प्रदोष पूजन
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मंगलवार को प्रदोष पूजन(त्रयोदशी) होने पर उसे भौम प्रदोष पूजन कहा जाता है
इस दिन की पूजा में ऋण और आर्थिक परेशानियों से मुक्ति की कामना करनी चाहिए
भौम प्रदोष व्रत
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मानव के लिए अनेक प्रकार के ऋण या कर्ज बताए गए हैं। जिनमें मातृ ऋण, पितृ ऋण, गुरु ऋण आदि। शास्त्रों में मानव जीवन के लिए बताए गए अलग-अलग संस्कारों और धर्म के पालन से यह ऋण उतर जाते हैं।
इसी तरह दैनिक और व्यावहारिक जीवन में भी व्यक्ति अपनी जरुरतों को पूरी करने के लिए धन का कर्ज लेता है। अनेक अवसरों पर पारिवारिक, सामाजिक जीवन में रिश्तेदार या संबंधियों द्वारा किए गए उपकार भी कर्ज का ही रुप है।
इन ऋणों से मुक्ति के लिए हर व्यक्ति भरसक कोशिश करता है। किंतु तमाम कोशिशों के बाद भी जब कर्ज बने रहें तो वह मानसिक भार बन जाते हैं। तब व्यक्ति कर्ज मुक्ति के लिए ऐसे उपाय ढूंढता है, जो उसकी परेशानियां दूर कर मानसिक शांति भी दे।
धर्म शास्त्र में बताए गए व्रत-उपवास ऐसे ही उपाय हैं, जिनका पालन कठिन लगता है, लेकिन अगर उनको आस्था और संकल्प के साथ अपनाया जाए तो उनके सुफल जरुर मिलते हैं। इनमें ही एक व्रत है- भौम प्रदोष व्रत। भौम, मंगल ग्रह का ही एक नाम है। इसलिए जब मंगलवार के दिन प्रदोष तिथि का योग बनता है, तब भौम प्रदोष व्रत रखा जाता है।
सूर्य के अस्त होने के बाद और रात के आने से पहले का समय यानि दिन का ढलना और रात की शुरुआत प्रदोष काल होता है। इस काल में किए जाने वाला व्रत प्रदोष व्रत कहलाता है। इस व्रत में भगवान शंकर की पूजा की जाती है। प्रदोष व्रत हर माह में शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन रखा जाता है। लोक मान्यताओं में द्वादशी एवं त्रयोदशी की तिथि को प्रदोष तिथि कहते हैं। यह व्रत अलग-अलग वारों पर अलग-अलग नामों से जाना जाता हैं। इसी क्रम मे मंगलवार को रखा जाने वाला प्रदोष व्रत भौम प्रदोष व्रत कहलाता है। पद्मपुराण के अनुसार इस दिन मंगल देवता के नामों का पाठ करने वाले व्रती को कर्ज से छुटकारा मिल जाता है।
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पौराणिक मान्यता है कि मंगल भगवान शिव से उत्पन्न हुए। कहीं खून तो कहीं आंसू और कुछ ग्रंथों में शिव के तेज से मंगल की पैदाईश मानी जाती है। यह भी माना जाता है कि शिव की कृपा से ही मंगल ग्रह के रूप में आकाश में स्थित हुआ। इसलिए मंगलवार और शनिवार के प्रदोष व्रत बहुत महत्व का माने गये हैं। यही कारण है कि भौम प्रदोष के दिन प्रदोष के साथ मंगलवार व्रत भी प्रभावकारी माना गया है।
भौम प्रदोष के दिन भगवान शिव की आराधना से जहां सभी दु:खों का अंत होता है, वहीं मंगल की आराधना व्यक्ति को हर बुरी स्थिति से बाहर निकालने वाली होती है। क्योंकि ज्योतिष में मंगल को हर विपरीत स्थितियों और कठिन समय से जूझने की ताकत देने वाला ग्रह माना जाता है।
प्रदोष व्रत में बिना जल पिए व्रत रखना होता है। सुबह स्नान करके भगवान शंकर, पार्वती और नंदी की बेल पत्र, गंगाजल, अक्षत, धूप, दीप सहित पूजा करें।
- किसी विद्वान ब्राह्मण से यह कार्य कराएं। शिवजी का षोडशोपचार पूजा करें। जिसमें भगवान शिव की गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप सहित कुल सोलह सामग्री से पूजा की जाती है।
- भगवान शिव को घी और शक्कर मिले जौ के सत्तू का भोग लगाएं।
- आठ दीपक आठ दिशाओं में जलाएं। आठ बार दीपक रखते समय प्रणाम करें।
- किसी बैल को चारा खिलाकर पानी पिलाएं और उसकी पूजा करें और शिव, पार्वती और नंदी का आवाहन इस मंत्र से करें -
ऋणरोगादिदारिद्र्यपापक्षुदपमृत्यव: । भयशोकमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा।। पृथिव्यां यानि तीर्थानि सागरान्तानि यानि च। अण्डमाश्रित्य तिष्टन्ति प्रदोषे गोवृषस्य तु।। स्पृष्टा तु वृषणौ तस्य श्रृंङ्गमध्ये विलोक्य च । पुच्छं च क कुदं चैव सर्वपापै: प्रमुच्यते ।।
- उस बैल की पूंछ और सिंग को छूने से सभी कामनाएं पूरी होती है। ऐसा खासतौर पर महिलाएं जरुर करें।
- शाम के समय फिर से स्नान करके इसी तरह शिव जी की पूजा करना चाहिए। इस प्रकार प्रदोष व्रत करने से माना जाता है कि व्रती शिव और मंगल की कृपा से हर कर्ज से मुक्ति पाता है। आपका देवेंद्र शुक्ला Mob 9300928179
दक्षिण भारत में प्रदोष व्रत को प्रदोषम के नाम से जाना जाता है और इस व्रत को भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए किया जाता है।
"भवाय भवनाशाय महादेवाय धीमते |
रुद्राय नीलकंठाय शर्वाय शशि मौलिने ||
उग्रयोग्राघनाशाय भीमाय भय हारिने ईशानाय |
नमस्तुभ्यं पशुनाम पतये नमः ||"
ऎसा माना जाता है कि प्रदोष काल में भगवान भोलेनाथ कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा में नृ्त्य करते है. जिन जनों को भगवान श्री भोलेनाथ पर अटूट श्रद्धा विश्वास हो, उन जनों को त्रयोदशी तिथि में पडने वाले प्रदोष व्रत का नियम पूर्वक पालन कर उपवास करना चाहिए. प्रत्येक चन्द्र मास की त्रयोदशी तिथि के दिन प्रदोष व्रत रखने का विधान है. यह व्रत कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों को किया जाता है. सूर्यास्त के बाद के 2 घण्टे 24 मिनट का समय प्रदोष काल के नाम से जाना जाता है. प्रदेशों के अनुसार यह बदलता रहता है. सामान्यत: सूर्यास्त से लेकर रात्रि आरम्भ तक के मध्य की अवधि को प्रदोष काल में लिया जा सकता है।
ऎसा माना जाता है कि प्रदोष काल में भगवान भोलेनाथ कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा में नृ्त्य करते है. जिन जनों को भगवान श्री भोलेनाथ पर अटूट श्रद्धा विश्वास हो, उन जनों को त्रयोदशी तिथि में पडने वाले प्रदोष व्रत का नियम पूर्वक पालन कर उपवास करना चाहिए।
यह व्रत उपवासक को धर्म, मोक्ष से जोडने वाला और अर्थ, काम के बंधनों से मुक्त करने वाला होता है. इस व्रत में भगवान शिव की पूजन किया जाता है. भगवान शिव कि जो आराधना करने वाले व्यक्तियों की गरीबी, मृ्त्यु, दु:ख और ऋणों से मुक्ति मिलती है।
प्रदोष व्रत का माहात्म्य :
शास्त्रों के अनुसार प्रदोष व्रत को रखने से दौ गायों को दान देने के समान पुन्य फल प्राप्त होता है. प्रदोष व्रत को लेकर एक पौराणिक तथ्य सामने आता है कि " एक दिन जब चारों और अधर्म की स्थिति होगी, अन्याय और अनाचार का एकाधिकार होगा, मनुष्य में स्वार्थ भाव अधिक होगी. तथा व्यक्ति सत्कर्म करने के स्थान पर नीच कार्यो को अधिक करेगा।
उस समय में जो व्यक्ति त्रयोदशी का व्रत रख, शिव आराधना करेगा, उस पर शिव कृ्पा होगी. इस व्रत को रखने वाला व्यक्ति जन्म- जन्मान्तर के फेरों से निकल कर मोक्ष मार्ग पर आगे बढता है. उसे उतम लोक की प्राप्ति होती है।
व्रत से मिलने वाले फल :
अलग- अलग वारों के अनुसार प्रदोष व्रत के लाभ प्राप्त होते है।
जैसे👉 सोमवार के दिन त्रयोदशी पडने पर किया जाने वाला वर्त आरोग्य प्रदान करता है. सोमवार के दिन जब त्रयोदशी आने पर जब प्रदोष व्रत किया जाने पर, उपवास से संबन्धित मनोइच्छा की पूर्ति होती है. जिस मास में मंगलवार के दिन त्रयोदशी का प्रदोष व्रत हो, उस दिन के व्रत को करने से रोगों से मुक्ति व स्वास्थय लाभ प्राप्त होता है. व बुधवार के दिन प्रदोष व्रत हो तो, उपवासक की सभी कामना की पूर्ति होने की संभावना बनती है।
गुरु प्रदोष व्रत शत्रुओं के विनाश के लिये किया जाता है. शुक्रवार के दिन होने वाल प्रदोष व्रत सौभाग्य और दाम्पत्य जीवन की सुख-शान्ति के लिये किया जाता है. अत में जिन जनों को संतान प्राप्ति की कामना हो, उन्हें शनिवार के दिन पडने वाला प्रदोष व्रत करना चाहिए. अपने उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए जब प्रदोष व्रत किये जाते है, तो व्रत से मिलने वाले फलों में वृ्द्धि होती है।
व्रत विधि ( गुरु मुख अनुसार )
प्रदोष व्रत करने के लिये उपवसक को त्रयोदशी के दिन प्रात: सूर्य उदय से पूर्व उठना चाहिए. नित्यकर्मों से निवृ्त होकर, भगवान श्री भोले नाथ का स्मरण करें. इस व्रत में आहार नहीं लिया जाता है. पूरे दिन उपावस रखने के बाद सूर्यास्त से एक घंटा पहले, स्नान आदि कर श्वेत वस्त्र धारण किये जाते है।
ईशान कोण की दिशा में किसी एकान्त स्थल को पूजा करने के लिये प्रयोग करना विशेष शुभ रहता है. पूजन स्थल को गंगाजल या स्वच्छ जल से शुद्ध करने के बाद, गाय के गोबर से लीपकर, मंडप तैयार किया जाता है. अब इस मंडप में पद्म पुष्प की आकृ्ति पांच रंगों का उपयोग करते हुए बनाई जाती है।
प्रदोष व्रत कि आराधना करने के लिये कुशा ( दर्भ ) के आसन का प्रयोग किया जाता है. इस प्रकार पूजन क्रिया की तैयारियां कर उतर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठे और भगवान शंकर का पूजन करना चाहिए. पूजन में भगवान शिव के मंत्र "ऊँ नम: शिवाय" इस मंत्र का जाप करते हुए शिव को जल का अर्ध्य देना चाहिए।
प्रदोष व्रत समापन पर उद्धापन :-
इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद व्रत का समापन करना चाहिए. इसे उद्धापन के नाम से भी जाना जाता है।
उद्धापन करने की विधि ( प्रादेशिक मान्यता का ध्यान रक़खे )
इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद व्रत का समापन करना चाहिए. इसे उद्धापन के नाम से भी जाना जाता है।
इस व्रत का उद्धापन करने के लिये त्रयोदशी तिथि का चयन किया जाता है. उद्धापन से एक दिन पूर्व श्री गणेश का पूजन किया जाता है. पूर्व रात्रि में कीर्तन करते हुए जागरण किया जाता है. प्रात: जल्द उठकर मंडप बनाकर, मंडप को वस्त्रों या पद्म पुष्पों से सजाकर तैयार किया जाता है।
"ऊँ उमा सहित शिवाय नम:"
मंत्र की एक माला अर्थात 108 बार जाप करते हुए, हवन किया जाता है. हवन में आहूति के लिये खीर का प्रयोग किया जाता है।
हवन समाप्त होने के बाद भगवान भोलेनाथ की आरती की जाती है. और शान्तिपाठ किया जाता है. अंत: में दो ब्रह्माणों को भोजन कराया जाता है. तथा अपने सामर्थ्य अनुसार दान दक्षिणा देकर आशिर्वाद प्राप्त किया जाता है।
सृष्टि की प्रत्येक वस्तु प्रकृति के विशेष सनातन नियमानुसार ही क्रियाशील है | प्रत्येक कर्म के साथ उसका फल जुड़ा होता है | परन्तु मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने तक ही सीमित है, फल पर मानव का कोई अधिकार नहीं है | समय आने पर कर्म का फल अवश्य प्राप्त होता है... यही प्रकृति का सनातन नियम है| ऐसा ही एक नियम है व्रत | व्रत से ज्ञानशक्ति, विचारशक्ति, बुद्धि, श्रद्धा, मेधा, भक्ति और पवित्रता की वृद्धि होती है और अंतरात्मा शुद्ध होती है |
प्रदोष व्रत में त्रयोदशी तिथि की शाम को गौरीशंकर की पूजा का अत्यधिक महत्व होता है | यह वह समय होता है जब माँ गौरा और भगवान् शंकर अत्यंत शुभ अनुकूल अवस्था में होते हैं | इस समय भगवान् महादेव से प्रत्येक कार्य में विजय और सफलता की प्राप्ति हेतु और सकल मनोकामनाओं की पूर्ती हेतु प्रार्थना के पूजा की जाती है | इस समय प्रभु माँ गौरी के साथ अत्यंत प्रसन्न अवस्था में होते हैं...अतः इस समय की गयी उनकी पूजा, अर्चना और प्रार्थना अवश्य फलीभूत होती है |
स्कन्द पुराण में इसका विवरण मिलता है कि किस प्रकार शांडिल्य मुनि ने इस व्रत की महिमा एक ब्राह्मण महिला से कही | वह ब्राह्मण स्त्री मुनि के पास दो बालको के साथ आई थी, एक उसका अपना पुत्र, सुचिव्रत, और एक अनाथ राजकुमार, धर्मगुप्त, जिसके पिता की युद्ध भूमि में हत्या कर दी गयी थी और शत्रु पक्ष द्वारा राज्य पर कब्ज़ा कर लिया गया था | मुनि के निर्देशानुसार उस ब्राह्मणी और दोनों बालको ने अत्यंत भक्ति और श्रद्धापूर्वक प्रदोष व्रत आरम्भ किये | जब आठवा प्रदोष था, तो सुचिव्रत को अमृत कलश की प्राप्ति हुयी और धर्मगुप्त को उसका खोया राज्य भी प्राप्त हो गया और वह तीनो सुखपूर्वक निवास करने लगे |
एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य इस व्रत पूजा से सम्बंधित यह है की इस पूजा के समय समस्त देवता अपने अपने सूक्ष्म रूप में आकर उपस्थित होते हैं इस पूजा में... जिस से इसकी महत्ता और भी अधिक बढ़ जाती है |
शास्त्रों में इस पूजा की महिमा का विस्तृत व्याखान मिलता है | महादेव के मंदिर में प्रभु के यदि केवल दर्शन ही कर लिए जाएँ तो अनेको जन्मो के पाप ताप नष्ट हो जाते हैं और कई गुना सुख सौभाग्य की प्राप्ति होती है | इस अत्यंत दुर्लभ शुभ समय में मात्र एक बिल्वपत्र तक चढ़ाना अनेको महापूजाओ के समान फलदायी होता है | इस समय शिव मंदिर में दीपक प्रज्वलित करने का बहुत अधिक महत्व है | संध्या काल में यदि इस दिन एक भी दीपक प्रज्वलित कर दिया जाय तो यह अनेको पुण्यो को प्रदान करने वाला कहा गया है , जिससे सकल सांसारिक और आध्यात्मिक शुभ फलो की प्राप्ति होती है | इस समय हम प्रभि से सीधा सम्बन्ध जोड़ सकते हैं | अत्यंत भाग्यशाली होते हैं प्रभु के वह भक्त जो इस व्रत को करते हैं... महादेव शीघ्र ही उनके सकल मनोरथो को अवश्य ही पूर्ण करते हैं | सूत जी के कथानुसार इस व्रत से सौ गौदान जितना फल प्राप्त होता है |
प्रदोष पांच प्रकार के होते हैं :
१) नित्य प्रदोष : प्रत्येक दिवस का गोधूली काल (शाम का समय) सूर्यास्त से ३ घटी (७२ मिन.) पहले जब आकाश में तारे दिखने लगते हैं |
२) पक्ष प्रदोष : शुक्ल पक्ष की चतुर्थी का संध्या काल
३) मास प्रदोष : प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी की संध्या
४) महा प्रदोष : प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी की संध्या और जिस दिन शनिवार का भी संयोग हो (अर्थात शुक्ल पक्ष का शनि प्रदोष )
५) प्रलय प्रदोष : वह समय जब सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड शिव में विलीन हो शिव से ही एक हो जाता है (अर्थात महाप्रलय काल ) |
त्रयोदशी तिथि एक माह में दो बार पड़ती है | एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में | कुछ भक्त जन केवल शुक्ल पक्ष में ही इस व्रत को करते हैं , तो कुछ भक्त जन दोनों पक्षों की त्रयोदशी को | इस तिथि को संध्या समय सभी देव गण कैलाश पर एकत्रित होते हैं और शिव आराधन करते हैं , जिससे साधक को समस्त सुखो और ऐश्वर्यों की प्राप्ति होती है | वार के अनुसार यह व्रत विशेष फलदायी कहा गया है :
रवि (अर्क अथवा सूर्य ) प्रदोष - आरोग्य प्राप्ति और आयु वृद्धि
सोम प्रदोष व्रत- मन: शान्ति और सुरक्षा, सकल मनोरथ सफल
भौम (मंगल ) प्रदोष- ऋण मोचन
बुद्ध प्रदोष - सर्व मनोकामना पूर्ण
गुरु प्रदोष - शत्रु विनाशक, पित्र तृप्ति, भक्ति वृद्धि
शुक्र प्रदोष - अभीष्ट सिद्धि, चारो पदार्थो (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) प्राप्ति
शनि प्रदोष- संतान प्राप्ति
शनि प्रदोष व्रत की महिमा अपार है | यह संतान प्राप्ति हेतु संजीवनी का कार्य करता है |
त्रयोदशी तिथि के देवता कामदेव हैं और अगले दिन पड़ने वाली चतुर्थदशी के देवता भगवान् रूद्र (शिव) स्वयं हैं | और कृष्ण पक्ष की चतुर्थदशी को मासिक शिवरात्री होती है | माघ मास की शिवरात्री महाशिवरात्री कहाती है | शिव ने कामदेव को भस्म अवश्य किया था... परन्तु देवादि देव महादेव समस्त कामनाओ को पूर्ण कर प्रत्येक सुख प्रदान करने वाले देव हैं जो अत्यंत शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं | अत: त्रयोदशी और चतुर्थदशी के योग के समय अर्थात त्रोदाशी को संध्या समय जब सूर्यास्त होने को होता है... तब भगवान् शंकर की पूजा का महत्व और भी अधिक हो जाता है |
इस व्रत को प्रत्येक नर नारी कर सकते हैं | जिन नियमो का पालन इन व्रत को करना होता है, वह हैं :
- अहिंसा
- सत्य वाचन
- ब्रह्मचर्य (दैहिक और मानसिक दोनों प्रकार से )
- दया
- क्षमा
- निंदा और इर्ष्या न करना
कुछ भक्त रात्री जागरण करते हैं... तो कुछ भक्त जन यह व्रत निर्जल निराहार रखते हैं... तो कुछ भक्त फलाहार सहित यह व्रत रखते हैं ... अपनी अपनी सामर्थ्य अनुसार | २४, १४ अथवा १२ वर्ष तक इस व्रत को रखने का संकल्प कुछ भक्त जन लेते हैं ... तो कुछ एक वर्ष तक यह पावन व्रत करते हैं... कुछ भक्त केवल ८ प्रदोष रखते हैं... तो कुछ १६ प्रदोष... |
इस दिन व्रती को प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत हो शिव मंदिर में
सर्वप्रथम नंदी जी, फिर गणपति, कुमार कार्तिकेय, माँ गौरा की पूजा और नाग पूजन के उपरान्त दीप प्रज्वलित कर पंचामृत ( कच्चा दूध, दही, शहद, देसी घी और शक्कर) से शिवाभिषेक करना चाहिए | भगवान् शिव को अभिषेक अत्यंत प्रिय है | पूजा के समय पवित्र भस्म से स्वयं को पहले त्रिपुंड लगाना अत्यंत शुभ होता है | यदि पवित्र भस्म न उपलभध हो, तो मात्र जल से भी त्रिपुंड धारण किया जा सकता है | अथवा तो धूप से बनी भस्म से भी त्रिपुंड लगाया जाता है | और फिर इसी प्रकार की पूजा शाम के समय, सूर्यास्त से घंटा पहले, पुन: स्नान उपरान्त, की जाती है जिसका महत्व अधिक होता है और शिवालय में दीप प्रज्वलित किये जाते हैं | कुछ भक्त पूजा के समय कलश पूजन भी करते हैं | फिर शिव को अत्यंत प्रिय मृत्युंजय मंत्र की एक माला का जप करने का विधान है इस व्रत में |
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टि वर्धनम |
उर्वारुकमिव बन्धनात मृत्युर्मुक्षीय माम्रतात ||
फिर प्रभु को भोग लगा कर प्रसाद ग्रहण किया जाता है और भक्त व्रत खोल लेते हैं और रात्री को अन्न ग्रहण कर लेते हैं | परन्तु कुछ भक्त अगले दिन ही अन्न ग्रहण करते हैं |
महादेव शंकर कृपा निधान हैं... अत: उनकी पूजा सेवा से सभी लौकिक, पारलौकिक अथवा आध्यात्मिक मनोवांछित फल प्राप्त किये जा सकते हैं |
यह व्रत उपवासक को धर्म, मोक्ष से जोडने वाला और अर्थ, काम के बंधनों से मुक्त करने वाला होता है. इस व्रत में भगवान शिव की पूजन किया जाता है. भगवान शिव कि जो आराधना करने वाले व्यक्तियों की गरीबी, मृ्त्यु, दु:ख और ऋणों से मुक्ति मिलती है.
सोमवार के दिन त्रयोदशी पडने पर किया जाने वाला वर्त आरोग्य प्रदान करता है. सोमवार के दिन जब त्रयोदशी आने पर जब प्रदोष व्रत किया जाने पर, उपवास से संबन्धित मनोइच्छा की पूर्ति होती है. जिस मास में मंगलवार के दिन त्रयोदशी का प्रदोष व्रत हो, उस दिन के व्रत को करने से रोगों से मुक्ति व स्वास्थय लाभ प्राप्त होता है. व बुधवार के दिन प्रदोष व्रत हो तो, उपवासक की सभी कामना की पूर्ति होने की संभावना बनती है.
गुरु प्रदोष व्रत शत्रुओं के विनाश के लिये किया जाता है. शुक्रवार के दिन होने वाल प्रदोष व्रत सौभाग्य और दाम्पत्य जीवन की सुख-शान्ति के लिये किया जाता है. अत में जिन जनों को संतान प्राप्ति की कामना हो, उन्हें शनिवार के दिन पडने वाला प्रदोष व्रत करना चाहिए. अपने उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए जब प्रदोष व्रत किये जाते है, तो व्रत से मिलने वाले फलों में वृ्द्धि होती है.
प्रदोष व्रत चन्द्र मास की दोनों त्रयोदशी के दिन किया जाता है जिसमे से एक शुक्ल पक्ष के समय और दूसरा कृष्ण पक्ष के समय होता है। कुछ लोग शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष के प्रदोष के बीच फर्क बताते हैं।
प्रदोष का दिन जब सोमवार को आता है तो उसे सोम प्रदोष कहते हैं, मंगलवार को आने वाले प्रदोष को भौम प्रदोष कहते हैं और जो प्रदोष शनिवार के दिन आता है उसे शनि प्रदोष कहते हैं।
(कृष्ण) - #कृष्ण पक्ष प्रदोष
(शुक्ल) -#शुक्ल पक्ष प्रदोष
जिस दिन त्रयोदशी तिथि प्रदोष काल के समय व्याप्त होती है उसी दिन प्रदोष का व्रत किया जाता है। प्रदोष काल सूर्यास्त से प्रारम्भ हो जाता है। जब त्रयोदशी तिथि और प्रदोष साथ-साथ होते हैं (जिसे त्रयोदशी और प्रदोष का अधिव्यापन भी कहते हैं) वह समय शिव पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ होता है। ऐसा माना जाता है कि प्रदोष के समय शिवजी प्रसन्नचित मनोदशा में होते हैं। द्रिक पञ्चाङ्ग प्रदोष के दिनों के साथ समय भी सूचीबद्ध करता है जो कि शिव पूजा के लिए उपयुक्त समय है।
प्रदोष व्रत करने के लिये उपवसक को त्रयोदशी के दिन प्रात: सूर्य उदय से पूर्व उठना चाहिए. नित्यकर्मों से निवृ्त होकर, भगवान श्री भोले नाथ का स्मरण करें. इस व्रत में आहार नहीं लिया जाता है. पूरे दिन उपावस रखने के बाद सूर्यास्त से एक घंटा पहले, स्नान आदि कर श्वेत वस्त्र धारण किये जाते है.
ईशान कोण की दिशा में किसी एकान्त स्थल को पूजा करने के लिये प्रयोग करना विशेष शुभ रहता है. पूजन स्थल को गंगाजल या स्वच्छ जल से शुद्ध करने के बाद, गाय के गोबर से लीपकर, मंडप तैयार किया जाता है. अब इस मंडप में पद्म पुष्प की आकृ्ति पांच रंगों का उपयोग करते हुए बनाई जाती है.
प्रदोष व्रत कि आराधना करने के लिये कुशा के आसन का प्रयोग किया जाता है. इस प्रकार पूजन क्रिया की तैयारियां कर उतर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठे और भगवान शंकर का पूजन करना चाहिए. पूजन में भगवान शिव के मंत्र "ऊँ नम: शिवाय" इस मंत्र का जाप करते हुए शिव को जल का अर्ध्य देना चाहिए.
इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद व्रत का समापन करना चाहिए. इसे उद्धापन के नाम से भी जाना जाता है.
इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद व्रत का समापन करना चाहिए. इसे उद्धापन के नाम से भी जाना जाता है.
इस व्रत का उद्धापन करने के लिये त्रयोदशी तिथि का चयन किया जाता है. उद्धापन से एक दिन पूर्व श्री गणेश का पूजन किया जाता है. पूर्व रात्रि में कीर्तन करते हुए जागरण किया जाता है. प्रात: जल्द उठकर मंडप बनाकर, मंडप को वस्त्रों या पद्म पुष्पों से सजाकर तैयार किया जाता है. "ऊँ उमा सहित शिवाय नम:" मंत्र का एक माला अर्थात 108 बार जाप करते हुए, हवन किया जाता है. हवन में आहूति के लिये खीर का प्रयोग किया जाता है.
हवन समाप्त होने के बाद भगवान भोलेनाथ की आरती की जाती है. और शान्ति पाठ किया जाता है. अंत: में दो ब्रह्माणों को भोजन कराया जाता है. तथा अपने सामर्थ्य अनुसार दान दक्षिणा देकर आशिर्वाद प्राप्त किया जाता है.
स्थान आधारित प्रदोष व्रत के दिन
यह जानना महत्वपूर्ण है कि प्रदोष के व्रत का दिन दो शहरों के लिए अलग-अलग हो सकता है। यह जरुरी नहीं है कि दोनों शहर अलग-अलग देशों में हों क्योंकि यह बात भारत वर्ष के दो शहरों के लिए भी मान्य है। प्रदोष के लिए व्रत का दिन सूर्यास्त के समय पर निर्भर करता है और जिस दिन सूर्यास्त के बाद त्रयोदशी तिथि प्रबल होती है उस दिन प्रदोष का व्रत किया जाता है। इसीलिए कभी कभी प्रदोष का व्रत त्रयोदशी तिथि के एक दिन पूर्व, द्वादशी तिथि के दिन पड़ जाता है।
क्योंकि सूर्यास्त का समय सभी शहरों के लिए अलग-अलग होता है इसीलिए प्रदोष के व्रत की तालिका का निर्माण शहर की भूगोलिक स्थिति को लेकर करना अत्यधिक जरुरी है। द्रिकपञ्चाङ्ग की तालिका हरेक शहर की भूगोलिक स्थिति को लेकर तैयार की जाती है इसीलिए यह ज्यादा शुद्ध है। अधिकतर पञ्चाङ्ग सभी शहरों के लिए एक ही तालिका को सूचीबद्ध करते हैं इसीलिए वो केवल एक ही शहर के लिए मान्य होते हैं।
प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी के व्रत को प्रदोष व्रत कहते हैं। सूर्यास्त के पश्चात रात्रि के आने से पूर्व का समय प्रदोष काल कहलाता है। इस व्रत में महादेव भोले शंकर की पूजा की जाती है। इस व्रत में व्रती को निर्जल रहकर व्रत रखना होता है। प्रात: काल स्नान करके भगवान शिव की बेल पत्र, गंगाजल, अक्षत, धूप, दीप सहित पूजा करें। संध्या काल में पुन: स्नान करके इसी प्रकार से शिव जी की पूजा करना चाहिए। इस प्रकार प्रदोष व्रत करने से व्रती को पुण्य मिलता है।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार #शनिप्रदोष व्रत शनि के अशुभ प्रभाव से बचाव के लिए उत्तम होता है। शनि प्रदोष व्रत करने वाले पर शनिदेव की असीम कृपा होती है। व्रत करने वाले को इस दिन प्रातः काल भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए इसके बाद शनि देव की पूजा। संध्या काल में सूर्यास्त के बाद रात होने से पहले गोधूली के समय शिव और शनि की पूजा करने से व्रत पूरा होता है। शनि प्रदोष व्रत के दिन ग्यारह बार दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ करने से शनि के अशुभ प्रभाव के कारण जीवन में आ रही परेशानी में कमी आती है।
शास्त्रों के अनुसार प्रदोष व्रत को रखने से दौ गायों को दान देने के समान पुन्य फल प्राप्त होता है. प्रदोष व्रत को लेकर एक पौराणिक तथ्य सामने आता है कि " एक दिन जब चारों और अधर्म की स्थिति होगी, अन्याय और अनाचार का एकाधिकार होगा, मनुष्य में स्वार्थ भाव अधिक होगी. तथा व्यक्ति सत्कर्म करने के स्थान पर नीच कार्यो को अधिक करेगा.
उस समय में जो व्यक्ति त्रयोदशी का व्रत रख, शिव आराधना करेगा, उस पर शिव कृ्पा होगी. इस व्रत को रखने वाला व्यक्ति जन्म- जन्मान्तर के फेरों से निकल कर मोक्ष मार्ग पर आगे बढता है. उसे उतम लोक की प्राप्ति होती है.
इस व्रत के महात्म्य को गंगा नदी के तट पर किसी समय वेदों के ज्ञाता और भगवान के भक्त श्री सूत जी ने सौनकादि ऋषियों को सुनाया था। सूत जी ने कहा है कि कलि युग में जब मनुष्य धर्म के आचरण से हटकर अधर्म की राह पर जा रहा होगा, हर तरफ अन्याय और अत्याचार का बोलबाला होगा। मानव अपने कर्तव्य से विमुख होकर नीच कर्म में संलग्न होगा उस समय प्रदोष व्रत ऐसा व्रत होगा जो मानव को शिव की कृपा का पात्र बनाएगा और नीच गति से मुक्त होकर मनुष्य उत्तम लोक को प्राप्त होगा। त्रयोदशी की रात्रि के प्रथम प्रहर में जो व्यक्ति किसी भेंट के साथ शिव प्रतिमा का दर्शन करता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है; [1]।
सूत जी ने सौनकादि ऋषियों को यह भी कहा कि प्रदोष व्रत से पुण्य से कलियुग में मनुष्य के सभी प्रकार के कष्ट और पाप नष्ट हो जाएंगे। यह व्रत अति कल्याणकारी है, इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य को अभीष्ट की प्राप्ति होगी। इस व्रत में अलग अलग दिन के प्रदोष व्रत से क्या लाभ मिलता है यह भी सूत जी ने बताया। सूत जी ने सौनकादि ऋषियों को बताया कि इस व्रत के महात्मय को सर्वप्रथम भगवान शंकर ने माता सती को सुनाया था। मुझे यही कथा और महात्मय महर्षि वेदव्यास जी ने सुनाया और यह उत्तम व्रत महात्म्य मैने आपको सुनाया है।
प्रदोष व्रत विधान
सूत जी ने कहा है प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी के व्रत को प्रदोष व्रत कहते हैं। सूर्यास्त के पश्चात रात्रि के आने से पूर्व का समय प्रदोष काल कहलाता है। इस व्रत में महादेव भोले शंकर की पूजा की जाती है। इस व्रत में व्रती को निर्जल रहकर व्रत रखना होता है। प्रात: काल स्नान करके भगवान शिव की [बेलपत्र]], गंगाजल, अक्षत, धूप, दीप सहित पूजा करें। संध्या काल में पुन: स्नान करके इसी प्रकार से शिव जी की पूजा करना चाहिए। इस प्रकार #प्रदोष व्रतकरने से व्रती को पुण्य मिलता है।
महत्त्व
सप्ताह के सातों दिन के प्रदोष व्रत का अपना विशेष महत्त्व है
रविवार के दिन प्रदोष व्रत आप रखते हैं तो सदा निरोग रहेंगे।
सोमवार के दिन व्रत करने से आपकी इच्छा फलित होती है।
मंगलवार को प्रदोष व्रत रखने से रोग से मुक्ति मिलती है और आप स्वस्थ रहते हैं।
बुधवार के दिन इस व्रत का पालन करने से सभी प्रकार की कामना सिद्ध होती है।
बृहस्पतिवार के व्रत से शत्रु का नाश होता है।
शुक्रवार प्रदोष व्रत से सौभाग्य की वृद्धि होती है।
शनिवार प्रदोष व्रत से पुत्र की प्राप्ति होती है।
जो व्रत करना हो, उस वार को पड़ने वाली त्रयोदशी का चयन करें तथा उसी वार के अनुसार कथा पढ़े-सुनें ।
रवि त्रयोदशी प्रदोष व्रत और कथा
॥ दोहा ॥
आयु, बुद्धि, आरोग्यता, या चाहो सन्तान ।
शिव पूजन विधवत् करो, दुःख हरे भगवान ॥
किसी समय सभी प्राणियों के हितार्थ परम् पुनीत गंगा के तट पर ऋषि समाज द्वारा एक विशाल सभा का आयोजन किया गया, जिसमें व्यास जी के परम् प्रिय शिष्य पुराणवेत्ता सूत जी महाराज हरि कीर्तन करते हुए पधारे। शौनकादि अट्ठासी हज़ार ऋषि-मुनिगण ने सूत जी को दण्डवत् प्रणाम किया। सूत जी ने भक्ति भाव से ऋषिगण को आशीर्वाद दे अपना स्थान ग्रहण किया। ऋषिगण ने विनीत भाव से पूछा, "हे परम् दयालु! कलियुग में शंकर भगवान की भक्ति किस आराधना द्वारा उपलब्ध होगी? कलिकाल में जब मनुष्य पाप कर्म में लिप्त हो, वेद-शास्त्र से विमुख रहेंगे। दीनजन अनेक कष्टों से त्रस्त रहेंगे। हे मुनिश्रेष्ठ! कलिकाल में सत्कर्मं में किसी की रुचि न होगी, पुण्य क्षीण हो जाएंगे एवं मनुष्य स्वतः ही असत् कर्मों की ओर प्रेरित होगा। इस पृथ्वी पर तब ज्ञानी मनुष्य का यह कर्तव्य हो जाएगा कि वह पथ से विचलित मनुष्य का मार्गदर्शन करे, अतः हे महामुने! ऐसा कौन-सा उत्तम व्रत है जिसे करने से मनवांछित फल की प्राप्ति हो और कलिकाल के पाप शान्त हो जाएं?
'सूत जी बोले-' हे शौनकादि ऋषिगण! आप धन्यवाद के पात्र हैं। आपके विचार प्रशंसनीय व जनकल्याणकारी हैं। आपके हृदय में सदा परहित की भावना रहती है, आप धन्य हैं। हे शौनकादि ऋषिगण! मैं उस व्रत का वर्णन करने जा रहा हूँ जिसे करने से सब पाप और कष्ट नष्ट हो जाते हैं तथा जो धन वृद्धिकारक, सुख प्रदायक, सन्तान व मनवांछित फल प्रदान करने वाला है। इसे भगवान शंकर ने सती जी को सुनाया था।
'सूत जी आगे बोले-' आयु वृद्धि व स्वास्थ्य लाभ हेतु रवि त्रयोदशी प्रदोष का व्रत करें। इसमें प्रातः स्नान कर निराहार रहकर शिव जी का मनन करें। मन्दिर जाकर शिव आराधना करें। माथे पर त्रिपुण धारण कर बेल, धूप, दीप, अक्षत व ऋतु फल अर्पित करें। रुद्राक्ष की माला से सामर्थ्यानुसार, ॐ नमः शिवाय जपे। ब्राह्मण को भोजन कराऐं और दान-दक्षिणा दें, तत्पश्चात्त मौन व्रत धारण करें। संभव हो तो यज्ञ-हवन कराऐं। ॐ ह्रीं क्लीं नमः शिवाय स्वाहा मंत्र से यज्ञ-स्तुति दें। इससे अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। प्रदोष व्रत में व्रती एक बार भोजन करे और पृथ्वी पर शयन करे। इससे सर्व कार्य सिद्ध होते हैं। श्रावण मास में इस व्रत का विशेष महत्त्व है। सभी मनोरथ इस व्रत को करने से पूर्ण होते हैं।
व्रत कथा
एक ग्राम में एक दीन-हीन ब्राह्मण रहता था। उसकी धर्मनिष्ठ पत्नी प्रदोष व्रत करती थी। उनके एक पुत्र था। एक बार वह पुत्र गंगा स्नान को गया। दुर्भाग्यवश मार्ग में उसे चोरों ने घेर लिया और डराकर उससे पूछने लगे कि उसके पिता का गुप्त धन कहाँ रखा है। बालक ने दीनतापूर्वक बताया कि वे अत्यन्त निर्धन और दुःखी हैं। उनके पास गुप्त धन कहाँ से आया।। चोरों ने उसकी हालत पर तरस खाकर उसे छोड़ दिया। बालक अपनी राह हो लिया। चलते-चलते वह थककर चूर हो गया और बरगद के एक वृक्ष के नीचे सो गया। तभी उस नगर के सिपाही चोरों को खोजते हुए उसी ओर आ निकले। उन्होंने ब्राह्मण-बालक को चोर समझकर बन्दी बना लिया और राजा के सामने उपस्थित किया। राजा ने उसकी बात सुने बगैर उसे कारावास में डलवा दिया। उधर बालक की माता प्रदोष व्रत कर रही थी। उसी रात्रि राजा को स्वप्न आया कि वह बालक निर्दोष है। यदि उसे नहीं छोड़ा गया तो तुम्हारा राज्य और वैभव नष्ट हो जाएगा। सुबह जागते ही राजा ने बालक को बुलवाया। बालक ने राजा को सच्चाई बताई। राजा ने उसके माता-पिता को दरबार में बुलवाया। उन्हें भयभीत देख राजा ने मुस्कुराते हुए कहा- 'तुम्हारा बालक निर्दोष और निडर है। तुम्हारी दरिद्रता के कारण हम तुम्हें पांच गांव दान में देते हैं।' इस तरह ब्राह्मण आनन्द से रहने लगा। शिव जी की दया से उसकी दरिद्रता दूर हो गई।
सोम त्रयोदशी प्रदोष व्रत और कथा
सोम त्रयोदशी प्रदोष व्रत से शिव-पार्वती प्रसन्न होते हैं। व्रती के समस्त मनोरथ पूर्ण होते हैं।
व्रत कथा
एक नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी। उसके पति का स्वर्गवास हो गया था। उसका अब कोई आश्रयदाता नहीं था, इसलिए प्रातः होते ही वह अपने पुत्र के साथ भीख माँगने निकल पड़ती थी। भिक्षाटन से ही वह स्वयं व पुत्र का पेट पालती थी। एक दिन ब्राह्मणी घर लौट रही थी तो उसे एक लड़का घायल अवस्था में कराहता हुआ मिला। ब्राह्मणी दयावश उसे अपने घर ले आई। वह लड़का विदर्भ का राजकुमार था। शत्रु सैनिकों ने उसके राज्य पर आक्रमण कर उसके पिता को बन्दी बना लिया था और राज्य पर नियंत्रण कर लिया था, इसलिए वह मारा-मारा फिर रहा था। राजकुमार ब्राह्मण-पुत्र के साथ ब्राह्मणी के घर रहने लगा। एक दिन अंशुमति नामक एक गंधर्व कन्या ने राजकुमार को देखा और उस पर मोहित हो गई। अगले दिन अंशुमति अपने माता-पिता को राजकुमार से मिलाने लाई। उन्हें भी राजकुमार भा गया। कुछ दिनों बाद अंशुमति के माता-पिता को शंकर भगवान ने स्वप्न में आदेश दिया कि राजकुमार और अंशुमति का विवाह कर दिया जाए। उन्होंने वैसा ही किया। ब्राह्मणी प्रदोष व्रत करती थी। उसके व्रत के प्रभाव और गंधर्वराज की सेना की सहायता से राजकुमार ने विदर्भ से शत्रुओं को खदेड़ दिया और पिता के राज्य को पुनः प्राप्त कर आनन्दपूर्वक रहने लगा। राजकुमार ने ब्राह्मण-पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बनाया। ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत के माहात्म्य से जैसे राजकुमार और ब्राह्मण-पुत्र के दिन फिरे, वैसे ही शंकर भगवान अपने दूसरे भक्तों के दिन भी फेरते हैं।
मंगल त्रयोदशी प्रदोष व्रत और कथा
मंगल त्रयोदशी प्रदोष व्रत व्याधियों का नाश करता है। ऋण से मुक्ति प्रदान करता है, सुख-शान्ति और श्रीवृद्धि करता है।
व्रत कथा
एक नगर में एक वृद्धा निवास करती थी। उसके मंगलिया नामक एक पुत्र था। वृद्धा की हनुमान जी पर गहरी आस्था थी। वह प्रत्येक मंगलवार को नियमपूर्वक व्रत रखकर हनुमान जी की आराधना करती थी। उस दिन वह न तो घर लीपती थी और न ही मिट्टी खोदती थी। वृद्धा को व्रत करते हुए अनेक दिन बीत गए। एक बार हनुमान जी ने उसकी श्रद्धा की परीक्षा लेने की सोची। हनुमान जी साधु का वेश धारण कर वहाँ गए और पुकारने लगे -'है कोई हनुमान भक्त जो हमारी इच्छा पूर्ण करे?' पुकार सुन वृद्धा बाहर आई और बोली- 'आज्ञा महाराज?' साधु वेशधारी हनुमान बोले- 'मैं भूखा हूँ, भोजन करूँगा। तू थोड़ी ज़मीन लीप दे।' वृद्धा दुविधा में पड़ गई। अंततः हाथ जोड़ बोली- 'महाराज! लीपने और मिट्टी खोदने के अतिरिक्त आप कोई दूसरी आज्ञा दें, मैं अवश्य पूर्ण करूँगी।' साधु ने तीन बार प्रतिज्ञा कराने के बाद कहा- 'तू अपने बेटे को बुला। मै उसकी पीठ पर आग जलाकर भोजन बनाऊँगा।' वृद्धा के पैरों तले धरती खिसक गई, परंतु वह प्रतिज्ञाबद्ध थी। उसने मंगलिया को बुलाकर साधु के सुपुर्द कर दिया। मगर साधु रूपी हनुमान जी ऐसे ही मानने वाले न थे। उन्होंने वृद्धा के हाथों से ही मंगलिया को पेट के बल लिटवाया और उसकी पीठ पर आग जलवाई। आग जलाकर, दुखी मन से वृद्धा अपने घर के अन्दर चली गई। इधर भोजन बनाकर साधु ने वृद्धा को बुलाकर कहा- 'मंगलिया को पुकारो, ताकि वह भी आकर भोग लगा ले।' इस पर वृद्धा बहते आंसुओं को पौंछकर बोली -'उसका नाम लेकर मुझे और कष्ट न पहुंचाओ।' लेकिन जब साधु महाराज नहीं माने तो वृद्धा ने मंगलिया को आवाज़ लगाई। पुकारने की देर थी कि मंगलिया दौड़ा-दौड़ा आ पहुँचा। मंगलिया को जीवित देख वृद्धा को सुखद आश्चर्य हुआ। वह साधु के चरणों में गिर पड़ी। साधु अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए। हनुमान जी को अपने घर में देख वृद्धा का जीवन सफल हो गया। मंगल प्रदोष व्रत से शंकर (हनुमान भी रुद्र हैं) और पार्वती जी इसी तरह भक्तों को साक्षात् दर्शन देकर कृतार्थ करते हैं।
बुध त्रयोदशी प्रदोष व्रत और कथा
बुध त्रयोदशी प्रदोष व्रत से सर्व कामनाएँ पूर्ण होती हैं। इस व्रत में हरी वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए। शंकर भगवान की आराधना धूप, बेल-पत्रादि से करनी चाहिए।
व्रत कथा
एक पुरुष का नया-नया विवाह हुआ। विवाह के दो दिनों बाद उसकी पत्नी मायके चली गई। कुछ दिनों के बाद वह पुरुष पत्नी को लेने उसके यहाँ गया। बुधवार को जब वह पत्नी के साथ लौटने लगा तो ससुराल पक्ष ने उसे रोकने का प्रयत्न किया कि विदाई के लिए बुधवार शुभ नहीं होता। लेकिन वह नहीं माना और पत्नी के साथ चल पड़ा। नगर के बाहर पहुँचने पर पत्नी को प्यास लगी। पुरुष लोटा लेकर पानी की तलाश में चल पड़ा। पत्नी एक पेड़ के नीचे बैठ गई। थोड़ी देर बाद पुरुष पानी लेकर वापस लौटा उसने देखा कि उसकी पत्नी किसी के साथ हंस-हंसकर बातें कर रही है और उसके लोटे से पानी पी रही है। उसको क्रोध आ गया। वह निकट पहुँचा तो उसके आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा। उस आदमी की सूरत उसी की भांति थी। पत्नी भी सोच में पड़ गई। दोनों पुरुष झगड़ने लगे। भीड़ इकट्ठी हो गई। सिपाही आ गए। हमशक्ल आदमियों को देख वे भी आश्चर्य में पड़ गये। उन्होंने स्त्री से पूछा 'उसका पति कौन है?' वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई। तब वह पुरुष शंकर भगवान से प्रार्थना करने लगा- 'हे भगवान! हमारी रक्षा करें। मुझसे बड़ी भूल हुई कि मैंने सास-श्वशुर की बात नहीं मानी और बुधवार को पत्नी को विदा करा लिया। मैं भविष्य में ऐसा कदापि नहीं करूँगा।' जैसे ही उसकी प्रार्थना पूरी हुई, दूसरा पुरुष अन्तर्धान हो गया। पति-पत्नी सकुशल अपने घर पहुँच गए। उस दिन के बाद से पति-पत्नी नियमपूर्वक बुध त्रयोदशी प्रदोष व्रत रखने लगे।
गुरु त्रयोदशी प्रदोष व्रत और कथा
शत्रु विनाशक-भक्ति प्रिय, व्रत है यह अति श्रेष्ठ।
वार मास तिथि सर्व से, व्रत है यह अति ज्येष्ठ॥
व्रत कथा
एक बार इन्द्र और वृत्रासुर की सेना में घनघोर युद्ध हुआ। देवताओं ने दैत्य-सेना को पराजित कर नष्ट-भ्रष्ट कर डाला। यह देख वृत्रासुर अत्यन्त क्रोधित हो स्वयं युद्ध को उद्यत हुआ। आसुरी माया से उसने विकराल रूप धारण कर लिया। सभी देवता भयभीत हो गुरुदेव बृहस्पति की शरण में पहुँचे। बृहस्पति महाराज बोले- पहले मैं तुम्हे वृत्रासुर का वास्तविक परिचय दे दूँ। वृत्रासुर बड़ा तपस्वी और कर्मनिष्ठ है। उसने गन्धमादन पर्वत पर घोर तपस्या कर शिव जी को प्रसन्न किया। पूर्व समय में वह चित्ररथ नाम का राजा था। एक बार वह अपने विमान से कैलाश पर्वत चला गया। वहाँ शिव जी के वाम अंग में माता पार्वती को विराजमान देख वह उपहासपूर्वक बोला- 'हे प्रभो! मोह-माया में फँसे होने के कारण हम स्त्रियों के वशीभूत रहते हैं। किन्तु देवलोक में ऐसा दृष्टिगोचर नहीं हुआ कि स्त्री आलिंगनबद्ध हो सभा में बैठे।' चित्ररथ के यह वचन सुन सर्वव्यापी शिवशंकर हंसकर बोले- 'हे राजन! मेरा व्यावहारिक दृष्टिकोण पृथक है। मैंने मृत्युदाता-कालकूट महाविष का पान किया है, फिर भी तुम साधारणजन की भाँति मेरा उपहास उड़ाते हो!' माता पार्वती क्रोधित हो चित्ररथ से संबोधित हुई- 'अरे दुष्ट! तूने सर्वव्यापी महेश्वर के साथ मेरा भी उपहास उड़ाया है। अतएव मैं तुझे वह शिक्षा दूँगी कि फिर तू ऐसे संतों के उपहास का दुस्साहस नहीं करेगा- अब तू दैत्य स्वरूप धारण कर विमान से नीचे गिर, मैं तुझे शाप देती हूं।' जगदम्बा भवानी के अभिशाप से चित्ररथ राक्षस योनि को प्राप्त हो त्वष्टा नामक ऋषि के श्रेष्ठ तप से उत्पन्न हो वृत्रासुर बना। 'वृत्रासुर बाल्यकाल से ही शिवभक्त रहा है। अतः हे इन्द्र तुम बृहस्पति प्रदोष व्रत कर शंकर भगवान को प्रसन्न करो।' देवराज ने गुरुदेव की आज्ञा का पालन कर बृहस्पति प्रदोष व्रत किया। गुरु प्रदोष व्रत के प्रताप से इन्द्र ने शीघ्र ही वृत्रासुर पर विजय प्राप्त कर ली और देवलोक में शान्ति छा गई।
शुक्र त्रयोदशी प्रदोष व्रत और कथा
अभीष्ट सिद्धि की कामना, यदि हो हृदय विचार।
धर्म, अर्थ, कामादि, सुख, मिले पदारथ चार॥
व्रत कथा
प्राचीनकाल की बात है, एक नगर में तीन मित्र रहते थे - एक राजकुमार, दूसरा ब्राह्मण कुमार और तीसरा धनिक पुत्र। राजकुमार व ब्राह्मण कुमार का विवाह हो चुका था। धनिक पुत्र का भी विवाह हो गया था, किन्तु गौना शेष था। एक दिन तीनों मित्र स्त्रियों की चर्चा कर रहे थे। ब्राह्मण कुमार ने स्त्रियों की प्रशंसा करते हुए कहा- 'नारीहीन घर भूतों का डेरा होता है।' धनिक पुत्र ने यह सुना तो तुरन्त ही अपनी पत्नी को लाने का निश्चय किया। माता-पिता ने उसे समझाया कि अभी शुक्र देवता डूबे हुए हैं। ऐसे में बहू-बेटियों को उनके घर से विदा करवा लाना शुभ नहीं होता। किन्तु धनिक पुत्र नहीं माना और ससुराल जा पहुँचा। ससुराल में भी उसे रोकने की बहुत कोशिश की गई, मगर उसने ज़िद नहीं छोड़ी। माता-पिता को विवश होकर अपनी कन्या की विदाई करनी पड़ी। ससुराल से विदा हो पति-पत्नी नगर से बाहर निकले ही थे कि उनकी बैलगाड़ी का पहिया अलग हो गया और एक बैल की टांग टूट गई। दोनों को काफ़ी चोटें आईं फिर भी वे आगे बढ़ते रहे। कुछ दूर जाने पर उनकी भेंट डाकुओं से हो गई। डाकू धन-धान्य लूट ले गए। दोनों रोते-पीटते घर पहुँचे। वहाँ धनिक पुत्र को साँप ने डस लिया। उसके पिता ने वैद्य को बुलवाया। वैद्य ने निरीक्षण के बाद घोषणा की कि धनिक पुत्र तीन दिन में मर जाएगा; जब ब्राह्मण कुमार को यह समाचार मिला तो वह तुरन्त आया। उसने माता-पिता को शुक्र प्रदोष व्रत करने का परामर्श दिया और कहा- 'इसे पत्नी सहित वापस ससुराल भेज दें। यह सारी बाधाएँ इसलिए आई हैं क्योंकि आपका पुत्र शुक्रास्त में पत्नी को विदा करा लाया है। यदि यह वहाँ पहुँच जाएगा तो बच जाएगा।' धनिक को ब्राह्मण कुमार की बात ठीक लगी। उसने वैसा ही किया। ससुराल पहुँचते ही धनिक कुमार की हालत ठीक होती चली गई। शुक्र प्रदोष के माहात्म्य से सभी घोर कष्ट टल गए ।
शनि त्रयोदशी प्रदोष व्रत और कथा
पुत्र कामना हेतु यदि, हो विचार शुभ शुद्ध।
शनि प्रदोष व्रत परायण, करे सुभक्त विशुद्ध॥
व्रत कथा
प्राचीन समय की बात है। एक नगर सेठ धन-दौलत और वैभव से सम्पन्न था। वह अत्यन्त दयालु था। उसके यहाँ से कभी कोई भी ख़ाली हाथ नहीं लौटता था। वह सभी को जी भरकर दान-दक्षिणा देता था। लेकिन दूसरों को सुखी देखने वाले सेठ और उसकी पत्नी स्वयं काफ़ी दुखी थे। दुःख का कारण था- उनके सन्तान का न होना। सन्तानहीनता के कारण दोनों घुले जा रहे थे। एक दिन उन्होंने तीर्थयात्रा पर जाने का निश्चय किया और अपने काम-काज सेवकों को सौंपकर चल पड़े। अभी वे नगर के बाहर ही निकले थे कि उन्हें एक विशाल वृक्ष के नीचे समाधि लगाए एक तेजस्वी साधु दिखाई पड़े। दोनों ने सोचा कि साधु महाराज से आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा शुरू की जाए। पति-पत्नी दोनों समाधिलीन साधु के सामने हाथ जोड़कर बैठ गए और उनकी समाधि टूटने की प्रतीक्षा करने लगे। सुबह से शाम और फिर रात हो गई, लेकिन साधु की समाधि नहीं टूटी। मगर सेठ पति-पत्नी धैर्यपूर्वक हाथ जोड़े पूर्ववत बैठे रहे। अंततः अगले दिन प्रातः काल साधु समाधि से उठे। सेठ पति-पत्नी को देख वह मन्द-मन्द मुस्कराए और आशीर्वाद स्वरूप हाथ उठाकर बोले- 'मैं तुम्हारे अन्तर्मन की कथा भांप गया हूँ वत्स! मैं तुम्हारे धैर्य और भक्तिभाव से अत्यन्त प्रसन्न हूँ।' साधु ने सन्तान प्राप्ति के लिए उन्हें शनि प्रदोष व्रत करने की विधि समझाई और शंकर भगवान की निम्न वन्दना बताई।
हे रुद्रदेव शिव नमस्कार।
शिव शंकर जगगुरु नमस्कार॥
हे नीलकंठ सुर नमस्कार।
शशि मौलि चन्द्र सुख नमस्कार॥
हे उमाकान्त सुधि नमस्कार।
उग्रत्व रूप मन नमस्कार ॥
ईशान ईश प्रभु नमस्कार।
विश्वेश्वर प्रभु शिव नमस्कार॥
तीर्थयात्रा के बाद दोनों वापस घर लौटे और नियमपूर्वक शनि प्रदोष व्रत करने लगे। कालान्तर में सेठ की पत्नी ने एक सुन्दर पुत्र जो जन्म दिया। शनि प्रदोष व्रत के प्रभाव से उनके यहाँ छाया अन्धकार लुप्त हो गया। दोनों आनन्दपूर्वक रहने लगे।
त्रयोदशी व्रत उद्यापन विधि
धर्मालुओं को ग्यारह त्रयोदशी अथवा वर्ष भर की 26 त्रयोदशी के व्रत करने के उपरान्त उद्यापन करना चाहिए। कार्य सिद्धि के उपरान्त त्रयोदशी के दिन ही उद्यापन करें। एक दिन पूर्व गणेश पूजन करें। रात्रि में भजन-कीर्तन द्वारा जागरण करें। प्रातः स्नानादि के उपरान्त रंगीन पद्म-पुष्प अथवा वस्त्रों से मंडप को सजाएं। मंडप में शिव-पार्वती की मूर्ति स्थापित कर विधिपूर्वक पूजन करें। हवन में खीर की आहुति देते हुए ॐ उमा सहित शिवाय नमः मन्त्र का 108 बार जप करें। हवन के बाद आरती उतारें और शान्ति पाठ करें। तत्पश्चात् दो ब्राह्मणों को भोजन कराऐं तथा यथाशक्ति दान दें। ब्राह्मणों का आशीर्वाद लें। स्कन्द पुराण में कहा गया है कि जो स्त्री-पुरुष विधि-विधान के साथ यह व्रत एवं उद्यापन करते हैं, भगवान शंकर-पार्वती उनकी समस्त मनोकामनाऐं पूर्ण करते हैं। फलस्वरूप उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है।
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