Day 1 || श्री कावड़ शिवमहापुराण कथा || पूज्य पंडित प्रदीप जी मिश्रा (सीहोर वाले) || रायपुर, छत्तीसगढ़
1/8/2023
चलिए जानते हैं कि आपने तिलदा नेवरा रायपुर छत्तीसगढ़ में आयोजित की जा रही प्रथम दिन की श्री शिव पुराण महा कथा कथा पूरी सुनी या नहीं?
प्रश्न नंबर 1
घनश्याम लाल अग्रवाल जी के परिवार द्वारा तिलदा नेवरा रायपुर छत्तीसगढ़ में आयोजित की जा रही श्री शिव पुराण महा कथा का श्रेय गुरुजी उन्हें नहीं देते हो फिर किला देते हैं?
चलिए हम बताते हैं वे इसका श्रेय उनकी पोती देविका को देते हैं । क्योंकि पुत्री प्राप्ति के लिए अग्रवाल परिवार ने प्रण किया था कि अगर हमारे घर में बेटी आएगी तो हम शिव कथा का आयोजन कराएंगे।
सबसे सुंदर फूल ढूंढना
प्रश्न नंबर 2
एक व्यक्ति और उसकी पत्नी को एक सुंदर बगीचे में से सबसे सुंदर फूल ढूंढने के लिए कहा गया। जिसमें जाने का एक ही नियम था कि आप जिस रास्ते से जाएंगे उसे वापस नहीं लौट सकते? तो क्या वे सबसे सुंदर फूल आ सके ?
जब वह दोनों उसमें घुस गए तो सबसे पहले उन्हें एक बहुत सुंदर फूल दिखाई दिया । देखते हैं शायद इससे सुंदर फुल आगे मिल जाए यह सोचते हुए वे आगे बढ़ गए। कुछ और आगे बढ़े तो उन्हें और सुंदर फूल मिला। इसी प्रकार और सुंदर और सुंदर और सुंदर को ढूंढने गए लालच में वह उस बगीचे के अंतिम छोर पर पहुंच गए जहां पर एक साधारण सा फूल खिला हुआ था। मजबूरी में उन्हें वहीं फूल तोड़ना पड़ा।
आजकल हमारी भी यही स्थिति बनी हुई है कि हम जो वर्तमान में है उसे प्राप्त करके खुश नहीं है और सुंदर और सुंदर और सुंदर पाने के चक्कर में हम अपने जीवन को व्यर्थ किए हुए हैं। गुरुदेव कहते हैं कि यदि अपने जीवन में संतुष्टि को लाया जाज तो उसी में ही खुश रहोगे।
प्रश्न नंबर 3
द्रौपदी ने कौन सा पुणु क्या है कि उसे पांच पांच आज्ञाकारी पति मिले ?
एक बार सत्यभामा ने रुकमणी जी से प्रश्न किया की एक बात समझ नहीं आती द्रौपदी जी को पांच पांच पति मिले और वह भी आज्ञाकारी हैं और उसके कहे में चलते हैं । जो वह कहे वह करने के लिए तैयार रहते हैं, और हमारे पति हैं कि 16108 पत्नियों के पति हैं और वह भी अपनी ही मर्जी से चलते हैं।
द्रौपदी के पास ऐसा क्या है ऐसी कौन सी चीज है कि उसके पति उसके कहे में चलते हैं।
तब सत्यभामा द्रोपदी के पास गई और बोली द्रौपदी हमारे एक पति और वह भी हमारे कहे में नहीं चलते और तुम्हारे पांच पांच पति और पांचों पति तुम्हारी कहे में चलते हैं। इसका रहस्य मुझे बतलाइए।
तब द्रोपदी सत्यभामा से बोली, 'हे सत्यभामा ! मुझे नहीं मालूम कि मेरे पास ऐसा क्या है ? परंतु जब मैं विवाह करके यहां आई तो मेरे पतियों ने अपनी मां से कहा देखो मां हम क्या लाए हैं? तो मां ने बिना देखे ही कह दिया कि उसे आपस में बांट लो।
तब मेरे पतियों ने मेरे पास आकर कहा कि हमारी मां ने आदेश दिया है कि हम पांचो आपको बांट लें। तब मैंने उनसे कहा था कि अब वे केवल आपकी ही मां नहीं है, अब मैं शादी करके आपके घर आ गई हूं इसलिए अब वे मेरी भी मां है और उनका आदेश मेरे लिए भी आदेश है। मैं उनका आदेश मानने के लिए तैयार हूं।
प्रिय सत्यभामा ! शायद मैंने अपने पतियों की माता के आदेश का सम्मान किया है इसलिए वे सभी मेरे हर आदेश का सम्मान करते हुए मेरे हर कार्य को करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।
इस पर गुरु जी कहते हैं कि जिस घर में नारी अपने बुजुर्गों का सम्मान करती है। उस घर में पुरुषों द्वारा नारियों का भी सम्मान किया जाता है।
नंद नार की कथा
प्रश्न नंबर 4
नंदलाल की कथा क्या आपने पूरी सुनी ?
क्या कहा सोच में पड़ गए,
तो हम आपको बता दें कि आज की कथा में यह कथा अधूरी रह गई। चलो हम इसे आपको पूरा सुनाते हैं?
नंदनार तमिलनाडु के एक छोटे से गांव में रहता था। वह भोले का भक्त था। यह जरूरी नहीं कि भगवान शिव का भक्त धनवान हो महान व्यक्ति हो परंतु यदि शिव भक्त के पास में भक्ति है भजन है जल चढ़ाने के लिए एक लोटा है और घर में जल है तो वही सबसे महान शिव भक्त है।
नंदनार के माता पिता बहुत गरीब थे उन्होंने उसे एक साहूकार के हाथों कुछ पैसों में बेच दिया इस प्रकार नंदनार बंधुआ मजदूर बनकर रह गया। उससे बहुत काम कराया जाता उससे खेती कराई जाती, उससे मजदूरी कराई जाती ,उससे सभी काम कराए जाते।
नंदनार सेठ जी के यहां जो काम किया करता था उस गांव से 25 किलोमीटर दूर तिरुकुंबुर नाम का एक शिव मंदिर था। साहूकार भी ऐसा कि उससे दिन रात काम लेता मुश्किल से एका दो घड़ी ही उसे आराम करने देता।
1 दिन साहस करके वह साहूकार से बोला, ‘मैं आज ही सारा काम कर दूंगा। शिव बाबा के दर्शन करना चाहता हूं। कल सिर्फ एक दिन की बात है, मैं जाकर वापस आ जाऊंगा।’
उस एक पल में जमींदार ने न जाने कैसे हां कह दिया, ‘ठीक है, जाओ। शाम से पहले वापस आ जाना।’
फिर अचानक उसे एहसास हुआ कि उसने ये क्या कह दिया। वह आगे बोला, ‘जाने से पहले तुम्हें पूरे चालीस एकड़ जमीन को जोतना होगा। अभी शाम है। सुबह से पहले तुम जुताई पूरी करके ही मंदिर जा सकते हो।’
नंदनार इतना मूर्ख नहीं था कि इसकी कोशिश करता। वह भगवान भोलेनाथ को याद करते हुए, चुपचाप सोने चला गया। उसका पूरा शरीर फड़क रहा था। वह जानता था कि इस बार उसे मंदिर जाना ही है, चाहे इसका नतीजा कुछ भी हो।
सुबह जब वह उठा, तो गांव में हंगामा मचा हुआ था। वह यह देखकर हैरान रह गये थे कि सारी चालीस एकड़ जमीन जोती हुई थी। जमींदार का मुंह खुला का खुला रह गया था। जमींदार के बीवी-बच्चे आकर नंदनार के पैरों पर गिर पड़े।
लोगों ने आकर नंदनार के हाथों में चांदी के सिक्के रख दिए, किसी ने उसके हाथ में भोजन का थैला रख दिया। किसी ने उसे छड़ी पकड़ा दी और कहा, ‘यह मंदिर जा रहा है, इसे ईश्वर ने खुद चुना है। शिव ने इसके लिए खुद आकर चालीस एकड़ जमीन जोत दी।’
वह दिल में परम आनंद लेकर मंदिर गया। मगर उस गरीबी में भी वह नहीं भूला था कि पुजारी उसे मंदिर की देहरी पार नहीं करने देंगे। वह मंदिर के बाहर निश्चित रूप से खड़ा रहा। शायद यही से उन्हें शिव के दर्शन हो जाए। उसने मंदिर में जाने का प्रयास किया तो पुजारियों ने उसे रोक दिया और उसे बाहर से एक दर्शन करने का आदेश सुना दिय।
नंदनार ने पुजारियों से कहा भगवन में भोले बाबा के दर्शन करने आया हूं और यह नंदी जी बीच में आ रहे हैं। ऐसे में मुझे दर्शन कैसे होंगे। मुझे बाहर द्वार से ही दर्शन करने दो।
निश्चित रूप से शिव अपने भक्त के लिए सब कुछ बदल देते हैं, मगर पुजारी नहीं झुकते। नंदनार सिर्फ एक बार शिव के दर्शन करना चाहता था। वह इस शिव की आज्ञा मानकर द्वार के बाहर ही खड़ा हो गया और भोले बाबा से प्रार्थना करने लगा।
हे बाबा आप मेरे लिए रातों-रात 40 एकड़ की जमीन जोत सकते हैं तो क्या आज मुझे पूरे दर्शन ही दोगे क्या मैं अपनी इस इच्छा को दिल में लिए वापस अपने मालिक साहूकार के पास चला जाऊंगा।
जानते हो तब क्या हुआ?
तब, उसके रास्ते में खड़ी नंदी की विशाल मूर्ति एक ओर खिसक गई। आज भी तिरुपुंगुर में नंदी की मूर्ति एक ओर को है।
बाद में लोग इस शख्स को नंयनार कहकर बुलाने लगे और वह एक मशहूर संत बन गया। आप उसे भक्त नहीं कह सकते, उसका पूरा जीवन बस कौतुहल या जिज्ञासा से भरा था और उसने कभी उस कौतुहल को जाने नहीं दिया।
लंकापति रावण
प्रश्न नंबर 5
जब रावण ने भोले बाबा के शिवलिंग को
एक बार रावण ने भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग को लंका ले जाने की सोची । जब भी वह उसे ले जाने का प्रयास करता तो हलाहल विष की गंध उसे परेशान करती? वह अचेत सा होने लगता। तो इस हलाहल विष की गंध उसने किस प्रकार दूर की?
जब विद्वता के अनुसार लंकापति रावण को पता लगा कि भगवान भोलेनाथ ने समुद्र मंथन के समय हलाहल विष का पान किया था। जब उन्होंने अंजलि में भरकर हलाहल विष को पीने के लिए मुख्य के पास लेकर आए तो उसकी गंध नासिका के द्वारा उनके शरीर में चली गई और उनके शरीर में उस विष की गंध बस गई । वह कैसे दूर होगी? रावण यही सोचता रहता।
एक रोज लंकापति रावण को तुंबरूका जी के दर्शन प्राप्त हुए तो उन्होंने तुंबरूका जी से प्रश्न किया कि हलाहल विष पान के समय जो गंध भोले बाबा के दिमाग में बस गई वह कैसे निकलेगी।
इस पर तुंबरूका जी ने कहा, 'हे दशानन ! सुनो , सावन का महीना हो, और दोनों हाथों से जल द्वारा भगवान भोलेनाथ का अभिषेक हो तो जैसे जैसे अभिषेक होता है वैसे वैसे ही इसकी गंध कम होती जाती है और जैसे-जैसे विश की गंध कम होती जाती है वैसे वैसे ही जल चढ़ाने वाला निहाल होता चला जाता है उसके जीवन में वैभव सत्ता बढ़ती चली जाती है और वह आगे और आगे बढ़ता ही चला जाता है।
तुंबरूका जी बोले, ' हे रावण! तुम्हें यदि भगवान भोलेनाथ की विष की गंध को दूर करनी है तो जल लाकर भगवान का अभिषेक करो।
तो उसने विश्व की गंद दूर करने के लिए उसी भाव से रावण अपने कंधों पर जल लेकर आया और भगवान भोलेनाथ का अभिषेक किया । आज उसी जल लाने के तंत्र (यंत्र) को हम कावड़ के नाम से जानते हैं।
प्रश्न नंबर 6
जो लोग कांवर लाने वालों को क्रिटिसाइज करते हैं उनके लिए गुरुदेव ने क्या कहा?
गुरु जी कहते हैं कि जो लोग कावर लाने वाले के लिए उल्टा सीधा बोलते हैं उनको यह तो तुंबरूका जी और रावण का जवाब है कि अपने कंधे पर कांवर में जल लेकर आने वाला व्यक्ति कितने कदम चलता है वैसे ही वह अपनी उन्नति की उतनी ही सीढ़ियां आगे बढ़ जाता है।
कावड़ के नियम
प्रश्न नंबर 7
गुरुदेव ने कावड़ लाने का पहला नियम बताया। वह क्या है?
गुरुदेव ने इस कथा में आगे कावड़ के नियम बताएं उन्होंने बताया कि पहले नियम के अनुसार कावड़ को कभी भी सिर के ऊपर से उठाकर या वारकर एक कंधे से दूसरे कंधे पर नहीं रखा जाता है। इसे आगे से घुमाकर या पीछे से घुमा कर दूसरे कंधे पर लाया जाता है।
इसमें हम आपको बता दें कि कावर को मुख्य रूप से पीछे से ही घुमाकर कंधा बदला जाता है।
प्रश्न नंबर 8
क्या आपको याद है कि कावड़ द्वारा संतान प्राप्ति कैसे की जा सकती है?
कावड़ के नियम के साथ ही गुरु जी ने बता दिया संतान पाने का उपाय
उन्होंने बताया कि जिस व्यक्ति की संतान नहीं होती अर्थात वह पुरुष है या नारी जो सुनता नहीं है वह जब कावर उठाए तो उसे अपनी गोदी को धान अर्थात चावल से भर दिया जाता है। वह उसे झोली में लटका कर आगे बढ़ता है। जब वह कावड़ का जल लेकर महादेव की तरफ बढ़ता है तो कंधे पर जल झूलता है और झोली में रखा धान।
जब वह कांवर लेकर आता है तो सबसे पहले भगवान को जल अर्पित करें फिर उस धान या चावल को जिसे लेकर आए हैं। उसे भोले बाबा पर अपने मन की बात बोलते हुए कहे भोले बाबा जिस प्रकार तूने यह झोली भारी है उसी प्रकार मेरी खाली झोली को भी बच्चे से भर देना । मेरी एक इच्छा है इसे पूरी कर देना।
प्रश्न नंबर 9
गुरुजी ने बताया विपत्तियों से बचने का उपाय । क्या आपको मालूम है ?
गुरुदेव का कहना है कि किसी के सामने अपनी विपत्तियों के बारे में रोने से अच्छा है ?
कि एक बेल पत्री को भगवान भोलेनाथ पर इस प्रकार अर्पित करें कि उसकी डंडी अशोक सुंदरी की ओर हो तब एक लोटा जल धीरे-धीरे भगवान को अर्पित करते हुए अपने मन की बातों से भोले बाबा मैं बहुत परेशान हूं। बहुत दुखी हूं बहुत तकलीफ में जीवन चल रहा है। तू न संभालेगा तो संभालेगा कौन?
तुम्ही हो माता पिता तुम्ही हो तुम्ही हो बंधु सखा तुम्ही में हो। बाबा जब से होश संभाला है तुझे ही तो अपना माना है। बस एक अब आप ही एकमात्र आप ही हो, जो मुझे इस विपत्ति से बाहर निकालोगे।
प्रश्न नंबर 10
शिव जी को क्रोध कब आता है
भगवान शिव को कभी क्रोध नहीं आता उन्हें केवल उसी अवस्था में क्रोध आता है जब उनके भक्तों पर कोई कष्ट आए और वह ना कटे।
यदि शिव कथा की बात करें और पत्रों की चर्चा ना करें तो गलत होगा आज की कथा में गुरुदेव ने तीन पत्र पढ़े चलिए उनसे संबंधित प्रश्न ही पूछते हैं।
पत्र नंबर 1
पूर्णिमा साहू जी को बहुत सारी बीमारियां थी जो बाद में टीबी में बदल गई? वह कैसे ठीक हुई ?
पूर्णिमा साहू पत्नी लक्ष्मण साहू बिलासपुर सिरगिटटी वासपारा वार्ड नंबर 10 की निवासी
पूर्णिमा साहू जी ने एक लोटा जल और बेलपत्र का महत्व बताया क्यों ने बहुत सारी बीमारियां थी जो बाद में टीबी में बदल गई और सब घर वालों ने भगवान भोलेनाथ पर चढ़ाया हुआ जल लाकर देना शुरू किया तो वह बिल्कुल ठीक हो गई यह है एक लोटा जल और बेलपत्र का महत्व।
पत्र नंबर दो
जयंती जनसेना राजगढ़ छत्तीसगढ़ की जिठानी की बहू कि 9 साल बाद संतान कैसे प्राप्त हुई?
इनको जिठानी की बहू कि 9 साल तक कोई संतान नहीं हुई तो फिर कथा सुननी तथा आंकड़े की जड़ के प्रयोग से उनको पुत्र रूप संतान की प्राप्ति हुई।
पत्र 3
प्रिया निर्मलकर पत्नी राकेश निर्मलकर खोली आरंग रायपुर छत्तीसगढ़ ने अपने पति को सरकारी नौकरी कैसे दिलवाई?
पत्नी ने पति के लिए संकल्प लिया कि उसको सरकारी नौकरी लगने चाहिए। क्या हुआ होगा चलिए आगे बताते हैं
पत्नी ने सेवा करी व्रत रखें और जो उनके पति ने 2016 में रेलवे का फार्म भरा था उसकी नौकरी 2023 में 8 साल बाद वही नौकरी उनको प्राप्त हुई ऐसे भोले बाबा।
देवराज ब्राह्मण की कथा?
इसके बाद बाबा ने देवराज ब्राह्मण की कथा सुनाई उसे भगवान भोलेनाथ पर विश्वास नहीं था लेकिन शिवपुराण की कथा सुनने और बेलपत्र के वृक्ष के नीचे प्राण त्यागने के कारण भगवान भोलेनाथ के लोक की प्राप्ति हुई।
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बिंदुक और चंचुला की कथा
बिंदूक एक बार चोरी करके लौट रहा था तो दीवार पर सब पैर फिसलने के कारण हुए पानी में गिरा और पानी में गिरने से मृत्यु हो गई इसलिए उसे मुक्ति प्राप्त नहीं हुई। चंचलानी चंचला ने अपने पति का कार्यक्रम कराया और कुछ समय बीतने के बाद शुरू धाम काशीपुरी गई तो वहां शिव कथा सुनकर मुक्ति को प्राप्त हुई और भगवान भोलेनाथ की सेवा में लग गई। फिर अपने पति के लिए तुंबरूका जी से कथा कराकर उसे प्रेत योनि से मुक्ति दिलाई।
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इसके प्रकार पहले दिन की कथा समाप्त हुई

सद्गुरु एक नयनार संत, नंदनार की कहानी सुना रहे हैं, जिनके लिए एक मंदिर में पत्थर का नंदी एक ओर खिसक गया था।
तमिलनाडु में एक सुंदर घटना घटी। इस घटना में तमिलनाडु के एक छोटे से गांव में एक गरीब परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ और उस बच्चे को जन्म लेते हैं दास होने के लिए भेज दिया गया। इस प्रकार वह बच्चा एक बंधुआ मजदूर बन गया। उसका कोई नाम नहीं था।
उसे हल चलाने में प्रवीण था इसलिए आम तौर पर उसे हलवाहे के नाम से जाना जाता था। एक बंधुआ मजदूर के ख़ुद के विचार कहां होते हैं। मगर शिव का विचार उसे जोश से भर देता था। बचपन से ही शिव के विचार उसके मन में कौतुहल या जिज्ञासा उत्पन्न कर देते थे।
जहां वह रहता था, वहां से सिर्फ पच्चीस किलोमीटर दूर तिरुपुंगुर नाम का प्रसिद्ध शिव मंदिर था। उसे लगता था कि शिव उसे बुला रहे हैं। इसलिए वह हमेशा से इस मंदिर में जाना चाहता था । मगर बंधुआ मजदूर होने के कारण अपने जीवन पर उसका अधिकार नहीं था, इसलिए वह मंदिर भी नहीं जा सकता था।
उसने कई बार जमींदार को अपनी बात समझाने की कोशिश कि ‘मैं सिर्फ एक दिन के लिए मंदिर जाकर वापस आ जाऊंगा।’
जमींदार हमेशा उसे किसी ना किसी काम में लगा देता वह कभी कहता, ‘आज निराई करनी है। कल खाद डालनी है। परसों तुम्हें जमीन जोतनी है। नहीं, तुम एक भी दिन बर्बाद नहीं कर सकते। तुम्हें क्या लगता है? तुम वैसे ही किसी काम के नहीं हो। तुम एक पूरा दिन बर्बाद करना चाहते हो? नहीं।’
शिव दर्शन की लालसा गहराने लगी
मगर उसके भीतर शिव दर्शन करने का कौतुहल या जिज्ञासा और गहराने लगी। वह तिरुपुंगुर में शिव के दर्शन करना चाहता था। एक दिन उसके पूरे शरीर में एक नई तरह की ऊर्जा जोश मारने लगी। इसी जोश में वह जमींदार के सामने जाकर खड़ा हो गया। एक बंधुआ मजदूर के पास इस प्रकार के जूस के होने की कल्पना नहीं की जा सकती है।
जमींदार उसे सामने देख कर फिर शुरू हो गया, ‘मूर्ख कहीं के ! पिछली बार तुम्हारी मां बीमार थी, उससे पहले बहन की शादी थी, उससे पहले तुम्हारी दादी तीन बार मरी। अब तुम मंदिर जाना चाहते हो, यह नहीं हो सकता।’
वह बोला, ‘मैं आज ही सारा काम कर दूंगा। कल सिर्फ एक दिन की बात है, मैं जाकर वापस आ जाऊंगा।’
उस एक पल में जमींदार ने हार मानकर कहा, ‘ठीक है, जाओ। शाम से पहले वापस आ जाना।’
फिर अचानक उसे एहसास हुआ कि उसने ये क्या कह दिया। वह आगे बोला, ‘जाने से पहले तुम्हें पूरे चालीस एकड़ जमीन को जोतना होगा। अभी शाम है। सुबह से पहले तुम जुताई पूरी करके ही मंदिर जा सकते हो।’
हलवाहा इतना मूर्ख नहीं था कि इसकी कोशिश भी करता। वह चुपचाप सोने चला गया। उसका पूरा शरीर फड़क रहा था। वह जानता था कि इस बार उसे मंदिर जाना ही है, चाहे इसका नतीजा कुछ भी हो।
शिव ने खुद ज़मीन जोत दी
सुबह जब वह उठा, तो गांव में हंगामा मचा हुआ था। वह यह देखकर हैरान रह गया कि सारी चालीस एकड़ जमीन जोती हुई थी। जमींदार का मुंह खुला का खुला रह गया था। जमींदार के बीवी-बच्चे आकर हलवाहे के पैरों पर गिर पड़े। वह हमेशा सोचता था कि शिव के सामने प्रार्थना करके वह प्रकृति के नियमों को तोड़ सकता है, बदल सकता है। मगर मनुष्य के नियम इतने क्रूर हैं कि आप कभी उन्हें बदल नहीं सकते। मगर यहां मनुष्य और देवता और प्रकृति, सभी के नियम टूट गए थे।
लोगों ने आकर उसके हाथों में चांदी के सिक्के रख दिए, किसी ने उसके हाथ में भोजन का थैला रख दिया। किसी ने उसे छड़ी पकड़ा दी और कहा, ‘यह मंदिर जा रहा है, इसे ईश्वर ने खुद चुना है। शिव ने इसके लिए खुद आकर चालीस एकड़ जमीन जोत दी।’
पत्थर की मूर्ती एक ओर खिसक गई
वह दिल में परम आनंद लेकर मंदिर गया। मगर एक अछूत का जीवन जीने के कारण वह नहीं भूला था कि पुजारी उसे मंदिर की देहरी पार नहीं करने देंगे। वह मंदिर के बाहर खड़ा रहा। निश्चित रूप से शिव अपने भक्त के लिए सब बदल देते हैं, मगर पुजारी नहीं झुकते। मगर वह सिर्फ एक बार शिव के दर्शन करना चाहता था। तब, उसके रास्ते में खड़ी नंदी की विशाल मूर्ति एक ओर खिसक गई। आज भी तिरुपुंगुर में नंदी की मूर्ति एक ओर को है।
बाद में लोग इस शख्स को नंदनार बुलाने लगे और वह एक मशहूर संत बन गया। आप उसे भक्त नहीं कह सकते, उसका पूरा जीवन बस कौतुहल या जिज्ञासा से भरा था और उसने कभी उस कौतुहल को जाने नहीं दिया।
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