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बिल्व, बेल पत्थरबेल

बिल्व
भारत में होने वाला एक फल का पेड़ है।

बिल्व, बेल या बेलपत्थर, भारत में होने वाला एक फल का पेड़ है। इसे रोगों को नष्ट करने की क्षमता के कारण बेल को बिल्व कहा गया है।[1] इसके अन्य नाम हैं-शाण्डिल्रू (पीड़ा निवारक), श्री फल, सदाफल इत्यादि। इसका गूदा या मज्जा बल्वकर्कटी कहलाता है तथा सूखा गूदा बेलगिरी। बेल के वृक्ष सारे भारत में, विशेषतः हिमालय की तराई में, सूखे पहाड़ी क्षेत्रों में ४००० फीट की ऊँचाई तक पाये जाते हैं।[2] मध्य व दक्षिण भारत में बेल जंगल के रूप में फैला पाया जाता है। इसके पेड़ प्राकृतिक रूप से भारत के अलावा दक्षिणी नेपालश्रीलंकाम्यांमारपाकिस्तानबांग्लादेशवियतनामलाओसकंबोडिया एवं थाईलैंड में उगते हैं। इसके अलाव इसकी खेती पूरे भारत के साथ श्रीलंका, उत्तरी मलय प्रायद्वीपजावा एवं फिलीपींस तथा फीजी द्वीपसमूह में की जाती है।[3]
बिल्व, बेल पत्थर
बेल
वैज्ञानिक वर्गीकरण
जगत:पादप
अश्रेणीत:आङग्योस्पेर्मै
अश्रेणीत:एकबीजपत्री
अश्रेणीत:रोसिदै
गण:सापीन्दालेस
कुल:रुतासेऐ
उपकुल:औरान्त्योइदेऐ
वंश समूह:क्लौसेनेऐ
वंश:ऐग्ले
कोरेआ
जाति:ऐ. मार्मेलोस
द्विपद नाम
'ऐग्ले मार्मेलोस
(L.कोर्र.सेर्र

धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण इसे मंदिरों के पास लगाया जाता है। हिन्दू धर्म में इसे भगवान शिव का रूप ही माना जाता है व मान्यता है कि इसके मूल यानि जड़ में महादेव का वास है तथा इनके तीन पत्तों को जो एक साथ होते हैं उन्हे त्रिदेव का स्वरूप मानते हैं परंतु पाँच पत्तों के समूह वाले को अधिक शुभ माना जाता है, अतः पूज्य होता है। धर्मग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है।[4][5] इसके वृक्ष १५-३० फीट ऊँचे कँटीले एवं मौसम में फलों से लदे रहते हैं। इसके पत्ते संयुक्त विपत्रक व गंध युक्त होते हैं तथा स्वाद में तीखे होते हैं। गर्मियों में पत्ते गिर जाते हैं तथा मई में नए पुष्प आ जाते हैं। फल मार्च से मई के बीच आ जाते हैं। बेल के फूल हरी आभा लिए सफेद रंग के होते हैं व इनकी सुगंध भीनी व मनभावनी होती है।[2][5]

परिचय

बेल का पत्ता
शिवलिंग पर चड़े बिल्व पत्र
बेल फल बीज

बेल का फल ५-१७ सेंटीमीटर व्यास के होते हैं। इनका हल्के हरे रंग का खोल कड़ा व चिकना होता है। पकने पर हरे से सुनहरे पीले रंग का हो जाता है जिसे तोड़ने पर मीठा रेशेदार सुगंधित गूदा निकलता है। इस गूदे में छोटे, बड़े कई बीज होते हैं। बाजार में दो प्रकार के बेल मिलते हैं- छोटे जंगली और बड़े उगाए हुए। दोनों के गुण समान हैं। जंगलों में फल छोटा व काँटे अधिक तथा उगाए गए फलों में फल बड़ा व काँटे कम होते हैं। बेल का फल अलग से पहचान में आ जाता है। इसकी अनुप्रस्थ काट करने पर यह १०-१५ खण्डों में विभक्त सा लगता है, जिनमें प्रत्येक में ६-१० बीज होते हैं। ये सभी बीज सफेद लुआव से परस्पर जुड़े होते हैं।[5] प्रायः सर्वसुलभ होने से इसमें मिलावट कम होती है। कभी-कभी इसमें गार्मीनिया मेंगोस्टना तथा कैथ के फल मिला दिए जाते हैं, परन्तु इसे काट कर इसकी परीक्षा की जा सकती है। इनकी वीर्य कालावधि लगभग एक वर्ष है।

बेल का पका फल

आचार्य चरक और सुश्रुत दोनों ने ही बेल को उत्तम संग्राही बताया है। फल-वात शामक मानते हुए इसे ग्राही गुण के कारण पाचन संस्थान के लिए समर्थ औषधि माना गया है। आयुर्वेद के अनेक औषधीय गुणों एवं योगों में बेल का महत्त्व बताया गया है, परन्तु एकाकी बिल्व, चूर्ण, मूलत्वक्, पत्र स्वरस भी अत्यधिक लाभदायक है।[3] चक्रदत्त बेल को पुरानी पेचिश, दस्तों और बवासीर में बहुत अधिक लाभकारी मानते हैं। बंगसेन एवं भाव प्रकाश ने भी इसे आँतों के रोगों में लाभकारी पाया है। यह आँतों की कार्य क्षमता बढ़ती है, भूख सुधरती है एवं इन्द्रियों को बल मिलता है।

बेल फल का गूदा डिटर्जेंट का काम करता है जो कपड़े धोने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। यह चूने के प्लास्टर के साथ मिलाया जाता है जो कि जलअवरोधक का काम करता है और मकान की दीवारो सीमेंट में जोड़ा जाता है। चित्रकार अपने जलरंग मे बेल को मिलाते है जो कि चित्रों पर एक सुरक्षात्मक परत लगाता है।[3]


रासायनिक संगठन

बेल के फल की मज्जा में मूलतः ग्राही पदार्थ पाए जाते हैं। ये हैं-म्युसिलेज पेक्टिन, शर्करा, टैनिन्स। इसमें मूत्र रेचक संघटक हैं-मार्मेलोसिन नामक एक रसायन जो स्वल्प मात्रा में ही विरेचक है।[2] इसके अतिरिक्त बीजों में पाया जाने वाला एक हल्के पीले रंग की तीखा तेल (लगभग १२ प्रतिशत) भी रेचक होता है। शक्कर ४.३ प्रतिशत, उड़नशील तेल तथा तिक्त सत्व के अतिरिक्त २ प्रतिशत भस्म भी होती है। भस्म में कई प्रकार के आवश्यक लवण होते हैं। बिल्व पत्र में एक हरा-पीला तेल, इगेलिन, इगेलिनिन नामक एल्केलाइड भी पाए गए हैं। कई विशिष्ट एल्केलाइड यौगिक व खनिज लवण त्वक् में होते हैं।[5]


सन्दर्भ

  1.  'रोगान बिलत्ति-भिनत्ति इति बिल्व। '
  2. ↑ इस तक ऊपर जायें:   बेमिसाल बेल Archived 2010-01-05 at the Wayback Machineअभिव्यक्ति पर। दीपिका जोशी
  3. ↑ इस तक ऊपर जायें:   बेल[मृत कड़ियाँ]। वेबग्रीन पर
  4.  बिल्वमूले महादेवं लिंगरूपिणमव्ययम्। य: पूजयति पुण्यात्मा स शिवं प्राप्नुयाद्॥
    बिल्वमूले जलैर्यस्तु मूर्धानमभिषिंचति। स सर्वतीर्थस्नात: स्यात्स एव भुवि पावन:॥ शिव पुराण १३/१४
    अर्थ- बिल्व के मूल में लिंगरूपी अविनाशी महादेव का पूजन जो पुण्यात्मा व्यक्ति करता है, उसका कल्याण होता है। जो व्यक्ति शिवजी के ऊपर बिल्वमूल में जल चढ़ाता है उसे सब तीर्थो में स्नान का फल मिल जाता है।

बेलपत्र वृक्ष की कहानी क्या है?
बेलपत्र का वृक्ष शुभ क्यूँ माना जाता है?
एक बार माता पार्वती के पसीने की बूंद मंदराचल पर्वत पर गिर गई और उससे बेल का पेड़ निकल आया।  माता पार्वती के पसीने से बेल के पेड़ का उद्भव हुआ। इसमें माता पार्वती के सभी रूप बसते हैं। वे पेड़ की जड़ में गिरिजा के स्वरूप में, इसके तनों में माहेश्वरी के स्वरूप में और शाखाओं में दक्षिणायनी व पत्तियों में पार्वती के रूप में रहती हैं,
फलों में कात्यायनी स्वरूप व फूलों में गौरी स्वरूप निवास करता है। इस सभी रूपों के अलावा, मां लक्ष्मी का रूप समस्त वृक्ष में निवास करता है। बेलपत्र में माता पार्वती का प्रतिबिंब होने के कारण इसे भगवान शिव पर चढ़ाया जाता है। भगवान शिव पर बेल पत्र चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं और भक्त की मनोकामना पूर्ण करते हैं। जो व्यक्ति किसी तीर्थस्थान पर नहीं जा सकता है अगर वह श्रावण मास में बिल्व के पेड़ के मूल भाग की पूजा करके उसमें जल अर्पित करे तो उसे सभी तीर्थों के दर्शन का पुण्य मिलता है।
बेल वृक्ष का महत्व क्या है? 

1. बिल्व वृक्ष के आसपास सांप नहीं आते।

2. अगर किसी की शवयात्रा बिल्व वृक्ष की छाया से होकर गुजरे तो उसका मोक्ष हो जाता है।

3. वायुमंडल में व्याप्त अशुद्धियों को सोखने की क्षमता सबसे ज्यादा बिल्व वृक्ष में होती है।

4. 4, 5, 6 या 7 पत्तों वाले बिल्व पत्रक पाने वाला परम भाग्यशाली और शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल मिलता है।

5. बेल वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है और बेल वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है।

6. सुबह-शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापों का नाश होता है।

7. बेल वृक्ष को सींचने से पितर तृप्त होते हैं।

8. बेल वृक्ष और सफेद आक को जोड़े से लगाने पर अटूट लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

9. बेलपत्र और ताम्र धातु के एक विशेष प्रयोग से ऋषि मुनि स्वर्ण धातु का उत्पादन करते थे।

10. जीवन में सिर्फ 1 बार और वह भी यदि भूल से भी शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ा दिया हो तो भी उसके सारे पाप मुक्त हो जाते हैं।

11. बेल वृक्ष का रोपण, पोषण और संवर्द्धन करने से महादेव से साक्षात्कार करने का अवश्य लाभ मिलता है।

BelPatra : बेलपत्र का क्या महत्व है? जानिए घर में बेलपत्र लगाने के 16 फायदे
Bel Patra Plant

बेलपत्र को संस्कृत (BelPatra in Sanskrit) में बिल्व पत्र (Bilva Patra) कहा जाता है। BelPatra (बेलपत्र) को काफी पवित्र माना जाता है जिसे देवी-देवताओं को चढ़ाया जाता है। बिल्व शब्द का अर्थ बेल का पेड़ और पत्र का अर्थ पत्ता होता है। अंग्रेजी में बेलपत्र (BelPatra in English) को ऐगल मार्मेलोस (Aegle marmelos) या वुड एप्पल (Wood Apple) कहा जाता है। इस पौधे पर कठोर खोल और हल्के तीखे स्वाद वाला बेल फल लगता है। पुराणों और वेदों के अनुसार, बेलपत्र का धार्मिक, औषधीय तथा सांस्कृतिक महत्व है।

हिंदू धर्म में बेलपत्र के पौधे (Belpatra Tree) को दिव्य वृक्ष माना जाता है, जिसे भगवान शिव को चढ़ाया जाता है। पौधे में सत्त्व तत्व होते हैं जो वातावरण में रज-तम कणों को निष्क्रिय करने के लिए सात्विक तरंगों को अवशोषित तथा उत्सर्जित करते हैं।

इसके अलावा, बेलपत्र (Belpatra) एक त्रिकोणों वाला पत्ता है जो भगवान शिव, ब्रह्मा, विष्णु और महेश की तीन आंखों को दर्शाता है। ये तीन आँखें, या शक्तियाँ, निर्णय लेने, कार्य करने तथा ज्ञान से जुड़ी हैं। Belpatra Tree को जैन धर्म में भी शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि 23वें तीर्थंकर पार्श्ववंत ने इसी वृक्ष के नीचे निर्वाण प्राप्त किया था।

बेलपत्र अंग्रेजी में

बेल को अंग्रेजी में एगल मार्मेलोस (Aegle Marmelos) कहा जाता है, जिसके अन्य नाम बेल, बिली या भेल कहा जाता है। बेलपत्र के अन्य अंग्रेजी नाम वुड एप्पल (Wood Apple), बंगाल क्वीन (Bengal Quince) और स्टोन एप्पल (Stone Apple) हैं। बेलपत्रों में तीन कोण होते हैं जो त्रिमूर्ति यानी ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश को दर्शाते हैं। अंग्रेजी का "bilva" शब्द बेल के पेड़ (Belpatra Tree) को दर्शाता है।

बेलपत्र के पेड़ का महत्व

शिव पुराण में बेलपत्र के पेड़ (Belpatra Tree) या उसके पत्तों की पूजा के महत्व की व्याख्या दी गई है। मनुष्य ही नहीं देवता भी बेलपत्र के वृक्ष की पूजा करते हैं। पुराणों के अनुसार, भगवान शिव शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करने वाले की हर मनोकामना पूरी करते हैं।

Belpatra के पत्ते शिव की ऊर्जा को अवशोषित करते हैं, और जब इसे भगवान को चढ़ाया जाता है, तो इसमें कुछ ऊर्जा समा जाती है। Belpatra Tree (बेलपत्र के पौधे) की जड़ों के आसपास स्नान करना ब्रह्मांड के सभी पवित्र जल में स्नान करने के बराबर है, जिससे व्यक्ति पवित्र और दिव्य हो जाता है। इसके अलावा, बेल-पत्र का प्रसाद किसी के तमस्, रजस व सत्व - किसी व्यक्ति के स्वभाव के तीन पहलुओं को त्यागने का संकेत है।

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बेलपत्र के पौधे (Belpatra Tree) के पत्ते

बेलपत्र का औषधीय महत्व

  • BelPatra (बेलपत्र) एक अनूठा पौधा है और इसके कई औषधीय लाभ हैं। बेल के फल में विटामिन और खनिज, जैसे विटामिन A, C, कैल्शियम, पोटेशियम, राइबोफ्लेविन, फाइबर और B6, B12 और B1 होते हैं। ये खनिज और विटामिन शरीर के विकास के लिए आवश्यक हैं।

  • यह पौधा तीनों दोषों को संतुलित करता है, जिसे आयुर्वेद में वात, पित्त और कफ कहा गया है। इसके अलावा, BelPatra (बेलपत्र) का रोजाना सेवन करने से उच्च रक्तचाप, हृदय की समस्याओं और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने में मदद करेगा।

  • पहले कच्चे बेल को हल्दी और घी में मिलाकर हड्डी टूटने पर लगाया जाता था।

बेलपत्र के 16 फायदे (Benefits of Bel Patra Plant)

बेलपत्र के पेड़ की छाल, जड़, फल और पत्ते सभी का इस्तेमाल अलग-अलग रोगों के इलाज के लिए किया जाता है। इस पवित्र वृक्ष से मसूड़ों से खून आना, अस्थमा, पीलिया, पेचिश, एनीमिया और कई अन्य बीमारियों को ठीक किया जा सकता है।

  1. बेल के फल में मौजूद टैनिन हैजा और डायरिया के इलाज में मदद करता है और इसके सूखे पाउडर का इस्तेमाल पुराने डायरिया के इलाज हेतु किया जाता है।

  2. BelPatra (बेलपत्र) में एंटीफंगल और एंटीवायरल गुण होते हैं जो शरीर के कई संक्रमणों का इलाज करने में मदद करते हैं।

  3. बेल के पत्ते (BelPatra) अत्यधिक चिकित्सीय होते हैं क्योंकि इसका अर्क कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने में मदद कर सकता है।

  4. BelPatra से निकाले गए तेल से सर्दी और अस्थमा जैसे श्वसन संबंधी विकार ठीक हो सकते हैं।

  5. घी और पके हुए बेल फल के मिश्रण को रोजाना खाने से दिल की कई बीमारियों से बचा जा सकता है।

  6. बेल फल कब्ज दूर करता है। नमक और काली मिर्च के साथ बेल फल का गूदा आंतों से विषाक्त पदार्थों को हटाने में मदद करता है।

  7. इसमें लैक्सेटिव अधिक होने के कारण बेलपत्र रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में फायदेमंद है।

  8. बेलपत्र का इस्तेमाल करने से त्वचा पर होने वाले रैशेस को ठीक करने में मदद मिल सकती है। साथ ही यह शरीर की दुर्गंध को दूर करने में भी मदद करता है।

  9. बेलपत्र का जूस पीने से आपके बाल झड़ने की समस्या दूर हो जाएगी। यह रूखे बालों को मुलायम बनाता है।

  10. BelPatra त्वचा के उन धब्बों को खत्म करने में मदद करता है जो दवा के साइड इफेक्ट के कारण होते हैं।

  11. BelPatra के फल में टैनिन होता है, जो विटिलिगो और बवासीर के प्रभावी उपचार में मदद करता है। प्राचीन काल में इन समस्याओं के उपचार हेतु कच्चे बेलपत्र के रस का इस्तेमाल किया जाता था।

  12. चूँकि बेल पत्र (BelPatra) में एंटी-ऑक्सीडेंट यौगिक भी होते हैं, यह गैस्ट्रिक अल्सर से भी लड़ने में मदद करता है। इस तरह के अल्सर से पेट में अम्ल का स्तर असंतुलित हो जाता है।

  13. BelPatra के फलों के अर्क में रोगाणुरोधी गुण भी होते हैं। कई शोधकर्ताओं ने कहा है कि यह शरीर के कई संक्रमणों के इलाज में मदद करता है।

  14. शरीर में विटामिन C की कमी से स्कर्वी रोग हो सकता है। यह रोग व्यक्ति की रक्त वाहिकाओं को प्रभावित करता है लेकिन इसका बेल से इसका इलाज किया जा सकता है। BelPatra में कई विटामिन पाए जाते हैं, और यह इस रोग को ठीक कर सकता है।

  15. बेल के अर्क में भी सूजनरोधी (anti-inflammatory) गुण होते हैं। इसके लिए आपको बेल के अर्क को सूजन वाली जगह पर लगाना है।

  16. लैक्सेटिव से भरपूर होने के कारण Bel Patra ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित करने में उपयोगी होता है। यह आपके अग्न्याशय को एक्टिव करता है, ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करने हेतु आवश्यक इंसुलिन का उत्पादन करता है।

बेल का फल


बेलपत्र से जुड़ी कहानी (BelPatra Story)

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, माना जाता है कि Belpatra (बेलपत्र) से पूरे ब्रह्मांड का निर्माण हुआ है। स्कंद पुराण के अनुसार, यह भगवान शिव का सबसे प्रिय पत्ता है। इस महापुराण में उल्लेख है कि एक बार देवी पार्वती के पसीने की बूंद मंदरांचल पर्वत पर गिरी थी, जहां से बिल्व वृक्ष यानी Belpatra का पेड़ निकला। इसलिए इसमें माता पार्वती के सभी रूप हैं। यह भी माना जाता है कि Belpatra के पौधे में देवी पार्वती अपने सभी रूपों में वास करती हैं। 

बेलपत्र के पौधे का धार्मिक महत्व

मिट्टी के दीयों से बेलपत्र के पेड़ की जड़ों की पूजा करना शुभ माना जाता है। ऐसा करने से व्यक्ति को सत्य का ज्ञान मिलता है। साथ ही, यह भी कहा जाता है कि यदि कोई व्यक्ति बेलपत्र के पौधे (Belpatra Tree) को छू लेता है, तो वह सभी पापों, नकारात्मकता और बीमारियों से मुक्त हो जाता है।

बेलपत्र के पौधे (Belpatra Tree) के वास्तु लाभ

बेलपत्र का पौधा (Belpatra Tree) सभी नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है और सकारात्मकता लाता है, अच्छा स्वास्थ्य और समृद्धि प्रदान करता है। इसके अलावा बेलपत्र के पेड़ के नीचे दीपक जलाने से ज्ञान लाभ होता है।

बेलपत्र का पौधा (Belpatra Tree) घर में कैसे उगाएं

  • बेल का फल लें, बीज अलग करने के लिए गूदा निकाल लें, उन्हें साफ कर लें तथा सुखाएं।

  • बेल के बीज बोने के लिए मिट्टी में गड्ढा खोदें।

  • नियमित रूप से जमीन में पानी डालें लेकिन बहुत अधिक पानी न दें।

  • कुछ सूखे पत्ते लें और उचित नमी बनाए रखने के लिए उन्हें मिट्टी में मिला दें।

  • फिर 10 से 12 दिनों के अंदर मिट्टी से अंकुर निकलते हुए दिखाई देगा।

बेलपत्र के पौधे (Belpatra Tree) की घर में देखभाल

यहां बताया गया है कि बेलपत्र के पौधे (Belpatra Tree) की देखभाल कैसे करना चाहिए:

बेल के पौधे के लिए जलवायु: Belpatra Tree गर्म वातावरण और सीधी धूप में अच्छी तरह उगते हैं। उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बेलपत्र का पौधा (Belpatra Tree) नम और गर्म जलवायु में अच्छी तरह से बढ़ता है। इसके लिए आमतौर पर 2 से 45 डिग्री सेल्सियस के बीच का तापमान ठीक रहता है।
 
बेलपत्र के पौधे को पानी देना: बेलपत्र के पौधे (Belpatra Tree) को बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है। लेकिन फल देने और बढ़ने के लिए इसे नियमित रूप से पानी देना पड़ता है। गर्मियों में बेलपत्र के पौधे (Belpatra Tree) को बार-बार पानी देने की जरूरत होती है, जबकि सर्दियों में सप्ताह में दो बार पानी देने की जरूरत होती है। मानसून में पौधे को पानी देने की जरूरत नहीं होती है।
 
बेलपत्र के पौधे के लिए उपयुक्त मिट्टी: बेलपत्र का पौधा (Belpatra Tree) रेतीली, मिट्टी या पथरीली मिट्टी में उगता है। हालांकि, दोमट और रेतीली मिट्टी में पौधे की वृद्धि अच्छी तरह से होती है। बेहतर फल उपज के लिए मिट्टी का PH 5-8 के बीच होना चाहिए।

बेलपत्र के पौधे (Belpatra Tree) की सुरक्षा: इस तरह से आप पौधे की सुरक्षा कर सकते हैं:

  • पौधे के आसपास से मृत, क्षतिग्रस्त या संक्रमित पौधे को हटा दें।

  • किसी भी तरह के कीट से सुरक्षा के लिए नीलगिरी, नीम या साइट्रस तेल का छिड़काव करें।

बेल पत्र (Bel Patra) कैसे चुनें?

हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि शिवलिंग पर चढ़ाने वाले Bel Patra - Bel leaves (बेलपत्र) में कम पत्ते हों। आमतौर पर कई बेलपत्र (Bel Patra) के पत्तों पर धारियां और चक्र बने होते हैं जिनका इस्तेमाल पूजा में नहीं करना चाहिए। मान्यता है कि धारियां और चक्र वाले बेलपत्र के पत्ते खंडित माने जाते हैं। 

जब आप श्रावण सोमवार (Shravan Somvar) के लिए बेल पत्र के पत्ते (Bel patra leaves) ले रहे हों, तो आपको यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पत्ते कहीं से कटे या फटे हुए न हों। अगर आपको बेलपत्र के कई पत्ते नहीं मिल पा रहे हैं, तो आप सिर्फ एक पत्ता ही चढ़ा सकते हैं; हालाँकि, वह पत्ता कहीं से फटा न हो।  

गर्मियों में रोजाना बेलपत्र क्यों खाना चाहिए?

गर्मियों में रोजाना बेल पत्र (Bel Patra) के पत्ते खाने से आपकी कई स्वास्थ्य समस्याएं दूर होती है। गर्मियों में रोजाना बेल पत्र के पत्तों का सेवन करने के ये कुछ प्रमुख फायदे इस प्रकार हैं:
  • यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।

  • हृदय स्वास्थ्य में सुधार करता है।

  • गैस, एसिडिटी व अपच जैसी पेट की समस्याओं से लड़ने में मदद करता है।

  • ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित करता है।

  • शरीर को ठंडक प्रदान करता है।

बेलपत्र का पौधा (Belpatra Tree) - कुछ महत्वपूर्ण बातें

हिंदू रीति-रिवाजों में बेलपत्र (Belpatra) चढ़ाने का काफी अधिक महत्व है। शिव पुराण के अनुसार, यह पत्ता भगवान शिव की पूजा करने हेतु इस्तेमाल किया जाता है। बेलपत्र का इस्तेमाल (Use of BelPatra) कई अन्य हिंदू देवी-देवताओं की पूजा के लिए भी किया जाता है।

आयुर्वेद में बेलपत्र को स्वास्थ्य तथा औषधीय गुणों से भरपुर बताया गया है। बेलपत्र के पत्ते (Belpatra Tree) का सेवन करने से आप रोगमुक्त और स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। बेलपत्र का धार्मिक महत्व (BelPatra Religious Significance) है और यह भगवान शिव को प्रसन्न करने हेतु चढ़ाया जाने वाला एक शुभ पत्ता है। 

घर में बेलपत्र का पौधा लगाने के फायदे.

भगवान शिव की अराधना का पर्व सावन माह, 14 जुलाई से शुरू हो रहा है. शिवपूजा में बेलपत्र का विशेष महत्व होता है. जिस घर में बेल पत्र का वृक्ष लगा होता है उनके घर विशेष तौर पर शिव की कृपा बनी रहती है. साथ ही ऐसे घर में साक्षात लक्ष्मी जी का वास होता है. पौधों को घर में एक निश्चित स्थान पर लगाने और इन्हें सही ढंग से स्थापित करने से कई समस्याएं दूर हो जाती है. शिव पुराण के अनुसार जिस स्थान पर बेलपत्र का पौधा लगाया जाता है वह काशी तीर्थ के समान पवित्र और पूजनीय स्थल हो जाता है. आइए जानते हैं घर में बेलपत्र का पौधा लगाने के फायदे.

दरिद्रता से मुक्ति

दरिद्रता को दूर करने के लिए घर में बेल पत्र का पौधा जरूर लगाना चाहिए. इससे मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और धन-धान्य के भंडार भरे रहते हैं. बेलपत्र का पत्ता आप अपने धन स्थान पर रख सकते हैं इससे घर में हमेशा बरकत बनी रहती है. आर्थिक संपन्नता के लिए इसे उत्तर-दक्षिण दिशा में लगाएं.

बुरे कर्मों के प्रभाव

शिव पुराण के अनुसार घर में बेलपत्र का पौधा होने से व्यक्ति के बुरे कर्मों का प्रभाव नष्ट हो जाता है और घर में रहने वाले सभी सदस्यों को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है.

ऊर्जावान रहने के लिए

मान्यता है कि बेल पत्र के पेड़ की जड़ों में मां गिरिजा, तने में मां महेश्वरी, शाखाओं में मां दक्षायनी, पत्तियों में मां पार्वती, फूलों में मां गौरी और फलों में देवी कात्यायनी वास करतीं हैं. शास्त्रों के अनुसार घर के उत्तर पश्चिम दिशा में लगा बेल का पौधा वहां रहने वाले सदस्यों को अधिक तेजस्वी और ऊर्जावान बनाता है।

टोने टोटके का असर नहीं

घर के आंगन में इसका पेड़ होने से बुरी शक्तियां घर में प्रवेश नहीं करती. ये तंत्र बाधाओं से हमें मुक्त कराता है और परिवार के सदस्यों की रक्षा करता है. इसके होने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है.

चंद्र दोष से छुटकारा

बेल पत्र घर में लगाने से कभी भी आपको चंद्र दोष और अन्य प्रकार के दोषों के अशुभ प्रभाव नहीं झेलने पड़ेंगे.

Bel Tree: बेल पेड़ से जुड़ी इन गलतियों को करने से रुष्ट हो जाते हैं शिव, जान लें जरूरी नियम और महत्व

Bel Tree: शिवपुराण के अनुसार, बेलपत्र में लक्ष्मी जी का वास होता है. शिवजी की पूजा में बेल के पत्ते से लेकर फूल, फल, लकड़ियां आदि का प्रयोग किया जाता है. इसलिए बेल पेड़ से जुड़ी गलतियां कभी न करें.

हिंदू धर्म में बेल के पेड़ का विशेष महत्व होता है. तुलसी, पीपल, केला आदि की तरह ही शास्त्रों में बेल के पेड़ को भी महत्वपूर्ण माना गया है. विशेषकर भगवान शिव की पूजा में बेल पेड़ की लकड़ियां, पत्ते, फूल और फल का इस्तेमाल किया जाता है.

धार्मिक ग्रंथों में भगवान शिव का जितना महत्व बताया गया है, उतना ही बखान बेल के पेड़ का भी किया गया है. मान्यता है कि बेल वृक्ष में भगवान शिव, माता पार्वती, लक्ष्मी जी समेत कई देवी-देवताओं का वास होता है.

आमतौर पर पूजा-पाठ में किसी वृक्ष के फूल या फल का प्रयोग होता है. लेकिन बेल ऐसा वृक्ष है, जिसकी पत्तियां भी पूजा के लिए पवित्र और महत्वपूर्ण मानी जाती है. शिवपुराण में इसे दिव्य वृक्ष बताया गया है. शिवजी को बेलपत्र अतिप्रिय है. इसलिए शिवजी से संबंधित सभी पूजा में बेलपत्र जरूर चढ़ाए जाते हैं. ऐसे में आपको बेल वृक्ष से जुड़ी इन महत्वपूर्ण बातों को जरूर जानना चाहिए.

कभी न करें बेल वृक्ष से जुड़ी ये गलतियां

  • शिवपुराण में बताया गया है कि, सोमवार के दिन कभी भी बेल के पत्ते, टहनी या डाली आदि नहीं तोड़ने चाहिए. यदि आपको सोमवार के दिन पूजा में बेलपत्र चढ़ाना है तो एक दिन पूर्व ही इसे तोड़कर रख लें.
  • सोमवार के साथ ही चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या और संक्रांति के दिन भी बेल पत्र नहीं तोड़ना चाहिए.
  • कभी भी बेल वृक्ष को काटना नहीं चाहिए. कहा जाता है कि बेल के पेड़ को काटने से व्यक्ति कई दुखों से घिर जाता है और वंश का नाश होने लगता है.
  • बेलपत्र कभी भी अशुद्ध नहीं होते हैं. इसलिए आप चढ़ाया हुआ बेलपत्र फिर से पूजा में चढ़ा सकते हैं.

बेल वृक्ष का महत्व

  • धार्मिक मान्यता है कि, बेल पेड़ की उत्पत्ति मां पार्वती के पसीने से हुई है. कहा जाता है कि, इसके जड़ में गिरजा, तनों में माहेश्वरी, शाखाओं में दक्षिणायनी, पत्तियों में मां पार्वती, फलों में कात्यानी, फूलों में गौरी और बेल के समस्त पेड़ में मां लक्ष्मी जी निवास करती हैं. मां पार्वती के पसीने से उत्पन्न होने के कारण मां सभी रूपों में इस पेड़ में वास करती हैं.
  • शिवपुराण में बताया गया है कि, अगर किसी मृतक के शव को बेल की छाया से होते हुए ले जाया जाए तो उसे मोक्ष और शिवलोक की प्राप्ति होती है.
  • पितरों को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करने और पितृदोष से मुक्ति के लिए भी बेल पेड़ को महत्वपूर्ण माना गया है. नियमित रूप से इसमें जल चढ़ाने से पितृदोष दूर हो जाता है.
  • वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर के उत्तर-पश्चिम दिशा में बेल का पेड़ लगाने से यश की प्राप्ति होती है और घर सुख-सौभाग्य से भरा रहता है.
  • बिल्वाष्टक स्तोत्र के अनुसार  "दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम्अघोरपापसंहारं एक बिल्वं शिवार्पणम्", यानी बेल पेड़ के स्पर्श और दर्शन मात्र से ही व्यक्ति के सभी पापों का नाश होता है. शिव को चढ़ाए गए एक बेलपत्र से अघोर पापों का नाश हो जाता है.

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q:बेलपत्र किस भगवान को चढ़ाया जाता है?
A:बेलपत्र मुख्यतः भगवान शिव और अन्य हिंदू देवताओं को भी चढ़ाया जाता है।
Q. भगवान शिव को बिल्व पत्र क्यों पसंद है?
A. ऐसा माना जाता है कि बिल्व पत्र के पत्ते भगवान शिव को प्रिय हैं। तीन पत्ती वाला बेल पत्र त्रिमूर्ति का प्रतिनिधित्व करता है: ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव)। जैसा कि पवित्र ग्रंथों में बताया गया है, बेलपत्र की तीन पत्तियां भगवान शिव की तीन आंखों का भी प्रतिनिधित्व करती हैं। बिल्व पत्र जैन धर्म में शुभ है क्योंकि 23वें तीर्थंकर पार्श्ववंत ने इसी वृक्ष के नीचे निर्वाण प्राप्त किया था। यह जानते हुए कि बिल्व पत्र भगवान शिव के पसंदीदा हैं, उनके भक्त इन पत्तियों का उपयोग करते हैं और उनके औषधीय लाभ प्राप्त करते हैं।
Q:बेलपत्र को अंग्रेजी में क्या कहते हैं?
A:अंग्रेजी में बेलपत्र को एगल मार्मेलोस (Aegle marmelos) या आमतौर पर स्टोन एप्पल या वुड एप्पल कहा जाता है।
Q. बेल पत्र के क्या उपयोग हैं?
A. बिल्व पत्र में औषधीय, त्वचा और वास्तु संबंधी लाभ हैं। इसमें सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्य भी हैं।
Q:क्या बेल पत्र का सेवन किया जा सकता है ?
A:बेलपत्र की पत्तियां कैल्शियम, पोटैशियम और आयरन जैसे खनिजों के साथ-साथ विटामिन A, B1 और B का अच्छा स्रोत हैं। उनके औषधीय लाभ हैं और इनका सेवन किया जा सकता है।
Q. बेल पत्र को अंग्रेजी में क्या कहते हैं?
A. एगल मार्मेलोस को बेल (या बिली या भेल), बंगाल क्विंस, गोल्डन सेब, जापानी कड़वा नारंगी, पत्थर सेब या लकड़ी सेब के रूप में जाना जाता है। यह भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण पूर्व एशिया की एक दुर्लभ प्रजाति है। यह भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल में प्राकृतिक प्रजाति के रूप में मौजूद है। यह पेड़ हिंदुओं के लिए पवित्र है। 
Q. बेलपत्र क्या हैं?
A. बेल के पौधे की पत्तियाँ बेलपत्र हैं। बेल पत्र एक पौधा है जिसे संस्कृत में बिल्व पत्र भी कहा जाता है। 'बिल्व' शब्द का अर्थ है बेल का पेड़ और 'पत्र' का अर्थ है पत्ता। बेल पत्र के पौधे में बेल फल भी शामिल है, जो एक कठोर खोल के साथ आता है और इसका स्वाद थोड़ा तीखा होता है। भारत में आप जिस क्षेत्र से हैं उसके आधार पर बेल पत्र के विभिन्न नाम और उच्चारण हैं। पौधे में सांस्कृतिक, सामाजिक और चिकित्सीय मूल्य हैं।
Q:बेलपत्र कैसे उपयोगी है?
A:बेलपत्र बेहद उपयोगी है, और यह वास्तु, स्वास्थ्य व त्वचा के लिए भी अच्छा है। इसके कुछ सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी हैं।
Q:क्या बेलपत्र का पौधा घर में लगा सकते हैं?
A:जी हां, बेलपत्र का पौधा घर में उत्तर पूर्व दिशा में लगाया जा सकता है। यह एक पवित्र तथा शुभ पौधा माना जाता है, जो घर से सभी नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर करता है।
Q:बेलपत्र के पत्ते कब नहीं तोड़ना चाहिए?
A:अष्टमी, अमावस्या, चतुर्थी और चतुर्दशी के दिन कभी भी बेलपत्र नहीं तोड़ना चाहिए। इसके अलावा, संक्रांति और सोमवार के दिन इन पत्तियों को नहीं तोड़ना चाहिए।
Q:क्या बेल पत्र की पत्तियां मधुमेह रोगियों के लिए फायदेमंद हैं?
A:रोज सुबह खाली पेट चार से पांच बेल के पत्ते चबाने से इंसुलिन नियंत्रित होता है और रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
Q:बालों के लिए बेलपत्र के पत्तों का उपयोग करने के क्या फायदे हैं?
A:जीरा के साथ मिलाकर स्कैल्प में मालिश करने पर बेलपत्र की पत्तियां हेयर टॉनिक की तरह काम करती हैं।
Q. क्या हम बेल पत्र का पत्ता खा सकते हैं? 
A. हां, आप बेल पत्र (पत्तियां) खा सकते हैं क्योंकि इसमें औषधीय और त्वचा संबंधी लाभ हैं। 


बिल्व वृक्ष  

बिल्व वृक्ष
बिल्व वृक्ष
जगतपादप (Plantae)
गणसापीन्दालेस (Sapindales)
कुलरुतासेऐ (Rutaceae)
जातिऐग्ले (Aegle)
प्रजातिमार्मेलोस (marmelos}
द्विपद नामऐग्ले मार्मेलोस
संबंधित लेखबेलपत्रशिवमहाशिवरात्रि
धार्मिक मान्यताहिन्दू धर्म में बिल्व वृक्ष की बड़ी मान्यता है। यह वृक्ष भगवान शिव को प्रिय है, ऐसा माना जाता है। इसके पत्ते शिव पूजा में विशेष रूप से प्रयोग किए जाते हैं।
औषधीय महत्त्वबिल्व वृक्ष के फल का सेवन वात, पित्त, कफ व पाचन क्रिया के दोषों को दूर करता है। यह त्वचा रोग और मधुमेह को बढ़ने से भी रोकता है।
अन्य जानकारीबिल्व वृक्ष पन्द्रह से तीस फुट ऊँचा और पत्तियाँ तीन और कभी-कभी पाँच पत्र युक्त होती हैं। गर्मियों में पत्ते गिरने पर मई में पुष्प लगते हैं

बिल्व अथव बेल (वानस्पतिक नाम: ऐग्ले मार्मेलोसअंग्रेज़ीAegle marmelos) विश्व के कई हिस्सों में पाया जाने वाला वृक्ष है। भारत में इस वृक्ष का पीपलनीमआमपारिजात और पलाश आदि वृक्षों के समान ही बहुत अधिक सम्मान है। हिन्दू धर्म में बिल्व वृक्ष भगवान शिव की अराधना का मुख्य अंग है। धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण इसे मंदिरों के पास लगाया जाता है। बिल्व वृक्ष की तासीर बहुत शीतल होती है। गर्मी की तपिश से बचने के लिए इसके फल का शर्बत बड़ा ही लाभकारी होता है। यह शर्बत कुपचन, आँखों की रौशनी में कमी, पेट में कीड़े और लू लगने जैसी समस्याओं से निजात पाने के लिये उत्तम है। बिल्व की पत्तियों मे टैनिन, लोहकैल्शियमपोटेशियम और मैग्नेशियम जैसे रसायन पाए जाते है।

परिचय

बिल्व वृक्ष पन्द्रह से तीस फुट ऊँचा और पत्तियाँ तीन और कभी-कभी पाँच पत्र युक्त होती हैं। तीखी स्वाद वाली इन पत्तियों को मसलने पर विशिष्ट गंध निकलती है। गर्मियों में पत्ते गिरने पर मई में पुष्प लगते हैं, जिनमें अगले वर्ष मार्च-मई तक फल तैयार हो जाते हैं। इसका कड़ा और चिकना फल कवच कच्ची अवस्था में हरे रंग और पकने पर सुनहरे पीले रंग का हो जाता है। कवच तोड़ने पर पीले रंग का सुगन्धित मीठा गूदा निकलता है, जो खाने और शर्बत बनाने के काम आता है। 'जंगली बेल' के वृक्ष में काँटे अधिक और फल छोटा होता है।

प्राप्ति स्थान

बेल के वृक्ष पूरे भारत में पाये जाते हैं। विशेष रूप से हिमालय की तराई, सूखे पहाड़ी क्षेत्रों में चार हज़ार फीट की ऊँचाई तक ये पाये जाते हैं। मध्य व दक्षिण भारत में बेल वृक्ष जंगल के रूप में फैले हुए हैं और बड़ी संख्या में उगते हैं। इसके पेड़ प्राकृतिक रूप से भारत के अलावा दक्षिणी नेपालश्रीलंकाम्यांमारपाकिस्तानबांग्लादेश, वियतनाम, लाओस, कंबोडिया एवं थाईलैंड में उगते हैं। इसके अतिरिक्त इसकी खेती पूरे भारत के साथ श्रीलंका, उत्तरी मलय प्रायद्वीप, जावा एवं फिलीपींस तथा फीजी द्वीपसमूह में भी की जाती है।

धार्मिक महत्त्व

हिन्दू धर्म में बिल्व वृक्ष को भगवान शिव का रूप माना जाता है। मान्यता है कि इसके मूल में महादेव का वास है। इसीलिए इस वृक्ष की पूजा का बहुत महत्त्व है। धर्मग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है। भगवान शिव को बिल्व और बिल्व के पत्ते अत्यधिक प्रिय हैं। नियमित बेलपत्र अर्पित करके भगवान शिव की पूजा करने वाला भगवान शिव का प्रिय होता है। ऐसा व्यक्ति अपनी जन्मपत्री में चाहे कितने भी अशुभ योग लेकर आया हो, तब भी उससे प्रभावित नहीं होता। 'शिवपुराण' में बेल के पेड़ को साक्षात शिव का स्वरूप कहा गया है। महर्षि व्यास के पुत्र सूतजी ने ऋषि-मुनियों को समझाते हुए कहा है कि- "जितने भी तीर्थ हैं, उन सबमें स्नान करने का जो फल है, वह बेल के वृक्ष के नीचे स्नान करने मात्र से प्राप्त हो जाता है।" गंध, पुष्प, धूप, दीप एवं नैवेद्य सहित जो व्यक्ति बिल्व के पेड़ की पूजा करता है, उसे इस लोक में संतान एवं भौतिक सुख मिलता है। ऐसा व्यक्ति मृत्यु के पश्चात् शिवलोक में स्थान प्राप्त करने योग्य बन जाता है। बेल के पेड़ की पूजा करने के बाद जो व्यक्ति एक भी शिव भक्त को आदर पूर्वक बेल की छांव में भोजन करवाता है, वह कोटि गुणा पुण्य प्राप्त कर लेता है। शिव भक्त को खीर एवं घी से बना भोजन करवाने वाले व्यक्ति पर महादेव की विशिष्ट कृपा होती है। ऐसा व्यक्ति कभी ग़रीब नहीं होता है। शाम के समय बेल की जड़ के चारों ओर दीपक जलाकर भगवान शिव का ध्यान और पूजन करने वाला व्यक्ति कई जन्मों के पाप कर्मों के प्रभाव से मुक्त हो जाता है।

महिमा

भगवान शिव की पूजा में बिल्व पत्र यानी बेलपत्र का विशेष महत्व है। महादेव एक बेलपत्र अर्पण करने से भी प्रसन्न हो जाते है, इसलिए तो उन्हें 'आशुतोष' भी कहा जाता है। सामान्य तौर पर बेलपत्र में एक साथ तीन पत्तियाँ जुड़ी रहती हैं, जिसे ब्रह्माविष्णु और महेश का प्रतीक माना जाता है। वैसे तो बेलपत्र की महिमा का वर्णन कई पुराणों में मिलता है, लेकिन 'शिवपुराण' में इसकी महिमा विस्तृत रूप में बतायी गयी है। शिवपुराण में कहा गया है कि बेलपत्र भगवान शिव का प्रतीक है। भगवान स्वयं इसकी महिमा स्वीकारते हैं। मान्यता है कि बेल वृक्ष की जड़ के पास शिवलिंग रखकर जो भक्त भगवान शिव की आराधना करते हैं, वे हमेशा सुखी रहते हैं। बेल वृक्ष की जड़ के निकट शिवलिंग पर जल अर्पित करने से उस व्यक्ति के परिवार पर कोई संकट नहीं आता और वह सपरिवार खुश और संतुष्ट रहता है। कहते हैं कि बेल वृक्ष के नीचे भगवान भोलेनाथ को खीर का भोग लगाने से परिवार में धन की कमी नहीं होती है और वह व्यक्ति कभी निर्धन नहीं होता है। बेल वृक्ष की उत्पत्ति के संबंध में 'स्कंदपुराण' में कहा गया है कि एक बार देवी पार्वती ने अपनी ललाट से पसीना पोछकर फेंका, जिसकी कुछ बूंदें मंदार पर्वत पर गिरीं, जिससे बेल वृक्ष उत्पन्न हुआ। इस वृक्ष की जड़ों में गिरिजा, तना में महेश्वरी, शाखाओं में दक्षयायनी, पत्तियों में पार्वती, फूलों में गौरी और फलों में कात्यायनी वास करती हैं। कहा जाता है कि बेल वृक्ष के कांटों में भी कई शक्तियाँ समाहित हैं। यह माना जाता है कि देवी महालक्ष्मी का भी बेल वृक्ष में वास है। जो व्यक्ति शिव-पार्वती की पूजा बेलपत्र अर्पित कर करते हैं, उन्हें महादेव और देवी पार्वती दोनों का आशीर्वाद मिलता है।

पौराणिक कथा

भगवान शिव को प्रसन्न करने का सबसे सरल तरीका उन्हें 'बेलपत्र' अर्पित करना है। बेलपत्र के पीछे भी एक पौराणिक कथा का महत्त्व है। इस कथा के अनुसार- "भील नाम का एक डाकू था। यह डाकू अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए लोगों को लूटता था। एक बार सावन माह में यह डाकू राहगीरों को लूटने के उद्देश्य से जंगल में गया और एक वृक्ष पर चढ़कर बैठ गया। एक दिन-रात पूरा बीत जाने पर भी उसे कोई शिकार नहीं मिला। जिस पेड़ पर वह डाकू छिपा था, वह बेल का पेड़ था। रात-दिन पूरा बीतने पर वह परेशान होकर बेल के पत्ते तोड़कर नीचे फेंकने लगा। उसी पेड़ के नीचे एक शिवलिंग स्थापित था। जो पत्ते वह डाकू तोडकर नीचे फेंख रहा था, वह अनजाने में शिवलिंग पर ही गिर रहे थे। लगातार बेल के पत्ते शिवलिंग पर गिरने से भगवान शिव प्रसन्न हुए और अचानक डाकू के सामने प्रकट हो गए और डाकू को वरदान माँगने को कहा। उस दिन से बिल्व-पत्र का महत्त्व और बढ़ गया।[१]

शिव का वास

शिवलिंग पर अर्पित बिल्वपत्र

'शिवपुराण' में बेलपत्र के वृक्ष की जड़ में शिव का वास माना गया है। इसलिए इसकी जड़ में गंगाजल के अर्पण का बहुत महत्व है। शिव और बेलपत्र का व्यावहारिक और वैज्ञानिक पहलू भी है। यह शिव पूजा द्वारा प्रकृति से प्रेम और उसे सहेजने की सीख देता है। कुदरत के नियमों या उसकी किसी भी रूप में हानि मानव जीवन के लिए घातक है। इसी तरह प्रकृति और सावन में बारिश के मौसम के साथ तालमेल बैठाने के लिए इसे गुणकारी माना गया है। शिव को बेलपत्र चढ़ाने से तीन युगों के पाप नष्ट हो जाते हैं। ग्रंथों में भगवान शिव को प्रकृति रूप मानकर उनकी रचना, पालन और संहार शक्तियों की वंदना की गई है। यही कारण है कि भगवान शिव की उपासना में भी फूल-पत्र और फल के चढ़ावे का विशेष महत्व है। शिव को बेलपत्र या बिल्वपत्र का चढ़ावा बहुत ही पुण्यदायी माना गया है।[२]

बेलपत्र से महादेव की पूजा का रहस्य

भगवान शिव को औढ़र दानी कहते हैं। शिव का यह नाम इसलिए है, क्योंकि यह जब देने पर आते हैं तो भक्त जो भी मांग ले, बिना हिचक दे देते हैं। इसलिए सकाम भावना से पूजा-पाठ करने वाले लोगों को भगवान शिव अति प्रिय हैं। भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या और भोग सामग्री की भी ज़रूरत होती है, जबकि शिव जी थोड़ी सी भक्ति और बेलपत्र एवं जल से भी खुश हो जाते हैं। यही कारण है कि भक्तगण जल और बेलपत्र से शिवलिंग की पूजा करते हैं। शिव जी को ये दोनों चीजें क्यों पसंद हैं, इसका उत्तर पुराणों में दिया गया है।

समुद्र मंथन के समय जब हलाहल नाम का विष निकलने लगा, तब विष के प्रभाव से सभी देवता एवं जीव-जंतु व्याकुल होने लगे। ऐसे समय में भगवान शिव ने विष को अपनी अंजुली में लेकर पी लिया। विष के प्रभाव से स्वयं को बचाने के लिए शिव जी ने इसे अपनी कंठ में रख लिया, इससे शिव जी का कंठ नीला पड़ गया और शिव जी 'नीलकंठ' कहलाने लगे। लेकिन विष के प्रभाव से शिव का मस्तिष्क गर्म हो गया। ऐसे समय में देवताओं ने शिव के मस्तिष्क पर जल उड़लेना शुरू किया, जिससे मस्तिष्क की गर्मी कम हुई। बेल के पत्तों की तासीर भी ठंढ़ी होती है। इसलिए शिव को बेलपत्र भी चढ़ाया गया। इसी समय से शिव जी की पूजा जल और बेलपत्र से शुरू हो गयी। बेलपत्र और जल से शिव जी का मस्तिष्क शीतल रहता है और उन्हें शांति मिलती है। इसलिए बेलपत्र और जल से पूजा करने वाले पर शिव जी प्रसन्न होते हैं।[३]

महत्त्वपूर्ण तथ्य

बिल्व वृक्ष का फल
  • जो व्यक्ति दो अथवा तीन बेलपत्र भी शुद्धतापूर्वक भगवन शिव पर चढ़ाता है, उसे निःसंदेह भवसागर से मुक्ति प्राप्ति होती है।[२]
  • यदि कोई व्यक्ति अखंडित (बिना कटा हुआ) बेलपत्र भगवान शिव पर चढ़ाता है, तो वह निर्विवाद रूप से अंत में शिवलोक को प्राप्त होता है।
  • बिल्व वृक्ष के दर्शन, स्पर्शन व प्रणाम करने से ही रात-दिन के सम्पूर्ण पाप दूर हो जाया करते हैं।
  • चतुर्थीअमावस्याअष्टमीनवमी, चौदस, संक्रांति, और सोमवार के दिन बिल्वपत्र तोड़ना निषिद्ध है।
  • भगवान शिव को बिल्वपत्र सदैव उल्टा अर्पित करना चाहिए, अर्थात् पत्ते का चिकना भाग शिवलिंग के ऊपर रहना चाहिए।
  • बिल्वपत्र में चक्र एवं वज्र नहीं होना चाहिये। कीड़ों द्वारा बनाये हुए सफ़ेद चिन्ह को चक्र कहते हैं और बिल्वपत्र के डंठल के मोटे भाग को वज्र कहते हैं।
  • बिल्वपत्र तीन से ग्यारह दलों तक के प्राप्त होतें हैं। ये जितने अधिक पत्रों के हों, उतना ही उत्तम होता है।
  • शिव जी को अर्पित किये जाने वाले बिल्वपत्र कटे-फटे एवं कीड़े के खाए नहीं होने चाहिए।
  • यदि किसी को बिल्वपत्र मिलने की मुश्किल हो तो उसके स्थान पर चांदी का बिल्वपत्र चढ़ाया जा सकता है, जिसे नित्य शुद्ध जल से धोकर शिवलिंग पर पुनः स्थापित किया जा सकता है।

अन्य भाषाओं में नाम

गर्मी एवं पेट के रोगों से मुक्ति प्रदान करने वाला बिल्व वृक्ष संस्कृत में 'बिल्व' और हिन्दी में 'बेल' नाम से प्रसिद्ध है। यह महाराष्ट्र और बंगाल में 'बेल', कोंकण में 'लोहगासी', गुजरात में 'बीली', पंजाब में 'वेल' और 'सीफल' संथाल में 'सिंजो', काठियावाड़ में 'थिलकथ' नाम से जाना जाता है। इसके गीले गूदे को 'बिल्वपेशिका' या 'बिल्वकर्कटी' तथा सूखे गूदे 'बेल सोंठ' या 'बेल गिरी' कहा जाता है। इसका शर्बत बड़ा ही स्वादिष्ट होता है, जो स्वास्थ्यवर्धक होने के साथ ही साथ कई बीमारियों को दूर रखने में सहायक है।

औषधीय गुण

आयुर्वेद में बेल वृक्ष को कई प्रकार से लाभकारी बताया गया है। इसके पत्तों, फलों आदि का औषधी के रूप में बहुत प्रयोग किया जाता है। इसके कुछ घरेलू इलाज निम्नलिखित हैं, किन्तु इनका सेवन करने से पहले आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श कर लेना उचित रहता है-

बिल्व फल
  • गुजरात प्राँत के डाँग ज़िले के आदिवासी बेल और सीताफल पत्रों की समान मात्रा मधुमेह के रोगियों के देते है।
  • गर्मियों मे पसीने और तन की दुर्गंध को दूर भगाने के लिये यदि बेल की पत्तियों का रस नहाने के बाद शरीर पर लगा दिया जाए तो समस्या से छुटकारा मिल सकता है।
  • पातालकोट के आदिवासियों के अनुसार बेल के कच्चे फल और पत्तियों को गौ-मूत्र में पीस लिया जाए और नारियल तेल में इसे गर्म कर कान में डाला जाए तो बधिरता दूर हो सकती है।
  • जिन्हे हाथ-पैर, तालुओं और शरीर में अक्सर जलन की शिकायत रहती है, उन्हें कच्चे बेल फल के गूदे को नारियल तेल में एक सप्ताह तक डुबोए रखने के बाद, इस तेल से प्रतिदिन स्नान से पूर्व मालिश करनी चाहिये।
  • बेल की जड़ों की छाल का काढ़ा मलेरिया व अन्य बुखारों में हितकर होता है।
  • अजीर्ण में बेल की पत्तियों के दस ग्राम रस में, एक-एक ग्राम काली मिर्च और सेंधा नमक मिलाकर पिलाने से आराम मिल सकता है।
  • अतिसार के पतले दस्तों में ठंडे पानी से 5-10 ग्राम बिल्व चूर्ण लेने से आराम पहुँचाता है। कच्चे बेल की कचरियों को धूप में अच्छी तरह सुखा लें या पंसारी से साफ छाँट कर ले आएँ। इन्हें बारीक पीस कर व कपड़े से छान करके शीशी में भर लें। यही बिल्व चूर्ण है। छोटे बच्चों के दाँत निकलते समय दस्तों में भी यह चुटकी भर देना चाहिए।
  • आँखें दुखने पर बेल के पत्तों का रस, स्वच्छ पतले वस्त्र से छानकर एक-दो बूँद आँखों में टपकाना चाहिए। इससे दुखती आँखों की पीड़ा, चुभन, शूल ठीक होकर, नेत्र ज्योति बढ़ती है।
  • जल जाने पर बिल्व चूर्ण को गरम किए गये तेल में मिलाकर उसको ठंडा करके पेस्ट बना लें। इसे जले अंग पर लेप करने से आराम आएगा। चूर्ण न होने पर बेल का पका हुआ गूदा साफ करके भी लेपा जा सकता है।

में मदद मिलती है।

2) त्वचा के लिए बेल पत्र के फायदे:

a) यदि आप अत्यधिक पसीने या त्वचा पर चकत्ते के कारण दुर्गंध की परेशानी से पीड़ित हैं, तो बेल पत्र का मिश्रण कुछ दिनों तक लगाने से शरीर की दुर्गंध कम हो जाएगी।

बी) बेल पत्र का रस खाने या पीने से बालों के झड़ने की समस्या को हल करने और रूखे और रूखे बालों को चिकना करने में मदद मिल सकती है।

ग) बेल पत्र का मिश्रण त्वचा पर सफेद धब्बे हटाने में मदद करता है जो दवा के दुष्प्रभाव के रूप में विकसित हो सकते हैं।

घर पर बेल पत्र कैसे उगायें

बेल पत्र का पौधा बहुत आसानी से उपलब्ध नहीं होता है क्योंकि यह आमतौर पर जंगलों में उगाया जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार , बेल पत्र का पौधा देवी पार्वती के पसीने की बूंदों से विकसित हुआ था और इसलिए इसे बहुत शुभ और पवित्र माना जाता है। घर पर बेल का पौधा उगाने के लिए इसकी जड़ बोने का सबसे अच्छा समय मानसून के दौरान होता है।

बेलपत्र के वास्तु लाभ

बेल पत्र का पौधा सभी नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर करता है और आसपास के वातावरण को सकारात्मकता से भर देता है क्योंकि यह अच्छा स्वास्थ्य और समृद्धि भी प्रदान करता है। ज्ञान प्राप्ति के लिए बेल के पेड़ के नीचे दीपक जलाना अच्छा माना जाता है।

बेल पत्र नींबू पानी रेसिपी

गर्मियों में बेल पत्र का उपयोग गर्मी से राहत पाने के लिए ताज़गी देने वाले पेय के रूप में भी किया जाता है। आइए एक नजर डालते हैं कि आप इस ड्रिंक को घर पर कैसे बना सकते हैं।

तैयारी का समय: 10 मिनट

पकाने का समय: 0 मिनट

कुल समय: 10 मिनट

कठिनाई स्तर: आसान

अवयव:

  • 1 बेल फल
  • 1-2 गिलास पानी
  • ½ नींबू
  • 4-5 पुदीने की पत्तियां
  • स्वादानुसार गुड़/भूरी चीनी

तैयार कैसे करें:

  1. एक बेल का फल लें और उसका गूदा निकाल लें। 
  2. गूदे को एक कटोरे में रखें और एक गिलास पानी डालें। 
  3. गूदे को मसल कर बीज अलग कर लीजिये.
  4. गूदे से पानी छान लें.
  5. पुदीने की पत्तियों को पीस लें.
  6. एक गिलास लें और उसमें कुटी हुई पुदीने की पत्तियां और नींबू डालें।
  7. गिलास में छना हुआ जूस डालें और अच्छी तरह मिला लें.

श्रावण विशेष : बेलपत्र का महत्व, उपयोग एवम लाभ

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श्रावण विशेष : बेलपत्र का महत्व, उपयोग एवम लाभ

श्रावण विशेष : बेलपत्र का महत्व, उपयोग एवम लाभ

हमारे धर्मशास्त्रों में ऐसे निर्देश दिए गए हैं, जिससे धर्म का पालन करते हुए पूरी तरह प्रकृति की रक्षा भी हो सके। यही वजह है कि देवी-देवताओं को अर्पित किए जाने वाले फूल और पत्र को तोड़ने से जुड़े कुछ नियम बनाए गए हैं। तो आइये जानते हैं पण्डित दयानन्द शास्त्री जी से भगवान शिव को बिल्वपत्र अर्पित करने का विधि विधान।

क्या है बेलपत्र

बेल के पेड़ की पत्तियों को बेलपत्र कहते हैं। पत्र में तीन पत्तियां एक साथ जुड़ी होती हैं लेकिन इन्हें एक ही पत्ती मानते हैं। शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करने से महादेव प्रसन्न होते हैं। मान्यता है कि शिव की उपासना बिना बेलपत्र के पूरी नहीं होती। अगर आप भी देवों के देव महादेव की विशेष कृपा पाना चाहते हैं तो बेलपत्र के महत्व को समझना बेहद ज़रूरी है।

बेलपत्र और शिव :

भगवान शंकर को बेलपत्र बेहद प्रिय हैं। भांग धतूरा और बिल्व पत्र से प्रसन्न होने वाले केवल शिव ही हैं। सावन में बेलपत्रों से विशेष रूप से शिव की पूजा की जाती है। तीन पत्तियों वाले पत्र आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं, किंतु कुछ ऐसे बिल्व पत्र भी होते हैं जो दुर्लभ पर चमत्कारिक और अद्भुत होते  हैं।

शिव आराधना में चढाने हेतु ऐसे होने चाहिए बेलपत्र

शिव आराधना में चढाने हेतु ऐसे होने चाहिए बेलपत्रशि‍व को बेलपत्र अर्पित करते वक्त और इसे तोड़ते समय कुछ खास नियमों का पालन करना जरूरी होता है ।क्या है वो नियम आइये जानते हैं-

  • भूलकर भी चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या तिथियों के साथ-साथ सं‍क्रांति के समय और सोमवार को बेलपत्र नहीं तोड़नी चाहिए।
  • शास्त्रों में कहा गया है कि अगर नया बेलपत्र न मिल सके, तो किसी दूसरे के चढ़ाए हुए पत्र को भी धोकर कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे किसी भी तरह का पाप नहीं लगेगा। जो स्कंदपुराम में बताया गया है।अर्पितान्यपि बिल्वानि प्रक्षाल्यापि पुन: पुन:।शंकरायार्पणीयानि न नवानि यदि क्वचित्।। (स्कंदपुराण)
  • एक बेलपत्र में तीन पत्तियां होनी चाहिए।
  • पत्तियां कटी या टूटी हुई न हों और उनमें कोई छेद भी नहीं होना चाहिए।
  • भगवान शिव को बेलपत्र चिकनी ओर से ही अर्पित करें।
  • शिव जी को बेलपत्र अर्पित करते समय साथ ही में जल की धारा जरूर चढ़ाएं।
  • बिना जल के बेलपत्र अर्पित नहीं करना चाहिए।

यह भी

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि हमारे धार्मिक ग्रंथों में बिल्व पत्र के वृक्ष को ‘श्रीवृक्ष’ भी कहा जाता है इसे ‘शिवद्रुम’ भी कहते है। बिल्वाष्टक और शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव को बेलपत्र अत्यंत प्रिय है। मान्यता है कि बेल पत्र के तीनो पत्ते त्रिनेत्रस्वरूप् भगवान शिव के तीनों नेत्रों को विशेष प्रिय हैं। बिल्व पत्र के पूजन से सभी पापो का नाश होता है ।

स्कंदपुराण’ में बेल पत्र के वृक्ष की उत्पत्ति के संबंध में कहा गया है कि एक बार माँ पार्वती ने अपनी उँगलियों से अपने ललाट पर आया पसीना पोछकर उसे फेंक दिया , माँ के पसीने की कुछ बूंदें मंदार पर्वत पर गिरीं, कहते है उसी से बेल वृक्ष उत्पन्न हुआ।

क्या है बेलपत्रशास्त्रों के अनुसार इस वृक्ष की जड़ों में माँ गिरिजा, तने में माँ महेश्वरी, इसकी शाखाओं में माँ दक्षयायनी, बेल पत्र की पत्तियों में माँ पार्वती, इसके फूलों में माँ गौरी और बेल पत्र के फलों में माँ कात्यायनी का वास हैं।

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हमारे शास्त्रों में बिल्व का पेड़ संपन्नता का प्रतीक, बहुत पवित्र तथा समृद्धि देने वाला है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते है कि बिल वृक्ष में माँ लक्ष्मी का भी वास है अत: घर में बेल पत्र लगाने से देवी महालक्ष्मी बहुत प्रसन्न होती हैं, जातक वैभवशाली बनता है।

बेलपत्र से भगवान शिव का पूजन करने से समस्त सांसारिक सुख की प्राप्ति होती है, धन-सम्पति की कभी भी कमी नहीं होती है।

अगर बेलपत्र पर ॐ नम: शिवाय या राम राम लिखकर उसे भगवान भोलेनाथ पर अर्पित किया जाय तो यह बहुत ही पुण्यदायक होता है ।

शास्त्रों के अनुसार रविवार के दिन बेलपत्र का पूजन करने से समस्त पापो का नाश होता है।

तृतीया तिथि के स्वामी देवताओं के कोषाध्यक्ष एवं भगवान भोलाथ के प्रिय कुबेर जी है । तृतीया को बेलपत्र चढ़ाकर कुबेर जी की पूजा करने , उनके मन्त्र का जाप करने से अतुल ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। और अगर कुबेर जी की पूजा बेल के वृक्ष के नीचे बैठकर, अथवा शिव मंदिर में की जाय तो पीढ़ियों तक धन की कोई भी कमी नहीं रहती है । भगवान शंकर को विल्वपत्र अर्पित करने से मनुष्य कि सर्वकार्य व मनोकामना सिद्ध होती हैं।

बेल पत्र का महत्व, कैसे हुई उत्‍पत्ति और क्‍या है फायदे

हिंदू धर्म में बेलपत्र का विशेष महत्व होता है। बेलपत्र बहुत ही पवित्र और शिव को प्रिय होती है और ये मंत्र का स्‍मरण करने से सारे पाप नष्‍ट हो जाते हैै  ”दर्शनम् बिल्‍व पत्रस्‍य, स्‍पर्शनमं पाप नाशनम्” अर्थात बेल पत्र का दर्शन कर लेने मात्र से पापों का नाश हो जाता है। लेकिन बेल पत्र का इतना महत्‍व क्‍यों है, इसके बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं। बैलपत्र के फल व पेड भी पूजनीय होते है और इसको लेकर एक कथा प्रचलित है।

बेल वृक्ष की उत्पत्ति स्कन्द पुराण के अनुसार, एक बार माता पार्वती जब भ्रमण कर रहीं थीं, तब उनके शरीर से पसीने की बूंद मंदराचल पर्वत पर गिर गई थी। उस पसीने के बूंद से पर्वत पर एक पेड़ की उत्पत्ति हुई और इस पेड़ को ही बेल वृक्ष के नाम से जाना गया। चूंकि, इस पेड़ की उत्पत्ति मां पार्वती के पसीने से हुई थी इसलिए इस पेड़ में मां पार्वती के सभी रूप वास करते हैं। बेल पेड़ के जड़ को गिरजा का स्वरूप माना गया है।

बेलपत्र का महत्व

हिंदू धर्म ग्रंथों में यह मान्यता है कि जिस प्रकार भगवान विष्णु को तुलसी पत्र प्रिय है वैसे ही भगवान शिव को बेलपत्र बहुत पसंद है। इसलिए शिव पूजा में बेल पत्र को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार जो कोई भी शिव जी की पूजा बेलपत्र से करते हैं उसकी मनोकामना भगवान जल्द ही पूरा करते हैं।

इस मंत्र का जाप करते हुए चढ़ानी चाहिए बिल्व पत्र

‘त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रयायुधम।
त्रिजन्मपापसंहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम।

शास्त्रों के अनुसार इस मंत्र का अर्थ होता है हे तीन गुणों तीन नेत्र, त्रिशूल को धारण करने वाले शिव जी, तीन जन्मों के पापों का संहार करने वाले शिव, मैं आपको बिल्वपत्र अर्पित करता हूं।


धार्मिक मान्यताएं (Belpatra)

1. इसके तनों में माहेश्वरी और शाखाओं में दक्षिणायनी एवं बेल के पत्तियों में मां पार्वती वास करती हैं। बेल के फलों में कात्यानी, फूलों में गौरी का वास होता है। इन सभी स्वरूपों के अलावा, मां लक्ष्मी जी बेल के समस्त पेड़ में निवास करती हैं। मान्यता है कि बेलपत्र मां पार्वती का प्रतिबिंब है जिसके कारण यह भगवान शिव को बहुत प्रिय है। शिव जी पर बेलपत्र चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं।

2. यदि कोई शव बिल्वपत्र के पेड़ की छाया से होकर श्मशान ले जाया जाता है, तो उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके अलावा बिल्वपत्र के पेड़ को नियमित रूप से जल चढ़ाने पर पितृों को तृप्ति मिलती है, और पितृदोष से मुक्ति मिलती है।

3. बिल्वपत्र के वृक्ष में लक्ष्मी का वास माना गया है। इसकी पूजा करने से दरिद्रता दूर होती है और बेलपत्र के वृक्ष और सफेद आक को जोड़े से लगाने पर निरंतर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

4. बेल की पत्तियां अधिकतर तीन, पांच या सात के समूह में होती हैं। तीन के समूह की तुलना भगवान शिव के त्रिनेत्र या त्रिशूल से की जाती है। इसके अलावा इन्हें त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी माना जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार मंदार पर्वत पर माता पार्वती के पसीने की बूंदे गिरने से बेल के पेड़ की उत्पत्ति हुई। यह पेड़ सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न कर आसपास की नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है।

बेल पत्‍त‍ियां खराब न हों (Belpatra)

मान्‍यता है कि बेलपत्र चढ़ाने से शि‍व जी का मस्‍तक शीतल रहता है। हालांकि इस दौरान ध्‍यान रखना चाहिए की बेलपत्र में तीन पत्‍त‍ियां हों। इसके अलावा पत्‍त‍ियां खराब न हों। बेलपत्र चढ़ाते समय जल की धारा साथ में जरूर अर्पि‍त करना चाहिए।

सेहत के फायदे

  • बेल फल में मौजूद टैनिन डायरिया और कालरा जैसे रोगों के उपचार में काम आता है।
  • कच्चे फल का गूदा सफेद दाग बीमारी का प्रभावकारी इलाज कर सकता है।
  • इससे एनीमिया, आंख और कान के रोग भी दूर होते हैं।
  • पुराने समय में कच्चे बेल के गूदे को हल्दी और घी में मिलाकर टूटी हुई हड्डी पर लगाया जाता था।
  • इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स के चलते पेट के छालों में आराम मिलता है।
  • बेल की पत्तियों का सत्व रक्त में कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम करने में लाभदायक है।
  • पेड़ से मिलने वाला तेल अस्थमा और सर्दी-जुकाम जैसे श्वसन संबंधी रोगों से लड़ने में सहायक है।
  • पके हुए फल के रस में घी मिलाकर पीने से दिल की बीमारियां दूर रहती हैं।
  • कब्ज दूर करने की सबसे अच्छी प्राकृतिक दवा है। इसके गूदे में नमक और काली मिर्च मिलाकर खाने से आंतों से विषैले तत्व बाहर निकल जाते हैं।
  • गर्मी की तपिश से बचने के लिए बेल का शर्बत पीना ज्‍यादा उचित होता है क्‍योंकि इसकी तासीर ठंडी होती है। बेल के पत्‍तों की तासीर भी ठंडी होती हैं।

बिल्व पत्र का महत्व

importance of vilv patra

बिल्व पत्र का महत्व बिल्व तथा श्रीफल नाम से प्रसिद्ध यह फल बहुत ही काम का है। यह जिस पेड़ पर लगता है वह शिवद्रुम भी कहलाता है। बिल्व का पेड़ संपन्नता का प्रतीक, बहुत पवित्र तथा समृद्धि देने वाला है।
बेल के पत्ते शंकर जी का आहार माने गए हैं, इसलिए भक्त लोग बड़ी श्रद्धा से इन्हें महादेव के ऊपर चढ़ाते हैं। शिव की पूजा के लिए बिल्व-पत्र बहुत ज़रूरी माना जाता है। शिव-भक्तों का विश्वास है कि पत्तों के त्रिनेत्रस्वरूप् तीनों पर्णक शिव के तीनों नेत्रों को विशेष प्रिय हैं।
भगवान शंकर को बिल्व पत्र बेहद प्रिय हैं।
भांग धतूरा और बिल्व पत्र से प्रसन्न होने वाले केवल शिव ही हैं। शिवरात्रि के अवसर पर बिल्वपत्रों से विशेष रूप से शिव की पूजा की जाती है। तीन पत्तियों वाले बिल्व पत्र आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं, किंतु कुछ ऐसे बिल्व पत्र भी होते हैं जो दुर्लभ पर चमत्कारिक और अद्भुत होते हैं।
बिल्वाष्टक और शिव पुराण में बिल्व पत्र का भगवान शंकर के पूजन में विशेष महत्व है, जिसका प्रमाण शास्त्रों में मिलता है। अन्य कई ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है। भगवान शंकर एवं पार्वती को बिल्व पत्र चढ़ाने का विशेष महत्व है।
मां भगवती को बिल्व पत्र श्रीमद् देवी भागवत में स्पष्ट वर्णन है कि जो व्यक्ति मां भगवती को बिल्व पत्र अर्पित करता है वह कभी भी किसी भी परिस्थिति में दुखी नहीं होता। उसे हर तरह की सिद्धि प्राप्त होती है और कई जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है और वह भगवान भोले नाथ का प्रिय भक्त हो जाता है। उसकी सभी इच्छाएं पूरी होती हैं और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
बिल्व पत्र के प्रकार??????
बिल्व पत्र चार प्रकार के होते हैं – अखंड बिल्व पत्र, तीन पत्तियों के बिल्व पत्र, छः से २१ पत्तियों तक के बिल्व पत्र और श्वेत बिल्व पत्र। इन सभी बिल्व पत्रों का अपना-अपना आध्यात्मिक महत्व है। आप हैरान हो जाएंगे ये जानकर की कैसे ये बेलपत्र आपको भाग्यवान बना सकते हैं और लक्ष्मी कृपा दिला सकते हैं।
अखंड बिल्व पत्र का विवरण बिल्वाष्टक में इस प्रकार है – ‘‘अखंड बिल्व पत्रं नंदकेश्वरे सिद्धर्थ लक्ष्मी’’। यह अपने आप में लक्ष्मी सिद्ध है। एकमुखी रुद्राक्ष के समान ही इसका अपना विशेष महत्व है। यह वास्तुदोष का निवारण भी करता है।


इसे गल्ले में रखकर नित्य पूजन करने से व्यापार में चौमुखी विकास होता है।तीन पत्तियों वाला बिल्व पत्र के महत्व का वर्णन भी बिल्वाष्टक में आया है जो इस प्रकार है-
‘‘त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतम् त्रिजन्म पाप सहारं एक बिल्वपत्रं शिवार्पणम’’

यह तीन गणों से युक्त होने के कारण भगवान शिव को प्रिय है। इसके साथ यदि एक फूल धतूरे का चढ़ा दिया जाए, तो फलों में बहुत वृद्धि होती है। तीन पत्तियों वाला बिल्व पत्र अर्पित करने से भक्त को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
रीतिकालीन कवि ने इसका वर्णन इस प्रकार किया है- ‘‘देखि त्रिपुरारी की उदारता अपार कहां पायो तो फल चार एक फूल दीनो धतूरा को’’ भगवान आशुतोष त्रिपुरारी भंडारी सबका भंडार भर देते हैं। तीन पत्तियों वाला बिल्व पत्रआप भी फूल चढ़ाकर इसका चमत्कार स्वयं देख सकते हैं और सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं। तीन पत्तियों वाले बिल्व पत्र में अखंड बिल्व पत्र भी प्राप्त हो जाते हैं।
कभी-कभी एक ही वृक्ष पर चार, पांच, छह पत्तियों वाले बिल्व पत्र भी पाए जाते हैं। परंतु ये बहुत दुर्लभ हैं।
छह से लेकर २१ पत्तियों वाले बिल्व पत्रये मुख्यतः नेपाल (nepal) में पाए जाते हैं। पर भारत (india) में भी कहीं-कहीं मिलते हैं। जिस तरह रुद्राक्ष कई मुखों वाले होते हैं उसी तरह बिल्व पत्र भी कई पत्तियों वाले होते हैं।
श्वेत बिल्व पत्र जिस तरह सफेद सांप, सफेद टांक, सफेद आंख, सफेद दूर्वा आदि होते हैं उसी तरह सफेद बिल्वपत्र भी होता है। यह प्रकृति की अनमोल देन है। इस बिल्व पत्र के पूरे पेड़ पर श्वेत पत्ते पाए जाते हैं। इसमें हरी पत्तियां नहीं होतीं। इन्हें भगवान शंकर को अर्पित करने का विशेष महत्व है। कैसे आया बेल वृक्ष?????
बेल वृक्ष की उत्पत्ति के संबंध में ‘स्कंदपुराण’ में कहा गया है कि एक बार देवी पार्वती ने अपनी ललाट से पसीना पोछकर फेंका, जिसकी कुछ बूंदें मंदार पर्वत पर गिरीं, जिससे बेल वृक्ष उत्पन्न हुआ। इस वृक्ष की जड़ों में गिरिजा, तना में महेश्वरी, शाखाओं में दक्षयायनी, पत्तियों में पार्वती, फूलों में गौरी और फलों में कात्यायनी वास करती हैं।
कांटों में भी हैं शक्तियाँ, कहा जाता है कि बेल वृक्ष के कांटों में भी कई शक्तियाँ समाहित हैं। यह माना जाता है कि देवी महालक्ष्मी का भी बेल वृक्ष में वास है।
जो व्यक्ति शिव-पार्वती की पूजा बेलपत्र अर्पित कर करते हैं, उन्हें महादेव और देवी पार्वती दोनों का आशीर्वाद मिलता है। ‘शिवपुराण’ में इसकी महिमा विस्तृत रूप में बतायी गयी है।
ये भी है श्रीफल (नारियल)से पहले बिल्व के फल को श्रीफल माना जाता था क्योंकि बिल्व वृक्ष लक्ष्मी जी का प्रिय वृक्ष माना जाता था।
प्राचीन समय में बिल्व फल को लक्ष्मी और सम्पत्ति का प्रतीक मान कर लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के लिए बिल्व के फल की आहुति दी जाती थी जिसका स्थान अब नारियल ने ले लिया है। प्राचीन समय से ही बिल्व वृक्ष और फल पूजनीय रहा है, पहले लक्ष्मी जी के साथ और धीरे-धीरे शिव जी के साथ।
वनस्पति में बेल का अत्यधिक महत्व है। यह मूलतः शक्ति का प्रतीक माना गया है। किसी-किसी पेड़ पर पांच से साढ़े सात किलो वजन वाले चिकित्सा विज्ञान में बेल का विशेष महत्व है।
आज कल कई व्यक्ति इसकी खेती करने लगे हैं। इसके फल से शरबत, अचार और मुरब्बा आदि बनाए जाते हैं। यह हृदय रोगियों और उदर विकार से ग्रस्त लोगों के लिए रामबाण औषधि है।
यह एक रामबाण दवा भी है। धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण इसे मंदिरों के पास लगाया जाता है।
बिल्व वृक्ष की तासीर बहुत शीतल होती है। गर्मी की तपिश से बचने के लिए इसके फल का शर्बत बड़ा ही लाभकारी होता है। यह शर्बत कुपचन, आंखों की रोशनी में कमी, पेट में कीड़े और लू लगने जैसी समस्याओं से निजात पाने के लिए उत्तम है। औषधीय गुणों से परिपूर्ण बिल्व की पत्तियों मे टैनिन, लोह, कैल्शियम, पोटेशियम और मैग्नेशियम जैसे रसायन पाए जाते हैं।
क्या हैं बेल पत्र अथवा बिल्व-पत्र?
बिल्व-पत्र एक पेड़ की पत्तियां हैं, जिस के हरे पत्ते लगभग तीन-तीन के समूह में मिलते हैं। कुछ पत्तियां चार या पांच के समूह की भी होती हैं। किन्तु चार या पांच के समूह वाली पत्तियां बड़ी दुर्लभ होती हैं। बेल के पेड को बिल्व भी कहते हैं। बिल्व के पेड़ का विशेष धार्मिक महत्व हैं।

शास्त्रोक्त मान्यता हैं कि बेल के पेड़ को पानी या गंगाजल से सींचने से समस्त तीर्थो का फल प्राप्त होता हैं एवं भक्त को शिवलोक की प्राप्ति होती हैं। बेल कि पत्तियों में औषधि गुण भी होते हैं। जिसके उचित औषधीय प्रयोग से कई रोग दूर हो जाते हैं।
भारतिय संस्कृति में बेल के वृक्ष का धार्मिक महत्व हैं, क्योकि बिल्व का वृक्ष भगवान शिव का ही रूप है। धार्मिक ऐसी मान्यता हैं कि बिल्व-वृक्ष के मूल अर्थात उसकी जड़ में शिव लिंग स्वरूपी भगवान शिव का वास होता हैं। इसी कारण से बिल्व के मूल में भगवान शिव का पूजन किया जाता हैं। पूजन में इसकी मूल यानी जड़ को सींचा जाता हैं।
धर्मग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता हैं-
बिल्वमूले महादेवं लिंगरूपिणमव्ययम्।
य: पूजयति पुण्यात्मा स शिवं प्राप्नुयाद्॥
बिल्वमूले जलैर्यस्तु मूर्धानमभिषिञ्चति।स सर्वतीर्थस्नात: स्यात्स एव भुवि पावन:॥
(शिवपुराण)भावार्थ: बिल्व के मूल में लिंगरूपी अविनाशी महादेव का पूजन जो पुण्यात्मा व्यक्ति करता है, उसका कल्याण होता है। जो व्यक्ति शिवजी के ऊपर बिल्वमूल में जल चढ़ाता है उसे सब तीर्थो में स्नान का फल मिल जाता है।
बिल्व पत्र तोड़ने का मंत्र...
बिल्व-पत्र को सोच-समझ कर ही तोड़ना चाहिए। बेल के पत्ते तोड़ने से पहले निम्न मंत्र का उच्चरण करना चाहिए-
अमृतोद्भव श्रीवृक्ष महादेवप्रियःसदा। गृह्यामि तव पत्राणि शिवपूजार्थमादरात्॥
-(आचारेन्दु)भावार्थ: अमृत से उत्पन्न सौंदर्य व ऐश्वर्यपूर्ण वृक्ष महादेव को हमेशा प्रिय है। भगवान शिव की पूजा के लिए हे वृक्ष में तुम्हारे पत्र तोड़ता हूं।
कब न तोड़ें बिल्व कि पत्तियां????
विशेष दिन या विशेष पर्वो के अवसर पर बिल्व के पेड़ से पत्तियां तोड़ना निषेध हैं।
शास्त्रों के अनुसार बेल कि पत्तियां इन दिनों में नहीं तोड़ना चाहिए.....
बेल कि पत्तियां सोमवार के दिन नहीं तोड़ना चाहिए। बेल कि पत्तियां चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या की तिथियों को नहीं तोड़ना चाहिए। बेल कि पत्तियां संक्रांति के दिन नहीं तोड़ना चाहिए।
अमारिक्तासु संक्रान्त्यामष्टम्यामिन्दुवासरे । बिल्वपत्रं न च छिन्द्याच्छिन्द्याच्चेन्नरकं व्रजेत ॥
(लिंगपुराण)भावार्थ: अमावस्या, संक्रान्ति के समय, चतुर्थी, अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी तिथियों तथा सोमवार के दिन बिल्व-पत्र तोड़ना वर्जित है।
चढ़ाया गया पत्र भी पूनः चढ़ा सकते हैं। शास्त्रों में विशेष दिनों पर बिल्व-पत्र तोडकर चढ़ाने से मना किया गया हैं तो यह भी कहा गया है कि इन दिनों में चढ़ाया गया बिल्व-पत्र धोकर पुन: चढ़ा सकते हैं।
अर्पितान्यपि बिल्वानि प्रक्षाल्यापि पुन: पुन:। शंकरायार्पणीयानि न नवानि यदि चित्॥ (स्कन्दपुराण) और (आचारेन्दु)
भावार्थ: अगर भगवान शिव को अर्पित करने के लिए नूतन बिल्व-पत्र न हो तो चढ़ाए गए पत्तों को बार-बार धोकर चढ़ा सकते हैं। बेल पत्र चढाने का मंत्र भगवान शंकर को बिल्वपत्र अर्पित करने से मनुष्य कि सर्वकार्य व मनोकामना सिद्ध होती हैं। श्रावण में बिल्व पत्र अर्पित करने का विशेष महत्व शास्त्रो में बताया गया हैं।
बिल्व पत्र अर्पित करते समय इस मंत्र का उच्चारण करना चाहिए:
त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतम्। त्रिजन्मपापसंहार, विल्वपत्र शिवार्पणम्
भावार्थ: तीन गुण, तीन नेत्र, त्रिशूल धारण करने वाले और तीन जन्मों के पाप को संहार करने वाले हे शिवजी आपको त्रिदल बिल्व पत्र अर्पित करता हूं।शिव को बिल्व-पत्र चढ़ाने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।




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