Day - 02 ॥ श्री तप शिवमहापुराण कथा ॥ पूज्य पंडित प्रदीप जी मिश्रा ॥ मैनपुरी, UP || 23 जुलाई 2023

 Day - 02 ॥ श्री तप शिवमहापुराण कथा ॥ पूज्य पंडित प्रदीप जी मिश्रा ॥ मैनपुरी, UP || 23 जुलाई 2023 

1. भगवान विष्णु का सत्यनारायण कहलाना ?

एक बार ब्रह्मा जी ने देखा कि मैं कमल के पुष्प के ऊपर बैठा हूं तो इस पुष्प का जन्म स्थान कहां है। तो उसकी डंडी पकड़कर नीचे आए तो उन्होंने पाया कि भगवान विष्णु के नाभि कमल से पुष्प की उत्पत्ति हुई है। 

तब उन्हेंने विष्णु से कहा कि आप के नाभि कमल से मेरा जन्म हुआ है तो आपका जन्म किस से हुआ है आप के पिता कौन हैं।

तब भगवान विष्णु ने उत्तर दिया कि जिसने मुझे जल मैं एक बिन्दु रुप बुलबुले के रूप में दर्शन दिए वहीं मेरे पिता हैं। उनका नाम शिव है। इस बिंदु को विद्वतजन ज्योतिर्लिंग कहते हैं शिवलिंग कहते हैं।

आप जो कह रहे हैं उस पर मैं कैसे विश्वास करूं यदि मुझे विश्वास ही दिलाना है तो मुझे अपने पिता के दर्शन कराइए मुझे आपके पिता के दर्शन करने हैं। 

विष्णु बोले मेरा पिता सर्वस्व हैं । वह कण-कण में विराजमान है । चलो मैं आपको उनके दर्शन करा देता हूं यह कहकर भगवान विष्णु ने सागर में बुलबुला उत्पन्न करने के लिए एक पर्वत को उठाया और उन्होंने सागर में उस पर्वत की सहायता से सागर मंथन किया। तो वहां एक खंम्बरूप ज्योतिर्लिंग उत्पन्न हुआ जो ऊपर आकाश में और नीचे पाताल में जा रहा था। 

दोनों सोचने लगी है क्या है। तब उस ज्योतिर्लिंग से भविष्यवाणी हुई कि मैंने इस सागर में विष्णु को उत्पन्न किया और विष्णु की नाभि से कमल उत्पन्न करके ब्राह्म तुमको उत्पन्न किया । इस प्रकार मैं विष्णु का पिता और आपका पिता मह हूँ। 

ब्रह्मा का के पांच मुख थे जिनमें से पांचवें मुख को विश्वास नहीं हुआ कि यह भविष्यवाणी सत्य है। उन्होंने उस ज्योतिर्लिंग को नीचे से ऊपर तक देखा। तो पाया की इसका ना इस तो इसका सिर है और नहीं पर फिर यह कैसे हमें जन्म दे सकता है। 

पहले इसके सिर और पैर का पता किया जाए तभी इस बात को सत्य माना जाए। अब तुम यह बताओ कि तुम किसे खोजना चाहोगे पैरों को या मुख को। 

तब  ब्रह्मा ने विष्णु से कहा कहा था ठीक है तुम ऊपर की तरफ जाओ और इनका मुंह देखो विष्णु जी ने मना किया है कि मैं ऐसा पाप नहीं कर सकता कि मैं अपने जन्म देने वाले हैं के मुख को देखने जा इतनी सामर्थ्य मुझ में नहीं है मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ति की नहीं है अपने पिता के चरण देख कर उनका आशीर्वाद पाऊंगा । लेकिन जो वह आए तो उन्हें चरण नहीं मिले। 

तो वह वापस लौट आए और ब्रह्मा जी के लौटने का इंतजार करने लगे हैं। ब्रह्मा जी मुख की खोज में और ऊपर और ऊपर और ऊपर जाते गए लेकिन उन्हें मुख नहीं दिखाई दिया। जब उन्हें मुख नहीं दिखाई दिया तो वहां उन्हें एक गाय दिखाई दी।
तब ब्रह्मा जी ने गाय को झूठ बोलने के लिए राजी कर लिया कि प्रत्येक घर से तुझे एक रोटी दिलवाऊंगा तु जिस घर जाएगी तुझे एक रोटी अवश्य मिलेगी। तुझे कोई दुत्कारेगा नहीं। एक रोटी के लिए गौ माता ने झूठ बोल ने के लिए तैयार हो गई। मात्र एक रोटी के लिए। 

तो गौ माता ब्रह्मा जी से बोली हे ब्रह्मदेव मैं तो बोल दूंगी परंतु मेरी बात पर विश्वास कौन करेगा?

तभी उनकी निगाह केतकी के फूल पर पड़ी उन्होंने उसे तोड़ लिया और उससे बोले कि तुझे नीचे चल कर बोलना होगा कि मैंने सिर के दर्शन कर लिए है और यह गाय उसकी साक्षी है। इस पर वह वह फूल बोला कि मुझे इससे क्या लाभ होगा ?

तो ब्रह्मा जी ने कहा मैं तुझे सबसे खुशबूदार फूल तो बना दूंगा। हर तरफ सुगंध ही सुगंध फैलाएगा । तेरी सुगंध कभी कम नहीं होगी।

गाय और केतकी के फूल के साथ ब्रह्मा जी नीचे पहुंचे तो घमंड में विष्णु भगवान के पास गए। तब 

वे विष्णु जी के पास गए और ब्रह्मा जी ने पूछा कि क्या तुम्हें शिव के चरण मिले? 

तो भगवान विष्णु ने मना कर दिया नहीं। और आपको हमारे पिता के मुख के दर्शन हुए बताइए वह कैसा है?

ब्रह्मा जी से विष्णु ने पूछा तुम्हें सिर मिला तो ब्रह्मा जी ने कहा हां

तभी भविष्यवाणी हुई है कि ब्रह्मा जी झूठ बोल रहे हैं उन्हें सिर के दर्शन नहीं हुए हैं।

तो उन्होंने कहा कि तुम्हें विश्वास नहीं है तो इस गाय से पूछो मैं इसी साक्षी के लिए इसे लेकर आया हूं। 

तब भगवान विष्णु ने गाय से पूछा कि तुमने भगवान शंकर का सिर देखा तो उसने भी हां कह दिया इस प्रकार गाय ने एक रोटी के चक्कर में झूठ बोल दिया।

एक बार फिर आकाशवाणी हुई गाय झूठ बोल रही है ।

तो ब्रह्मा जी पुणे बोल, तुम्हें विश्वास नहीं है तो मेरे पास एक और साक्षी है। इस केतकी के फूल से पूछो, तब भगवान विष्णु ने केतकी से पूछा कि हे केतकी क्या ब्रह्मा जी ने भगवान शंकर का सिर देखा है तो केतकी ने खुशबूदार बनने के चक्कर में झूठ बोल दिया।

तब शंकर जी ने प्रकट होकर कहा कि गौमाता तूने जगत की माता होकर झूठ बोला है। तेरे शरीर से पूरा विश्व पोषित होता है इसलिए तेरा पूरा शरीर पूजा जाएगा लेकिन तूने मुखसे झूठ बोला है इसलिए, तेरा मुख नहीं पूजा जाएगा। सब लोग सभी देवों की तीर्थ स्थलों की मंदिरों की परिक्रमा आगे से प्रारंभ करेंग। पर गौ माता तूने अपने मुंह से झूठ बोला है इसलिए तेरी परिक्रमा मुख से नहीं बल्कि तेरी पूछ से शुरू होकर तेरी पूंछ पर ही समाप्त हो गई। 

संसार में किए जाने वाले सभी दान वस्त्र दान अन्न दान आगे से से करेंगे लेकिन गौमाता का दान अर्थात गोदान पीछे से तेरी पूछ पकड़ कर किया जाएगा। इसलिए आज भी गौ माता का दान गाय की पूंछ पकड़कर किया जाता हैं। 

गौमाता को अपनी गलती का एहसास हो गया तो गौ माता ने भगवान शिव से क्षमा मांग ली और शिव ने क्षमा कर दिया। 

फिर भगवान भोलेनाथ ने भगवान विष्णु के  समक्ष केतकी के झूठ बोलने पर गुस्सा आ गया और वह बोले तुमने विष्णु और मेरे सामने झूठ बोला है इसलिए मैं तुझे श्राप देता हूं कि तू सारे देवों ऊपर चढ़ेगा लेकिन मेरे ऊपर कभी नहीं चढ़ेगा। 
यदि भूल से भी जो तुझे मेरे ऊपर चढ़ेएया तो उसे सहस्रों गौ हत्या के पाप के बराबर पाप लगेगा। 

तब भगवान भोलेनाथ बोले हे विष्णु तुमने मेरे समक्ष न होने पर भी सबके सामने सत्य बोला इसलिए आज से तुम्हारा नाम सत्यनारायण होगा। और सत्यनारायण के नाम से जो तुम्हारा कथा पूजन हवन आदि करेगा उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी।

परंतु ब्रह्मा के पांचवें मुख ने अभी भी शिव के लिए उल्टा सीधा बोलना जारी रखा। शिव ने ब्रह्मा जी के पांचवें मुख को बार-बार शांत रहने के लिए कहा लेकिन वह चुप नहीं हुआ।

तब गुस्से में आकर उन्होंने पैर के अंगूठे के नख से ब्रह्मा के पांचवें मुख को काट दिया। और शेर के जमीन में गिरते ही वह बड़ अर्थात वट के वृक्ष में बदल गया। इस प्रकार ब्रह्मा जी के के पांचवें सिर से बड़ अर्थात वट के वृक्ष का जन्म हुआ।


2. मलमास के दुखों का निवारण

विष्णुपुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार सतयुग के अन्त में महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी दिति के दो पुत्र हुए। हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष। दिति के बड़े पुत्र हिरण्यकशिपु ने कठिन तपस्या द्वारा ब्रह्मा को प्रसन्न करके यह वरदान प्राप्त कर लिया कि वर्ष के 12 महीनों के अंदर न वह किसी मनुष्य द्वारा मारा जा सकेगा न पशु द्वारा, न दिन में मारा जा सकेगा न रात में, न घर के अंदर न बाहर, न किसी अस्त्र के प्रहार से और न किसी शस्त्र के प्रहार से उसक प्राणों को कोई डर रहेगा। इस वरदान ने उसे अहंकारी बना दिया और वह अपने को अमर समझने लगा। उसने इंद्र का राज्य छीन लिया और तीनों लोकों को प्रताड़ित करने लगा। वह चाहता था कि सब लोग उसे ही भगवान मानें और उसकी पूजा करें। उसने अपने राज्य में विष्णु की पूजा को वर्जित कर दिया।हिरण्यकशिपु के चार पुत्र थे उनके नाम थे प्रह्लाद , अनुहल्लाद , संहलाद और हल्लद थे। हिरण्यकशिपु का सबसे बड़ा पुत्र प्रह्लाद, भगवान विष्णु का उपासक था और यातना एवं प्रताड़ना के बावजूद वह विष्णु की पूजा करता रहा। क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका से कहा कि वह अपनी गोद में प्रह्लाद को लेकर प्रज्ज्वलित अग्नि में चली जाय क्योंकि होलिका को वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी। जब होलिका ने प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रवेश किया तो प्रह्लाद का बाल भी बाँका न हुआ पर होलिका जलकर राख हो गई। अंतिम प्रयास में हिरण्यकशिपु ने लोहे के एक खंभे को गर्म कर लाल कर दिया तथा प्रह्लाद को उसे गले लगाने को कहा। एक बार फिर भगवान विष्णु प्रह्लाद को उबारने आए। वे खंभे से नरसिंह के रूप में प्रकट हुए तथा हिरण्यकशिपु को महल के प्रवेशद्वार की चौखट पर, जो न घर का बाहर था न भीतर, गोधूलि बेला में, जब न दिन था न रात, आधा मनुष्य, आधा पशु जो न नर था न पशु ऐसे नरसिंह के रूप में अपने लंबे तेज़ नाखूनों से जो न अस्त्र थे न शस्त्र और यह मलमास था जो सामान्य वर्ष के बारे में वर्षों से बिल्कुल अलग था इस प्रकार और उसका पेट चीर कर उसे मार डाला। इस प्रकार हिरण्यकशिपु अनेक वरदानों के बावजूद अपने दुष्कर्मों के कारण भयानक अंत को प्राप्त हुआ।

सावन के महीने में मलमास में भगवान भोलेनाथ की कठोर तपस्या की शिव शंकर भगवान उन्हें दर्शन देने के लिए आए तो उसकी इच्छा पूछी तो मलमास निका भगवान सारे देवता मेरा अपमान करते हैं सम्मेलन निराधर करते हैं बस मुझ पर कृपा कृपा से सब कुछ ठीक हो जाएगा जा पर कृपा राम की होई ता पर कृपा करे सब कोई।

भगवान शिव मलमास को भगवान नारायण के पास लेकर पहुंचे हम क्षक्षश्रयम नारायण ने जैसे ही देवा दी दव महादेव को देखा तो उठ कर बैठ गए बैठे थे अब प्रणाम करके उनसे आने का कारण पूछा तो भगवान भोलेनाथ भोले नरसिंह अवतार के समय हिरण्यकश्यप को मारने के लिए एक नया मास का निर्माण किया गया था अब आप ने इसे बना तो दिया लेकिन इसका कोई सम्मान नहीं मिलता लव कुश का निरादर करते हैं। अब ऐसा कुछ काम कीजिए जिससे उसे भी सम्मान मिल सके तब भगवान विष्णु ने भगवान शिव के कहने पर अपना पुरुषोत्तम नाम इस मलमास को दे दिया और तब से यह मास पुरुषोत्तम मास के नाम से प्रसिद्ध हो गया । 

भगवान शिव ने नारायण के कहने पर मलमास को आशीर्वाद दिया है मलमास जब तू घड़ी पल और नक्षत्रों भोगता जब सावन के महीने में पहुंचेगा जो मेरी आराधना पुरुषोत्तम मास या अधिक मास में करेगा तो उसकी जिंदगी में मैं कभी दुख नहीं आने दूंगा।

3. शमशान का अर्थ

वह स्थान जहां भगवान रहते हैं उसे श्मशान कहते हैं उसका अर्थ है वह स्थान जहां सबकी शान समान अर्थात बराबर होती है वहां छोटा और बड़े में कोई भेद नहीं किया जाता।

4.जब किसी शब्द के पीछे अशब्द जुड़ जाए

ब्रह्मा जी ने सोचा कि सृष्टि वृष्टि की रचना तो मैं कर दूंगा। जब किसी शब्द के पीछे अशब्द जैसे रोटी वोटी, पानी वाली गाड़ी बड़ी आदि निकले तो समझो उसके साथ अहंकार बोल रहा है।

सबसे पहले ब्रह्मा जी से किन्नरों की सृष्टि का जन्म हुआ तब भगवान कृष्ण और सुनाओ वैष्णो हंस पड़े तब भगवान शिव भोले तब से बोले हे भगवान किसी के शरीर से किसी भी प्रकार से कम शक्ति पर अर्थात फोर्स तैनात होने लंगड़े होने टोटे होने या फिर कुछ और कमी होने पर और किन्नर पर कभी पर हंसना नहीं चाहिए जो हंसता है उसे एक जन्म उसी का लेना पड़ता है जिस पर वह हंसा। 

भगवान विष्णु को द्वापर युग में भगवान कृष्ण के रूप में एक बार किन्नर बनना पड़ा था।

5. पंचदीप और सप्त तिथियां

केवल सावन मास की अधिक मास में आने वाले दोनों पक्षों की साथ तिथियों पंचमी, अष्टमी, एकादशी, प्रदोष, शिवरात्रि, अमावस्या और पूर्णिमा पर पांच दीपक भगवान के सामने प्रज्वलित कर अपने घर के द्वार पर रखने से उस घर में कभी कोई कष्ट नहीं आता।


आज के उपाय नंबर 1

उपाय नंबर 1

पंचदीप और सप्त तिथियां

केवल सावन मास की अधिक मास में आने वाले दोनों पक्षों की साथ तिथियों पंचमी, अष्टमी, एकादशी, प्रदोष, शिवरात्रि, अमावस्या और पूर्णिमा पर पांच दीपक भगवान के सामने प्रज्वलित कर अपने घर के द्वार पर रखने से उस घर में कभी कोई कष्ट नहीं आता।

उपाय नंबर 2

कब कर सकते हैं सावन के अधिक मास में शिवरात्रि पड़ सूर्योदय से सूर्यास्त तक इसको कर सकते हैं।

सफेद दूर्वा बाबा शिव को समर्पित करके एक लोटा जल कुंड केश्वर अवधूत ईश्वर महादेव का नाम लेकर महादेव को संप्रभुता और अवसर मिलेगा बलवा को उठाकर वापस लिया है जिसको डायलिसिस चल रहे हो ज्योति किडनी लीवर फेल हो गए हो जाए उसको दे दे और बुढ़वा पानी में गला दे और उसका पानी आधा चम्मच के आसपास पानी देना शुरू करें एक हफ्ते में ही उसके डायलिसिस का मौजा उसके डायलिसिस काम होना शुरू हो जाएंगे और उसके लाभ मिलने लगेगा चार पांच हपत्ते में ही।

जिस प्रकार बैंक विक्क मशीनों नोटों की गड्डी में से निकली ही अमूल्य है ना मूल्य हिंद नोट को बाहर निकाल देता है उसी प्रकार हमारे शरीर से बीमारी को बाहर निकाल लेते हैं।


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