बिल्व, बेल पत्थरबेल
| बिल्व, बेल पत्थर बेल | |
|---|---|
| वैज्ञानिक वर्गीकरण | |
| जगत: | पादप |
| अश्रेणीत: | आङग्योस्पेर्मै |
| अश्रेणीत: | एकबीजपत्री |
| अश्रेणीत: | रोसिदै |
| गण: | सापीन्दालेस |
| कुल: | रुतासेऐ |
| उपकुल: | औरान्त्योइदेऐ |
| वंश समूह: | क्लौसेनेऐ |
| वंश: | ऐग्ले कोरेआ |
| जाति: | ऐ. मार्मेलोस |
| द्विपद नाम | |
| 'ऐग्ले मार्मेलोस (L.) कोर्र.सेर्र | |
धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण इसे मंदिरों के पास लगाया जाता है। हिन्दू धर्म में इसे भगवान शिव का रूप ही माना जाता है व मान्यता है कि इसके मूल यानि जड़ में महादेव का वास है तथा इनके तीन पत्तों को जो एक साथ होते हैं उन्हे त्रिदेव का स्वरूप मानते हैं परंतु पाँच पत्तों के समूह वाले को अधिक शुभ माना जाता है, अतः पूज्य होता है। धर्मग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है।[4][5] इसके वृक्ष १५-३० फीट ऊँचे कँटीले एवं मौसम में फलों से लदे रहते हैं। इसके पत्ते संयुक्त विपत्रक व गंध युक्त होते हैं तथा स्वाद में तीखे होते हैं। गर्मियों में पत्ते गिर जाते हैं तथा मई में नए पुष्प आ जाते हैं। फल मार्च से मई के बीच आ जाते हैं। बेल के फूल हरी आभा लिए सफेद रंग के होते हैं व इनकी सुगंध भीनी व मनभावनी होती है।[2][5]
परिचय



बेल का फल ५-१७ सेंटीमीटर व्यास के होते हैं। इनका हल्के हरे रंग का खोल कड़ा व चिकना होता है। पकने पर हरे से सुनहरे पीले रंग का हो जाता है जिसे तोड़ने पर मीठा रेशेदार सुगंधित गूदा निकलता है। इस गूदे में छोटे, बड़े कई बीज होते हैं। बाजार में दो प्रकार के बेल मिलते हैं- छोटे जंगली और बड़े उगाए हुए। दोनों के गुण समान हैं। जंगलों में फल छोटा व काँटे अधिक तथा उगाए गए फलों में फल बड़ा व काँटे कम होते हैं। बेल का फल अलग से पहचान में आ जाता है। इसकी अनुप्रस्थ काट करने पर यह १०-१५ खण्डों में विभक्त सा लगता है, जिनमें प्रत्येक में ६-१० बीज होते हैं। ये सभी बीज सफेद लुआव से परस्पर जुड़े होते हैं।[5] प्रायः सर्वसुलभ होने से इसमें मिलावट कम होती है। कभी-कभी इसमें गार्मीनिया मेंगोस्टना तथा कैथ के फल मिला दिए जाते हैं, परन्तु इसे काट कर इसकी परीक्षा की जा सकती है। इनकी वीर्य कालावधि लगभग एक वर्ष है।

आचार्य चरक और सुश्रुत दोनों ने ही बेल को उत्तम संग्राही बताया है। फल-वात शामक मानते हुए इसे ग्राही गुण के कारण पाचन संस्थान के लिए समर्थ औषधि माना गया है। आयुर्वेद के अनेक औषधीय गुणों एवं योगों में बेल का महत्त्व बताया गया है, परन्तु एकाकी बिल्व, चूर्ण, मूलत्वक्, पत्र स्वरस भी अत्यधिक लाभदायक है।[3] चक्रदत्त बेल को पुरानी पेचिश, दस्तों और बवासीर में बहुत अधिक लाभकारी मानते हैं। बंगसेन एवं भाव प्रकाश ने भी इसे आँतों के रोगों में लाभकारी पाया है। यह आँतों की कार्य क्षमता बढ़ती है, भूख सुधरती है एवं इन्द्रियों को बल मिलता है।
बेल फल का गूदा डिटर्जेंट का काम करता है जो कपड़े धोने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। यह चूने के प्लास्टर के साथ मिलाया जाता है जो कि जलअवरोधक का काम करता है और मकान की दीवारो सीमेंट में जोड़ा जाता है। चित्रकार अपने जलरंग मे बेल को मिलाते है जो कि चित्रों पर एक सुरक्षात्मक परत लगाता है।[3]
रासायनिक संगठन
बेल के फल की मज्जा में मूलतः ग्राही पदार्थ पाए जाते हैं। ये हैं-म्युसिलेज पेक्टिन, शर्करा, टैनिन्स। इसमें मूत्र रेचक संघटक हैं-मार्मेलोसिन नामक एक रसायन जो स्वल्प मात्रा में ही विरेचक है।[2] इसके अतिरिक्त बीजों में पाया जाने वाला एक हल्के पीले रंग की तीखा तेल (लगभग १२ प्रतिशत) भी रेचक होता है। शक्कर ४.३ प्रतिशत, उड़नशील तेल तथा तिक्त सत्व के अतिरिक्त २ प्रतिशत भस्म भी होती है। भस्म में कई प्रकार के आवश्यक लवण होते हैं। बिल्व पत्र में एक हरा-पीला तेल, इगेलिन, इगेलिनिन नामक एल्केलाइड भी पाए गए हैं। कई विशिष्ट एल्केलाइड यौगिक व खनिज लवण त्वक् में होते हैं।[5]
सन्दर्भ
- ↑ 'रोगान बिलत्ति-भिनत्ति इति बिल्व। '
- ↑ इस तक ऊपर जायें:अ आ इ बेमिसाल बेल Archived 2010-01-05 at the Wayback Machine।अभिव्यक्ति पर। दीपिका जोशी
- ↑ इस तक ऊपर जायें:अ आ इ बेल[मृत कड़ियाँ]। वेबग्रीन पर
- ↑ बिल्वमूले महादेवं लिंगरूपिणमव्ययम्। य: पूजयति पुण्यात्मा स शिवं प्राप्नुयाद्॥
बिल्वमूले जलैर्यस्तु मूर्धानमभिषिंचति। स सर्वतीर्थस्नात: स्यात्स एव भुवि पावन:॥ शिव पुराण १३/१४
अर्थ- बिल्व के मूल में लिंगरूपी अविनाशी महादेव का पूजन जो पुण्यात्मा व्यक्ति करता है, उसका कल्याण होता है। जो व्यक्ति शिवजी के ऊपर बिल्वमूल में जल चढ़ाता है उसे सब तीर्थो में स्नान का फल मिल जाता है।

बेलपत्र को संस्कृत (BelPatra in Sanskrit) में बिल्व पत्र (Bilva Patra) कहा जाता है। BelPatra (बेलपत्र) को काफी पवित्र माना जाता है जिसे देवी-देवताओं को चढ़ाया जाता है। बिल्व शब्द का अर्थ बेल का पेड़ और पत्र का अर्थ पत्ता होता है। अंग्रेजी में बेलपत्र (BelPatra in English) को ऐगल मार्मेलोस (Aegle marmelos) या वुड एप्पल (Wood Apple) कहा जाता है। इस पौधे पर कठोर खोल और हल्के तीखे स्वाद वाला बेल फल लगता है। पुराणों और वेदों के अनुसार, बेलपत्र का धार्मिक, औषधीय तथा सांस्कृतिक महत्व है।
हिंदू धर्म में बेलपत्र के पौधे (Belpatra Tree) को दिव्य वृक्ष माना जाता है, जिसे भगवान शिव को चढ़ाया जाता है। पौधे में सत्त्व तत्व होते हैं जो वातावरण में रज-तम कणों को निष्क्रिय करने के लिए सात्विक तरंगों को अवशोषित तथा उत्सर्जित करते हैं।
इसके अलावा, बेलपत्र (Belpatra) एक त्रिकोणों वाला पत्ता है जो भगवान शिव, ब्रह्मा, विष्णु और महेश की तीन आंखों को दर्शाता है। ये तीन आँखें, या शक्तियाँ, निर्णय लेने, कार्य करने तथा ज्ञान से जुड़ी हैं। Belpatra Tree को जैन धर्म में भी शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि 23वें तीर्थंकर पार्श्ववंत ने इसी वृक्ष के नीचे निर्वाण प्राप्त किया था।
बेलपत्र अंग्रेजी में
बेल को अंग्रेजी में एगल मार्मेलोस (Aegle Marmelos) कहा जाता है, जिसके अन्य नाम बेल, बिली या भेल कहा जाता है। बेलपत्र के अन्य अंग्रेजी नाम वुड एप्पल (Wood Apple), बंगाल क्वीन (Bengal Quince) और स्टोन एप्पल (Stone Apple) हैं। बेलपत्रों में तीन कोण होते हैं जो त्रिमूर्ति यानी ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश को दर्शाते हैं। अंग्रेजी का "bilva" शब्द बेल के पेड़ (Belpatra Tree) को दर्शाता है।
बेलपत्र के पेड़ का महत्व
शिव पुराण में बेलपत्र के पेड़ (Belpatra Tree) या उसके पत्तों की पूजा के महत्व की व्याख्या दी गई है। मनुष्य ही नहीं देवता भी बेलपत्र के वृक्ष की पूजा करते हैं। पुराणों के अनुसार, भगवान शिव शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करने वाले की हर मनोकामना पूरी करते हैं।
Belpatra के पत्ते शिव की ऊर्जा को अवशोषित करते हैं, और जब इसे भगवान को चढ़ाया जाता है, तो इसमें कुछ ऊर्जा समा जाती है। Belpatra Tree (बेलपत्र के पौधे) की जड़ों के आसपास स्नान करना ब्रह्मांड के सभी पवित्र जल में स्नान करने के बराबर है, जिससे व्यक्ति पवित्र और दिव्य हो जाता है। इसके अलावा, बेल-पत्र का प्रसाद किसी के तमस्, रजस व सत्व - किसी व्यक्ति के स्वभाव के तीन पहलुओं को त्यागने का संकेत है।

बेलपत्र का औषधीय महत्व
BelPatra (बेलपत्र) एक अनूठा पौधा है और इसके कई औषधीय लाभ हैं। बेल के फल में विटामिन और खनिज, जैसे विटामिन A, C, कैल्शियम, पोटेशियम, राइबोफ्लेविन, फाइबर और B6, B12 और B1 होते हैं। ये खनिज और विटामिन शरीर के विकास के लिए आवश्यक हैं।
यह पौधा तीनों दोषों को संतुलित करता है, जिसे आयुर्वेद में वात, पित्त और कफ कहा गया है। इसके अलावा, BelPatra (बेलपत्र) का रोजाना सेवन करने से उच्च रक्तचाप, हृदय की समस्याओं और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने में मदद करेगा।
पहले कच्चे बेल को हल्दी और घी में मिलाकर हड्डी टूटने पर लगाया जाता था।
बेलपत्र के 16 फायदे (Benefits of Bel Patra Plant)
बेलपत्र के पेड़ की छाल, जड़, फल और पत्ते सभी का इस्तेमाल अलग-अलग रोगों के इलाज के लिए किया जाता है। इस पवित्र वृक्ष से मसूड़ों से खून आना, अस्थमा, पीलिया, पेचिश, एनीमिया और कई अन्य बीमारियों को ठीक किया जा सकता है।
बेल के फल में मौजूद टैनिन हैजा और डायरिया के इलाज में मदद करता है और इसके सूखे पाउडर का इस्तेमाल पुराने डायरिया के इलाज हेतु किया जाता है।
BelPatra (बेलपत्र) में एंटीफंगल और एंटीवायरल गुण होते हैं जो शरीर के कई संक्रमणों का इलाज करने में मदद करते हैं।
बेल के पत्ते (BelPatra) अत्यधिक चिकित्सीय होते हैं क्योंकि इसका अर्क कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने में मदद कर सकता है।
BelPatra से निकाले गए तेल से सर्दी और अस्थमा जैसे श्वसन संबंधी विकार ठीक हो सकते हैं।
घी और पके हुए बेल फल के मिश्रण को रोजाना खाने से दिल की कई बीमारियों से बचा जा सकता है।
बेल फल कब्ज दूर करता है। नमक और काली मिर्च के साथ बेल फल का गूदा आंतों से विषाक्त पदार्थों को हटाने में मदद करता है।
इसमें लैक्सेटिव अधिक होने के कारण बेलपत्र रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में फायदेमंद है।
बेलपत्र का इस्तेमाल करने से त्वचा पर होने वाले रैशेस को ठीक करने में मदद मिल सकती है। साथ ही यह शरीर की दुर्गंध को दूर करने में भी मदद करता है।
बेलपत्र का जूस पीने से आपके बाल झड़ने की समस्या दूर हो जाएगी। यह रूखे बालों को मुलायम बनाता है।
BelPatra त्वचा के उन धब्बों को खत्म करने में मदद करता है जो दवा के साइड इफेक्ट के कारण होते हैं।
- BelPatra के फल में टैनिन होता है, जो विटिलिगो और बवासीर के प्रभावी उपचार में मदद करता है। प्राचीन काल में इन समस्याओं के उपचार हेतु कच्चे बेलपत्र के रस का इस्तेमाल किया जाता था।
- चूँकि बेल पत्र (BelPatra) में एंटी-ऑक्सीडेंट यौगिक भी होते हैं, यह गैस्ट्रिक अल्सर से भी लड़ने में मदद करता है। इस तरह के अल्सर से पेट में अम्ल का स्तर असंतुलित हो जाता है।
- BelPatra के फलों के अर्क में रोगाणुरोधी गुण भी होते हैं। कई शोधकर्ताओं ने कहा है कि यह शरीर के कई संक्रमणों के इलाज में मदद करता है।
- शरीर में विटामिन C की कमी से स्कर्वी रोग हो सकता है। यह रोग व्यक्ति की रक्त वाहिकाओं को प्रभावित करता है लेकिन इसका बेल से इसका इलाज किया जा सकता है। BelPatra में कई विटामिन पाए जाते हैं, और यह इस रोग को ठीक कर सकता है।
- बेल के अर्क में भी सूजनरोधी (anti-inflammatory) गुण होते हैं। इसके लिए आपको बेल के अर्क को सूजन वाली जगह पर लगाना है।
- लैक्सेटिव से भरपूर होने के कारण Bel Patra ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित करने में उपयोगी होता है। यह आपके अग्न्याशय को एक्टिव करता है, ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करने हेतु आवश्यक इंसुलिन का उत्पादन करता है।

बेलपत्र से जुड़ी कहानी (BelPatra Story)
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, माना जाता है कि Belpatra (बेलपत्र) से पूरे ब्रह्मांड का निर्माण हुआ है। स्कंद पुराण के अनुसार, यह भगवान शिव का सबसे प्रिय पत्ता है। इस महापुराण में उल्लेख है कि एक बार देवी पार्वती के पसीने की बूंद मंदरांचल पर्वत पर गिरी थी, जहां से बिल्व वृक्ष यानी Belpatra का पेड़ निकला। इसलिए इसमें माता पार्वती के सभी रूप हैं। यह भी माना जाता है कि Belpatra के पौधे में देवी पार्वती अपने सभी रूपों में वास करती हैं।
बेलपत्र के पौधे का धार्मिक महत्व
मिट्टी के दीयों से बेलपत्र के पेड़ की जड़ों की पूजा करना शुभ माना जाता है। ऐसा करने से व्यक्ति को सत्य का ज्ञान मिलता है। साथ ही, यह भी कहा जाता है कि यदि कोई व्यक्ति बेलपत्र के पौधे (Belpatra Tree) को छू लेता है, तो वह सभी पापों, नकारात्मकता और बीमारियों से मुक्त हो जाता है।
बेलपत्र के पौधे (Belpatra Tree) के वास्तु लाभ
बेलपत्र का पौधा (Belpatra Tree) सभी नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है और सकारात्मकता लाता है, अच्छा स्वास्थ्य और समृद्धि प्रदान करता है। इसके अलावा बेलपत्र के पेड़ के नीचे दीपक जलाने से ज्ञान लाभ होता है।
बेलपत्र का पौधा (Belpatra Tree) घर में कैसे उगाएं
बेल का फल लें, बीज अलग करने के लिए गूदा निकाल लें, उन्हें साफ कर लें तथा सुखाएं।
बेल के बीज बोने के लिए मिट्टी में गड्ढा खोदें।
नियमित रूप से जमीन में पानी डालें लेकिन बहुत अधिक पानी न दें।
कुछ सूखे पत्ते लें और उचित नमी बनाए रखने के लिए उन्हें मिट्टी में मिला दें।
फिर 10 से 12 दिनों के अंदर मिट्टी से अंकुर निकलते हुए दिखाई देगा।
बेलपत्र के पौधे (Belpatra Tree) की घर में देखभाल
यहां बताया गया है कि बेलपत्र के पौधे (Belpatra Tree) की देखभाल कैसे करना चाहिए:
बेलपत्र के पौधे (Belpatra Tree) की सुरक्षा: इस तरह से आप पौधे की सुरक्षा कर सकते हैं:
पौधे के आसपास से मृत, क्षतिग्रस्त या संक्रमित पौधे को हटा दें।
किसी भी तरह के कीट से सुरक्षा के लिए नीलगिरी, नीम या साइट्रस तेल का छिड़काव करें।
बेल पत्र (Bel Patra) कैसे चुनें?
गर्मियों में रोजाना बेलपत्र क्यों खाना चाहिए?
यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।
हृदय स्वास्थ्य में सुधार करता है।
गैस, एसिडिटी व अपच जैसी पेट की समस्याओं से लड़ने में मदद करता है।
ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित करता है।
शरीर को ठंडक प्रदान करता है।
बेलपत्र का पौधा (Belpatra Tree) - कुछ महत्वपूर्ण बातें
हिंदू रीति-रिवाजों में बेलपत्र (Belpatra) चढ़ाने का काफी अधिक महत्व है। शिव पुराण के अनुसार, यह पत्ता भगवान शिव की पूजा करने हेतु इस्तेमाल किया जाता है। बेलपत्र का इस्तेमाल (Use of BelPatra) कई अन्य हिंदू देवी-देवताओं की पूजा के लिए भी किया जाता है।
आयुर्वेद में बेलपत्र को स्वास्थ्य तथा औषधीय गुणों से भरपुर बताया गया है। बेलपत्र के पत्ते (Belpatra Tree) का सेवन करने से आप रोगमुक्त और स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। बेलपत्र का धार्मिक महत्व (BelPatra Religious Significance) है और यह भगवान शिव को प्रसन्न करने हेतु चढ़ाया जाने वाला एक शुभ पत्ता है।
घर में बेलपत्र का पौधा लगाने के फायदे.
भगवान शिव की अराधना का पर्व सावन माह, 14 जुलाई से शुरू हो रहा है. शिवपूजा में बेलपत्र का विशेष महत्व होता है. जिस घर में बेल पत्र का वृक्ष लगा होता है उनके घर विशेष तौर पर शिव की कृपा बनी रहती है. साथ ही ऐसे घर में साक्षात लक्ष्मी जी का वास होता है. पौधों को घर में एक निश्चित स्थान पर लगाने और इन्हें सही ढंग से स्थापित करने से कई समस्याएं दूर हो जाती है. शिव पुराण के अनुसार जिस स्थान पर बेलपत्र का पौधा लगाया जाता है वह काशी तीर्थ के समान पवित्र और पूजनीय स्थल हो जाता है. आइए जानते हैं घर में बेलपत्र का पौधा लगाने के फायदे.
दरिद्रता से मुक्ति
दरिद्रता को दूर करने के लिए घर में बेल पत्र का पौधा जरूर लगाना चाहिए. इससे मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और धन-धान्य के भंडार भरे रहते हैं. बेलपत्र का पत्ता आप अपने धन स्थान पर रख सकते हैं इससे घर में हमेशा बरकत बनी रहती है. आर्थिक संपन्नता के लिए इसे उत्तर-दक्षिण दिशा में लगाएं.
बुरे कर्मों के प्रभाव
शिव पुराण के अनुसार घर में बेलपत्र का पौधा होने से व्यक्ति के बुरे कर्मों का प्रभाव नष्ट हो जाता है और घर में रहने वाले सभी सदस्यों को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है.
ऊर्जावान रहने के लिए
मान्यता है कि बेल पत्र के पेड़ की जड़ों में मां गिरिजा, तने में मां महेश्वरी, शाखाओं में मां दक्षायनी, पत्तियों में मां पार्वती, फूलों में मां गौरी और फलों में देवी कात्यायनी वास करतीं हैं. शास्त्रों के अनुसार घर के उत्तर पश्चिम दिशा में लगा बेल का पौधा वहां रहने वाले सदस्यों को अधिक तेजस्वी और ऊर्जावान बनाता है।
टोने टोटके का असर नहीं
घर के आंगन में इसका पेड़ होने से बुरी शक्तियां घर में प्रवेश नहीं करती. ये तंत्र बाधाओं से हमें मुक्त कराता है और परिवार के सदस्यों की रक्षा करता है. इसके होने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है.
चंद्र दोष से छुटकारा
बेल पत्र घर में लगाने से कभी भी आपको चंद्र दोष और अन्य प्रकार के दोषों के अशुभ प्रभाव नहीं झेलने पड़ेंगे.
Bel Tree: बेल पेड़ से जुड़ी इन गलतियों को करने से रुष्ट हो जाते हैं शिव, जान लें जरूरी नियम और महत्व
Bel Tree: शिवपुराण के अनुसार, बेलपत्र में लक्ष्मी जी का वास होता है. शिवजी की पूजा में बेल के पत्ते से लेकर फूल, फल, लकड़ियां आदि का प्रयोग किया जाता है. इसलिए बेल पेड़ से जुड़ी गलतियां कभी न करें.
हिंदू धर्म में बेल के पेड़ का विशेष महत्व होता है. तुलसी, पीपल, केला आदि की तरह ही शास्त्रों में बेल के पेड़ को भी महत्वपूर्ण माना गया है. विशेषकर भगवान शिव की पूजा में बेल पेड़ की लकड़ियां, पत्ते, फूल और फल का इस्तेमाल किया जाता है.
धार्मिक ग्रंथों में भगवान शिव का जितना महत्व बताया गया है, उतना ही बखान बेल के पेड़ का भी किया गया है. मान्यता है कि बेल वृक्ष में भगवान शिव, माता पार्वती, लक्ष्मी जी समेत कई देवी-देवताओं का वास होता है.
आमतौर पर पूजा-पाठ में किसी वृक्ष के फूल या फल का प्रयोग होता है. लेकिन बेल ऐसा वृक्ष है, जिसकी पत्तियां भी पूजा के लिए पवित्र और महत्वपूर्ण मानी जाती है. शिवपुराण में इसे दिव्य वृक्ष बताया गया है. शिवजी को बेलपत्र अतिप्रिय है. इसलिए शिवजी से संबंधित सभी पूजा में बेलपत्र जरूर चढ़ाए जाते हैं. ऐसे में आपको बेल वृक्ष से जुड़ी इन महत्वपूर्ण बातों को जरूर जानना चाहिए.
कभी न करें बेल वृक्ष से जुड़ी ये गलतियां
- शिवपुराण में बताया गया है कि, सोमवार के दिन कभी भी बेल के पत्ते, टहनी या डाली आदि नहीं तोड़ने चाहिए. यदि आपको सोमवार के दिन पूजा में बेलपत्र चढ़ाना है तो एक दिन पूर्व ही इसे तोड़कर रख लें.
- सोमवार के साथ ही चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या और संक्रांति के दिन भी बेल पत्र नहीं तोड़ना चाहिए.
- कभी भी बेल वृक्ष को काटना नहीं चाहिए. कहा जाता है कि बेल के पेड़ को काटने से व्यक्ति कई दुखों से घिर जाता है और वंश का नाश होने लगता है.
- बेलपत्र कभी भी अशुद्ध नहीं होते हैं. इसलिए आप चढ़ाया हुआ बेलपत्र फिर से पूजा में चढ़ा सकते हैं.
बेल वृक्ष का महत्व
- धार्मिक मान्यता है कि, बेल पेड़ की उत्पत्ति मां पार्वती के पसीने से हुई है. कहा जाता है कि, इसके जड़ में गिरजा, तनों में माहेश्वरी, शाखाओं में दक्षिणायनी, पत्तियों में मां पार्वती, फलों में कात्यानी, फूलों में गौरी और बेल के समस्त पेड़ में मां लक्ष्मी जी निवास करती हैं. मां पार्वती के पसीने से उत्पन्न होने के कारण मां सभी रूपों में इस पेड़ में वास करती हैं.
- शिवपुराण में बताया गया है कि, अगर किसी मृतक के शव को बेल की छाया से होते हुए ले जाया जाए तो उसे मोक्ष और शिवलोक की प्राप्ति होती है.
- पितरों को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करने और पितृदोष से मुक्ति के लिए भी बेल पेड़ को महत्वपूर्ण माना गया है. नियमित रूप से इसमें जल चढ़ाने से पितृदोष दूर हो जाता है.
- वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर के उत्तर-पश्चिम दिशा में बेल का पेड़ लगाने से यश की प्राप्ति होती है और घर सुख-सौभाग्य से भरा रहता है.
- बिल्वाष्टक स्तोत्र के अनुसार "दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम्, अघोरपापसंहारं एक बिल्वं शिवार्पणम्", यानी बेल पेड़ के स्पर्श और दर्शन मात्र से ही व्यक्ति के सभी पापों का नाश होता है. शिव को चढ़ाए गए एक बेलपत्र से अघोर पापों का नाश हो जाता है.


शिव को बेलपत्र अर्पित करते वक्त और इसे तोड़ते समय कुछ खास नियमों का पालन करना जरूरी होता है ।क्या है वो नियम आइये जानते हैं-
शास्त्रों के अनुसार इस वृक्ष की जड़ों में माँ गिरिजा, तने में माँ महेश्वरी, इसकी शाखाओं में माँ दक्षयायनी, बेल पत्र की पत्तियों में माँ पार्वती, इसके फूलों में माँ गौरी और बेल पत्र के फलों में माँ कात्यायनी का वास हैं।
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