एक स्थान पर वर्णन मिलता है कि ज्‍योति या मां ज्वालामुखी का जन्‍म भगवान शिव के तेज से हुआ था। इस प्रकार ये उनके प्रभामंडल का स्‍वरूप हैं। 

दूसरे वर्णन के अनुसार ज्‍योति का जन्‍म मां पार्वती के माथे से निकले तेज से हुआ था। तेजोमयी देवी ज्‍योत‍ि का दूसरा नाम ज्‍वालामुखी भी है और तमिलनाडु कई मंद‍िरों में उनकी पूजा होती है।

3. मनसा देवी या वासुकी

मनसा देवी या वासुकी का जन्‍म भी कार्तिकेय की तरह पार्वती के गर्भ से नहीं हुआ था। पिता, सौतेली मां और पति द्वारा उपेक्ष‍ित होने की वजह से उनका स्‍वभाव काफी गुस्‍से वाला माना जाता है। आमतौर पर उनकी पूजा बिना किसी प्रतिमा या तस्‍वीर के होती है। इसकी जगह पर पेड़ की कोई डाल, मिट्टी का घड़ा या फ‍िर मिट्टी का सांप बनाकर पूजा होती है। 

सांप के काटने से बचाने के लिए उनकी पूजा होती है। मान्यता है कि सर्पदंश यानी सांप के काटे जाने का इलाज मनसा देवी के पास होता है। 

बंगाल की लोककथाओं के अनुसार इनका जन्‍म जब श‍िव जी का तेज (जो या वीर्य), सांपों की मां कद्रु द्वारा बनाए एक पुतले को छू गया था। उसी से मनसा का जन्म हुआ। इसलिए उनको श‍िव पुत्री माना गया है । जैसा कि हम पहले भी कह चुके हैं कि मनसा का जन्‍म भी कार्तिकेय की तरह पार्वती के गर्भ से नहीं हुआ था। बंगाल के कई मंद‍िरों में उनका व‍िध‍िवत पूजन किया जाता है।

शिव के पुत्र

भगवान शिव के प्रमुख 8 पुत्र बताए गए हैं- गणेश, कार्तिकेय, सुकेश, जलंधर, अयप्पा, भूमा, अंधक, खूजा (मंगलदेव)। सभी के जन्म की कथा रोचक है।

1. श्री गणेश जी

श्री गणेश जी भगवान शिव के छोटे पुत्र हैं। पार्वती जी ने इनका जन्म दिया है। इनका मुख हाथी का है इसलिए इन्हें गजमुख के नाम से भी जाना जाता है। ग्रंथों में इन्हें बुद्धि के देवता और विघ्नहर्ता अर्थात समस्त विघ्नों को दूर करने वाला कहा गया है। श्री गणेश जी देवताओं में सर्वप्रथम पूजे जाते है। इस कारण किसी भी शुभ कार्य से पहले इनका पूजन अवश्य ही किया जाता है तभी पूजा का फल मिलता है। इनके पूजन से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। 

गणेश जी का परिवार 

प्रजापति विश्वरूप की पुत्रियां रिद्धि और सिद्धि (या सिद्धि और बुद्धि) भगवान श्रीगणेश की पत्नियां हैं । शास्त्रो के अनुसार सिद्धि समस्त कार्यों में, मनोरथों में मनवाँछित सफलता देती है। वहीँ रिद्धि अर्थात बुद्धि मनुष्य को ज्ञान, विवेक प्रदान करती हैं।

भगवान शिव के दो पौत्र, अर्थात भगवान गणेश के दो पुत्र क्षेम (शुभ) और लाभ है । ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, क्षेम (शुभ) देव हमारे द्वारा अर्जित पुण्य, धन-संपत्ति, हमारे ज्ञान और मान सम्मान को सुरक्षित रखते हैं। दूसरे शब्दों में क्षेम (शुभ) देव हमारे परिश्रम से अर्जित की गई हर वस्तु को सुरक्षित रखते हैं, उसे बढ़ाते हैं, कम नहीं होने देते है,

वही दूसरी ओर लाभ देव उसमे निरंतर वृद्धि करते है। हमें शुभ लाभ देते है। लाभ देव हमारी सुख – समृद्धि, हमारे ज्ञान, हमारे यश को लगातार बढ़ाते है ।

2. कार्तिकेय

इनके पुत्र भगवान कार्तिकेय साहस के अवतार पराक्रम अवतार और शक्ति प्रदान करते हैं। ये भगवान शिव के बड़े पुत्र हैं। कार्तिकेय के पास देवताओं के सेनापति का पद है। कम आयु में ही अपने अदम्य साहस के बल पर उन्होंने तारकासुर का विनाश किया था। इसलिए आत्मविश्वास और आत्मबल की प्राप्ति कार्तिकेय से होती है। 

शिवपुराण के अनुसार, कार्तिकेय ब्रह्मचारी हैं, वहीं ब्रह्मवैवर्त पुराण में इनकी पत्नी का नाम देवसेना बताया गया है।

अन्य रिश्ते : ब्रह्मा के एक पुत्र का नाम दक्ष प्रजापति था। इनकी कई पुत्रियां थीं। इनकी एक पुत्री सती का विवाह भगवान शंकर से हुआ और दूसरी पुत्री ख्याति का विवाह ऋषि भृगु से हुआ। मतलब यह कि भगवान शंकर और ऋषि भृगु आपस में साढू भाई हुए। ख्याति से भृगु को दो पुत्र दाता और विधाता मिले और एक बेटी श्री लक्ष्मी का जन्म हुआ। श्री लक्ष्मी का विवाह उन्होंने भगवान श्री हरि विष्णु से कर दिया था। 

सहचर और सहारियां 

भगवान शिव का परिवार बहुत बड़ा है। एकादश रुद्राणियाँ, चौंसठ योगिनियाँ तथा भैरवादि इनके सहचर और सहचरी हैं।

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7. शिव के नंदी आदि गण 
1. नंदी , 2.भृंगी, 3. रिटी, 4. टुंडी, 5. श्रृंगी, 6. नन्दिकेश्वर, 7. बेताल, 8. पिशाच, 9. तोतला और 10. भूतनाथ

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8. शिव की अष्टमूर्ति
1.  पृथ्वीमूर्ति - शर्व, 2. जलमूर्ति - भव, 3. तेजमूर्ति - रूद्र, 4. वायुमूर्ति - उग्र, 5. आकाशमूर्ति - भीम, 6. अग्निमूर्ति - पशुपति, 7. सूर्यमूर्ति - ईशान, 8. चन्द्रमूर्ति - महादेव

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9. शिव परिवार और उनके वाहन 

शिव में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। शिव के मस्तक पर एक ओर पुरुष रुपी चंद्र है, तो दूसरी ओर स्त्री रूप गंगा। एक ओर महाविषधर सर्प उनके गले का हार है, तो दूसरी ओर जहरीले बिच्छू भी उनके कानों की शोभा बढ़ाते है। 

वे अर्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं। गृहस्थ होते हुए भी वीतरागी और श्मशानवासी हैं। वे सौम्य और आशुतोष होते हुए भी भयंकर रुद्र हैं। 

शिव परिवार भी इससे अछूता नहीं हैं। 

उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी (बैल)-सिंह, सर्प–मयूर–मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है। 

शिव परिवार के सभी सदस्य एक प्रकार से परस्पर एक दूसरे के विरोधी प्रकृति के हैं, किन्तु फिर भी वे सभी एक ही स्थान पर मिल-जुल कर सुख पूर्वक रहते हैं। यही इस परिवार की सबसे अद्भुत बात है।

महादेव का वाहन है बैल (नंदी), माता पार्वती का वाहन है सिंह, माता त्रिपुर बालासुन्दरी के रूप में अशोकसुन्दरी का वाहन भी नंदी ही है। कार्तिकेय का वहां मयूर (मोर) है और गणपति का वाहन मूषक (चूहा) है। इसके अतिरिक्त नागराज वासुकि भी महादेव के परिवार के अभिन्न अंग हैं। ये सभी जीव एक-दूसरे के शत्रु हैं। नाग यानी सांप चूहे को खाता है; मोर, सांप को खा जाता है, शेर नंदी बैल का शिकार करता है। फिर भी सभी एक साथ परस्पर प्रेम से रहते हैं। शिव जी का परिवार जीवन को सुखी बनाने का सूत्र बताता है।

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10. शिवरात्रि

“शिवरात्रि” का अर्थ है “भगवान शिव की महान रात्रि,” प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी शिवरात्रि कहलाती है, लेकिन फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रि कही गई है। चंद्रमाह की 14वीं रात – अमावस्या से पहले की रात – महीने की सबसे अंधेरी रात होती है। इस रात, ग्रह का उत्तरी गोलार्द्ध इस प्रकार अवस्थित होता है कि मनुष्य भीतर ऊर्जा का प्राकृतिक रूप से ऊपर की और जाती है। 

उसे शिवरात्रि कहा जाता है।जहां द्वादश राशियां, द्वादश मास व द्वादश शिवरात्रियां तो द्वादश ज्योतिर्लिगों की आराधना या दर्शन मात्र सकारात्मक फलदायिनी हो जाता है।

इस दिन शिवोपासना भुक्ति एवं मुक्ति दोनों प्रदान करती है, क्योंकि इसी दिन ब्रह्मा, विष्णु ने शिवलिंग की पूजा सृष्टि में पहली बार की थी। इस दिन सृष्टि का आरम्भ अग्निलिंग (जो महादेव का विशालकाय स्वरूप है) के उदय से हुआ। 

श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि के ही दिन भगवान शिव और माता पार्वती की शादि हुई थी। इसलिए भगवान शिव ने इस दिन को वरदान दिया था और यह दिन भगवान शिव का बहुत ही प्रिय दिन है। महाशिवरात्रि का।

माघकृष्ण चतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि। ॥ शिवलिंगतयोद्रूत: कोटिसूर्यसमप्रभ॥

भगवान शिव अर्धरात्रि में शिवलिंग रूप में प्रकट हुए थे, इसलिए शिवरात्रि व्रत में अर्धरात्रि में रहने वाली चतुर्दशी ग्रहण करनी चाहिए। कुछ विद्वान प्रदोष व्यापिनी त्रयोदशी विद्धा चतुर्दशी शिवरात्रि व्रत में ग्रहण करते हैं। 

नारद संहिता के  अनुसार जिस तिथि को अर्धरात्रि में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी हो, उस दिन शिवरात्रि करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। जिस दिन प्रदोष व अर्धरात्रि में चतुर्दशी हो, वह अति पुण्यदायिनी कही गई है।

इस दिन ज्योतिर्लिग का प्रादुर्भाव हुआ, जिस कारण शक्तिस्वरूपा पार्वती ने मानवी सृष्टि का मार्ग प्रशस्त किया। 

फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि मनाने के पीछे कारण है कि इस दिन क्षीण चंद्रमा के माध्यम से पृथ्वी पर अलौकिक लयात्मक शक्तियां आती हैं, जो जीवनीशक्ति में वृद्धि करती हैं। पूरी रात मनाए जाने वाले इस उत्सव में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि ऊर्जाओं के प्राकृतिक प्रवाह को उमड़ने का पूरा अवसर मिले – आप अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखते हुए – निरंतर जागते रहते हैं।

इस तिथि को पूरे दिन व्रत रखते हैं। वे भगवान शिव को फूल, बेलपत्र, और फल भी अर्पण करते हैं। 

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11. महाशिवरात्रि

महाशिवरात्रि फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। माता पार्वती की पति रूप के महादेव शिव को पाने के लिये की गई तपस्या का फल महाशिवरात्रि है। 

यह शिव और शक्ति की मिलन की रात है। आध्यात्मिक रूप से इसे प्रकृति और पुरुष के मिलन की रात के रूप में बताया जाता है। इसी दिन माता पार्वती और शिव विवाह के पवित्र सूत्र में बंधे। शादी में जिन 7 वचनों का वादा वर-वधु आपस में करते है। उसका कारण शिव पार्वती विवाह है। महादेव शिव का जन्म उलेखन कुछ ही ग्रंथों में मिलता है। परंतु शिव अजन्मा है उनका जन्म या अवतार नहीं हुआ। महाशिवरात्रि पर्व भारत वर्ष में काफी धूम-धाम से मनाया जाता है।

यह केवल एक नींद से जागते रहने की रात भर न रह जाए, यह आपके लिए जागरण की रात्रि होनी चाहिए, चेतना व जागरूकता से भरी एक रात!

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मासिक शिवरात्रि पूजा विधि
★ मासिक शिवरात्रि के दिन प्रातः जल्दी उठकर नित्य क्रिया से निवृत्त होकर स्नानादि करें। 
★ इस समय यदि मंदिर नहीं जा सकते तो घर पर रहकर ही पूजा करें।
★ सबसे पहले शिव जी के समक्ष पूजा स्थान में दीप प्रज्वलित करें। 
★ यदि  घर शिवलिंग है तो दूध, और गंगाजल आदि से अभिषेक करें। 
★ शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा आदि अवश्य अर्पित करें। 
★ इस दिन भगवान शिव के साथ माता पार्वती की पूजा भी करनी चाहिए। 
★ पूजा करते समय नम: शिवाय मंत्र का उच्चारण करते रहें। 
★ भगवान शिव को भोग लगाएं और आरती करें।

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12. भगवान शिव के शृंगार के रहस्य

पुराण के अनुसार भगवान शिव महाकल्याणकारी हैं। तैतीस कोटि देवी-देवताओं में शिव ही ऐसे हैं जिनकी लिंग के रूप में पूजा होती है और जिन्हें उनके भक्त फक्कड़ बाबा के रूप में भी जानते हैं। भगवान शिव का नाम आते ही मन में एक वैरागी पुरुष की छवि उभरकर आती है। बैरागी भी ऐसा जो न जाने किन-किन चीजों से अपना श्रृंगार करता है। उन्होंने बड़ी ही विचित्र चीजों को अपने शृंगार के रूप में धारण किया हुआ हैं।

भगवान भोलेनाथ के शृंगार प्रतीकों में अनेक रहस्यों छिपे हुए हैं। वे क्या है ? पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शिव जी के शरीर पर मौजूद हर एक प्रतीक का एक विशेष महत्त्व और प्रभाव है। आइए जानते हैं इसके पीछे का सत्य और महत्त्व क्या है।

तीसरी आंख : भगवान शिव को "त्र्यंबकम" (संस्कृत: त्र्यंबकम्) अर्थात तीन नेत्र वाला कहा जाता है। शास्त्रीय संस्कृत में, 'त्र' शब्द का अर्थ "तीन" और 'अंबक' शब्द का अर्थ "एक आंख" है। इस प्रकार भगवान शिव को तीन वाला कहा गया है। इसी लिए इनको अक्सर तीसरी आंख के साथ चित्रित किया जाता है। इसे तेरे नेत्रा की सहायता से इन्होंने कामदेव को जलाकर राख कर दिया।

चंद्रमा- शिव अपने मस्तक पर नवीन चंद्रमा अर्थात अर्धचंद्र धारण करते हैं। चन्द्रशेखर विशेषण (संस्कृत: चन्द्रशेखर "चंद्रमा को अपनी शिखा में धारण करने वाला" जहां 'चन्द्र' = "चंद्रमा"; शेखर = "शिखा, मुकुट"), सोमनाथ अर्थात चंद्र देव के पूज्य देव। 

स्वभाव से शीतल चंद्रमा उनको हलाहल विष के ताप को कम करता है। चन्द्रमा के धारण करने का अर्थ है कि कितनी भी कठिन परिस्थिति क्यों न हो लेकिन मन को हमेशा अपने काबू में रखना चाहिए।

भस्म- भस्म शिव जी का प्रमुख शृंगार है। उनका शरीर राख (भस्म, विभूति ) से ढका हुआ दिखाया गया है। शिव के भस्म रमाने के पीछे कुछ आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक कारण भी हैं। एक ओर यह दर्शाता है कि कैसे परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको ढालना चाहिए। भौतिक अस्तित्व नश्वर है, जो अन्ततः राख बनकर समाप्त हो जाता है, और इस प्रकार शाश्वत आत्म और आध्यात्मिक मुक्ति की खोज हुई है। 

वहीं दूसरी ओर भस्म लगाने का वैज्ञानिक कारण यह है कि भस्म शरीर के रोम छिद्रों को बंद कर देती है। इससे शरीर को सर्दियों में सर्दी और गर्मियों में गर्मी नहीं लगती। कई तरह के त्वचा संबंधी रोगों में भी भस्म को इस्तेमाल किया जाता है।

जटाएं (उलझे हुए बाल) : शिव की विशिष्ट केश शैली वाले केशों को जटाएं , "जटे हुए बाल ", जटा - सरल संस्कृत अनुवाद के अनुसार बाल। जब हम लंबे समय तक बाल नहीं धोते तो उनमें से बदबू आने लगती है और वे रूखे हो जाते हैं। और समय बीतने पर बालों का रंग काले से तांबे के समान लाल में बदल जाता है, और समय बीतने पर बाल आपस में चिपक और उलझ जाते हैं। अब इन्हें अलग नहीं किया जा सकता। इन आपस में चिपके और उलझे बालों को जटाएं कहा जाता है।

 

नीला गला : विशेषण नीलकंठ (संस्कृत नीलकंठ ; नील = "नीला", कंठ = "गला")। [213] [214] चूंकि शिव ने समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष की विनाशकारी क्षमता को खत्म करने के लिए उसे पी लिया था। उनके कृत्य से आश्चर्यचकित होकर, पार्वती ने उनकी गर्दन दबा दी और इसे पूरे ब्रह्मांड में फैलने से रोकने के लिए उनकी गर्दन में रोक दिया, माना जाता है कि यह शिव के पेट में था। हालाँकि जहर इतना शक्तिशाली था कि इससे उसकी गर्दन का रंग नीला हो गया। [215] [216] यह विशेषता इंगित करती है कि कोई व्यक्ति दुर्व्यवहार और अपमान के रूप में सांसारिक जहर को निगलकर समभाव से शिव बन सकता है और उन्हें देने वालों को आशीर्वाद दे सकता है। [217]

ध्यानमग्न योगी : उनकी प्रतिमा अक्सर उन्हें योग मुद्रा में, ध्यान करते हुए दिखाती है, कभी-कभी योग के भगवान के रूप में प्रतीकात्मक हिमालय पर्वत कैलाश पर। [11]

शीश पर गंगा- जब पृथ्वी की विकास यात्रा के लिए माता गंगा का आव्हान किया गया तब धरती गंगा नदी के आवेग को सहने में असमर्थ थी। इसी वजह से शिव जी ने अपनी जटाओं में गंगा मां को स्थान दिया। इस बात से यह सिद्ध होता है कि दृढ़ संकल्प के माध्यम से किसी भी अवस्था को संतुलित किया जा सकता है।

पवित्र गंगा : गंगाधर विशेषण , " गंगा नदी का वाहक " (गंगा)। गंगा शिव की जटाओं से बहती है। [218] [219] कहा जाता है कि देश की प्रमुख नदियों में से एक गंगा ने शिव की जटाओं में अपना निवास स्थान बनाया है । [220]

बाघ की खाल : शिव को अक्सर बाघ की खाल पर बैठे हुए दिखाया जाता है। [11]

नागदेवता– महाकल्याणकारी भगवान शिव के गले में नागदेवता विराजमान है। पुराणों में वर्णन है कि समुद्र मंथन के समय इन्होंने रस्सी के रूप में कार्य करते हुए सागर को मथा था। वासुकी नाम का यह नाग शिव का परम भक्त था। इनकी भक्ति से ही प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपने गले में आभूषण की तरह लिपटे रहने का वरदान दिया।

नागराज वासुकी : शिव को अक्सर नाग वासुकी के साथ माला पहने हुए दिखाया जाता है। वासुकी नागों के दूसरे राजा हैं (पहला विष्णु का पर्वत, शेष है )। एक पौराणिक कथा के अनुसार, वासुकी को शिव ने आशीर्वाद दिया था और समुद्र मंथन के बाद उन्होंने इसे एक आभूषण के रूप में पहना था ।

त्रिशूल- भगवान शिव का त्रिशूल सत, रज और तम गुणों के सांमजस्य को दर्शाता है। यह बताता है कि इनके बीच सांमजस्य के बिना सृष्टि का संचालन संभव नहीं है।

त्रिशूल : शिव आमतौर पर एक त्रिशूल धारण करते हैं जिसे त्रिशूल कहा जाता है । [11] त्रिशूल विभिन्न हिंदू ग्रंथों में एक हथियार या प्रतीक है। [221] एक प्रतीक के रूप में, त्रिशूल शिव के तीन पहलुओं "निर्माता, संरक्षक और विध्वंसक" का प्रतिनिधित्व करता है, [222] या वैकल्पिक रूप से यह सत्व , रजस और तमस के तीन गुणों के संतुलन का प्रतिनिधित्व करता है । [223]

डमरू- कहते हैं कि भगवान शिव के हाथों में विद्यमान डमरू बजने से आकाश, पाताल एवं पृथ्वी एक लय में बंध जाते हैं। ब्रह्म स्वरूप डमरू नाद सृष्टि सृजन का मूल बिंदू हैं।

डमरू या ड्रम : घंटे के आकार का एक छोटा ड्रम डमरू के नाम से जाना जाता है । [224] [225] यह नटराज के नाम से जाने जाने वाले प्रसिद्ध नृत्य प्रतिनिधित्व [226] में शिव के गुणों में से एक है । ड्रम को पकड़ने के लिए एक विशिष्ट हाथ का इशारा ( मुद्रा ) जिसे ḍamaru-हस्ता (संस्कृत में " ḍamaru -हाथ") कहा जाता है, का उपयोग किया जाता है। [227] इस ड्रम का उपयोग विशेष रूप से कापालिक संप्रदाय के सदस्यों द्वारा एक प्रतीक के रूप में किया जाता है । [228] ओडिशा और दक्षिण भारतीय प्रतीकों में शिव के हाथों में कुल्हाड़ी ( परशु ) और हिरण रखे हुए हैं। [229]

रुद्राक्ष- माना जाता है कि भगवान शिव ने संसार के उपकार के लिए कई वर्षों तक तप किया। उसके बाद जब उन्होंने अपनी आंखें खोली, तो उनके नेत्र से कुछ आंसू जमीन पर गिर गए। इन बूंदों से रुद्राक्ष वृक्ष की उत्पत्ति हुई। सच्चे मन से भगवान भोले की आराधना करने के बाद रुद्राक्ष धारण करने से तन-मन में सकारात्मकता का संचार होता है।

माला के मोती : उन्हें माला पहनाई जाती है या उनके दाहिने हाथ में माला के मोतियों की एक माला होती है, जो आमतौर पर रुद्राक्ष से बनी होती है । [11] यह अनुग्रह, भिक्षुक जीवन और ध्यान का प्रतीक है। [230] [231]

नंदी : नंदी, (संस्कृत:नंदिन(नंदिन)), उसबैलजो शिव की सवारी के रूप में कार्य करता है। [232] [233] मवेशियों के साथ शिव का जुड़ाव उनके नाम पशुपति , यापशुपति(संस्कृत: पशुपति) में परिलक्षित होता है, जिसका अनुवाद शर्मा ने "मवेशियों के स्वामी" के रूप में किया है [234] और क्रामरिश ने "जानवरों के स्वामी" के रूप में अनुवाद किया है, जो नोट करते हैं इसका प्रयोग विशेष रूप से रुद्र के विशेषण के रूप में किया जाता है। [235]

कैलाश पर्वत : हिमालय में कैलाश पर्वत उनका पारंपरिक निवास स्थान है। [11] [236] हिंदू पौराणिक कथाओं में, कैलाश पर्वत की कल्पना एक लिंग के समान की गई है , जो ब्रह्मांड के केंद्र का प्रतिनिधित्व करता है। [237]

गण : गणशिव के अनुचर हैं और कैलाश में रहते हैं ।उनके स्वभाव के कारण उन्हें अक्सर भूतगण या भूत यजमान के रूप में जाना जाता है। आम तौर पर सौम्य, सिवाय इसके कि जब उनके स्वामी के विरुद्ध अपराध किया जाता है, उन्हें अक्सर भक्त की ओर से प्रभु के साथ हस्तक्षेप करने के लिए बुलाया जाता है। उनके पुत्रगणेश कोशिव द्वारा उनके नेता के रूप में चुना गया था, इसलिए गणेश की उपाधि गण-ईश या गण-पति , " गणों के स्वामी" थी। [238]

वाराणसी: वाराणसी (बनारस) को शिव का विशेष प्रिय शहर माना जाता है और यह भारत के सबसे पवित्र तीर्थ स्थानों में से एक है। धार्मिक संदर्भ में इसे काशी कहा जाता है। [239]

खप्पर– शिव भगवान ने प्राणियों की क्षुधा शांति के माता अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगी थी। इसका मतलब है कि यदि हमारे द्वारा किसी का भी कल्याण होता है, तो उसको प्रदान करना चाहिए।

पैरों में कड़ा- यह स्थिरता तथा एकाग्रता को दर्शाता है। शिव जी के समान ही कुछ योगीजन भी एक पैर में कड़ा धारण करते हैं।

वह संहार करने वाले या मृत्यु देने वाली भूमिका निभाते नहीं हैं, वह तो मृत्युंजय हैं। 

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प्रसिद्ध बारह ज्योतिर्लिंग

सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर, केदारेश्वर, भीमशंकर, विश्वेश्वर, त्र्यंबक, वैद्यनाथ, नागेश, रामेश्वर तथा घुश्मेश्वर– ये प्रसिद्ध बारह ज्योतिर्लिंग हैं।

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शिवजी के 19 अवतार 

इन अवतारों के अलावा शिव के दुर्वासा, महेश, वृषभ, पिप्पलाद, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, अवधूतेश्वर, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, ब्रह्मचारी, सुनटनतर्क, द्विज, अश्वत्थामा, किरात, नतेश्वर और हनुमान आदि अवतारों का उल्लेख भी ‘शिव पुराण’ में हुआ है जिन्हें अंशावतार माना जाता है

1. वीरभद्र : भगवान शिव ने अपने इस वीरभद्र रूप में अवतार उस समय लिया था जब प्रजापति दक्ष के यज्ञ आयोजन में देवी सती अपमान के कारण हवन कुंड में कूद पड़ी थीं। जब भगवान शिव को यह पता चला कि देवी सती ने अपने प्राण त्याग दिए हैं तो उन्होंने अपने सिर से एक जटा को उखाड़कर पर्वत के ऊपर पटक दिया था। उसी पटकी गई जटा के पूर्वभाग से वीरभद्र उत्पन्न हुए। वीरभद्र ने दक्ष के यज्ञ का पूरी तरह से विनाश कर दिया और दक्ष का सिर काट मृत्युदंड प्रदान किया।

2. पिप्पलाद : भगवान शिव का पिप्पलाद रूप शनि दोषों के निवारण में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। उनकी कृपा से ही शनि पीड़ा से निजात पाना संभव हो पाया। पिप्पलाद से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार एक बार पिप्पलाद ने देवताओं से सवाल किया कि आखिर क्या वजह रही मेरे पिता दधीचि मेरे जन्म से पहले ही मुझे छोड़कर चले गए? देवताओं ने कहा कि शनि की दृष्टि के चलते ही ऐसा हुआ है।
देवताओं की बातों को सुनकर पिप्पलाद क्रोधित हो उठे और उन्होंने शनिदेव को नक्षत्र मंडल से गिरने का श्राप दे डाला। उनके श्राप का प्रभाव यह हुआ कि शनि अकाश से गिरने लगे, इसके बाद देवताओं की प्रार्थना पर पिप्पलाद ने शनि को क्षमा तो किया परंत एक शर्त रखी कि जन्म से लेकर सोलह वर्ष की आयु तक शनि किसी पर अपनी दृष्टि नहीं डालेंगे। 

3. नंदी अवतार : भगवान शिव का नंदी अवतार सभी जीवों से प्रेम करने का संदेश हमें देता है। नंदी यानी बैल कर्म का प्रतीक माना जाता है। शिव जी के इस अवतार से जुड़ी कथा कहती है कि शिलाद नामक मुनि ब्रह्मचारी थे। अपना वंश समाप्त होते देख शिलाद मुनि के पितरों ने उनसे संतान उत्पन्न करने के लिए कहा।

इसके बाद शिलाद ने एक मृत्युहीन संतान की कामना के उद्देश्य से भगवान शिव की कठोर तपस्या करनी शुरू कर दी। शिलाद की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने स्वयं शिलाद के यहां पुत्र रूप में जन्म लेने का वर प्रदान किया। इसके कुछ समय पश्चात शिलाद एक बार भूमि जोत रहा था और भूमि जोतते समय शिलाद को उसी भूमि से एक बालक मिला जो भूमि से उत्पन्न हुआ था। शिलाद ने उस बालक का नाम नंदी रखा था।

4. भैरव अवतार : जब ब्रह्मा और विष्णु स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगे थे तब तेज पुंज के बीच पुरुष आकृति दिखाई दी। उसे देखकर ब्रह्मा जी बोले कि तुम मेरे पुत्र हो मेरी क्षरण में आओ। ब्रह्मा की बात को सुनकर भगवान् शिव को बहुत क्रोध आया और उन्होंने पुरुषाकृति से कहा कि काल की तरह शोभित होने के कारण आप कालराज और भैरव हैं।

शिव जी से यह वरदान प्राप्त कर काल भैरव ने अपनी अंगुली के नाख़ून से ही ब्रह्मा जी के पांचवे सिर को काट डाला। इससे काल भैरव ब्रह्महत्या के दोषी माने गए। काशी में प्रवेश के बाद ही भगवान शिव के इस रूप को ब्रह्महत्या के बड़े दोष से मुक्ति मिल पाई थी।  

5. अश्वत्थामा अवतार : अश्वत्थामा भगवान शिव के अंशावतार माने जातें हैं। महाभारत में गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ही एकमात्र ऐसे योद्धा माने जाते हैं पूरे युद्ध को कौरवों के पक्ष में रखने की क्षमता रखते थे। परन्तु दुर्भाग्यवश वे युद्ध के अंत में जाकर सेनापति बने थे।  इनके बारे में कहा जाता है कि वे आज भी अमर हैं और पृथ्वी पर मौजूद हैं।

6. शरभावतार : शरभावतार को भगवान शंकर छठा अवतार माना जाता है। उनका यह अवतार में आधा भाग मृग और आधा भाग शरभ पक्षी का था।  

7. गृहपति अवतार : यह शिव जी का सातवां अवतार है जो विश्वानर नामक मुनि और उनकी पत्नी शुचिष्मति के पुत्र थे। मुनि की आराधना की प्रसन्न होकर ही भगवान शिव ने शुचिष्मति के गर्भ से जन्म लेने का वरदान दिया था।  

8. ऋषि दुर्वासा : भगवान शिव के आठवें अवतार ऋषि दुर्वासा को अनसुइया के पति महर्षि अत्रि ने ब्रह्मा की आज्ञा से ऋक्षकुल पर्वत पर कठोर तपस्या कर वरदान के रूप में पाया था। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर त्रिदेवों- ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीन पुत्र होने का वरदान दिया था।  ब्रह्मा जी के अंश से चन्द्रमा, विष्णु जी के अंश से दत्तात्रेय और शिव जी के अंश से ऋषि दुर्वासा ने जन्म लिया था।  

9. हनुमान : हनुमान जी भगवान शिव के नौंवे अवतार माने जाते हैं। अमृत मंथन के दौरान जब शिव जी विश्वमोहिनी के रूप को देख कामातुर हो गए थे तब उनके वीर्यपात को सप्तऋषियों ने एक पत्ते में संग्रहित कर लिया था। फिर समय आने पर सप्तऋषियों ने वह वानरराज केसरी की अर्धांग्नी अंजनी के कान के माध्यम से गर्भ में धारण हुआ था। इससे ही बलशाली हनुमान जी का जन्म हुआ था।  

10. वृषभ अवतार : भगवान शिव के वृषभ अवतार ने उपद्रव मचा रहे विष्णु जी के पुत्रों का संहार किया था। विष्णु जी के ये पुत्र चन्द्रमुखियों के साथ रमण करते हुए उत्पन्न हुए थे।

भगवान शिव के अन्य 9 अवतारों की सूची कुछ इस प्रकार है | Shiva Avatar List | Shiva Avatar Name 

11. यतिनाथ अवतार
12. कृष्णदर्शन अवतार
13. अवधूत अवतार
14. भिक्षुवर्य अवतार
15. सुरेश्वर अवतार
16. किरात अवतार
17. सुनटनर्तक अवतार
18. ब्रह्मचारी अवतार
19. यक्ष अवतार

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भगवान शिव का अभिषेक अनेकों प्रकार से किया जाता है। जलाभिषेक : जल से और

दुग्‍धाभिषेक : दूध से। 

शिव पुराण के अनुसार, महाशिवरात्रि पूजा में छह वस्तुओं को अवश्य शामिल करना चाहिए:

शिव लिंग का जल, दूध और शहद के साथ अभिषेक। बेर या बेल के पत्ते जो आत्मा की शुद्धि का प्रतिनिधित्व करते हैं;

चंदन स्नान के बाद शिव लिंग को लगाया जाता है। यह पुण्य का प्रतिनिधित्व करता है;

फल, जो दीर्घायु और इच्छाओं की सन्तुष्टि को दर्शाते हैं;

जलती धूप, धन, उपज (अनाज);

दीपक जो ज्ञान की प्राप्ति के लिए अनुकूल है;

और पान के पत्ते जो सांसारिक सुखों के साथ सन्तोष अंकन करते हैं।

अभिषेक में निम्न वस्तुओं का प्रयोग नहीं किया जाता है:

तुलसी के पत्ते

हल्दी

चंपा और केतकी के फूल


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यद्यपि भगवान शिव सर्वत्र व्याप्त हैं, तथापि काशी और कैलास- ये दो उनके मुख्य निवास स्थान कहे गये हैं।

भगवान शिव ने जहां सुरों (देवताओं) ऐश्वर्य प्रदान किया हैं, साथ ही उन्होंने अनेक असुरों- अन्धक, दुन्दुभी, महिष, त्रिपुर, रावण, निवात-कवच आदि को भी अतुलनीय ऐश्वर्य प्रदान किया। कुबेर जैसे राक्षस को उनकी कृपा से यक्षों का स्वामित्व प्राप्त हुआ। 

सभी देवों और राक्षसों को कालकूट विष से दु:खी देखकर उन्होंने कालकूट विष का पान किया। इसी से वे नीलकण्ठ कहलाये। 

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शिव सामंजस्य के प्रतीक 



पूजन

शिवरात्रि की पूजा रात्रि के चारों प्रहर में करनी चाहिए। शिव को बिल्वपत्र, पुष्प, चन्दन का स्नान प्रिय हैं। इनकी पूजा के लिये दूध, दही, घी, चीनी, शहद इन पांच अमृत जिसे पञ्चामृत कहा जाता है, से की जाती है। शिव का त्रिशूल और डमरू की ध्वनि मंगल, गुरु से संबंधित हैं। चंद्रमा उनके मस्तक पर विराजमान होकर अपनी कांति से अनंताकाश में जटाधारी महामृत्युंजय को प्रसन्न रखता है तो बुधादि ग्रह समभाव में सहायक बनते हैं। महामृत्युंजय मंत्र शिव आराधना का महामंत्र है। सावन सोमवार व्रत को काफी फलदायी बताया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से भक्तों की सभी इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है।[8] महाशिवरात्रि का व्रत अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए करते हैं।

अनेक नाम

मुख्य लेख: शिव सहस्रनाम

हिन्दू धर्म में भगवान शिव को अनेक नामों से पुकारा जाता है

  • रूद्र - रूद्र से अभिप्राय जो दुखों का निर्माण व नाश करता है।
  • पशुपतिनाथ - भगवान शिव को पशुपति इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह पशु पक्षियों व जीवआत्माओं के स्वामी हैं।
  • अर्धनारीश्वर - शिव और शक्ति के मिलन से अर्धनारीश्वर नाम प्रचलित हुआ।
  • महादेव - महादेव का अर्थ है महान ईश्वरीय शक्ति।
  • भोलेनाथ - भोलेनाथ का अर्थ है कोमल हृदय, दयालु व आसानी से माफ करने वालों में अग्रणी। यह विश्वास किया जाता है कि भगवान शंकर आसानी से किसी पर भी प्रसन्न हो जाते हैं।
  • लिंगम - पूरे ब्रह्मांड का प्रतीक है।
  • नटराज - नटराज को नृत्य का देवता मानते है क्योंकि भगवान शिव तांडव नृत्य के प्रेमी है। "शिव" शब्द का अर्थ "शुभ, स्वाभिमानिक, अनुग्रहशील, सौम्य, दयालु, उदार, मैत्रीपूर्ण" होता है। लोक व्युत्पत्ति में "शिव" की जड़ "शि" है जिसका अर्थ है जिन में सभी चीजें व्यापक है और "वा" इसका अर्थ है "अनुग्रह के अवतार"। ऋग वेद में शिव शब्द एक विशेषण के रूप में प्रयोग किया जाता है, रुद्रा सहित कई ऋग्वेदिक देवताओं के लिए एक विशेषण के रूप में। शिव शब्द ने "मुक्ति, अंतिम मुक्ति" और "शुभ व्यक्ति" का भी अर्थ दिया है।  इस विशेषण का प्रयोग विशेष रूप से साहित्य के वैदिक परतों में कई देवताओं को संबोधित करने हेतु किया गया है। यह शब्द वैदिक रुद्रा-शिव से महाकाव्यों और पुराणों में नाम शिव के रूप में विकसित हुआ, एक शुभ देवता के रूप में, जो "निर्माता, प्रजनक और संहारक" होता है।
  • महाकाल अर्थात समय के देवता, यह भगवान शिव का एक रूप है जो ब्राह्मण के समय आयामो को नियंत्रित करते है।


समुद्र मन्थन

[[समुद्र मन्थन|समुद्र मंथन]अमृत का उत्पादन करने के लिए निश्चित था, लेकिन इसके साथ ही हलाहल नामक विष भी पैदा हुआ था। हलाहल विष में ब्रह्माण्ड को नष्ट करने की क्षमता थी और इसलिए केवल भगवान शिव इसे नष्ट कर सकते थे। भगवान शिव ने हलाहल नामक विष को अपने कण्ठ में रख लिया था। जहर इतना शक्तिशाली था कि भगवान शिव अत्यधिक दर्द से पीड़ित हो उठे थे और उनका गला नीला हो गया था। इस कारण से भगवान शिव 'नीलकण्ठ' के नाम से प्रसिद्ध हैं। उपचार के लिए, चिकित्सकों ने देवताओं को भगवान शिव को रात भर जगाये रहने की सलाह दी। इस प्रकार, भगवान शिव के चिन्तन में एक सतर्कता रखी। शिव को आनंदित करने और जागाये रखने के लिए, देवताओं ने अलग-अलग नृत्य और संगीत बजाये। जैसे सुबह हुई, उनकी भक्ति से प्रसन्न भगवान शिव ने उन सभी को आशीर्वाद दिया। शिवरात्रि इस घटना का उत्सव है, जिससे शिव ने दुनिया को बचाया। तब से इस दिन, भक्त उपवास करते है।[13]

शिकारी कथा

एक बार पार्वती जी ने भगवान शिवशंकर से पूछा, 'ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?' उत्तर में शिवजी ने पार्वती को 'शिवरात्रि' के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- 'एक बार चित्रभानु नामक एक शिकारी था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।'

शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल-वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो विल्वपत्रों से ढका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।[14]

पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुँची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूँगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई।

कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे पारधी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूँ। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूँ। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगी।' शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिन्ता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे पारधी!' मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊँगी। इस समय मुझे शिकारी हँसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ। हे पारधी! मेरा विश्वास कर, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरन्त लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।

बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ। हे पारधी! मेरा विश्वास कर, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरन्त लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में बेल-वृक्षपर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृगविनीत स्वर में बोला, हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलम्ब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूँ। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊँगा।

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।' उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गया। भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।

थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किन्तु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवम् सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवम् दयालु बना लिया। देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहे थे। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प-वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए।


  • गणेश व, पार्वती, गणेश और कार्तिकेय

Shiv, Parvati, Ganesh and Kartik

उनके अनेक रूपों में उमा-महेश्वर, अर्द्धनारीश्वर, पशुपति, कृत्तिवासा, दक्षिणामूर्ति तथा योगीश्वर आदि अति प्रसिद्ध हैं।

महाभारत, आदिपर्व के अनुसार पांचाल नरेश द्रुपद की पुत्री द्रौपदी पूर्वजन्म में एक ऋषि कन्या थी। उसने श्रेष्ठ पति पाने की कामना से भगवान शिव की तपस्या की थी। शंकर ने प्रसन्न होकर उसे वर देने की इच्छा की। उसने शंकर से पाँच बार कहा कि वह सर्वगुणसंपन्न पति चाहती है। शंकरजी ने कहा कि अगले जन्म में उसके पाँच भरतवंशी पति होंगे, क्योंकि उसने पति पाने की कामना पाँच बार दोहरायी थी।

भगवान शिव की ईशान, तत्पुरुष, वामदेव, अघोर तथा अद्योजात पाँच विशिष्ट मूर्तियाँ और शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव- ये अष्टमूर्तियाँ प्रसिद्ध हैं।




सोमवार व्रत का महत्व : सोमवार का व्रत रखने से क्या होता है? | Somvar ka vrat rakhne se kya hota hai? 

ऐसा माना जाता है कि Somvar Vrat रखने से भगवान शिव और उनका परिवार प्रसन्न होते हैं. इससे व्यक्ति की मनोकामनाएं पूरी होती हैं और उसके जीवन से दुख, रोग, कलह, क्लेश, और आर्थिक तंगी दूर होती है. सोमवार का व्रत करने से कुंडली में चंद्र ग्रह की स्थिति भी मज़बूत होती है.
 
सावन सोमवार व्रत का बड़ा ही महत्‍व होता है। मान्‍यता है कि इस व्रत को रखने से कुवांरी कन्‍याओं को उनका मनचाहा वर मिलता है और सुहागिने अगर यह व्रत रखें, तो उनके पति की आयु लंबी होती है। इस दिन भगवान शिव का आर्शिवाद पाने के लिए बच्‍चे से लेकर बूढ़े-बुजुर्ग तक यह व्रत रखते हैं। इस व्रत के नियम काफी कठिन है।

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सोमवार का व्रत रखने के फ़ायदे:
दांपत्य जीवन में खुशियां आती हैं.
पति-पत्नी का रिश्ता मज़बूत होता है.
घर में कलेश, वाद-विवाद की समस्या हल होती है.
कोर्ट-कचहरी के मामलों में भी राहत मिलती है.
जिनका स्वभाव उग्र होता है, उन्हें सोमवार का व्रत रखना चाहिए. इससे उग्रता में कमी आती है और उनका स्वभाव खुशमिजाज़ होता है.
अगर आप लगातार मानसिक परेशानी या तनाव का सामना कर रहे हैं, तो यह चंद्र दोष का कारण हो सकता है. इसलिए ऐसे में आपको सोमवार व्रत रखना चाहिए और साथ ही चंद्र देव की पूजा करनी चाहिए.
Also Read: Bhagwan Shiv ki Janam ki kahani: आइये जानें काल और मृत्यु से परे रहने वाले भगवान शिव का जन्म कैसे हुआ?

सोमवार के व्रत में कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए:
पूजा के समय कभी भी शिवलिंग की पूरी परिक्रमा नहीं करनी चाहिए. जलाधारी के स्थान तक परिक्रमा कर रुक जाना चाहिए और वापस घूमकर परिक्रमा को पूरा करना चाहिए.
सोमवार के दिन काले रंग के वस्त्र नहीं पहनने चाहिए.
पूजा में शिवजी को तुलसी, सिंदूर, हल्दी, लाल रंग के फूल नहीं चढ़ाने चाहिए.
भगवान शिव की पूजा करने वाले लोगों के लिए सोमवार के व्रत का बहुत अधिक महत्व है। इस दिन व्रत का पालन करने से भगवान शिव और पार्वती जी की असीम कृपा प्राप्त होती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

प्रति सोमवार व्रत विधि | Somvar Vrat ki Puja Vidhi | सोमवार व्रत कथा विधि | प्रति सोमवार व्रत विधि 
1. सोमवार के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।  
2. स्नान के बाद भगवान शिव का जलाभिषेक करें।  
3. फिर उन्हें बेलपत्र, पुष्प, फल आदि अर्पित करें।   
4. घी का दीपक और धूप जलाएं और व्रत का संकल्प लें।  
5. सोमवार व्रत कथा का पाठ करें और ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का 108 बार जाप करें। 

सोमवार का व्रत कितने दिन करना चाहिए?
16 सोमवार व्रत रखने के बाद 17वें सोमवार को उद्यापन करना चाहिए। सोमवार व्रत के उद्यापन में मां पार्वती, शिव जी और चन्द्र देव की विधिवत पूजा के साथ हवन करना चाहिए। इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान कर लें।

सोमवार व्रत के लाभ | Somvar Vrat ke labh 
मान्यता है कि यदि कोई भी श्रद्धा भाव से सावन के सभी सोमवार का व्रत करता है तो उस व्यक्ति पर भगवान शिव और पार्वतीजी की अवश्य कृपा होती है। सोमवार का व्रत रखने से मनुष्य की दुःख और चिंताएं दूर होती हैं एवं शरीर के रोगों से मुक्ति मिलती है। इसके अलावा इस व्रत को करने से कुंडली में चंद्र ग्रह की स्थिति मजबूत होती है।
 
सोमवार का व्रत करने से क्या क्या लाभ होता है?
1. सोमवार के दिन व्रत रखने से दुःख और चिंताएं दूर होती हैं।
2. व्यक्ति को शरीर के अनेकों रोगों से मुक्ति मिलती है।  
3. घर की आर्थिक तंगी समाप्त होती है।  
4. घर नकारात्मक ऊर्जाओं से दूर रहता है। 

सोमवार व्रत कथा | Somvar Vrat Katha | somvar vrat katha in hindi | भोलेनाथ की कथा सोमवार की 
somwar vrat katha – 
एक बार की बात है एक नगर में साहूकार रहा करता था जिसके पास धन दौलत की कोई कमी नहीं थी। इतना अधिक धनवान होने के बावजूद वह साहूकार निः संतान था। कोई संतान न होने के कारण वह बहुत चिंतित रहा करता था। संतान प्राप्ति की इच्छा लिए वह साहूकार हर सोमवार व्रत किया करता और पूरी श्रद्धा से भगवान शिव और पार्वती की पूजा करता।
साहूकार की भक्ति से माता पार्वती बहुत प्रसन्न हुई और उन्होंने भगवान शिव से साहूकार की मनोकामना पूर्ण करने के लिए कहा।

जिसपर भगवान शिव ने पार्वती जी को समझाने के प्रयास किया कि इस संसार में हर व्यक्ति को उसके कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। इस तरह जिस भी व्यक्ति को जो हासिल है वह उसके कर्मों का फल ही है। भगवान शिव की बात तो पार्वती जी ने सुनी पर वे अभी भी साहूकार की भक्ति से प्रसन्न होकर उसकी इच्छा को पूर्ण करना चाहती थी।

देवी पार्वती के बार – बार आग्रह किए जाने पर भगवान शिव ने साहूकार को पुत्र प्राप्ति का वरदान तो दिया परंतु वह बालक केवल बारह वर्ष तक ही जीवित रह सकता था। साहूकार भगवान शिव और माता पार्वती की सभी बातें सुन रहा था। दोनों की बातों को सुनकर भी साहूकार मन से स्थिर बना रहा उसे न तो इस बात की प्रसन्नता हुई और न ही कोई दुख। वह साहूकार पूरे मन से भगवान शिव और पार्वती जी की पूजा-अर्चना करता रहा।

कुछ समय बीता और साहूकार के घर पुत्र ने जन्म लिया। जब साहूकार का बालक ग्यारह वर्ष का हुआ तो उसे शिक्षा ग्रहण करने के लिए काशी भेजने का फैसला लिया गया। साहूकार ने बालक के मामा को धन दिया और कहा कि इसे शिक्षा ग्रहण करने के लिए काशी ले जाओ। साथ ही जाते – जाते मार्ग में यज्ञ भी करवाना, जहां भी यज्ञ कराओ वहां ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा भी अवश्य देना।  

इस तरह मामा – भांजे यज्ञ करते हुए और ब्राह्मणों को भोजन व दक्षिणा देते हुए काशी की ओर निकल पड़े थे। वहीं मार्ग में एक नगर में कन्या का विवाह हो रहा था पर दुर्भाग्यवश जिस राजकुमार के साथ कन्या का विवाह होने वाला था वह एक आंख से काना था।

राजकुमार के पिता ने अपने बेटे के एक आंख से काने होने की बात छुपाने के लिए एक चाल सोची। उसने साहूकार के बेटे को देखकर सोचा कि क्यों न इस लड़के को अपने बेटे के स्थान पर बिठाकर कर कन्या से विवाह करा लिया जाए। फिर विवाह होने के बाद पैसे देकर इसे वापिस भेज दूंगा और राजकुमारी को अपने साथ ले जाऊंगा। इस प्रकार साहूकार के लड़के के साथ उस कन्या का विवाह करा दिया गया।

साहूकार के बेटे ने विवाह तो कर लिया परंतु वह अपनी ईमानदारी खोना नहीं चाहता था। उसे किया गया कृत्य न्यायसंगत नहीं लगा। उसने यह बात बताने के लिए राजकुमारी की चुनरी के पल्ले पर लिखा कि तुम्हारा विवाह मेरे साथ हो रहा है परंतु मैं असली राजकुमार नहीं हूं। असली राजकुमार एक आंख से काना है। मैं तो यहां काशी में शिक्षा ग्रहण करने के उद्देश्य से आया हूं।

जब राजकुमारी को सारी बात पता चली तो उसने ने अपने माता-पिता को सब बात बताई। अपनी पुत्री की बात सुनकर राजा ने अपनी बेटी को विदा नहीं किया और बारात वापिस लौट गई। वहीं शिक्षा के लिए जा रहे मामा भांजे काशी में पहुंचे तो पहुंचते ही उन्होंने यज्ञ किया। जिस दिन यज्ञ था उसी दिन लड़के की आयु बारह वर्ष होनी थी। इसपर लड़के ने अपने मामा से कहा कि वह स्वस्थ महसूस नहीं कर रहा है। मामा ने भांजे को जाकर सोने के लिए कहा।

भगवान शिव के वरदान के अनुसार सोते ही बालक के प्राण निकल गए। मामा ने मृत भांजे को देखकर विलाप करना शुरू कर दिया। संयोग की बात थी कि उस समय शिव जी और पार्वती जी वहां से गुजर रहे थे। उन्होंने निकट जाकर देखा तो भगवान शिव और पार्वती जी को मालूम हुआ कि यह तो वही साहूकार का पुत्र है जिसे केवल बारह वर्ष तक जीवित रहने के वरदान दिया था। माता पार्वती भाव विभोर हो उठी और उन्होंने भगवान शिव से आग्रह किया कि हे! प्रभु आप इसे और आयु प्रदान करें नहीं तो इसके माता पिता इसके जाने के वियोग सहन नहीं कर पाएंगे।

माता पिता के आग्रह किए जाने पर भगवान शिव ने साहूकार के बेटे को जीवनदान दे दिया। काशी से शिक्षा समाप्त कर जब मामा भांजे घर की ओर निकले तो सबसे पहले वे इस नगर में पहुंचे जहां उस लड़के का विवाह हुआ था। वहां पहुंचकर उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया तो राजकुमारी के पिता उस लड़के के पहचान गए और उन्होंने अपनी पुत्री को विदा कर दिया।
जब तीनों लोग घर पहुंचे तो वहां साहूकार और उनकी पत्नी अपने पुत्र के लौटने का इंतजार कर रहे थे। उन्होंने प्रण लिया हुआ था कि अगर उन्हें अपने पुत्र के जीवित न होने का समाचार प्राप्त हुआ तो वे भी अपने प्राण त्याग देंगे। साहूकार और उनकी पत्नी ने बेटे को जीवित देखा तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था।

उसी रात्रि को साहूकार के सपने में भगवान शिव ने आकर कहा कि हे! श्रेष्ठी मैंने तेरे सोमवार के व्रत और सच्ची श्रद्धा से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लंबी आयु प्रदान की है। इस तरह जो भी भक्तजन सोमवार का व्रत ( Somwar ka Vrat ) पालन कर सच्चे मन से भगवान शिव और पार्वती जी की पूजा करता है और उसकी सभी मनोकामना पूर्ण होंगी।

सोमवार व्रत कब से शुरू करना चाहिए? | Somvar vrat kab se shuru karna chahiye? 
भगवान शिव को समर्पित सोमवार व्रत ( Somvar Vrat ) की शुरुआत श्रावण, चैत्र, मार्गशीर्ष और वैशाख मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से करनी चाहिए। ध्यान रहे कि सोमवार के व्रत कम से कम 16 तो अवश्य ही होने चाहिए। 

सोमवार के व्रत में क्या नहीं खाना चाहिए? | Somvar ke vrat me kya nahi khana chahiye? 
सोमवार के व्रत में वैसे तो खाने को लेकर कोई कड़े नियम नहीं है परन्तु इस दिन अधिक तेल मसाले वाला भुना हुआ भोजन न लें। साथ ही ध्यान रहे कि इस दिन व्रत की शुरुआत चाय के साथ न करें।

क्या सोमवार व्रत में नमक खाना चाहिए? | Kya Somvar vrat me namak khana chahiye? 
सोमवार के व्रत के दिन नमक न खाने की सलाह दी जाती है। इस दिन फलाहार करना चाहिए और संध्या के समय कुछ मीठा ग्रहण कर ही व्रत खोलना चाहिए।

व्रत कितने बजे खोलना चाहिए शाम को? 
व्रत कितने बजे खोलना चाहिए? व्रत खोलने का कोई एक निश्चित समय नहीं है, यह व्रत के प्रकार और व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता है। कुछ व्रत निर्जला होते हैं, जिनमें पूरे दिन कुछ भी खाया या पिया नहीं जाता है। ऐसे व्रतों को सूर्यास्त के बाद खोला जाता है।




भगवान शिव की अन्य पारम्परिक पूजासंपादित करें

मुख्य लेख: ज्योतिर्लिंग

बारह ज्योतिर्लिंग (प्रकाश के लिंग) जो पूजा के लिए भगवान शिव के पवित्र धार्मिक स्थल और केन्द्र हैं। वे स्वयम्भू के रूप में जाने जाते हैं, जिसका अर्थ है "स्वयं उत्पन्न"। बारह स्‍थानों पर बारह ज्‍योर्तिलिंग स्‍थापित हैं।

  1. सोमनाथ यह शिवलिंग गुजरात के काठियावाड़ में स्थापित है।
  2. श्री शैल मल्लिकार्जुन मद्रास में कृष्णा नदी के किनारे पर्वत पर स्थापित है श्री शैल मल्लिकार्जुन शिवलिंग।
  3. महाकाल उज्जैन के अवंति नगर में स्थापित महाकालेश्वर शिवलिंग, जहाँ शिवजी ने दैत्यों का नाश किया था।
  4. ॐकारेश्वर मध्यप्रदेश के धार्मिक स्थल ओंकारेश्वर में नर्मदा तट पर पर्वतराज विंध्य की कठोर तपस्या से खुश होकर वरदाने देने हुए यहां प्रकट हुए थे शिवजी। जहां ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापित हो गया।
  5. नागेश्वर गुजरात के द्वारकाधाम के निकट स्थापित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग।
  6. बैजनाथ झारखंड के बैद्यनाथ धाम में स्थापित शिवलिंग।
  7. भीमाशंकर महाराष्ट्र की भीमा नदी के किनारे स्थापित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग।
  8. त्र्यंम्बकेश्वर नासिक (महाराष्ट्र) से 25 किलोमीटर दूर त्र्यंम्बकेश्वर में स्थापित ज्योतिर्लिंग।
  9. घृष्णेश्वर महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में एलोरा गुफा के समीप वेसल गाँव में स्थापित घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग।
  10. केदारनाथ हिमालय का दुर्गम केदारनाथ ज्योतिर्लिंग। हरिद्वार से 150 पर मिल दूरी पर स्थित है।
  11. काशी विश्वनाथ बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग।
  12. रामेश्वरम्‌ त्रिचनापल्ली (मद्रास) समुद्र तट पर भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग।

जटाएं होंगी, जिनमें कुछ अलौकिक शक्तियां हो सकती हैं। यह घटना सती देवी के आत्मदाह के दौरान प्रदर्शित होती है और उसके बाद भगवान शिव की जटा से पैदा हुई एक बहुत शक्तिशाली राक्षसी शक्ति, जिसे वीरभद्र कहा जाता है, प्रदर्शित होती है।


शिव को चंद्रमौली (जिनके बालों में अर्धचंद्र है) कहा जाता है, इसके पीछे एक लंबी कहानी है।


माता सती के निधन के बाद, शिव ने स्वयं जाकर यज्ञ को नष्ट करने के बजाय वीरभद्र को दक्ष यज्ञ को नष्ट करने के लिए क्यों बनाया? क्या ग्रंथों में कोई विशिष्ट व्याख्या है?
  • दक्ष हमेशा चाहते थे कि शिव उनके अधीन रहें क्योंकि शिव उनके जमाता (दामाद) थे। एक बार ऋषियों ने प्रयाग में यज्ञ आयोजित करने की योजना बनाई और सभी दिव्य प्राणियों को आमंत्रित किया गया। शिव और सती यज्ञ में शामिल होते हैं और अपने निर्धारित स्थान पर बैठते हैं। जब दक्ष कार्यक्रम स्थल में प्रवेश करते हैं, तो सभी खड़े हो जाते हैं और सम्मान के साथ उन्हें प्रणाम करते हैं, शिव की प्रतीक्षा करते हैं। तब दक्ष शिव को प्रणाम न करने के लिए उन पर क्रोधित होते हैं। यहां तक ​​कि जब शिव ने दक्ष को समझाया, कि वह यज्ञ में त्रिदेवों में से एक के रूप में आए हैं, न कि उनके जमाता, दामाद के रूप में, तब भी दक्ष अहंकार के साथ कार्यक्रम स्थल से चले गए।
  • और बाद में, दक्ष ने निरेश्वर यज्ञ की योजना बनाई

** मैंने पहले भी इसी तरह का उत्तर लिखा है, मैं वह सामग्री पोस्ट कर रहा हूं **

शिव को चंद्रमौली (जिनके बालों में अर्धचंद्र है) कहा जाता है, इसके पीछे एक लंबी कहानी है।

  • प्रजापति दक्ष की कुल 62 बेटियाँ थीं (मत्स्य पुराण के अनुसार), और उन्होंने अपनी 27 बेटियों का विवाह चंद्र से किया था।
  • लेकिन चंद्रमा अपनी 27 पत्नियों में से केवल रोहिणी से प्रेम करते थे और बाकी 26 पत्नियों की उपेक्षा करते थे।
    • अपने पति के पक्षपातपूर्ण प्रेम को सहन करने में असमर्थ, 26 बहनें अपने पिता दक्ष के पास गईं और उनसे चंद्रमा द्वारा उनकी उपेक्षा करने की शिकायत की।
    • चंद्रमा के केवल रोहिणी के प्रति प्रेम और अपनी अन्य 26 बेटियों की उपेक्षा से दक्ष क्रोधित हो जाते हैं और उन्होंने चंद्रमा को हमेशा के लिए नष्ट हो जाने/चंद्रमा के क्षीण होने का श्राप दे दिया।
  • दक्ष का श्राप चंद्र पर असर करने लगता है और धीरे-धीरे उन्हें दर्द महसूस होने लगता है और चंद्रमा फीका पड़ने लगता है।
  • फिर, ऋषि नारद चंद्रमा के पास जाते हैं और कहते हैं, “हे चंद्रमा, केवल एक ही भगवान हैं, जो तुम्हें दक्ष के श्राप से बचा सकते हैं। यह कोई और नहीं बल्कि महादेव हैं।''
    • चंद्रा कहते हैं, "शिव मुझे कभी क्यों बचाएंगे?" दक्ष शिव के भक्त हैं, और शिव ने पहले ही दक्ष को वचन दिया था कि वह कभी भी दक्ष के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे, और दक्ष के सभी वरदान और श्राप काम करेंगे और कभी वापस नहीं लिये जायेंगे! “.
    • नारद कहते हैं, “तुम जो कह रहे हो वह सही है चंद्रा। तो, मैं तुम्हें एक विचार दूँगा। आप पहले शिव के पास जाते हैं, और अपनी सुरक्षा के लिए शिव से वचन लेते हैं, और बाद में दक्ष के श्राप के बारे में बताते हैं! “.
  • चंद्रमा वैसा ही करता है, जैसा ऋषि नारद ने निर्देशित किया था।
  • चंद्रमा शिव के पास जाते हैं और शिव के चरणों में गिर जाते हैं और कहते हैं “हे मेरे महादेव, कृपया मेरी रक्षा करें, मैं आपके चरणों से तब तक नहीं उठूंगा, जब तक आप मेरी रक्षा करने का वचन नहीं देते!”
  • महादेव कहते हैं, “हे चंद्रमा, मैं अपना वचन देता हूं, मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा।”
  • यह सुनकर चंद्रमा मुस्कुराते हुए उठते हैं और महादेव को धन्यवाद देते हैं और फिर शिव को पूरा वृतांत बताते हैं। दक्ष के श्राप की पूरी कहानी सुनने के बाद, शिव हैरान हो गए, उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें!
  • जब दक्ष को नारद के माध्यम से शिव द्वारा चंद्रमा की रक्षा के बारे में पता चला। वह तुरंत खैलाश पर्वत पर जाता है।
    • दक्ष को खैलाश में प्रवेश करते देख चंद्रमा शिव के पीछे छिप गये। दक्ष शिव पर क्रोधित होकर कहते हैं, “हे शिव, आप ऐसा क्यों कर रहे हैं? ? मैंने चंद्रमा को श्राप दिया है और आप उसकी रक्षा क्यों कर रहे हैं?? आपने पहले ही वचन दे दिया था कि आप मेरे प्रजापति के कार्यों में कभी हस्तक्षेप नहीं करेंगे। चंद्रमा को अभी मुझे सौंप दो।
    • शिव कहते हैं, "मैं जानता हूं कि चंद्रमा ने गलती की है, केवल अपनी एक पत्नी से प्रेम करके और अपनी अन्य पत्नियों की उपेक्षा करके, उसने पति धर्म का उल्लंघन किया है"।
    • परंतु दक्ष, यदि चंद्रमा धूमिल हो जाए तो संपूर्ण जगत को चंद्रमा की अनुपस्थिति में कष्ट सहना पड़ेगा। अत: विश्व कल्याण के लिए कृपया अपना श्राप वापस लें।
    • दक्ष शिव पर क्रोधित होते हैं और कहते हैं, "यह असंभव है, चंद्रमा को लुप्त होना होगा।" इस प्रकार, शिव और दक्ष के बीच वाकयुद्ध बढ़ने लगता है।
  • तब, भगवान विष्णु आते हैं और स्थिति में हस्तक्षेप करते हैं और कहते हैं, “हे महादेव और दक्ष, कृपया इस मुद्दे पर झगड़ा न करें। मेरे पास एक विचार है, कृपया मेरी बात सुनें।
    • मैं अपनी शक्तियों से चंद्रमा को दो बराबर हिस्सों में बांट दूंगा, एक आधे हिस्से की रक्षा शिव करेंगे और दूसरे आधे हिस्से की रक्षा करेंगे, दक्ष का श्राप सहन करेंगे और धीरे-धीरे लुप्त हो जाएंगे और फिर से अपने पूर्ण रूप में आ जाएंगे।
    • जब चंद्रमा पूरी तरह से लुप्त हो जाएगा, तो इसे अमावस्या का दिन कहा जाएगा और धीरे-धीरे वह पूर्ण आकार में बढ़ना शुरू कर देगा, इसे पूर्णिमा दिवस (पूर्णिमा) कहा जाता है। इस प्रकार, इन्हें कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष कहा जाएगा ( एक महीने को दो हिस्सों में विभाजित किया जाएगा)।


नोट –
1. ध्यान दें कि आपके घर में एक ही स्थान पर नींबू और मिर्ची ने रखी हूं अर्थात जिस घर की डलिया में, फ्रिज में, रसोई में नींबू और मिर्ची ये दोनों एक ही जगह रहते है तो उनके घर में कभी शांति नहीं रहती है।

2. बैल पत्थर के फल का गुदा अगर व्यक्ति ने खा लिया है दूसरे शब्दों में यदि बैलपत्थर खा लिया है और किसी कारणवश वह 27 दिन के अंदर मर गया है, तो वह व्यक्ति प्रेतयोनि में या नरक में नहीं जाएगा। वह सीधा कैलाश धाम ही जाएगा।

3. भगवान शिव की पूजा कभी भी काले रंग के कपड़े पहनकर नहीं करना चाहिए।

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