मृतसञ्जीवन स्तोत्रम् ।। 🕉️

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      🕉️  ।। मृतसञ्जीवन स्तोत्रम् ।। 🕉️

एवमारध्य गौरीशं देवं मृत्युञ्जयमेश्वरं।
मृतसञ्जीवनं नाम्ना कवचं प्रजपेत् सदा।।१।।

सारात् सारतरं पुण्यं गुह्याद्गुह्यतरं शुभं।
महादेवस्य कवचं मृतसञ्जीवनामकं।।२।।

समाहितमना भूत्वा शृणुष्व कवचं शुभं।
शृत्वैतद्दिव्य कवचं रहस्यं कुरु सर्वदा।।३।।

वराभयकरो यज्वा सर्वदेवनिषेवितः।
मृत्युञ्जयो महादेवः प्राच्यां मां पातु सर्वदा।।४।।

दधाअनः शक्तिमभयां त्रिमुखं षड्भुजः प्रभुः।
सदाशिवोऽग्निरूपी मामाग्नेय्यां पातु सर्वदा।।५।।

अष्टदसभुजोपेतो दण्डाभयकरो विभुः।
यमरूपि महादेवो दक्षिणस्यां सदावतु।।६।।

खड्गाभयकरो धीरो रक्षोगणनिषेवितः।
रक्षोरूपी महेशो मां नैरृत्यां सर्वदावतु।।७।।

पाशाभयभुजः सर्वरत्नाकरनिषेवितः।
वरुणात्मा महादेवः पश्चिमे मां सदावतु।।८।।

गदाभयकरः प्राणनायकः सर्वदागतिः।
वायव्यां मारुतात्मा मां शङ्करः पातु सर्वदा।।९।।

शङ्खाभयकरस्थो मां नायकः परमेश्वरः।
सर्वात्मान्तरदिग्भागे पातु मां शङ्करः प्रभुः।।१०।।

शूलाभयकरः सर्वविद्यानमधिनायकः।
ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्वरः।।११।।

ऊर्ध्वभागे ब्रःमरूपी विश्वात्माऽधः सदावतु।
शिरो मे शङ्करः पातु ललाटं चन्द्रशेखरः।।१२।।

भूमध्यं सर्वलोकेशस्त्रिणेत्रो लोचनेऽवतु।
भ्रूयुग्मं गिरिशः पातु कर्णौ पातु महेश्वरः।।१३।।

नासिकां मे महादेव ओष्ठौ पातु वृषध्वजः।
जिह्वां मे दक्षिणामूर्तिर्दन्तान्मे गिरिशोऽवतु।।१४।।

मृतुय्ञ्जयो मुखं पातु कण्ठं मे नागभूषणः।
पिनाकि मत्करौ पातु त्रिशूलि हृदयं मम।।१५।।

पञ्चवक्त्रः स्तनौ पातु उदरं जगदीश्वरः।
नाभिं पातु विरूपाक्षः पार्श्वौ मे पार्वतीपतिः।।१६।।

कटद्वयं गिरीशौ मे पृष्ठं मे प्रमथाधिपः।
गुह्यं महेश्वरः पातु ममोरू पातु भैरवः।।१७।।

जानुनी मे जगद्दर्ता जङ्घे मे जगदम्बिका।
पादौ मे सततं पातु लोकवन्द्यः सदाशिवः।।१८।।

गिरिशः पातु मे भार्यां भवः पातु सुतान्मम।
मृत्युञ्जयो ममायुष्यं चित्तं मे गणनायकः।।१९।।

सर्वाङ्गं मे सदा पातु कालकालः सदाशिवः।
एतत्ते कवचं पुण्यं देवतानां च दुर्लभम्।।२०।।

 🌹🙏     फल श्रुति-

मृतसञ्जीवनं नाम्ना महादेवेन कीर्तितम्।
सह्स्रावर्तनं चास्य पुरश्चरणमीरितम्।।२१।।

यः पठेच्छृणुयान्नित्यं श्रावयेत्सु समाहितः। 
सकालमृत्युं निर्जित्य सदायुष्यं समश्नुते।।२२।।

हस्तेन वा यदा स्पृष्ट्वा मृतं सञ्जीवयत्यसौ।
आधयोव्याध्यस्तस्य न भवन्ति कदाचन।।२३।।

कालमृयुमपि प्राप्तमसौ जयति सर्वदा।
अणिमादिगुणैश्वर्यं लभते मानवोत्तमः।।२४।।

युद्दारम्भे पठित्वेदमष्टाविशतिवारकं।
युद्दमध्ये स्थितः शत्रुः सद्यः सर्वैर्न दृश्यते।।२५।।

न ब्रह्मादीनि चास्त्राणि क्षयं कुर्वन्ति तस्य वै।
विजयं लभते देवयुद्दमध्येऽपि सर्वदा।।२६।।

प्रातरूत्थाय सततं यः पठेत्कवचं शुभं। 
अक्षय्यं लभते सौख्यमिह लोके परत्र च।।२७।।

सर्वव्याधिविनिर्मृक्तः सर्वरोगविवर्जितः।
अजरामरणो भूत्वा सदा षोडशवार्षिकः।।२८।।

विचरव्यखिलान् लोकान् प्राप्य भोगांश्च दुर्लभान्।
तस्मादिदं महागोप्यं कवचम् समुदाहृतम्।।२९।।

मृतसञ्जीवनं नाम्ना देवतैरपि दुर्लभम्।।३०।।

।। इति वशिष्ठ कृत मृतसञ्जीवन स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

      🎇 हिंदी अर्थ  

      गौरीपति मृत्युञ्जयेश्र्वर भगवान् शंकर की विधिपूर्वक आराधना करने के पश्चात भक्त को सदा मृतसञ्जीवन नामक कवच का सुस्पष्ट पाठ करना चाहिये।

      महादेव भगवान् शङ्कर का यह मृतसञ्जीवन नामक कवच तत्त्व का भी तत्त्व है, पुण्यप्रद है गुह्य और मङ्गल प्रदान करनेवाला है।

       आचार्य शिष्य को उपदेश करते हैं कि- 
     हे वत्स! अपने मन को एकाग्र करके इस मृतसञ्जीवन कवच को सुनो। यह परम कल्याणकारी दिव्य कवच है। इसकी गोपनीयता सदा बनाये रखना।
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      जरा से अभय करने वाले, निरन्तर यज्ञ करने वाले, सभी देवतओं से आराधित हे मृत्युञ्जय महादेव ! आप पूर्व-दिशा में मेरी सदा रक्षा करें।

       अभय प्रदान करनेवाली शक्ति को धारण करनेवाले, तीन मुखोंवाले तथा छ: भुजओंवाले, अग्निरूपी प्रभु सदाशिव अग्रिकोण में मेरी सदा रक्षा करें।

        अट्ठारह भुजाओं से युक्त, हाथ में दण्ड और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, सर्वत्र व्याप्त यमरुपी महादेव शिव दक्षिण-दिशा में मेरी सदा रक्षा करें।

        हाथ में खड्ग और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, धैर्यशाली, दैत्यगणों से आराधित रक्षोरुपी महेश नैर्ऋत्यकोण में मेरी सदा रक्षा करें।

        हाथ में अभयमुद्रा और पाश धारण करनेवाले, सभी रत्नाकरों से सेवित, वरुणस्वरूप महादेव भगवान् शंकर पश्चिम- दिशा में मेरी सदा रक्षा करें।

       हाथों में गदा और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, प्राणोम के रक्षक, सर्वदा गतिशील वायुस्वरूप शंकरजी वायव्यकोण में मेरी सदा रक्षा करें।

       हाथों में शंख और अभयमुद्रा धारण करनेवाले नायक (सर्वमार्गद्रष्टा) सर्वात्मा सर्वव्यापक परमेश्वर भगवान् शिव समस्त दिशाओं के मध्य में मेरी रक्षा करें।

        हाथों में शंख और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, सभी विद्याओं के स्वामी, ईशानस्वरूप भगवान् परमेश्व शिव ईशानकोण में मेरी रक्षा करें।

        ब्रह्मरूपी शिव मेरी ऊर्ध्वभाग में तथा विश्वात्मस्वरूप शिव अधोभाग में मेरी सदा रक्षा करें। शंकर मेरे सिर की और चन्द्रशेखर मेरे ललाट की रक्षा करें।

       मेरे भौंहों के मध्य में सर्वलोकेश और दोनों नेत्रों की त्रिनेत्र भगवान् शंकर रक्षा करें, दोनों भौंहों की रक्षा गिरीश एवं दोनों कानों को रक्षा भगवान् महेश्वर करें।

       महादेव मेरी नासिका की तथा वृषभध्वज मेरे दोनों ओठों की सदा रक्षा करें। 
     दक्षिणामूर्ति मेरी जिह्वा की तथा गिरीश मेरे दाँतों की रक्षा करें।

        मृत्युञ्जय मेरे मुख की एवं नागभूषण भगवान् शिव मेरे कण्ठ की रक्षा करें। 
      पिनाकी मेरे दोनों हाथों की तथा त्रिशूली मेरे हृदय की रक्षा करें।

       पञ्चवक्त्र मेरे दोनों स्तनो की और जगदीश्वर मेरे उदर की रक्षा करें। 
        विरूपाक्ष नाभि की और पार्वतीपति पार्श्वभाग की रक्षा करें।

        गिरीश मेरे दोनों कटिभाग की तथा प्रमथाधिप पृष्टभाग की रक्षा करें। 
         महेश्वर मेरे गुह्यभाग की और भैरव मेरे दोनों ऊरुओं की रक्षा करें।

        जगद्धर्ता मेरे दोनों घुटनों की, जगदम्बिका मेरे दोनों जंघो की तथा लोकवन्दनीय सदाशिव निरन्तर मेरे दोनों पैरों की रक्षा करें।

       गिरीश मेरी भार्या की रक्षा करें तथा भव मेरे पुत्रोंकी रक्षा करें। मृत्युञ्जय मेरे आयु की गणनायक मेरे चित्त की रक्षा करें।

         कालों के काल सदाशिव मेरे सभी अंगो की रक्षा करें। 
💝
       हे वत्स !  देवताओं के लिये भी दुर्लभ इस पवित्र कवच का वर्णन मैंने तुमसे किया है।

       महादेवजी ने मृतसञ्जीवन नामक इस कवच को कहा है। इस कवच की सहस्त्र आवृत्ति को पुरश्चरण कहा गया है।

       जो अपने मन को एकाग्र करके नित्य इसका पाठ करता है, सुनता अथावा दूसरों को सुनाता है, वह अकाल मृत्यु को जीतकर पूर्ण आयु का उपयोग करता है।

        जो व्यक्ति अपने हाथ से मरणासन्न व्यक्ति के शरीर का स्पर्श करते हुए इस मृतसञ्जीवन कवच का पाठ करता है, उस आसन्नमृत्यु प्राणी के भीतर चेतनता आ जाती है। फिर उसे कभी आधि-व्याधि नहीं होती।

यह मृतसञ्जीवन कवच काल के गाल में गये हुए व्यक्ति को भी जीवन प्रदान कर ‍देता है और वह मानवोत्तम अणिमा आदि गुणों से युक्त ऐश्वर्य को प्राप्त करता है।

       युद्ध आरम्भ होने के पूर्व जो इस मृतसञ्जीवन कवच का २८ बार पाठ करके रणभूमि में उपस्थित होता है, वह उस समय सभी शत्रुऔं से अदृश्य रहता है।

       यदि देवताऔं के भी साथ युद्ध छिड जाय तो उसमें उसका विनाश ब्रह्मास्त्र भी नही कर सकते, वह विजय प्राप्त करता है।

       जो प्रात:काल उठकर इस कल्याणकारी कवच सदा पाठ करता है, उसे इस लोक तथा परलोक में भी अक्षय्य सुख प्राप्त होता है।

        वह सम्पूर्ण व्याधियों से मुक्त हो जाता है, सब प्रकार के रोग उसके शरीर से भाग जाते हैं। वह अजर-अमर होकर सदा के लिये सोलह वर्षवाला व्यक्ति बन जाता है।

       इस लोक में दुर्लभ भोगों को प्राप्त कर सम्पूर्ण लोकों में विचरण करता रहता है। इसलिये इस महागोपनीय कवच को मृतसञ्जीवन नाम से कहा है।

यह देवताओं के लिय भी दुर्लभ है।

।। इति वसिष्ठ कृत मृतसञ्जीवन स्तोत्रम् ।।
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